साहित्य-सृजन से राष्ट्रार्चन

साहित्य-सृजन से राष्ट्रार्चन

भारत की सर्वाधिक प्राचीन भाषा ‘संस्कृत’ है। उसका अपार साहित्य देश में राष्ट्रीयता के भावों को हृदयंगम करता है, तभी आदिकवि वाल्मीकि का यह वाक्य ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ राष्ट्र-प्रेमियों का ‘बोध वाक्य’ बन गया कि मातृभूमि स्वर्ग से भी महान् है। देश की एकता को एक सूत्र में बाँधने हेतु महान् अर्थशास्त्री, राजनीति के प्रणेता चाणक्य, उपनाम कौटिल्य कृत ‘अर्थशास्त्र’ को सर्वोच्च संस्कृत ग्रंथों में मान्यता प्राप्त है। संस्कृत साहित्य में इस ग्रंथ के सूत्र वाक्य राजनीति के साहित्य में अति उच्चकोटि के माने गए हैं। भारत जब छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित होकर संकट के दौर से गुजर रहा था, ऐसे में महान् सम्राट् चंद्रगुप्त का निर्माण चाणक्य के द्वारा इन्हीं सूत्रों से सफलता को प्राप्त हुआ। संस्कृत साहित्य में ‘विदुर नीति’, नीतियों पर ‘पंचतंत्र’ का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया। हम तो भारतीय मिथकों, प्रतीकों, बिंबों में जीनेवाले लोग हैं। हम रामायण, महाभारत, भवभूति, कालिदास को छोड़कर न जी सकते हैं, न परंपरा का अर्थ पा सकते हैं। जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। देश अखंड बन सका था, इसी महान् राजनीति के ग्रंथ को आधार बनाकर। अर्थनीति द्वारा चाणक्य ने अखंड भारत का अपना लक्ष्य पूरा किया।

जिस प्रकार बंगाल में क्रांतिकारियों ने ‘आनंदमठ’ से ‘वंदेमातरम्’ गाते हुए और देशभक्ति का मूल मंत्र लेते हुए फाँसी पर चढ़कर देशहित में बलिदान दिए, उसी तरह संस्कृत से प्रेरणा लेकर बँगला उपन्यास में संन्यासियों के ‘वंदेमातरम्’ से देश गुंजायमान हो उठा। देश में राष्ट्रीयता की भावना को साहित्य से बहुत शक्ति मिलती है। विदेश में बँगलाभाषी नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’, जिसमें जापानियों द्वारा अंग्रेजों की ओर से लड़नेवाले भारतीय युद्धबंदियों की, जो विभिन्न प्रदेशों के भाषा-भाषी होते हुए भी हिंद का प्रयाण-गीत ‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा, यह जिंदगी है कौम की, कौम पर लुटाए जा...’ लिखकर भारतीय झंडे को विदेश में भारत की ओर से फहराया था। इसी परिप्रेक्ष्य में हम उन पुनउर्त्थानवादियों का विरोध करते हैं, जो समाज में विघटन करानेवाले साहित्य परोसने में ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। वे जाति-बिरादरी, सांप्रदायिकता और अंधविश्वासों का साहित्य निर्माण कर पाखंडी साधु-संतों के तथाकथित साहित्य-लेखन को बढ़ावा दे रहे हैं। इसीलिए पाँच सौ वर्ष हुए विश्वकवि तुलसी ने अपने कालजयी साहित्यिक ग्रंथों में कलियुग के नाम पर ‘बेचहिं वेद धरम दुहि लेहीं’ नामक धार्मिक साहित्य का प्रकाशन-प्रवचन देकर साहित्य को प्रदूषित करने का स्पष्ट संकेत भी दे दिया। स्वर्णित लंका विजय कर, वहीं पर स्थायी शासन कर निवास बनाने की अपेक्षा स्वदेश के ‘मम पुरी सुहावन’ अयोध्या वापस लौटे। यही तुलसी के शब्दों की राष्ट्रार्चना है।

समाज में अनेक समस्याएँ आने पर ही विभिन्न प्रकार का साहित्य अनेक नामों से प्रचारित हो रहा है। दलितोत्थान, नारी समाज पर आधारित दहेज, बाल-विवाह, तलाक, भू्रण-हत्या तथा अशिक्षा पर आधारित साहित्य-सृजन, नारी साहित्य, दलित समस्याओं पर केंद्रित दलित साहित्य का निर्माण हो रहा है। दलितोत्थान साहित्य-सृजन समाज का उत्थान करनेवाला है, किंतु वहीं पर कामसूत्र का यौन विकृत साहित्य क्लब तथा कॉकटेल पार्टी के द्वारा समाज को विकृत कर रहा है। दूसरी ओर फुटपाथी साहित्य में अपराध कथा को भी बलात्कार कर उसे समाज को अपराध कथा साहित्य नाम से बढ़ावा दे रहा है। यह समाज व देश को प्रदूषित कर रहा है, ऐसे प्रकाशन पर रोक लगनी चाहिए। राष्ट्राराधना में राजनीति को प्रेमचंद के शब्दों के कहे अनुसार ‘साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल की तरह होती है’, किंतु इसके ठीक विपरीत हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई महत्त्व नहीं, जो हमें वेदों, रामायण, महाभारत, गौतम बुद्ध, महावीर, आदि शंकराचार्य, गुरुनानक, राणा प्रताप, शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेन्नम्मा, स्वामी दयानंद, गीता रहस्य के रचयिता बाल गंगाधर तिलक के गणेशोत्सव की स्थापना के साथ ही ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, इसे हम लेकर रहेंगे’ का उद्घोष राष्ट्रीय साहित्य का एक सूत्रवाक्य स्थापित होकर राष्ट्रार्चना में मील का पत्थर बना।

राष्ट्रीयता और संस्कृति पर महाकवि इकबाल की पंक्तियाँ ‘यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहाँ, अब तक मगर है बाकी नामो-निशां हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहाँ हमारा’। इस प्रकार तुलसी के सैकड़ों वर्ष पूर्व अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम हिंदवी न जाननेवाला हिंदुस्तानी नहीं हो सकता, यही ‘हिंदवी’ अपभ्रंश होकर ‘हिंदी’ कही जाने लगी, जिसे तत्कालीन राजभाषा फारसी में व्यक्त किया, किंतु राष्ट्रार्चना में मशाल बना—‘तुर्क हिंदुस्तानियम मन हिंदी गोयम जवाब। शक मिस्त्री न दारम कज अरब गोयम सुखन।’ यानी मैं हिंदुस्तान का तुर्क हूँ और हिंदवी में उत्तर देता हूँ। मेरे पास मिश्री की मिठास नहीं कि मैं अरबी में बात करूँ! ज्ञातव्य है कि अमीर खुसरो के समकालीन ‘हिंदी’ को ‘हिंदवी’ ही कहा जाता था। यही राष्ट्रार्चन साहित्य-सृजन का परिचय संपूर्ण माना जाएगा।

देश में प्राचीन संस्कृत साहित्य ने ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ से राष्ट्रार्चना कर शुभारंभ किया। वही धारा ‘पृथ्वी-राज रासो’, ‘आल्हा’ में मिलती है। मुगल काल में महाकवि भूषण शिवाजी महाराज के साथ युद्धक्षेत्र में जाकर देशप्रेम की ज्वाला को साहित्य में वीर रस में प्रवाहित करते थे, भूषण की ‘शिवा बावनी’ महाकवि राष्ट्रार्चना का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अंग्रेजों के शासन काल में भी स्वाधीनता की लौ प्रज्वलित करने में प्रातःकाल से ही सेनानी कवि पं. वंशीधर शुक्ल की प्रभात फेरियों के जुलूस से गली-कूचों, गाँवों-नगरों में ‘उठो सोनेवालो सबेरा हुआ है, वतन के फकीरों का फेरा हुआ है’ का उद्घोष राष्ट्रीय धारा को प्रवाहित करने लगा। इसी प्रकार कानपुर के सेनानी कवि पद्मश्री श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की एक राष्ट्रीय रचना उसी धारा को प्रवाहित करने लगी। एक राष्ट्रीय रचना ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा...’ ने आंदोलित देशभक्त इस राष्ट्रीय तराने को गाते हुए देश में करोड़ों लोगों को राष्ट्रार्चना से संलग्नता प्रदान की। देश के कोने-कोने से सड़कों पर जुलूसों में गिरफ्तारी देने लगे। इस गीत को साहित्यिक गीत न माननेवालों को राष्ट्रकवि पद्मश्री सोहनलाल द्विवेदी ने स्पष्ट कहा, ‘जो रचना मन को झंकृत न करे, उसे मैं काव्य की दृष्टि में मानता ही नहीं हूँ।’ महात्मा गांधी ने ‘खादी’ तथा ‘नमक’ आंदोलन का शुभारंभ किया, जिसे राष्ट्रकवि द्विवेदी ने राष्ट्रीय धारा से संबद्ध कर एक नई दिशा दी। अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद की इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क की शहादत के बाद राष्ट्रकवि द्विवेदीजी द्वारा रचित यह रचना, ‘वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो, हो जहाँ बलि शीश अगणित एक सिर मेरा मिला लो,’ अभी तक समय-समय पर गाई जाती है, जो राष्ट्रार्चना की जीवंतता को शाश्वत रूप प्रदान किए हुए है। इसी तरह की इन पंक्तियों को राष्ट्रीय कवि जगदंबा प्रसाद ‘हितैषी’ ने अपनी लेखनी से लिखा, जो देश के कोने-कोने में गूँजने लगा—‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटनेवालों का यही बाकी निशां होगा।’

नेताजी ने भारत के सबसे बड़े भू-भाग में बोली जानेवाली हिंदी भाषा को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का पूर्ण समर्थन किया। विदेश से देश को सर्वप्रथम स्वाधीनता का रेडियो-संदेश भी हिंदी में ही दिया था। गुजराती भाषी महात्मा गांधी के अनुसार, ‘बिना राष्ट्रभाषा हिंदी के देश गूँगा रहेगा।’ सर्वप्रथम देश में सभी देशों ने अपने राष्ट्रों के झंडे फहराए, उस विदेशी शासन में जर्मन भूमि में भारत को पारसी लेडी मैडम कामा ने ‘वंदेमातरम्’ लिखे झंडे को भारत की ओर से फहराया था। कानपुर के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण’ की ये पंक्तियाँ राष्ट्रार्चना की ओर स्पष्ट दिग्दर्शन करती हैं—

अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है,

मुरदा है वह देश, जहाँ साहित्य नहीं है।

जहाँ नहीं साहित्य, वहाँ देश कहाँ है?

जहाँ नहीं आदर्श, वहाँ उत्कर्ष कहाँ है?

सेनानी महाकवि-मनीषी, सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के कथनानुसार, ‘जब हम राजनैतिक दृष्टि से पराधीन थे, तब तो हमारे पास स्वाधीन भाषा थी। जब स्वाधीन हो गए, तब हमारी भाषाएँ पराधीन हो गईं।’ आज हम देश की नदियों, सड़कों को जोड़ रहे हैं, जो देश के विकास को गति प्रदान करेंगी। देश की भाषाओं को परस्पर संबद्ध करने से ही देश एकता के सूत्र में होकर विकास-यात्रा की ओर अग्रसर होगा। इन सभी भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने का कार्य केवल ‘हिंदी’ ही कर सकती है। यह राष्ट्रार्चना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इसी संदर्भ में कवियों के निर्माता सुकवि गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ का नाम प्रमुख है। इनकी एक रचना ही राष्ट्रार्चना की पहचान है—

पावन पुजारी बस एक देश-देवता के,

चाहे जिस पंथ में हों, चाहे जिस देश में।

स्वाधीनता के बाद दो घटनाक्रम ऐसे दृष्टिगत हुए, जिसमें राष्ट्रार्चना का स्वरूप स्पष्ट देखने को मिला। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कथनानुसार, ‘‘इन हजार वर्षों में भारतवर्ष का हिंदीभाषी जन-समुदाय क्या सोच-समझ रहा था, इस बात की जानकारी का एकमात्र साधन हिंदी साहित्य है। हिंदी साहित्य अपने आपमें एक ऐसी शक्तिशाली वस्तु है कि उसकी उपेक्षा भारतीय विचारधारा को समझने में घातक होगी।’’

देश को स्वतंत्रता प्राप्त होने के पश्चात् भारत की राजभाषा हिंदी को बनाने हेतु देश की संविधान सभा में मराठी भाषी बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, जो लंदन से बैरिस्टर बने, राष्ट्रीय एकता की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत हैं उद्बोधन के कुछ अंश—

‘‘मैं ऐसे प्रांत का हूँ, जिसका अपना इतिहास है और उस इतिहास पर मुझे शर्म आने का कोई कारण नहीं है। मेरी भाषा में ऐसा साहित्य है, जिसका मुझे अभिमान है। इतना होते हुए भी जाहिर करना चाहता हूँ, समूचे हिंदुस्तान की एक ही राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। उसके लिए मेरी भाषा बलिदान करने को तैयार हूँ। वरना हमारी अखिल भारतीय की बातें खोखली ही ठहरेंगी।’’ इसके पश्चात् यह विचार संविधान सभा में अहिंदी भाषी विद्वान् गोपालास्वामी आयंगर ने प्रस्तुत किया था।

अंत में एक बात, जो राष्ट्रार्चना को साकार करने का प्रत्यक्ष दर्शन कराएगी। आप इस घटनाक्रम को जब अनुभव करेंगे कि क्या यह सपना लघु भारत में दक्षिणी तट पर अनेक द्वीपों का एक समूह, जिसे अंडमान निकोबार द्वीप समूह कहा जाता है, यह केंद्र शासित प्रदेश है। सर्वप्रथम अमर शहीद भगत सिंह के क्रांतिकारी साथी शिव वर्माजी थे। उन्होंने इसी अंडमान द्वीप समूह में २० वर्षों की लंबी सजा काटी थी। अंग्रेजी शासन में लंबे वर्षों की सजावाले कैदियों को यहीं भेजा जाता था, जिसे ‘काला पानी’ कहा जाता था। वहाँ की आपबीती घटनाएँ तो कभी-कभी शिव वर्माजी स्वयं पूछने पर वर्णन किया करते थे। वर्माजी ने अंग्रेजी-हिंदी में लगभग डेढ़ दर्जन क्रांतिकारी जीवन की घटनाओं पर पुस्तकें लिखीं। इसके पश्चात् मित्रवर युवा साहित्यकार श्री कृष्ण कुमार यादव (आई.पी.एस.) मेरे निवास के सन्निकट कानपुर मुख्यालय डाकघर के उच्च प्रशासनिक पद पर कयरत थे। उनकी पदोन्नति होकर निदेशक डाक सेवाओं के रूप में अंडमान-निकोबार तबादला हो गया। उनसे फोन पर लंबी वार्त्ता में वे बताया करते थे कि यह ‘लघु भारत’ का स्वरूप है। वहाँ पर सभी प्रदेशों के विभिन्न भाषा-भाषी लंबी सजा पानेवाले भारत के कैदी ‘सेल्युलर’ जेल में बंद थे। उनके बीच संपर्क भाषा के रूप में विभिन्न प्रांतों के भाषा-भाषी कैदियों की संपर्क भाषा हिंदी को ही माध्यम बनाया गया। नरपुंगव बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर को दो जीवन की सजा दी गई। उन्होंने ही जेल के अधिकारियों तथा विभिन्न प्रदेशों के भाषा-भाषी कैदियों की बोल-चाल की संपर्क भाषा हिंदी को बनाने में पूर्ण सहयोग प्रदान किया। अधिकारियों को कैदियों से संपर्क भाषा हिंदी पुस्तकों के मँगाने के सुझाव पर परस्पर राष्ट्रभाषा में वार्त्ता तथा आजीवन सजा प्राप्त कैदियों के परिवार अंडमान-निकोबार में स्थायी रूप से बस गए। वे सभी हिंदी भाषी ही बने। वहाँ से सभी वर्गों-जातियों के लोग हिंदी भाषी सांसद निर्वाचित कर लोकसभा में भेजते रहे।

भारतवर्ष की जीवन-शैलियों, रीति-रिवाजों, आस्था-विश्वासों, भाषा और बोलियों को लघु कलेवर में सँजोए अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह सही अर्थों में ‘लघु भारत’ है। कभी काला पानी नाम से कुख्यात अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अब ‘मुक्ति तीर्थ’ के रूप में समादृत है। स्वतंत्रता-सेनानियों की चरणरज से पावन यह धरती ‘पुण्य भूमि’ है। अंग्रेजों की दुर्दमनीयता के विरुद्ध ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष करनेवाले स्वाधीनता-संग्राम के महानायकों के अदम्य साहस और निर्भयता की भूमि है। मानव के कोल्हू में जोते जाने की नृशंसता और करुण गाथा की भूमि है। यह द्वीप समूह स्वामी विवेकानंद के सपनों को साकार रूप देता हुआ समाज के जाति-पाँति, छुआछूत और ऊँच-नीच की दुर्भावनाओं से सर्वथा मुक्त है। इसीलिए लेखक-संपादक ‘द्वीप लहरी’ डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी ने वहाँ निवास करते हुए अपनी काव्य-पंक्तियों में द्वीप समूह के जनजीवन के संदर्भ में प्रस्तुत पंक्तियों में रेखांकित किया है—‘वर्ण-वर्ण के खिले फूल सम, आदिम, नागर अधिवास यहाँ जन-मन की डाली पर हरदम/छाया रहता मधुमास जहाँ।’ हर तरह के लोग, हर तरह की जातियाँ, हर तरह की परंपराएँ देखने को मिलती हैं। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, उडि़या, मलयालम, पंजाबी, असमी, गुजराती, मराठी, बँगला आदि भाषाओं का प्रयोग होता है; किंतु संपर्क भाषा के रूप में ‘हिंदी’ ही समादृत होती है। यह उन दिनों से ही यहाँ संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग होती है, जब स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों अथवा अपराधियों का प्रथम दल बंदी के रूप में इस द्वीप समूह पर आया था। सेल्यूलर जेल में विभिन्न भाषा-भाषियों के बीच हिंदी ही संपर्क भाषा थी। सावरकर ने न केवल कैदियों, बल्कि जेल अधिकारियों को हिंदी सिखाने का कार्य किया था। उनके कथनानुसार कि हिंदी ही एक ऐसी भाषा है, जो राष्ट्रभाषा का स्थान ले सकती है। उन्होंने ही कैदियों से हिंदी पुस्तकें मँगाने की बात कही।

वास्तविकता में अंडमान-निकोबार में स्त्री शिक्षा, यानी महिलाओं का शिक्षण प्रतिशत पुरुषों की तुलना में कम नहीं है। परदा प्रथा का प्रचलन नहीं है और सभी विभागों में निम्न से उच्च पदों पर महिलाएँ कार्यरत हैं। इसीलिए स्वामी विवेकानंद तथा महात्मा गांधी का राष्ट्रार्चना का सपना इस द्वीप में ही साकार रूप ले सका है। यहाँ राष्ट्रार्चना का सपना छुआछूत और ऊँच-नीच अथवा समाज जाति-पाँति के कथन से पूर्णरूपेण मुक्त है। देश में यही एकमात्र सर्वप्रदेशीय एवं विभिन्न भाषी होने के बाद भी लोकसभा में हिंदी वक्ता ही सदैव निर्वाचित होता है। इसीलिए इस द्वीप समूह को स्वामी विवेकानंद तथा महात्मा गांधी के सपने को साकार करनेवाला प्रदेश कहा जाता है। इसका मूल कारण राष्ट्रभाषा हिंदी द्वारा राष्ट्रार्चना की महत्ता और इसके द्वारा उद्देश्य का सपना साकार होना है। इसीलिए केरल के लेखक एवं कविवर डॉ. एन. रमन नायर (अध्यक्ष, हिंदी विभाग, केरल विश्वविद्यालय, कोचीन) द्वारा ‘राष्ट्र भारती’ शीर्षक की पंक्तियों में राष्ट्रार्चना की मूल भावना समाहित है—

राष्ट्र राष्ट्र की राजधाती है। राष्ट्र राष्ट्र का राष्ट्रगीत है।

राष्ट्र राष्ट्र का संविधान है। राष्ट्र राष्ट्र का राष्ट्र केतु है॥

राष्ट्र चिह्न है, राष्ट्र पक्षी है। राष्ट्र राष्ट्र की राष्ट्र वाणी है॥

हिंदी हमारी राष्ट्रवाणी है। हम एक चित्त हैं, हम कटिबद्ध हैं॥

हम एक कंठ हो करेंगे नारा। राष्ट्रभारती हिंदी की जय हो।

हिंदी हमारी राष्ट्र वाणी है। हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है॥

जय हिंदी। जय नागरी॥

‘मानस संगम’, महाराज प्रयाग नारायण मंदिर, शिवाला

कानपुर-२०८००१ (उ.प्र.)

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