भँवरजी म्हाने खेलण द्यौ गणगौर

होलिका दहन के दूसरे दिन से ही राजस्थान में गणगौर पूजन की गूँज होने लगती है। सूर्योदय से पूर्व ही किशोरावस्था की बालिकाएँ घर से निकलकर दूब लेने जाती हैं। समूह बनाकर दूब लेकर आती हैं। घर पर वे दूब से शंकर-पार्वती की प्रतीक प्रतिमा ईश्वर-गौरा का पूजन करती हैं। राजस्थान में गणगौर शंकर-पार्वती की आराधना का प्रमुख त्योहार है। सामान्यतः इसे गौरी पूजा कहते हैं। गणगौर ‘गौरी’ का ही पर्यायवाची है। गणगौर महिलाओं का प्रमुख त्योहार है। कोई भी महिला कुमारी हो अथवा विवाहित इसे हमेशा मनाती है। कुमारी कन्याएँ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति की अभिलाषा पूर्ण होने के लिए इसका पूजन करती हैं। दूसरी तरफ विवाहित महिलाएँ अपना सुहाग अमर बनाए रखने के लिए इसे बडे़ उत्साह और उमंग के साथ मनाती हैं। जोधपुर, बीकानेर, शेखावाटी तथा जयपुर में गणगौर त्योहार के उपलक्ष्य में लगनेवाले मेले देखने योग्य होते हैं, इस प्रकार गणगौर राजस्थान का एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक त्योहार है।

महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि राजस्थान की गणगौर तीज का मेला देखने विदेशी पर्यटक भारत आते हैं। जयपुर में त्रिपोलिया से शाही गणगौर तीज की प्रतिमाएँ बहुत ही धूमधाम से निकाली जाती हैं।

चाहें इसे गणगौर कहें अथवा गबर, गबजा। इन सब शब्दों का एक आशय और अर्थ होता है। इस त्योहार के दिन कुँवारी और विवाहित दोनों ही महिलाएँ व्रत रखकर इसका पूजन करती हैं, कथा-श्रवण करती हैं, गीत गाती हैं। जैसा कि उल्लेख है कि गणगौर पूजा चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से आरंभ होकर चैत्र शुक्ला चतुर्थी को समाप्त होती है। पूरे अठारह दिनों तक राजस्थान में चहल-पहल रहती है। होली दहन के दूसरे दिन ही प्रातः उसकी राख लेकर अंडाकार गोलियाँ बनाई जाती हैं। उन्हें गौरी का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।

आठवें दिन शीतलाष्टमी को तालाब से चिकनी मिट्टी लाकर उससे ईसर (ईश्वर) व गौरी की प्रतिमाएँ निर्मित कर उसी में होली की राख की जो गोलियाँ बनाई गई थीं, उन्हें मिला दिया जाता है। प्रतिदिन उन्हें पूजा जाता है। एक छोटे गमले में मिट्टी डालकर जौ मिला दिए जाते हैं। तीन-चार दिनों के उपरांत उनमें अंकुर प्रस्फुटित होने लगते हैं। उनकी अनवरत बढ़त होती रहती है। पूजा की समाप्ति के दिन यही जुहारे महिला-पुरुष-बालक, सभी अपने मस्तक पर धारण करते हैं।

गणगौर पूजन के समय गीत भी गाए जाते हैं। पूजा का मुख्य दिन चैत्र शुक्ला तृतीया होता है। सभी घरों में इस दिन अपनी सामर्थ्यानुसार लापसी या सीरा बनाया जाता है, जो गणगौर प्रतिमा पर प्रसादस्वरूप चढ़ाया जाता है। उसके पश्चात् शुभ मुहूर्त देखकर प्रतिमाओं को जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

चैत्र शुक्ला तृतीया व चतुर्थी को गबर की सवारी निकलती है, जो सामान्यतः ‘गबर का मेला’ कहलाता है। चतुर्थी को विभिन्न ठिकानों, सेठों आदि की मूर्तियों के साथ सवारी निकलती है। ये प्रतिमाएँ ईसर व गौरा राजस्थानी वेशभूषा में होती हैं। इसमें उस क्षेत्र के सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति सम्मिलित होते हैं। अस्तु, अच्छा-खासा मेला लग जाता है। यह मेला वर्ष भर के मेलों में सबसे श्रेष्ठ होता है। महिलाएँ रंग-बिरंगे वस्त्रों व आभूषणों से लदी रहती हैं। वे सभी अपने-अपने गबरे सिरों पर लिये होती हैं। महिलाएँ गबरों को बिठाकर गाते समय घूम भी डालती हैं। मेले के अतिरिक्त कॉलोनियों व मोहल्लों में भी गबरे सजाए जाते हैं। महिलाएँ गाती-नाचती हैं और घूम डालती हैं।

सवारी देखने के लिए क्या हिंदू, क्या मुसलिम, सिक्ख और ईसाई—सभी वर्ग-संप्रदाय के व्यक्ति बडे़ जोश-उमंग के साथ आते हैं, उसे सांप्रदायिक सद्भावना के स्नेह का संगम कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

गणगौर पूजन पर सभी समुदायों द्वारा गाए जानेवाले गीत भी बडे़ मनभावन और रंगीन होते हैं। इसमें एक तो यह गीत जो प्रमुख रूप से गाया जाता है, उसकी प्रथम पंक्ति द्रष्टव्य है—

भँवरजी म्हाने पूजन द्यौ गणगौर।

भँवरजी म्हाने खेलण दयौ गणगौर॥

ओ जी! म्हारा सैंया जोबे बाट

विलाला म्हाने खेलणद्यौ गणगौर।

ओ जी! म्हारे बिछिया रतन जडाए॥

भँवरजी म्हाने खेलण द्यौ गणगौर।

विलाला म्हाने खेलण द्यौ गणगौर।

दूसरा गीत इस प्रकार है—

म्हारे माथा ने महिमय लाव,

म्हारा हँजा मारू याहीं रेवोजी,

याहीं रहौ उगंता सूरज इंहा ही रेवोजी,

थाने कोटे-बूँदी में हौसी गणगौर

म्हारा हँजा मारू याहीं रेवोजी।

इसी तरह जब गणगौर पूरी जाती है तो महिलाएँ हाथ में दूब लेकर पानी से स्पर्श कर छींटे मारती हुई गाती हैं—

गबर गणगोर माता, खोल किंवाड़ी

बाहर ऊबी थारी पूजण वाड़ी

पूजा ए, पुजारयाँ बायाँ, असण कासण माँगा

जण, हरजामी बाबो माँगो, राता देओ माँएँ

कान्ह कवर सो वीरा माँगा राअी सी भौजाई,

साँवलियाँ बहनोओ माँगा,

सोदरा बहन माँगा,

हाँड़ा धोवण फूफो माँगा झाड़ू देवण भूवाँ॥

गुप्ता सदन, एस.बी.के. गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल के पास,

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