वंदे मातरम् के उद्घोषक : बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

अपनी पुस्तकों—‘महिलाएँ और स्वराज्य’ तथा ‘क्रांतिकारी महिलाएँ’ पर काम करते हुए मैंने ‘संन्यासी विद्रोह’ के बारे में जाना और देवी चौधरानी के वीर कृत्य से भी परिचित-प्रभावित हुई। अंग्रेज शासकों द्वारा छोड़े गए रिकॉर्ड में विद्रोही संन्यासियों को ‘लुटेरे’ कहा गया है; इसी तरह वीरांगना देवी चौधरानी को भी ‘दस्यु रानी’। देवी चौधरानी के बारे में पढ़कर लगता था कि यह रचनाकार की औपन्यासिक कल्पना है। यह चरित्र ऐतिहासिक है या लोककथाओं की नायिका का? इसपर इतिहासकारों में देर तक बहस भी चलती रही थी, जब तक कि ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिल गए।

संन्यासी विद्रोह के प्रसिद्ध लड़ाके मजनू शाह फकीर ने सन् १७७४-७५ में एक विशाल विद्रोही संगठन बनाया था। उन्होंने सन् १७७६ में कंपनी सरकार से कई बड़ी टक्करें लीं। फिर २९ दिसंबर, १७८६ को अंग्रेजी सेना से एक मुठभेड़ में गंभीर रूप से घायल हो जाने पर अगले दिन उनकी मृत्यु हो गई थी। उनके शिष्य भवानी पाठक उन दिनों बार-बार अंग्रेजी नावों पर हमला करके उनका माल-असबाब लूट ले जाते थे। सन् १७८८ में वह भी एक बजरे में अपने साठ बरकंदाजों के साथ पकड़े गए और मार डाले गए। ये लोग अंग्रेजों के स्थानीय जमींदारों के साथ किए गए गठबंधन के शिकार गरीब किसानों और कारीगरों पर अत्याचार का बदला लेने के लिए छापामार लड़ाइयाँ लड़ रहे थे और लूट के माल से शोषित-पीडि़त गरीब जनता की मदद करते थे, अन्यथा संन्यासियों को अपना अध्यात्म-साधना का मार्ग छोड़ इस तरह का काम क्यों करना पड़ता? हमारी ऋषि-परंपरा शास्त्र के साथ, समय की जरूरत पर, शस्त्र-साधना की भी रही है। महाभारत इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। आजादी की लड़ाई के प्रारंभिक काल में अन्य विद्रोहों के साथ संन्यासी विद्रोह की भी यही पृष्ठभूमि है, जिसके विस्तार में जाना यहाँ संभव नहीं।

संन्यासी विद्रोह की सूत्रधार देवी चौधरानी विद्रोही संन्यासियों की मुखिया थीं, जिन्हें शक्ति-उपासना के दैवी प्रतीक के रूप में जाना-समझा जा सकता है। उस समय के अंग्रेज लेफ्टिनेंट ब्रेनन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भवानी पाठक की गतिविधियों के पीछे देवी चौधरानी का हाथ था, जो अपने अधीन अनेक वेतनभोगी बरकंदाजों की सेना के रख-रखाव के लिए भवानी पाठक से लूट के माल में से हिस्सा लेती थीं। भवानी पाठक मारे गए, तब भी देवी चौधरानी ने न हार मानी थी, न अंग्रेजों के हाथ आई थीं। कथाकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित शेष कहानी में कल्पना का पुट हो सकता है। पर देवी चौधरानी का चरित्र उनकी कल्पना की उपज नहीं, ऐतिहासिक चरित्र है, यह बात अब प्रमाणों से सिद्ध हो चुकी है। ब्रेनन की रिपोर्ट के अनुसार, भवानी पाठक के दल की इस ‘क्रूर’ नेत्री की गिरफ्तारी के लिए ‘ऊपर’ से आदेश प्राप्त किए गए थे। पर यह बहादुर, निर्भीक नेत्री, जो नदी में बजरा डाले राजरानियों की तरह रहती थी, कभी भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आई। सभी संन्यासी योद्धा उनकी वीरता का लोहा मानते थे और उनके पास छापामार बरकंदाजों की एक अच्छी फौज थी। पर अनेक संन्यासी नेताओं के मारे जाने के बाद भी वह अंत तक नहीं पकड़ी गईं। अगर पकड़ी जातीं तो उन्हें गिरफ्तार करने या प्राणदंड देने का शेखी भरा बयान अंग्रेजों के छोड़े रिकॉर्ड में अवश्य मिलता। दमन-चक्र के समय अपनी सेना को भंग कर वह स्वयं कहाँ रहस्यमय ढंग से गायब हो गईं, इस बारे में इतिहास मौन है; जबकि इधर एक टी.वी. धारावाहिक ‘देवी चौधरानी’ में उन्हें घर लौटकर गृहस्थी बसाते दिखाया गया है, जो असंभव सी बात लगती है। घर लौटतीं तो क्या उनके खून के प्यासे अंग्रेजों की निगाह से छुपी रहतीं? हो सकता है, नए शोधकर्ता उनकी अधूरी कहानी को कभी पूरा कर सकें! बहरहाल, संन्यासी विद्रोह हमारे स्वतंत्रता-संग्राम का वह प्रथम उज्ज्वल अध्याय है, जिसका मूल्यांकन किया ही जाना चाहिए कि आनेवाले समय में उससे प्रेरणा ली जा सके।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय इस इतिहास को कथा में पिरोकर असंख्य पाठकों के सामने न लाते तो संन्यासियों का उद्घोष ‘वंदे मातरम्’ हमारे पूरे स्वतंत्रता-संग्राम की प्रेरणा बन उसे शक्ति कैसे प्रदान करता! और वर्तमान में भी हमारा राष्ट्रगान कैसे बनता! स्वतंत्रता-सेनानी इस गीत को मातृ-वंदना के रूप में गाते थे और इसी जयघोष के साथ हँसते-हँसते हथकडि़याँ पहनते व फाँसी का फंदा गले में डलवाते थे। राष्ट्रवादी साहित्यकारों में इसीलिए बंकिम चंद्र को शीर्ष स्थान प्राप्त है।

बंकिम चंद्र का जन्म २६ जून, १८३८ को चौबीस परगना के काठालपाड़ा में हुआ था। पिता यादव चंद्र चट्टोपाध्याय एक सरकारी कर्मचारी थे, पर साधु-संन्यासियों के भक्त थे। उनकी जीवन शैली का प्रभाव बालक बंकिम पर भी पड़ा और वह भी बड़े होकर सरकारी नौकरी के साथ इस ओर रुचि रखने लगे। सन् १८५८ में प्रेसीडेंसी कॉलेज से बी.ए. करके (जो उस समय के युवक के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी, उसपर कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रथम स्नातक होने का गौरव!) वह डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हुए, फिर डिप्टी कलेक्टर बने। इस तरह सभी वर्गों के लोगों के संपर्क में आने का अवसर उन्हें मिला और अंग्रेज अधिकारियों के कारनामों को निकट से जानने का भी। एक ओर उन्हें यह अनुभव अपने लेखन में काम आया, दूसरी ओर अपनी नौकरी व लेखन में तालमेल बैठाने में। जन-मन का अध्ययन यदि उन्हें देशवासियों को संगठित कर उनके चरित्र की कमजोरियों को सुधारने में सहायक हुआ तो सरकारी अधिकारी के नाते ऊँचे तबके के अंग्रेजों व अंग्रेज अधिकारियों के संपर्क में रहकर उनके आचार-व्यवहार को समझने में भी। इसीलिए उनकी विचार-पद्धति का सम्यक् ज्ञान पाकर वह उनसे व्यावहारिक स्तर पर निबटने में सफल हो सके।

बंकिम चंद्र की साहित्य-साधना उनके छात्र जीवन से ही आरंभ हो गई थी। सन् १८५३ से १८५६ तक उनकी अनेक गद्य व पद्य रचनाएँ ‘संवाद प्रभाकर’ और ‘संवाद साधुरंजन’ में छप गई थीं। सन् १८५८ में बी.ए. करने के बाद उन्होंने १८५९ में बी.एल. की परीक्षा भी पास कर ली थी। सन् १८९१ तक वह सरकारी नौकरी में रहे, फिर अवकाश-प्राप्ति के बाद पूरी तरह साहित्य-सृजन को समर्पित हो गए। यद्यपि इसके बाद तीन वर्ष तक ही जीवित रहे। लेखन का प्रारंभ उन्होंने अंग्रेजी से किया था; पर जल्दी ही उन्हें लगा, यह परितृप्ति नहीं दे सकेगा तो बँगला में लेखन करने लगे। सन् १८६५ में ‘दुर्गेशनंदिनी’, सन् १८६६ में ‘कपाल कुंडला’ कृतियाँ रचित व प्रकाशित हुईं और वह बंगाल के सुधी वर्ग में चर्चित व ख्यात हो गए। तीन साल बाद ‘मृणालिनी’ उपन्यास छपा। इसके बाद १८८२ में ‘राज सिंह’, १८८२ में ही ‘आनंद मठ’ और १८८४ में ‘देवी चौधरानी’। इसके बाद सन् १८८७ में ‘सीताराम’ नामक उपन्यास भी छपा। इनके बीच ‘इंदिरा’, ‘विष वृक्ष’, ‘युगलांगुरीय’, ‘चंद्रशेखर’, ‘राधारानी’, ‘रजनी’, ‘कृष्णकांत का वसीयतनामा’ भी; पर इनके बाद और ‘सीताराम’ से पहले छपे ‘आनंद मठ’ और ‘देवी चौधरानी’ ने उन्हें स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में अमर कर दिया, विशेष रूप से ‘आनंद मठ’ ने।

बंग भाषा और साहित्य के उत्कर्ष में तथा बंगवासियों के जातीय चरित्र-गठन व चरित्र-नियंत्रण में ‘वंदे मातरम्’ मंत्र के उद्घोषक ऋषितुल्य साहित्य-सम्राट् बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का अवदान अद्वितीय है। अपने जीवनकाल में ही वे एक श्रेष्ठ उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे। बाद में भी उनकी कुछ रचनाएँ कालजयी हुईं। जिस उद्देश्य के लिए उन्होंने लेखनी उठाई, उस अभीष्ट की सिद्धि में उन्हें पर्याप्त सफलता भी मिली। यद्यपि एक सरकारी अधिकारी के नाते उनके लेखकीय मार्ग में कठिनाई उपस्थित थी, विशेष रूप से संन्यासी विद्रोह की सच्चाई और देवी चौधरानी जैसे चरित्र को वाणी देने में, पर उन्होंने पर्याप्त चतुराई से काम लिया था। ऊपर से वह राजभक्ति का प्रदर्शन भी करते थे और अंग्रेजों की समझ में न आनेवाली भाषा में अपने काम की सफाई भी दे लेते थे। अंग्रेजी छोड़कर बँगला में लिखने का एक कारण यह भी था और यह भी कि अपने उस काल में उन्होंने ‘आनंद मठ’ को लेकर बंग समाज में कोई आंदोलन नहीं उठने दिया। उनकी मृत्यु के बारह वर्ष बाद, जब तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी ने अदूरदर्शिता का परिचय दे ‘बंग-भंग’ का आह्वान किया तो ‘स्वदेशी आंदोलन’ उठ खड़ा हुआ था, जिसमें ‘वंदे मातरम्’ का खुलकर उपयोग हुआ था और आंदोलन की उग्रता देखकर सरकार को ‘बंग-भंग’ के अपने प्रस्ताव को वापस लेना पड़ गया था। यही नहीं, उस अंग्रेज अधिकारी को भी वापस इंग्लैंड बुला लिया गया था।

‘बंकिम ग्रंथावली’ के तीन खंडों में उनकी कृतियाँ हिंदी के पाठकों को भी सुलभ हैं, पर बंकिम चंद्र का साहित्य केवल ग्रंथ-रचना तक ही सीमित न था। सन् १८७२ में उन्होंने ‘बंग दर्शन’ नामक पत्रिका भी निकाली थी, जिसका बंग साहित्य के क्षेत्र में ऐतिहासिक स्थान है। अनेक तत्कालीन मनीषियों व साहित्यकारों ने उसमें लिखा—साहित्य, दर्शन, समाज-विज्ञान, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा-विज्ञान, समीक्षा, संगीत, अध्यात्म, कलाएँ आदि सभी विषयों पर। उस समय के मापदंड से बंग साहित्य में आधुनिकता का समावेश भी इस पत्रिका से हुआ। बंकिम चंद्र के उपन्यासों की लोकप्रियता का कारण था—तत्कालीन बंग समाज का सजीव वर्णन और कुरीति-निवारण के साथ एक स्वस्थ समाज का निर्माण, जिसे उनकी मौलिकता, प्रसाद गुण, सहजता और जीवंतता ने जन-जन तक पहुँचा दिया। उनका स्थान बँगला के प्रथम उपन्यासकार के रूप में है, फिर भी उन्होंने इतनी परिपक्वता प्रदर्शित की और पाठकों को इतना अनिर्वचनीय आनंद प्रदान किया कि न केवल उनकी रचनाएँ कालजयी हुईं, बल्कि उनकी लोकप्रियता आज तक जस-की-तस बनी हुई है।

अठारहवीं शताब्दी का बंग समाज अधिकतर बंकिम के उपन्यासों में ही व्यवहृत हुआ है। इतिहास व समाज के प्रति निष्ठा, समसामयिक मूल्य-बोध, तत्कालीन समाज की संकीर्णताओं से मुक्ति का आह्वान और कल्पना की रोचक उड़ान उनके लेखन की लोकप्रियता के कारण थे ही, राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा ने उसमें और चार चाँद लगा दिए थे। यद्यपि जिस समाज से वे जुड़े थे उस सामंती समाज को ही उनकी रचनाओं में प्रमुख स्थान मिला है; पर उनकी कृतियों में मानव हृदय के अंतर्द्वंद्व, वेदना और उल्लास की अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं को सुधी जनों के बीच स्थापित कर सकी और उनमें निहित मूल्य उन्हें जन-जन में लोकप्रिय बना सके। बंग साहित्य में एक नवीन नारी-दर्शन का सूत्रपात भी उनके लेखन की विशेषता है, जिसने बीसवीं शताब्दी के घात-प्रतिघात के बीच दो सदी पूर्व के ‘देवी चौधरानी’ जैसे चरित्र को भी ला बिठाया था। कथा के माध्यम से देशभक्ति का उनका यह प्रदर्शन उन्हें उनके बाद भी जन-जन में जीवित रख सका।

उनके अंतिम दिनों में उनका स्वास्थ्य बहुत गिर गया था। अवकाश-प्राप्ति के बाद वे केवल कुछ वर्ष ही जीवित रहे, फिर ८ अप्रैल, १८९४ को कीर्ति-शेष हो गए। उनकी पत्नी राजलक्ष्मी देवी अपनी तीन पुत्रियों के साथ उनके जाने के बाद भी कई वर्षों तक जीवित रही थीं। रवींद्रनाथ से लेकर बंग साहित्य के अनेक युवा लेखक लंबे समय तक उनसे प्रेरणा पाते रहे। उनकी प्रेरणा का वह अक्षय स्रोत आज भी चुका नहीं है, युगों-युगों तक रहेगा।

(‘स्वाधीनता सेनानी लेखक-पत्रकार’ पुस्तक से साभार)

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