२०१९ के आम चुनाव की ओर

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा और एन.डी.ए. सरकार अजेय है, ऐसे नैराश्य और हतोत्साह की भावना एवं वातावरण से मुख्य विरोधी पक्ष कांग्रेस तथा अन्य विरोधी दल क्षुब्ध थे। समझ नहीं पा रहे थे कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कौन सी रणनीति अपनाई जाए। राजस्थान में लोकसभा के दो उपचुनावों अजमेर और अलवर तथा विधानसभा के एक उपचुनाव में कांग्रेस विजयी रही। ये सीटें पहले भाजपा के पास थीं। गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन पहले की तुलना में कहीं अच्छा रहा, इससे कांग्रेस में एक नई स्फूर्ति का संचार हुआ। उन्हें आशा बँधी कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर सत्ता में आ सकती है। लेकिन त्रिपुरा, मेघालय तथा नागालैंड, उत्तर-पूर्व के इन प्रदेशों में भाजपा अथवा भाजपा समर्थित सरकार बनने से विपक्षी खेमे में फिर उदासी छा गई। विशेषतया त्रिपुरा में, जहाँ २० वर्ष से सी.पी.एम. की सरकार थी, भाजपा की जीत विस्मयकारी रही। सी.पी.एम. का गढ़ ध्वस्त हो गया। मेघालय कांग्रेस के हाथ से निकल गया। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समय-समय पर भाजपा का विकल्प बनाने की बात करती रही हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने जब तीसरे फ्रंट का सुझाव दिया, यानी भाजपा और कांग्रेस दोनों को छोड़कर सबका स्वागत किया। शीघ्र मिलकर दोनों के बीच परस्पर बातचीत करने की संभावना है।

उत्तर प्रदेश में फूलपुर और गोरखपुर में उपचुनाव हुए, क्योंकि गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ पाँच बार लोकसभा का चुनाव जीते थे तथा फूलपुर से केशव प्रसाद मौर्य। १९१७ में भाजपा की २११ सीटों पर बड़ी जीत हुई। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और मौर्य उप-मुख्यमंत्री। दोनों अब विधान परिषद् के सदस्य हैं। अतएव दोनों स्थानों पर पुनः उपचुनाव हुए। दोनों सीटों पर सपा के प्रत्याशी जीते। यह भाजपा के लिए करारा झटका है। यही नहीं, चुनाव के कुछ दिनों पहले मायावती ने घोषणा की कि बसपा सपा का समर्थन करेगी। हालाँकि उन्होंने किसी चुनावी सभा में भाग नहीं लिया। बसपा को २०१४ में लोकसभा में एक भी स्थान प्राप्त नहीं हुआ था। यह घोषणा भी उन्होंने चुनाव के चंद दिन पहले की। बसपा के कार्यकर्ता सक्रिय हो गए और यह सिद्ध हो गया कि मायावती अपने वोट ट्रांसफर करा सकती हैं।

किसी को विश्वास नहीं था कि १९९५ की घटना के बाद, जहाँ मायावती की इज्जत का सवाल था कि वह कभी सपा से हाथ नहीं मिलाएगी, दोनों में साँप और नेवले जैसी दुश्मनी थी। तब भाजपा के कुछ लोगों ने मायावती को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया था, उन दिनों मुलायम सिंह सपा के नेता और उ.प्र. के मुख्यमंत्री थे; और अब बेटा अखिलेश, जिसने ‘बुआ’ मायावती को मना लिया। मायावती की घोषणा के सरप्राइज एलीमेंट ने भाजपा को हतप्रभ कर दिया। भाजपा ने इस मेल-जोल को गंभीरता से नहीं लिया और उसका क्या नतीजा हो सकता है, इस ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। भाजपा की हार के कारणों की बाद में चर्चा करेंगे, हालाँकि अभी पार्टी को ही अपनी जाँच करनी होगी। खैर, मायावती ने अपनी घोषणा में कहा था कि यह समर्थन केवल इन उप-चुनावों तक सीमित है और २०१९ के आम चुनाव के बारे में समय आने पर निर्णय करेंगी। अब ऐसा लगता है कि मुँह में खून लग गया है। दोनों भाजपा को हराने के लिए २०१९ में भी कुछ ऐसा समझौता कर सकते हैं।

अखिलेश मायावती को धन्यवाद देने उनके निवास-स्थान पर गए और कहा जा रहा है कि दोनों के बीच इस मुद्दे पर भी बातचीत हुई। मुलायम सिंह, जो अखिलेश से अलग हो गए थे, अब सपा के पक्ष में २०१९ के आम चुनाव में हर जगह जाने को तैयार हो गए हैं। अखिलेश का कहना है कि आगे के लिए पुरानी बातों को भूल जाना पड़ता है। कांग्रेस ने भी गोरखपुर और फूलपुर में अपने प्रत्याशी खड़े किए थे, पर उनकी जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में कोई वजूद नहीं है, न संगठन और न कोई विश्वसनीय नेता। २०१७ के दो युवा भाई एक साथ न हो सके, हालाँकि अखिलेश ने राहुल से अपने प्रत्याशियों को वापस लेने को कहा था। इधर सोनिया गांधी ने संसद् के दूसरे भाग के पहले विपक्ष के नेताओं को अपने यहाँ रात्रि-भोजन के लिए आमंत्रित किया और भाजपा को २०१९ के आम चुनाव में हराने के लिए एक सम्मिलित रणनीति बनाई। ममता, मायावती और अखिलेश स्वयं इसमें शामिल न हो सके, पर उनके प्रतिनिधि वहाँ मौजूद थे। इस भोज में करीब छोटे-बड़े बीस दलों ने शिरकत की।

एन.सी.पी. के शरद पवार भी वहाँ उपस्थित थे। राहुल से उनकी बातचीत होती रही, बाद में भी राहुल उनसे मिलने गए। वास्तव में शरद पवार इन सबसे वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता हैं। राजनीति के मँजे हुए खिलाड़ी हैं। वे तीन दशक से प्रधानमंत्री का पद हाथ लगने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, पर अभी तक यह नहीं हो सका है। उन्हें यह आखिरी अवसर नजर आ रहा है। संविधान बचाने के नाम पर उन्होंने अन्य विरोधी दलों को निमंत्रित किया था, पर उनका लक्ष्य एक ही है। यदि यह संभव न हो तो महाराष्ट्र ही उनके हाथ में आ जाए। पर वहाँ की सत्ता बिना कांग्रेस के तालमेल के संभव नहीं है। आगे देखना है कि इनके बीच किस प्रकार का समझौता होता है। वे शिवसेना के दोनों गुटों से संपर्क बनाए हुए हैं। राज ठाकरे ने पूना में उनका लंबा साक्षात्कार किया। अब गुड़ी पड़वा के अवसर पर शरद पवार को अपने आयोजन, यानी एक बड़ी सभा में निमंत्रित करने गए थे।

इधर भाजपा के सहयोगियों में सरकार चलाने को लेकर कुछ असंतोष झलकता है। इनका कहना है कि हमारी बात नहीं सुनी जाती है, हमसे अहम मुद्दों पर बात नहीं होती है और जो सम्मान सहयोगी दलों का होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है। वाजपेयी सरकार की तरह इस समय एनडीए में कोई कोऑर्डिनेटर नहीं है। शिवसेना ने तो पहले ही कह दिया था कि २०१९ का आम चुनाव और अगले विधानसभा चुनाव अपने बलबूते पर लड़ेंगे, भाजपा के साथ मिलकर नहीं।

अकाली दल भाजपा के साथ है, पर वह भी कभी-कभी अपनी माँगें पेश करता है। बिहार में नीतीश कुमार के जेडीयू से माझी ने अपने दल को अलग कर लिया है। महादलितवाली स्ट्रैटेजी कहाँ तक प्रभावी होगी, कहा नहीं जा सकता है। इसके अलावा लोकसभा की सीट जेडीयू के हाथ से निकल गई। इससे नीतीश का कद कुछ छोटा हो गया। लालू के जेल में रहने पर भी राजद काफी मजबूत है। बिहार में यादवों के दिमाग में यह बात घर कर गई है कि भ्रष्टाचार के मामलों में केवल पिछड़े लोग ही पकड़े जाते हैं, उच्च वर्गवाले नहीं। लालू के पुत्र तेज प्रसाद यादव का नेतृत्व असरदार रहा। बिहार का यह महागठबंधन कारगर होता है या नहीं, यह देखने की बात है। वैसे इस समय २१ राज्यों में एनडीए शासन कर रहा है। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी भी अलग हो गई है, क्योंकि मोदी सरकार ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया है। उन्होंने अपने दोनों मंत्रियों को मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिलवा दिया। भाजपा के मंत्रियों ने भी आंध्र मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग केवल बहाना है।

वाई.एस.आर. कांग्रेस आंध्र के हितों की रक्षा के नाम पर अधिक जनप्रिय हो रही थी, तो नायडू ने अपनी लोकप्रियता बचाने के लिए यह चाल चली। वाई.एस.आर. कांग्रेस ने कहा कि वे मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव लाएँगे। नायडू ने पहले तो कहा कि वे प्रस्ताव का समर्थन करेंगे, परंतु फिर अपना अलग प्रस्ताव लाने की बात कही। बीजेडी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। शायद वह अविश्वास प्रस्ताव में वोटिंग ही न करे। वैसे मोदी सरकार को कोई खतरा नहीं दिखता है, किंतु इतने बड़े बहुमत के होते हुए अविश्वास प्रस्ताव के आने से सरकार की छवि कुछ धूमिल तो होगी ही। इससे जनता में अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो जाती है। देश देवगौड़ा, गुजराल और चंद्रशेखर की सरकारों को देख चुका है। विकास के लिए और अंतरराष्ट्रीय जगत् में समभाव के लिए देश स्थिरता चाहता है। अन्य अनेक पहलू हैं, पर उनकी चर्चा संभव नहीं है।

कांग्रेस में जो नई ऊर्जा पैदा हुई है, इसी कारण इंडिया टूडे के बॉम्ब एन्क्लेव में सोनिया गांधी ने बड़े जोश से कहा कि २०१९ में ‘अच्छे दिन’ का नारा कांग्रेस के लिए वही काम करेगा, जो ‘शाइनिंग इंडिया’ या ‘उज्ज्वल भारत’ ने २००४ में किया था। १६, १७ और १८ फरवरी को कांग्रेस के महाधिवेशन में राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की औपचारिकताएँ पूरी की गईं। स्वराज-प्राप्ति के पहले मोतीलाल नेहरू और उनके बाद पुत्र जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इंदिरा गांधी स्टेडियम में वर्षों बाद वही दृश्य देखा गया, जब सोनिया गांधी के बाद उनके पुत्र राहुल कांग्रेस के अध्यक्ष बने; इस आशा और आकांक्षा के साथ कि २०१९ में वे देश के प्रधानमंत्री बनेंगे। संयुक्त प्रगतिशील संगठन के अध्यक्ष ने जोशीला भाषण दिया और कहा कि मोदी के सबका विकास, सबके साथ, न खाएँगे और न खाने देंगे आदि नारे सत्ता हथियाने के हथकंडे थे। उनको ड्रामाबाज की संज्ञा दी गई। बदले की भावना से प्रेरित अहंकारी आदि कहा गया। भाषण में आगे कहा गया कि कांग्रेस न कभी पहले झुकी है और न झुकेगी। समान विचारधारावाले दलों से गठबंधन करेंगे, ताकि भाजपा को हराया जा सके। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल ने कहा कि कांग्रेस ही देश को आगे ले जा सकती है और देश में एकता बनाए रख सकती है। जनता ऊब चुकी है। किसानों और युवाओं के लिए मोदी कोई रास्ता नहीं निकाल पाए हैं। राहुल ने यह भी कहा कि युवाओं को प्राथमिकता मिलेगी, किंतु वे अनुभवी नेताओं को साथ लेकर चलेंगे। इस महाधिवेशन में तीन प्रस्ताव पास हुए। जब कांग्रेस सत्ता में होगी तो किसानों के कर्जे माफ होंगे। ई.वी.एम. की जगह मतपत्रों से चुनाव की माँग की गई, यद्यपि २००४ और २००९ में उसी के जरिए उनकी जीत हुई थी। साथ ही लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का विरोध किया। अन्य लोकलुभावने वादे किए गए। संगठन को मजबूत और सक्रिय करने की बात कही गई। कर्नाटक, जहाँ चुनाव होनेवाले हैं, पूरे सत्र में छाया रहा। देखना है कि अब किस प्रकार की व्यावहारिक रणनीति बनाई जाती है।

जैसाकि हम इस स्तंभ में पहले ही चर्चा कर चुके हैं, २०१९ का चुनाव भाजपा के लिए सहज और सरल नहीं होगा। इस समय संगठन और सरकार दोनों को आत्ममंथन करना होगा। कांग्रेस और अन्य विरोधी दल सोच रहे हैं कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्ता पके हुए फल की तरह है, जिसे वे तुरंत प्राप्त कर सकते हैं। इस समय भाजपा सरकार को निष्पक्ष होकर उन खामियों पर ध्यान देना होगा, जिनकी वजह से उत्तर प्रदेश में योगी को हार का मुँह देखना पड़ा। आरोप और प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। कहा जाता है कि योगी आदित्यनाथ का तालमेल न भाजपा के कार्यकर्ताओं से है और न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों से। वे अपनी वाहिनी पर विश्वास करते हैं। दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि दिल्ली मुख्यमंत्री के सुझावों की अनदेखी कर रही है। खेदजनक है कि ब्राह्मण और क्षत्रियों के विरोध की बात भी गोरखपुर के संबंध में हुई। फूलपुर और गोरखपुर दोनों जगह कम वोट डाले गए, जो कि कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता का परिचायक है। कार्यकर्ताओं ने चुनाव में आवश्यक दिलचस्पी नहीं ली। दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि कार्यकर्ताओं और सांसदों तथा विधायकों को खुलकर अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलता है। उनमें बहुत खिन्नता है। यदि ऐसा है तो क्यों है, इसका निराकरण शीघ्र ही करना होगा। २०१९ की डगर कठिन और पथरीली है। यह स्पष्ट हो रहा है कि राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न दुश्मन। नरेंद्र मोदी की साख और विश्वसनीयता अब भी सबसे ऊपर है। इसीलिए विरोधी समय-बेसमय तरह-तरह से उनकी छवि पर आक्रमण करते हैं, किंतु यदि कार्यकर्ता, विधायक और सांसद ही उदासीन रहेंगे तो ऐसे में मोदी अकेले कहाँ तक बोझ उठा सकते हैं? मोदी की नीतियाँ और कार्यक्रम सही ढंग से जनता की जानकारी में नहीं आ रहे हैं। अनुपालन में भी शिथिलता है।

एक खेदजनक प्रसंग है कि २०१८-१९ का बजट बिना किसी विचार-विमर्श या संसद् में बिना किसी बहस के पास हो गया, क्योंकि मुख्य प्रतिपक्ष और अन्य विरोधी दल संसद् की काररवाई चलने नहीं दे रहे थे। लोकसभा में तो पास हो गया, लेकिन यदि राज्यसभा में कुछ सुझाव दिए जाते हैं, तो यह सरकार पर निर्भर है कि वह माने या न माने। यह पहली बार नहीं हुआ है। दो बार पहले भी हो चुका है, पर है यह चिंताजनक। यह अवसर होता है जनता के अभाव-अभियोगों को प्रस्तुत करने का और अर्थव्यवस्था में सुधार के सुझाव देने का। कांग्रेस इस मौके का फायदा उठा सकती थी। पंजाब नेशनल बैंक में नीरव मोदी और चौकसी घोटाले के प्रारंभिक घोटालों के अतिरिक्त और भी कुछ कारनामे तथा घोटाले सामने आ रहे हैं। कानून अपना काम कर रहा है, पर बहस में प्रतिपक्ष सरकार की अन्य कमजोरियों का पर्दाफाश कर सकता था, परंतु विफल रहा। यह दृष्टिगोचर हो रहा है कि बैंकों के कर्ज देने के जो नियम हैं, उनका अरसे से उल्लंघन हो रहा है। बैंकों के अधिकारियों और कर्ज लेनेवाले व्यापारियों में साँठगाँठ है। यह भी अजीब है कि कुछ संवेदनशील पदों पर नियुक्तियों में दस-दस साल कोई परिवर्तन नहीं किए गए, अतएव घोटालों पर परदा डालना आसान हुआ। ऑडिट चाहे वह आंतरिक है अथवा बाहर की स्वतंत्र इकाई द्वारा, दोनों बिल्कुल असफल रहे अथवा वे ऑडिट भी इस गठजोड़ में शामिल रहे और हेरा-फेरी चलती रही। ऐसे में पूरी बैंकिंग व्यवस्था का पुनर्निरीक्षण आवश्यक है।

कुछ अर्थवेत्ताओं ने सुझाव दिए हैं कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों का निजीकरण होना चाहिए। यह सुझाव भी संदेह से परे नहीं है। हाँ, यह आवश्यक है कि बैंकों के बोर्ड में योग्य और ईमानदार डायरेक्टर होने चाहिए और उन्हें अपने काम में स्वायत्तता मिलनी चाहिए। बैंकों को किसी प्रकार के राजनैतिक और अन्य बाहरी दबावों से सुरक्षित रखना अनिवार्य है। एक चिंता का विषय यह भी है कि वित्त मंत्रालय ने नियमानुसार बैंकों पर निगरानी न रखने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक पर डाली। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों के संबंध में उसके अधिकारों में कमी की गई है, वह अधिकारियों की अदला-बदली नहीं कर सकता। रिजर्व बैंक ने कर्ज देने की कुछ प्रणालियों पर रोक लगा दी है। इससे देनदार और ईमानदार व्यापारियों तथा उद्योगपतियों को भी कठिनाई होगी। रिजर्व बैंक ने वित्त मंत्रालय पर इसका दायित्व डाल दिया। जब दो बड़ी पब्लिक इकाइयों के मतभेद सामने आएँ, तो यह चिंता का विषय हो जाता है, जबकि स्वस्थ बैंकिंग व्यवस्था के लिए दोनों में तालमेल आवश्यक है। जब देश की आर्थिक व्यवस्था सुधर रही है और उन्नति हो रही है, तो ऐसे में इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

सावरकर के चार मुख अभियोग

२६ फरवरी को दिल्ली के जाने-माने हिंदी भवन में डॉ. हरींद्र श्रीवास्तव लिखित पुस्तक ‘फोर स्टॉर्मी ट्रायल्स ऑफ वीर सावरकर’ का लोकार्पण हुआ। इस दिन, यानी २६ फरवरी, १९६६ में वीर सावरकर ने स्वेच्छा से शरीर छोड़ा था। कृति का लोकार्पण राज्यसभा के सदस्य और सुप्रसिद्ध पत्रकार डॉ. विप्लव दास गुप्ता ने किया। आयोजन की अध्यक्षता करने का हमारा दायित्व था। सावरकर के आत्म-समर्पण का दिवस उनकी सोच की गरिमा और गंभीरता, दोनों को उद्घाटित करता है। हरींद्र श्रीवास्तव की सावरकर विषयक (हिंदी और अंग्रेजी में) करीब दस पुस्तकें हैं। १९८१ में उनकी पुस्तक ‘फाइव स्टॉर्मी ईयर्स इन लंदन’ प्रकाशित हुई तो उसकी बहुत सराहना हुई। उसका हिंदी अनुवाद ‘उदित मार्तंड सावरकर लंदन में’ नाम से राजपाल ऐंड संस द्वारा १९८४ में निकला और तीन संस्करणों के बाद भी आज वह पुस्तक अनुपलब्ध है। दोनों पुस्तकों का पुनः प्रकाशन होना चाहिए। हरींद्र श्रीवास्तव स्वयं दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे हैं। उन्होंने सावरकर के साहित्य पर शिवाजी यूनिवर्सिटी, कोल्हापुर से डी.लिट. की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने वीर सावरकर पर एक फिल्म भी बनाई है। श्रीवास्तव को हिंदी और उर्दू में भी उतनी ही महारथ हासिल है, जितनी कि अंग्रेजी में। हमने एक बार उनको ‘सावरकर का दीवाना’ कहा था, और उन्होंने हँसकर कहा, यह सही है।

पुस्तक के विषय में अपने एक परिचयात्मक आलेख का पाठन सहपाठी और मित्र डॉ. कौल ने किया। श्रीवास्तव ने बड़े भावभीने शब्दों में सावरकर के जीवन के आखिरी सात दिनों की दिनचर्या की व्याख्या की, जिसे सुनकर श्रोताओं की आँखों में आँसू आ गए। लोग भाव-विह्वल हो गए। अपने विद्वत्तापूर्ण उद्बोधन में डॉ. विप्लव दास गुप्ता ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों तथा कुछ अन्य लोगों ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उनकी अवहेलना की, उनके विचारों को गलत ढंग से पेश किया। इसका एक कारण यह है कि सावरकर एक राजनेता या एक दल हिंदू महासभा के नेता थे। उनका व्यक्तित्व और प्रतिभा बहुमुखी थी। वे मौलिक चिंतक थे, कवि और उपन्यासकार थे, जीवनी लेखक थे, इतिहासकार थे, स्वतंत्रता सेनानी थे तथा राजनीति के दार्शनिक विवेचक थे।

आज आवश्यकता है कि उनकी मूल विचारधारा को उचित प्रकार से विश्लेषित किया जाए। उन्होंने मराठी में बहुत कुछ लिखा है, उसका सम्यक् विश्लेषण और प्रस्तुतीकरण अभी बाकी है। इस पुस्तक में सावरकर के विरुद्ध चार मुकदमों का विश्लेषणात्मक विवरण है। विशद विषय है, विस्तार से लिखा है। हरींद्र श्रीवास्तव ने देश और विदेश में शोध कर सामग्री एकत्र की है। यह पुस्तक उनकी पूरी जीवनी नहीं है, किंतु एक संक्षेप वृत्त उन्होंने दे दिया है। इंग्लैंड जाने के पहले उनकी नाशिक और पूना की राजनैतिक गतिविधियों और ब्रिटेन की साम्राज्यवाद विरोधी काररवाइयों एवं भारत की स्वतंत्रता का प्रचार करने के कारण, विशेषतया मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली के वध के बाद भारत की ब्रिटिश सरकार बहुत विचलित थी और येन-केन-प्रकारेण सावरकर को गिरफ्तार करना चाहती थी। स्वास्थ्य लाभ के लिए उन दिनों सावरकर फ्रांस में थे, जबकि उनके बड़े भाई गणेश सावरकर और अन्य कई साथी भारत में गंभीर धाराओं में पकड़ लिये गए। सरकार विनायक दामोदर सावरकर को भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालक और धुरी मानती थी। श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम कामा आदि शुभचिंतकों के मना करने पर भी वे लंदन वापस आ गए, क्योंकि उनके दिल में यह भावना घर कर गई कि उनके सहयोगी यातनाएँ भुगत रहे हैं, उसमें उनकी भी भागीदारी होनी चाहिए।

लंदन लौटते ही वे गिरफ्तार कर लिये गए। मजिस्ट्रेट ने उन्हें व्रिक्सटन जेल भेज दिया। जमानत नामंजूर कर दी, इस बिना पर कि पूरे केस के कागजात आने चाहिए। भारत सरकार और ब्रिटिश सरकार मिलीभगत से नहीं चाहती थीं कि मुकदमा लंदन में सुना जाए, क्योंकि वहाँ के कानून के अंदर सावरकर को दोषी करार देना आसान न था। हालाँकि सावरकर विद्या-अध्ययन के लिए सब औपचारिकताएँ पूरी कर और भारत सरकार के नियमानुसार विलायत गए थे; फिर भी सरकार ने उन्हें कानून से भगोड़ा बताकर अदालत से भारत भेजने की माँग की, क्योंकि वहाँ का न्यायतंत्र पूरे तौर पर उनके हाथ में था। सावरकर के वकील रेजीनल्ड वाहन ने बहुत कोशिश की कि मुकदमा ब्रिटिश अदालत में चले, पर वे सफल नहीं हुए। कोर्ट ऑफ अपील ने भी भारत सरकार के अनुरोध पर सावरकर को भारत भेजने के निर्णय की तस्दीक कर दी, जस्टिस कोलरिज का मत इसके विपरीत था। विंसटन चर्चिल ने, जो उस समय ब्रिटिश सरकार में होम सेक्रेटरी थे, तुरंत सावरकर को भारत भेजने के आदेश दे दिए। यह था उनपर पहला मुकदमा।

सावरकर बराबर अन्याय के शिकार होते रहे। हम चारों मुकदमों की तफसील में यहाँ नहीं जा सकते हैं, उसके लिए तो पुस्तक को ही पढ़ना होगा। इस निर्णय के बाद उनके सहयोगियों ने सोचा कि सावरकर को ले जानेवाला पानी का जहाज जब फ्रांस के मार्सेलीज बंदरगाह पर कार्यवश रुकेगा, क्यों न उन्हें वहीं पर छुड़ा लिया जाए। सावरकर को यह जानकारी जेल में पहुँचा दी गई थी। टॉयलेट जाने के बहाने कोजेटे के रास्ते मार्सेलीज के पास सावरकर समुद्र में कूद गए। पुलिसकर्मियों ने उनपर गोलियाँ दागनी शुरू कीं और पीछा करने लगे। सावरकर तैरते हुए फ्रांस के समुद्र-तट पर पहुँच गए। पुलिस उनका पीछा ‘चोर-चोर’ कहकर कर रही थी। फ्रांस के एक कनिष्ठ पुलिस अधिकारी को सावरकर ने भीगे जाँघिया और कमीज पहने टूटी-फूटी फ्रेंच में यह बताने की कोशिश की कि वे एक राजनैतिक कैदी हैं, चोर नहीं, और उनको अपने उच्च अधिकारियों के पास ले जाने का अनुरोध किया। लेकिन ब्रिटिश और भारत की पुलिस, जो उनको बंबई ला रही थी, के दबाव में उस जूनियर पुलिस अधिकारी ने सावरकर को उनके सुपुर्द कर दिया। वे उन्हें फिर ब्रिटिश जहाज में ले गए। उनपर निगरानी बहुत कड़ी कर दी गई। उधर कार खराब हो जाने के कारण उनको छुड़ाने के प्रयास में उनके साथी घटनास्थल पर कुछ देर से पहुँच पाए। यह समाचार-पत्रों में छपा, बड़ा राजनैतिक बावेला शुरू हुआ। एक राजनैतिक व्यक्ति को, जो फ्रांस में शरण माँग रहा था, गलत तरीके से ब्रिटिश और इंडियन पुलिस क्यों ले गई? यह राजनैतिक शरण माँगने का मामला था। अखबारों में इसकी बहुत राजनैतिक गरमागरमी रही। फ्रांस के राजनेताओं ने फ्रांस सरकार और ब्रिटिश सरकार की बड़ी आलोचना की। बहुत कोशिश के बाद मामला हेग के अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल को सौंपा गया। ट्रिब्यूनल ने सरकारों की आलोचना की, पर अंत में निर्णय ब्रिटिश सरकार के पक्ष में रहा; जिनके कब्जे में सावरकर थे। सावरकर का यह मुकदमा अंतरराष्ट्रीय कानून का एक महत्त्वपूर्ण भाग बन गया। हेग ट्रायल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का अपने आप में एक विचित्र अध्याय है। प्रज्ञस चाहता था, ट्रिब्यूनल ने भी कहा था कि भारत में उनके अभियोग पर काररवाई शुरू नहीं होनी चाहिए, जब तक कि वह पूरे विवादास्पद मामले को सुनकर निर्णय न दे। भारत के गवर्नर जनरल और बंबई के गवर्नर तो तुले हुए थे कि शीघ्र मुकदमा शुरू हो, क्योंकि शेर उनकेपिंजड़े में आ ही गया था, किसी-न-किसी तरह उनको कालापानी भेजा ही जाए।

तीसरा मुकदमा भारत में नाशिक षड्यंत्र केस के रूप में शुरू हुआ, साधारण अदालत में नहीं, एक विशेष ट्रिब्यूनल बनाया गया। बंबई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस वैसिल स्काट अध्यक्ष, जस्टिस एन.जी. चंदावर्कर (जो कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने) और जस्टिस हियटन सदस्य। उनका निर्णय अंतिम था। तीनों मामलों में सावरकर को आरोपी बनाया गया। सरकारी वकील थे एडवोकेट जनरल जार्डीन तथा अन्य तीन प्रसिद्ध वकील। मैडम कामा के अनुरोध पर सावरकर के बचाव पक्ष के वकील बने जोसेफ बैपतीस्टा, जो तिलक के होमरूल में सहयोगी थे तथा कुछ अन्य प्रतिष्ठित एडवोकेट। सावरकर ने अपने बचाव में कुछ कहने से इनकार किया, क्योंकि ट्रिब्यूनल को अधिकार नहीं है उनके विरुद्ध आरोप सुनने का। फ्रांस की भूमि पर जब वे शरणार्थी के अधिकार (राइट टू एसाइलम) माँग रहे थे, अंतरराष्ट्रीय परंपरा का उल्लंघन कर उनको गिरफ्तार किया गया, अतः उनकी गिरफ्तारी अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि वह फ्रांस पर, जो स्वयं को स्वतंत्रता, समता और भाईचारे का जनक मानता है, अपना मामला उसके विवेक पर छोड़ते हैं।

ट्रिब्यूनल ने फ्रांस की उनकी गिरफ्तारी की अवैधता को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वह तो अभी हेग में विचाराधीन है। जैसा अंदेशा था, सावरकर को आजीवन कारावास और उनकी पूरी जायदाद की जब्ती की सजा सुना दी गई। बंबई के गवर्नर चाहते थे कि २५ साल के कारावास के बाद भी सावरकर भारत में वापस न आ सकें। उनपर उसी ट्रिब्यूनल के सामने एक मुकदमा और चलाया गया कि नाशिक के कलक्टर जैक्सन हत्याकांड में उन्होंने पिस्तौल भेजी थी, वे हत्याकांड को बढ़ावा देने और उसमें सहायक होने के आरोपी हैं। इस मुकदमे में भी ट्रिब्यूनल ने उन्हें दूसरी बार आजीवन कारावास का दंड दिया। किसी को दो आजीवन कारावास की सजा का यह पहला और अपने आप में एक ही उदाहरण है। काला पानी में पचास साल कारावास का दंड। उसके बाद ३ जुलाई, १९११ से अंडमान का प्रकरण तथा दस साल के बाद भारत में रत्नागिरि जेल में। उसके उपरांत रत्नागिरि से घर में नजरबंदी और सरकार द्वारा उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर। १० मई, १९३७ को उनकी रिहाई तथा उसके उपरांत हिंदू महासभा के अध्यक्ष, अंत में अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति से संन्यास।

चौथा मुकदमा स्वतंत्र भारत में उनपर चला, जब उनको गांधी हत्याकांड में आरोपी बनाया गया। बहुत कम लोग शायद यह जानते हैं कि सावरकर और गांधी का परिचय लंदन से था। दो-तीन बार उनकी मुलाकातें भी हुईं। उस समय तक शायद गोखले को छोड़कर कांग्रेस के किसी नेता से इतना पुराना परिचय शायद ही रहा हो। भारतीय विद्यार्थियों ने लंदन में विजयादशमी का आयोजन किया। इस अवसर पर दोनों ने अपने विचार प्रकट किए। अहिंसा के विषय में दोनों में मतभेद था, पर कोई वैयक्तिक रंजिश नहीं थी। रत्नागिरि में भी गांधीजी और कस्तूरबा गांधी सावरकर से मिले। हरिजन समस्या पर बातचीत हुई। सावरकर उस समय अस्पृश्यता निर्मूलन के कार्य में संलग्न थे। किसी प्रकार के पारस्परिक या व्यक्तिगत विद्वेष का प्रश्न ही नहीं था। फिर भी गांधीजी की नीतियों से उनका खुला विरोध था, खासकर मुसलिम तुष्टीकरण और भारत विभाजन के सवाल पर। फिर भी गांधी-हत्या के आरोप में सावरकर गिरफ्तार किए गए। गोडसे तथा सावरकर के अपने बयान से स्पष्ट हो जाता है कि सावरकर का गांधीजी की हत्या से कोई संबंध नहीं है। उसने सावरकर और अपने संबंधों का खुलासा किया कि किस प्रकार उनका सम्मान करते हुए वह गांधी के स्वतंत्रता के बाद केविचारों से सहमत नहीं था। लालकिले में स्पेशल कोर्ट में मुकदमा चला। जस्टिस आत्माराम ने उन्हें सादर मुक्त कर दिया, क्योंकि उनके विरोध में कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था। बचाव पक्ष में उनके मुख्य अधिवक्ता थे सी.आर. दास के भाई एस.आर. दास। फिर भी कुछ लोग समय-समय पर उन्हें यह दोष देते रहते हैं।

तुषार गांधी ने इस विषय पर एक पुस्तक गांधी ‘लेट्स किल’ (रूपा, दिल्ली) लिखी है और उसमें जो तर्क दिए, उनका हरींद्र श्रीवास्तव ने निराकरण किया है। उन्होंने ध्यान आकर्षित किया है मनोहर मोलगांवकर की किताब का, उसके द्वितीय संस्करण, २००८ (रोलो बुक्स, दिल्ली), जहाँ उन्होंने बताया है कि किस प्रकार डॉ. अंबेडकर, जो उस समय विधि मंत्री थे, ने एल.वी. भोपटकर को बताया कि सावरकर के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है, वे निर्दोष घोषित होंगे। कैबिनेट केकुछ अन्य मंत्री भी ऐसा सोचते हैं, केवल प्रधानमंत्री नेहरू के ही कारण वे आरोपी बनाए गए हैं। पहले संस्करण में मोलगांवकर ने लिखा है कि जो आपातकाल में प्रकाशित हुआ था, इन बातों की चर्चा नहीं कर सके। देश की स्वतंत्रता के बाद जिस आजादी के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया और यातनाएँ सहीं, इससे सावरकर के स्वास्थ्य और मनोदशा को बहुत धक्का लगा। वे अत्यंत अंतर्मुखी हो गए, पुराने परिचितों और सहयोगियों से भी मिलना-जुलना छोड़ सा दिया। एक विडंबना यह देखिए कि १८५७ की क्रांति पर सावरकर ने भारतीय दृष्टिकोण से प्रथम स्वातंत्र्य समर ग्रंथ लिखा, शोध और मूल दस्तावेजों के आधार पर, जो उन्हें ब्रिटिश लाइब्रेरी में उपलब्ध हुए; और छपने के पहले ही ब्रिटिश सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया तथा जिसके प्रकाशन का अपना गरिमामय इतिहास है, उसके लेखक को १९५७ में शताब्दी वर्ष के किसी आयोजन में मो. आजाद या प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा आमंत्रित नहीं किया गया। किंतु कुछ जन-संस्थाओं ने उस अवसर पर वीर सावरकर को आमंत्रित किया और उन्होंने पुरजोर भाषण दिया। यहाँ यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जब इंग्लैंड में सावरकर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन कर रहे थे, जिससे ब्रिटिश सरकार परेशान थी, उस समय नेहरू भी वहाँ विद्यार्थी थे। अपनी आत्मजीवनी में नेहरू ने बहुत कुछ उस समय की घटनाओं की चर्चा की है, पर सावरकर और इंडिया हाउस का कोई जिक्र करना उन्होंने उचित नहीं समझा। शायद लालकिले के मुकदमे के उपरांत दिल्ली में यह पहला और अंतिम आयोजन था, जिसमें सावरकर ने भाग लिया। सावरकर का हर मुकदमा अपना महत्त्व रखता है। सावरकर का जीवन समुद्र की तरह है—कितना और क्या लिखा जाए? विद्वान् लेखक हरींद्र श्रीवास्तव ने इस पुस्तक में उनको संक्षेप में समाहित किया है। वे साधुवाद के पात्र हैं। २६ फरवरी के आयोजन में यह जानकर प्रसन्नता हुई कि उन्होंने इस पुस्तक का हिंदी रूपांतर तैयार कर लिया है, जो संभवतः वीर सावरकर के जन्मदिवस मई, २०१८ तक प्रकाशित हो जाएगा।

कन्नौज नाम कैसे पड़ा?

इस स्तंभ में ‘वैचारिकी’, भारतीय विद्यामंदिर की द्विभाषिक शोध-पत्रिका की समय-समय पर चर्चा होती रही है। ‘वैचारिकी’ जुलाई-अगस्त, २०१७ के अंक में एक महत्त्वपूर्ण आलेख डॉ. भँवरलाल जोशी का ‘एक अद्भुत व्युत्पत्ति कोश’ देखने को मिला। उन्होंने उसमें राजस्थान की एक विलक्षण प्रतिभा की ऐतिहासिक देन की चर्चा की है। वे किसी विद्यालय में नहीं पढे़। गरीबी के कारण विधवा माँ के भरण-पोषण के लिए १६ वर्ष की आयु तक गाय चराने का काम करते रहे। उसके उपरांत उन्होंने स्वाध्याय एवं निदिध्यास से आठ भाषाओं में प्रवीणता प्राप्त की। वे भाषाएँ हैं—अरबी, फारसी, तुर्की, उर्दू, संस्कृत, प्राकृत, हिंदी और अंग्रेजी। अपनी आयु के चालीस वर्षों में उन्होंने करीब ४५ हजार पृष्ठों के अद्भुत ‘व्युत्पत्ति कोश’ की रचना की। ९३ वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हो गया। कोश अपूर्ण और अप्रकाशित रहा। डॉ. भँवरलाल जोशी का कहना है कि उन्होंने अपने ज्ञान को सदैव गुप्त रखा, जिससे कि उनकी खोज का श्रेय कोई दूसरा न ले ले। स्व. श्री लक्ष्मीलालजी जोशी, जो राजस्थान के एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी, शिक्षाविद् तथा व्युत्पत्तिकार के मित्र थे, अरबी के कुछ भाग लिप्यंतरण के लिए राजस्थान अकादमी, उदयपुर से कोशिश की, पर प्रयास सफल नहीं हुआ। विद्वान् लेखक ने किसी प्रकार व्युत्पत्तिकार, विद्वान् राजवैद्य डॉ. घनश्याम शर्मा शास्त्री, अलिमे फाजिल फारसी से निकटता बढ़ाकर और उनका विश्वास अर्जित कर करीब सौ शब्दों की व्युत्पत्तियाँ प्राप्त कर अपनी शोधपूर्ण विस्तृत भूमिका के साथ बानगी के तौर पर १९७३ में ‘अपूर्व हिंदी व्युत्पत्ति कोश ः परिचायिका’ प्रकाशित करवाई। भँवरलालजी का यह कार्य स्तुत्य है। उन्होंने जो लेख ‘वैचारिकी’ में लिखा, वह कम-से-कम राजस्थान के सत्ताधारियों और विद्वानों के संज्ञान में आना चाहिए। डॉ. जोशी के सहयोग से राजस्थान सरकार को इस धरोहर के संरक्षण का प्रयास करना चाहिए।

इतिहास और साहित्य में रुचि तथा कुछ समय तक राजस्थान में कार्यरत रहने के कारण इस ओर हमारा थोड़ा सा लगाव रहा है। एक और विशेष कारण यह रहा कि डॉ. जोशी ने कन्नौज शब्द की व्युत्पत्ति का विवरण दिया है। यह हमारे पूर्वजों का आदिस्थान है। आज भी कन्नौज से १०-१५ किलोमीटर की दूरी पर हमारा पैतृक घर है। कन्नौज अब एक जिला या जनपद है। कन्नौज का लोकेशन स्टे्रटेजीकली काफी महत्त्व का है। डॉ. जोशी ने अपने आलेख में कन्नौज की व्युत्पत्ति का उदाहरण दिया है, अतएव इसमें हमारी दिलचस्पी होना स्वाभाविक है। हम लेख के उस भाग को ‘वैचारिकी’ के सौजन्य और डॉ. जोशी को धन्यवाद सहित उद्धृत कर रहे हैं। संयोग से जो ग्रंथ, जैसे डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी के ‘कन्नौज का इतिहास’, इलियट डाउसन के संपूर्ण आठ वॉल्यूम ‘द हिस्टरी ऑफ इंडिया वाई इरस हिस्टोरिज्म’ एवं ‘उर्दू-हिंदी कोश’ हमारे संग्रह में उपलब्ध हैं, उनको देखा। इसके अतिरिक्त आनंदस्वरूप मिश्र के ‘कन्नौज का इतिहास’, हिंदी संस्थान, लखनऊ से प्रकाशित ग्रंथ भी देखा। कन्नौज की उपर्युक्त व्याख्या वहाँ भी नहीं है। यह अवश्य कहना चाहेंगे कि यह गं्रथ प्राचीन भारत के इतिहास को समझने के लिए बहुत लाभदायक है। यह एक नई व्याख्या है, जो व्युत्पत्तिकार ने विद्वत्तापूर्वक निकाली है, यह विचारणीय भी लगती है। कन्नौज कभी भव्य और खुशहाल नगरी रही है, देश की राजधानी रही और कश्मीर तक उसका राज्य रहा है। इसीलिए मुसलिम आक्रमणकारियों और इतिहासकारों ने नगरी का नाम कन्नौज रखा। ‘कन्नौज’ नाम कैसे पड़ा, इस दिशा में एक नई खोज है।

English has derived from French, many words which had been borrowed from the Germanic tribes, Franks, Goths and from the Arabs, and from Spanish Words borrowed from Goths as well as from the Arabs and celts. (Webster’s New World Dictionary, Second Edition, Page XXXI).

एक अन्य शब्द देखिए ‘कनोज’। यह उत्तर प्रदेश के एक शहर का नाम है, जिसे वर्तमान में कन्नौज लिखा जा रहा है। उक्त व्युत्पत्ति कोश में इसे अरबी भाषा से हिंदी में आया हुआ बताया गया है, जबकि हिंदी के भाषाविद् इसे संस्कृत के ‘कान्यकुब्ज’ शब्द का तद्भव रूप मानते हैं। इन दोनों में से कौन सा मत सत्य है, यह प्रकट करने से पहले मैं यहाँ कन्नौज के इतिहास पर शोध करनेवाले विद्वान् डॉ. आर.एस. तिवारी का उल्लेख करना चाहूँगा। डॉ. तिवारी अपने शोध-प्रबंध ‘हिस्टरी ऑफ कन्नौज’ में ‘कन्नौज’ नाम के संबंध में संस्कृत के साहित्यिक ग्रंथों और पुराणों के अनेकानेक उद्धरण प्रस्तुत करने पर भी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके कि ‘कन्नौज’ नाम निर्विवाद रूप से ‘कान्यकुब्ज’ नाम का अपभ्रंश रूप है। ‘अपूर्व हिंदी व्युत्पत्ति कोश’ के विद्वान् लेखक के मतानुसार उत्तर प्रदेश के उक्त प्रसिद्ध शहर ‘कन्नौज’ (जो कभी उत्तर भारत की राजधानी भी था) को यह नाम अरबों ने दिया था और यह नाम उक्त शहर की पुरानी आर्थिक समृद्धि की ऐतिहासिक पहचान का वाचक है। व्युत्पत्ति कोश का लेखक बताता है कि इस शहर का यह नाम जिस शब्द से बना है, वह मूल शब्द है ‘कनूज’। यह शब्द अरबी भाषा के ‘कंज’ शब्द का बहुवचन है। कंज का अर्थ है—भंडार, खजाना। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ से प्रकाशित मुहम्मद मुस्तफा खाँ मद्दाह के उर्दू-हिंदी शब्दकोश में भी ‘कंज’ शब्द को अरबी भाषा का ही बताकर इसका अर्थ निधि या खजाना लिखा हुआ है (पृ.सं.९२)। इससे ‘कनूज’ का अर्थ हुआ ‘बहुत खजाने’। फारसी तवारीखों के लेखक भी इस शहर का नाम ‘कनोज’ और ‘कनूज’ दोनों रूपों में लिखते रहे हैं। अरबी के भाषाविज्ञान की दृष्टि से भी ‘कन्नौज’ शब्द को ‘कनूज’ से बना हुआ बताना अनुचित नहीं है। इस प्रकार ‘कनूज’ (बहुत खजाने) से संबद्ध ‘कन्नौज’ (या कनोज) का अर्थ होता है—‘बहुत खजानेवाला’।

निष्कर्ष है कि यह शहर अपने इस नाम की व्युत्पत्ति की दृष्टि से ‘बहुत खजानोंवाला’ शहर सिद्ध होता है और फारसी तवारीखों में यह अपनी इसी विशेषता से पहचाना जाता रहा था। इसका प्रमाण ‘कामिल-उत-तवारीख’ तथा ‘तारीख-इ-यमीनी’ आदि कई इतिहास-ग्रंथों के आधार पर लिखित सर एच.एम. इलियट के ग्रंथ ‘हिस्टरी ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाइ इट्स ओन हिस्टोरियंस’ में भी मिलता है। सर इलियट के उपर्युक्त इतिहास-ग्रंथ में लिखा मिलता है कि गजनविदे साह मसूद तृतीय (४९२-५०९ हिजरी सन्) ने कन्नौज को जीतने के लिए अपनी फौज को रवाना करते समय कहा था, ‘‘हिंद की राजधानी कन्नौज, शमन्स का काबा और कृष्यभूमियों का किबला है, जहाँ हिंद के सारे खजाने उसी तरह एकत्र हैं, जिस तरह नदियों का जल समुद्र में एकत्र होता है।’’ (Kananj the capital of Hind...The Kaba of the Shamans and the Kibla of infields where the treasures of Hind were collected just as all the rivers flow into the sea. (Eliot, history of India as told by its own Historians. Vol. IV, page 526).

इस ऐतिहासिक प्रमाण से यह प्रकट होता है कि ‘कनोज’ नाम इस शहर की प्राचीन समृद्धि का परिचायक है। इससे यह परिचय मिलता है कि अरब आदि पश्चिमी यवन देशों के बादशाहों के दिलों में भारत के इस शहर की प्राचीन अतुल आर्थिक समृद्धि के प्रति प्रबल आकर्षण रहा था। ‘कान्यकुब्ज’ नाम से ‘कनोज’ या कन्नौज शब्द का विकास मानने पर इस शहर की वैसी कोई इतिहास-प्रसिद्धि प्रमाणित नहीं होती, जैसी अरब भाषा के ‘कनूज’ या तत्संबद्ध ‘कनोज’ से ‘कन्नौज शब्द का विकास मानने से होती है। कन्नौज अति प्राचीन नगर है, और भारतीय इतिहास तथा संस्कृति का केंद्रबिंदु रहा है। इस विषय में समयानुसार आगे और जानने का प्रयास होगा।

पूर्व राष्ट्रपति के संस्मरण

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के अपने संस्मरण के दो भाग पूर्व में उनके राष्ट्रपति के कार्यकाल में प्रकाशित हो चुके थे और इस स्तंभ में उनकी चर्चा भी हुई थी। तीसरा खंड ‘द कोलिएशन ईयर्स’, यानी ‘मिली-जुली सरकार के वर्ष’ हाल ही में प्रकाशित हुआ। प्रकाशक हैं रूपा, दिल्ली। चूँकि पहले दो खंडों के प्रकाशन के समय लेखक देश के राष्ट्रपति के दायित्व का निर्वहण कर रहे थे, उनको पढ़ते समय कभी-कभी ऐसा लगता था कि वे व्यक्तियों और समस्याओं के बारे में कुछ और कहना चाहते हैं, लेकिन कह नहीं पा रहे हैं। तीसरे खंड में लेखक अधिक मुखर हैं। राष्ट्रपति के दायित्व का बंधन नहीं है। वैसे प्रणब मुखर्जी बहुत सोच-विचारकर और संतुलित ढंग से अपने शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो कहते हैं, उससे और काफी इशारे मिल जाते हैं। यह उनकी राजनैतिक परिपक्वता का परिचायक है। उनके तीसरे खंड का कालखंड काफी उथल-पुथल भरा और संवेदनशीलता का था। मिली-जुली सरकार को चलाना आसान नहीं होता है। उसकी पेचीदगियाँ समझना और उनका निराकरण करना बड़ी कुशलता का काम है। प्रणब मुखर्जी इसमें बहुत माहिर हैं। वैसे उन्होंने सोनिया गांधी से अपने संबंध, दो बार प्रधानमंत्री बनने के आसार, पर दोनों बार आशा फलीभूत न हो पाना आदि के बारे में खुलेपन से लिखा है।

देवगौड़ा और गुजराल की सरकारों के प्रति कांग्रेस का रवैया कैसा और क्यों रहा, उसपर अच्छा प्रकाश डाला है। वे कांग्रेस की मिलीजुली सरकार में रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री और पुनः वित्त मंत्री बने, इन बातों का उन्होंने अच्छा विवरण दिया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री चिदंबरम से किन मामलों में उनका मत या सोच अलग रही, उसका भी उन्होंने खुलासा किया है। प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस की मिली-जुली सरकार और पार्टी में भी समय-समय पर संकटमोचनक की भूमिका निभाई। अमरीका से न्यूक्लियर डील के विरोध में सी.पी.एम. ने साथ छोड़ दिया, तब भी उन्होंने बड़ी सूझ-बूझ से कार्य किया, ताकि कांग्रेस की सरकार चलती रहे। कैबिनेट में जब किसी मामले में आम सहमति नहीं हो पाती तो उसे एक समिति पर छोड़ दिया जाता था और उसके अध्यक्ष प्रणबजी होते तथा वे कोई-न-कोई हल निकाल लेते थे। राजनीति में साम, दंड, भेद का कहाँ और किस प्रकार प्रयोग हो, वे अच्छी तरह जानते हैं। उनका राजनीति और संसदीय अनुभव काफी लंबा रहा। उनकी स्मरण-शक्ति अद्भुत है। वे संविधान और संसद् के नियमों के आधार पर विशेषज्ञ हैं। दुविधा के समय वे अपनी याददाश्त से कोई-न-कोई पुराने निर्णय या संस्मरणों का आधार निकाल ही लेते हैं। उनका यह तीसरा खंड भारतीय राजनीति और संसदीय कार्यप्रणाली को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। आशा है, उनके राष्ट्रपति-काल के संस्मरण इस वर्ष के अंत तक प्रकाशित होकर आ जाएँगे। पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय हैं। शिक्षा और विकास की समस्याओं में उनकी विशेष दिलचस्पी है। शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने एक फाउंडेशन की स्थापना की है, जो इस क्षेत्र में शोध करेगा और समस्याओं के निदान के लिए सुझाव देगा तथा जनता में जागृति पैदा करने का प्रयास करेगा।

आपातकाल की त्रासदी

इमरजेंसी या आपातकाल पर अंग्रेजी में अनेक पुस्तकें आई हैं। भुक्तभोगियों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने अपने संस्मरण लिखे हैं अथवा जो उन्होंने देखा, उसका विवेचन किया है। आपातकाल ने देश की मनोदशा पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। देश प्रतिवर्ष उस समय की स्थिति को स्मरण करता है, और नहीं चाहता कि देश को पुनः उस प्रकार की स्थिति देखनी पडे़। हिंदी में भी कुछ पुस्तकें अवश्य निकली हैं, पर उनमें समग्रता के साथ आपातकाल का आकलन नहीं हुआ। शुभ्र ज्योत्स्ना की ‘कैसे भूलें आपातकाल का दंश’ पुस्तक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से अभी प्रकाशित हुई है। ग्रंथ के प्रणयन करनेवाले संपादक मंडल केसदस्य हैं—डॉ. चंद्रशिखा, डॉ. अशोक गर्ग एवं सुभाष आहुजा। पुस्तक का उपशीर्षक रेखांकित करता है कि आपातकाल (२६ जून, १९७५ से २१ मार्च, १९७७) अँधेरे के खिलाफ संघर्ष है। पुस्तक में कुछ अखबारों के फोटो तथा तरह-तरह के चित्र एवं तसवीरें हैं, जो उस समय के हालात पर रोशनी डालती हैं। यह ग्रंथ आपातकाल का समग्रता से आकलन करता है, तथ्य प्रस्तुत करता है। वास्तव में बारह अध्यायों में आपातकाल से रूबरू कराता है। पाँचवें अध्याय में लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा प्रतिरोध के अन्य मुख्य नायकों के स्केच अत्यंत सार्थकता से प्रस्तुत किए गए हैं। यह एक संग्रहणीय ग्रंथ है। कम-से-कम हिंदी भाषा-भाषी प्रदेशों के जन-पुस्तकालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में यह ग्रंथ अवश्य उपलब्ध होना चाहिए, ताकि आगे आने वाली पीढि़याँ जान सकें कि किस प्रकार थोथे कारणों से देश पर आपातकाल थोपा गया था, देश ने क्या-क्या यातनाएँ सहन कीं और किस प्रकार जनता ने अपने प्रयास से लोकतंत्र के प्रकाश का पुनः स्थापन किया।

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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