वंदनवार

वंदनवार

पारिजात की माँ ने गाँव के नाई के हाथ गृहस्थी का बहुत सारा सामान लादकर भेज दिया था। घी, तेल, गुड़, आटा, दाल, चावल, सब्जी, मसाले, जो भी उनके खेत और पशुधन से जुट पाया, सबकुछ भेजा था।

नाई ने संदेश दिया कि माँ और पिताजी कल आ जाएँगे।

पारिजात के लिए माँ और पिताजी का आना किसी उत्सव से कम नहीं था। उन्हें देखकर उसे लगता कि वह सारी चिंता-तनाव से मुक्त होकर पुराना पारिजात हो गया है, जो न कभी चुप बैठता और न किसी को मुँह लटकाए बैठा हुए देख पाता था। उसे वे सारी स्मृतियाँ मुदित कर जाती थीं, जिसमें वह सबको हँसाने के लिए नए-नए चुटकुले और व्यंग्य गढ़ा करता था।

इधर वर्षों से वह गाँव नहीं जा पाया था। माँ और पिताजी की खोज-खबर भी नहीं ले पाता था। पिताजी ने गाँव में टेलीफोन लगवा लिया था। वे लोग फोन पर ही यहाँ का हालचाल लेकर और अपनी बताकर संतुष्ट हो जाया करते थे।

पारिजात ने शहर में नया मकान बनवाया है, यह माता-पिता के लिए विशेष प्रसन्नता का समाचार था। क्योंकि वे बराबर कहा करते थे कि अपना घर छोटा हो या बड़ा, अपना ही होता है। किराये के मकान में कब तक रहोगे?

माँ और पिताजी का सपना पूरा हुआ। वे लदे-फँदे सामान के साथ पहुँच गए। दूसरे दिन सुबह पूजा की तैयारी की गई।

पारिजात ने माँ के आदेशानुसार आम्र पल्लव से वंदनवार सजाना शुरू किया। माँ ने अपने लाए हुए भारी-भरकम थैलों में से एक थैला उसे थमा दिया था। इस थैले में आम के पल्लव, हरी दूब, आम की सूखी लकड़ी, गाय का गोबर, कलश, जौ और केले के पत्ते थे।

पारिजात को पल्लव निकालते समय अपना बचपन याद आने लगा। किस तरह वह पेड़ पर चढ़कर पत्ते तोड़ता था। हवन के लिए आम की सूखी टहनियाँ तोड़़कर लाता था। इस स्मृति से मन में एक उमंग उठी और वह पूजा के दिन दादी के कंठ से निकले गीत गुनगुना उठा—

आज अइहैं मोरे राम, हो शबरी के घरवाँ,

केसिया से अपनी सबरी बहारैं दुवरवा।

यही रहिया अइहैं भगवान् हो सबरी के घरवाँ। आज अइहैं...

गंगा-जमुनवा क जल भरि लावैं,

राम करिहैं स्नान, हो सबरी के घरवाँ। आज अइहैं...

सुरही क गोबरा से अँगना लिपावैं,

बेदिया बैठिहैं भगवान् हो, सबरी के घरवाँ। आज अइहैं...

चखि-चखि बैरिया सबरी दोनिया सजावैं,

भोगवा लगइहैं भगवान् हो, सबरी के घरवाँ। आज अइहैं...

उसने पत्तों को रस्सी में सजाकर रख लिया और एक सिरे से दूसरे सिरे पर बाँधने जा रहा था। तभी पत्नी रूपा ने आकर उसे झिड़कना शुरू कर दिया, जो अभी-अभी ब्यूटी पार्लर से लौटी थी।

रूपा कहने लगी, ‘‘यह सब क्या कर रहे हो? मैंने इतनी सुंदर बिजली की झालर लाकर रखी है, उसका क्या होगा?’’

पारिजात की स्वर-लहरी गुम हो गई, उसने उत्तर दिया, ‘‘मैं तो माँ की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ। तुम जो कहो, वह भी कर दूँगा।  पहले घर में जाकर बच्ची को सँभालो। वह रो-रोकर माँ को परेशान कर रही है।’’

इतना सुनते ही रूपा ने आवाज और तेज करके कहा ‘‘तुम बच्ची को नहीं सँभाल सकते थे, यह जाहिलोंवाला काम करना ज्यादा जरूरी था? यह मेरा घर है, आपकी माँ का नहीं। उनसे कहो कि अपने घर में जाकर ये घास-फूस, पत्तों के वंदनवार सजाएँ। मेरे घर में यह सब नहीं चलेगा। एक तो बिना बुलाए आ धमकीं, दूसरे अंट-शंट सजावट करा रही हैं।’’

माँ के अपमान से पारिजात का चेहरा काला पड़ गया। वहाँ बाहर से आए कुछ और लोग भी मौजूद थे। पत्नी के इस बरताव से वह आजिज आ चुका था। एक ओर माँ और पिता हैं, जो गाँव में जी तोड़ मेहनत करके खेती करा रहे हैं और जो भी पैदावार होती है, उसे हर महीने यहाँ देने आते हैं। जो अनाज बचता है, उसे बेचकर हमारे बैंक खाते में डालते रहते हैं। मैंने कई बार समझाया भी कि अपने लिए बचाकर कुछ धन रखिए। आपकी दवा आदि के लिए किसी से माँगना न पड़े, पर माँ और पिताजी दोनों का ही कहना है कि हमें भगवान् ने परिवार दिया है तो वे हमारी सेवा करेंगे ही। दोनों बेटियों की शादी कर दी है। तुम्हारा भी विवाह कर दिया। तुम्हें अच्छी नौकरी मिल गई है। अब हमें किसी बात की चिंता नहीं है।

माँ ममता की प्रतिमूर्ति हैं। तरह-तरह की सौगातें, पकवान लेकर बिना बुलाए कभी पिताजी को भेज देती हैं तो कभी स्वयं आ जाती हैं। माँ-पिताजी कैसे मानें कि उनके बेटे का घर उनका अपना नहीं है।

माँ और पिताजी जिस समय में जीते थे, उसमें घर किसी एक का नहीं होता था। उसके पूरे परिवार, नाते-रिश्तों को होता था। घर किसी एक परिवार का भी नहीं होता, पूरे टोले-मोहल्ले, पूरे गाँव का होता था।

किसी के घर मेहमान आए और सोने की जगह न हो तो वे हमारे घर पर रुकते थे, खाते-पीते थे। पारिजात ने पिता का वह घर देखा था। जहाँ हमेशा नाते-रिश्तेदारों की भीड़ रहती थी।

पिता ने जब शहर में घर बनवाया तो वहाँ भी पूरे गाँव के लोग उसे अपना घर समझकर आते थे, रुकते थे। किसी को कोर्ट-कचहरी का काम हो, अस्पताल में मरीज दिखाना हो, वर दिखाई के लिए आना हो, शहर का घर सबके लिए खुला था। माँ का सारा समय रसोई में कटता था।

पारिजात और बहनों की पढ़ाई के लिए गाँव से सटे शहर में उन्होंने घर बनवाया था, पर अन्य रिश्तेदारों तथा गाँव के बच्चे भी यहीं रहकर पढ़ते थे।

माँ को रात-दिन रसोई में खटते देखकर पारिजात कभी-कभी पिता पर नाराज भी होता था, ‘बाबूजी! आप माँ का भी खयाल करिए, आपकी मेहमाननवाजी में उन्हें कितनी मेहनत पड़ती है।’ पिता शांत स्वर में उत्तर देते थे, ‘बेटा! पता नहीं, किसके आशीर्वाद, पुरखों के पुण्य-प्रताप से हम इस लायक बने हैं कि लोगों को खिला सकते हैं। तुम्हारी माँ को मैं जानता हूँ, उसे सबको खिलाने में सुख मिलता है। आज तक कभी उसने शिकायत नहीं की कि उसे मेहनत करनी पड़ती है। यदि एक सप्ताह तक कोई मेहमान न आए तो वह चिट्ठी भेजकर नाते-रिश्तेदारों को बुला लेती है कि बहुत दिन हो गए मिले हुए। मौका निकालकर आ जाओ।’

वही माँ उसकी पदोन्नति की खबर सुनकर आई थीं। इसी अवसर पर नए मकान में गृह-प्रवेश की खुशी मनाने का भी मौका था।

नए घर में वास्तु देवता की पूजा और सत्य नारायण की कथा कराने की योजना माँ की ही थी। पहले कथा कराकर फिर शाम को दावत देने सलाह दी थी।

रूपा को अपने पति की पदोन्नति और विशाल बँगले का वैभव दिखाने का अवसर मिल रहा था तो उसने उत्साहपूर्वक तैयारी शुरू कर दी थी।

कल शाम को पारिजात ने माँ-पिताजी को ताँगे से उतरते हुए भारी बैग तथा बड़ा बक्सा उतरवाते देखा तो लपककर पैर छुए और सामान भीतर लाने में मदद की।

रूपा ने चिढ़कर अपनी सहेली से कहा, ‘‘आ गए श्रवण कुमार के माता-पिता। अब तो सारा इंतजाम मुझे ही करना पड़ेगा। श्रवण कुमार तो उन्हीं के पास मँडराते रहेंगे।’’

वह भुनभुनाती हुई भीतर चली गई।

बच्ची को कंधे पर थपकियाँ देकर सुलाते हुए माँ कमरे भर में चक्कर लगा रही थीं, पर बच्ची रोती ही जा रही थी।

रूपा ने तेजी से आकर बेटी को सास की गोद से खींच लिया और बोली, ‘‘जरा सी बच्ची को नहीं सँभाल पा रही हैं। उसे भूख लगी है, बोतल से दूध तो पिला ही सकती थीं।’’

माँ अवाक् रह गई थीं। अभी कल ही तो उन्होंने रोती हुई बच्ची को चुप कराने के लिए बोतल से दूध पिलाने की कोशिश की थी तो बहू ने झिड़क दिया था, ‘‘दूध घड़ी देखकर टाइम से पिलाया जाता है। जाहिलों की तरह हरदम जब भी बच्चा रोये मैं दूध नहीं पिलाती।’’

माँ ने वहाँ से हट जाना ही बेहतर समझा और चुपचाप बाहर आ गईं। उन्हें मन-ही-मन लज्जा का बोध हो रहा था कि कहीं किसी ने बहू की बातें सुन न ली हों। यद्यपि सुननेवाला बहू को ही सरासर गलत ठहराता, पर इसमें उनकी अपनी भी प्रतिष्ठा कम होगी।

कमरे से बाहर निकलते ही उन्होंने देखा कि बहू की एक सहेली उसको ढूँढ़ती हुई भीतर आ रही थी। उसने पूछा, ‘‘माँजी! रूपा कमरे में है?’’ उन्होंने ‘हाँ’ में सिर हिला दिया।

आँगन में आईं तो देखा, बेटा हाथ में वंदनवार की रस्सी थामे विमूढ़ सा बैठा है। आस-पास बैठे खड़े लोगों की चुप्पी से वे समझ गईं कि यहाँ कुछ घटित हुआ है।

माँ अपने बेटे की खुशी के मौके पर उसे चिंतित नहीं होने देना चाहती थीं। उन्हें देखते ही बेटा उठ खड़ा हुआ और खुली वंदनवार को लपेटने लगा।

पारिजात का दोस्त बोल उठा, ‘‘आंटी! यहाँ शहर में आम्र-पल्लव के वंदनवार का महत्त्व कोई नहीं समझता। यहाँ बिजली की झालर लगनेवाली थी, इसीलिए पारिजात चिंता में है कि आपकी आज्ञा का पालन कैसे करे?’’

माँ के चेहरे पर मुसकान उभरी, पर देखनेवाले समझ गए थे कि इस मुसकान के पीछे कितनी गहरी पीड़ा है।

माँ ने वंदनवार को बेटे के हाथ से लेकर प्यार से लपेटते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं बेटा! मैं इसे वापस ले जाऊँगी। अपने छोटे से आँगन और द्वार पर सजाकर वहाँ पूजा करवा लूँगी। घर तो तुम्हारा ही है, यहाँ भी, वहाँ भी। पूजा का कलश कहीं भी रखा जाए, वंदनवार सजे, तुम्हारा मंगल होगा। वास्तु देवता छोटे से गृह के देवता नहीं हैं, उनका तो पूरे ब्रह्मांड में स्थान है। कहीं भी पूजन करो, वे प्रसन्न होते हैं। पूजा तो मन से होती है। ये सब रीति-रिवाज, सजावट के उपकरण तो अपने संतोष के लिए होते हैं।’’

माँ ने वंदनवार को धरती पर रखा। हलदी-सिंदूर से धरती को टीका कर प्रणाम किया और अपने आँचल से बुहारकर माथे से लगा लिया। किसी के पैरों से रौंदने से यह पूजन-स्थली बच जाए, शायद यही माँ का उद्देश्य था।

माँ ने बड़े से बैग में वंदनवार वापस रख लिया। बहुत दिनों के बाद बेटे ने यह वंदनवार बनाया है, इसके माध्यम से मेरे बेटे का हाथ उस आँगन में पहुँच जाएगा, जहाँ उसने जन्म लिया और पला-बढ़ा। वास्तु देवता पुरखों की धरती पर आसन पाकर प्रसन्न हो जाएँगे। आखिर उसी पुराने मकान की नींव ने तो इस नई नींव को जन्म दिया है। जड़ को सींचो तो फुनगी हरियाती ही है।

माँ संतुष्ट-प्रसन्न मुद्रा में बाहर आकर पिता के पास बैठ गईं तो पारिजात का सिर स्वतः मन-ही-मन अपने जन्मदाता के चरणों में
बिछ गया।

पारिजात की आँखों के सामने बचपन के वंदनवार झूलने लगे। पत्नी की ओर से मलिन हुआ मन भी साफ  हो गया। माँ को किसी के भी मन का मालिन्य दुःख देगा, क्योंकि वे साक्षात् क्षमा की प्रतिमूर्ति हैं। वह वापस आकर बिजली की सजावट कराने में व्यस्त हो गया।

रूपा बाहर आई तो मन में सोचे हुए उसके सारे वाक् आयुध धराशायी हो गए। सामने कोई प्रतिद्वंद्वी था ही नहीं।

रूपा ने पूछा, ‘‘वंदनवार कहाँ है?’’

पारिजात ने माँ के बड़े बैग की ओर इशारा कर दिया।

रूपा ने बैग खोलकर वंदनवार निकाला और पति को थमाते हुए बोली, ‘‘आपसे कोई काम पूरा ही नहीं होता। सारा दिन लगा दिया और वंदनवार तक नहीं टाँग पाए।’’

इतना कहकर वह बच्ची को सास की गोद में डालते हुए बोली, ‘‘लीजिए, सँभालिए इसे और यहीं बैठे-बैठे बताती जाइए कि पूजा के लिए क्या-क्या सजावट व तैयारी करनी है। पंडितजी पहुँचनेवाले हैं।’’ सबने अनुभव किया कि धूपबत्ती के बिना जले ही सुगंध पूरे वातावरण में फैल गई।

रूपा ने थाल में माँ के थैले से गोबर, हरी दूब, कदली-पत्र आदि निकालकर रखना शुरू कर दिया।

श्रीवत्स, ४५ गोखले विहार मार्ग

लखनऊ (उ.प्र.)

दूरभाष : ९३३५९०४९२९

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