ध्वनि

मैं अनेक हूँ। उनमें दो मुख्य हैं—मेरी दृष्टिहीनता और मेरा इसलाम।

इन दोनों में किसके पता चलने से उसका मुँह बंद होगा? किसके पता चलने से उसकी आवाज और तेज होगी? मुझे जो गालियाँ दे रही थी, उसके फूलों का स्पर्श मेरी नाक से हुआ, शायद मेरे ही जैसी लंबी होगी। मेरी लंबाई और मेरी चौड़ी छाती को देखकर अम्मीजान में आनंद दिखाई देता था। अप्रयत्न ही मेरी साँस ने फूलों की उस महक को सुड़का। मेरी उस साँस के अतिरिक्त मेरे शरीर का कोई भाग उससे लगा होगा, वही मेरा जुर्म था।

विचार एक के ऊपर एक बड़ी तेजी के साथ फिसल रहे थे। मेरे कुछ कहने के पहले ही वह बस के अन्य लोगों से, शायद मर्दों से मेरी धृष्टता का सही जवाब चाह रही थी। दूसरी ओर के लोगों में शायद मेरा काला चशमा शंका उत्पन्न कर रहा था। यदि मेरे हाथ में आवाज देनेवाली एक छड़ी होती तो शायद उन्हें वह शंका नहीं होती।

उनकी गालियों को, लोगों की शंकाओं को, मेरे विचारों को विराम देते हुए एक नरम हाथ ने ‘यहाँ बैठिए’ कहते हुए मुझे बिठाया।

‘मुन्नी! तुमने अच्छा किया, वकील साहब बैठिए।’

उस नर्मी का नाम सत्या था। उस सत्या को मेरे जीवन में भी जारी रहने की सुविधा प्रदान करने का श्रेय सूर्यचंद्र वर्मा को जाता है। अंधा वकील हूँ। कोई भी याद रख सकता है। वर्मा ने मुझे मेरी गाड़ी के साथ याद रखा। आज आप गाड़ी में क्यों नहीं आए? वह पहला प्रश्न था। गाड़ी में ही आता रहता हूँ। आ सकता हूँ। आ सकनेवाले बहुत कम भारतीय मुसलमानों में मैं भी एक हूँ। लेकिन मुझे बस ही पसंद है। ध्वनियाँ, आवाजें, गंध, स्पर्श, हँसी, बातें ऐसा महसूस होता है, मानो दुनिया मेरे चारों ओर एक सुहाना गुनगुना गरम चादर ओढ़ रहा हो। ऐसा भी लगता है कि अम्मीजान के दिए गए विचारों की उँगलियों से दुनिया को छू रहा हूँ। लेकिन एक ही बात काँटे जैसी चुभती रहती है, वह है दुनिया की दया।

मेरे उतरने का स्टॉप आ गया। मेरे सेल का जी.पी.एस. मुझे चेता रहा था। तब तक बातों में व्यस्त वर्मा ‘मुझे और सत्या को यहीं उतरना है’ कहते हुए मेरे पीछे उतर गया। उस नरम हाथ ने मेरी मदद के लिए मेरे हाथ को थामा। नीचे उतरने के बाद—

‘‘मेरा थामना आपको अच्छा नहीं लगा?’’

‘‘आप लंबी हैं?’’

‘‘क्यों-क्यों?’’ आवाज में नर्मी समाप्त हो रही थी।

वह नरमी क्यों समाप्त हो रही थी, बाद में समझ में आया। हम अकसर अपनी बातों के दौरान स्वयं को व्यक्त करने के लिए जितना समय निकालते हैं, उतना समय सामनेवाले और उसकी बातों को समझने के लिए शायद ही निकालते हैं। यह बात बहुत बाद में सत्या ने ही मुझे समझाई। साँवलों के प्रति गोरों में और नाटों के प्रति लंबों में एक और प्रकार की हीन भावना।

‘‘चलो पापा, चलते हैं।’’ शायद वह चली जा रही थी।

‘‘ठहरो मुन्नी, ठहरो!’’ कहते हुए शायद वर्मा बेटी के पीछे हो गया।

उस पल मुझे उसके असभ्य व्यवहार पर बहुत गुस्सा आया। मैंने जो कुछ कहा, वह मेरे स्वानुभव के सहारे बना विचार मात्र था। उस समय मेरा निश्चित विचार था कि उस तरह मेरा कहना सभ्यता के दायरे में ही आता है। उस दिन समाप्त हो जानेवाली कहानी को दोपहर में मिलकर वर्मा ने आगे बढ़ाया।

सत्या के जीवन में उसकी लंबाई ने बहुत मुसीबतें ला खड़ी कीं। अदालत की दहलीज पर कदम रखना पड़ा। इंटरनेट के माध्यम से सगाई पक्की हुई। वर्मा ने बेधड़क लड़की की लंबाई पाँच फिट लिखी। दूल्हे ने फोटो देखा—पसंद आई। घर आकर भी देखा—पसंद आई। जाति-गोत्र धन-दौलत, सबकुछ ठीक-ठाक लगे। जब सबको सबकुछ पसंद था तो देरी किस बात की? शादी हो गई। तीन महीनों के वैवाहिक जीवन के बाद दूल्हे को शक हुआ। नापकर देखा तो चार फिट दस अंगुल ही थी। धोखे की शिकायत करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटया। जोरदार तर्क था कि शादी नहीं चलेगी, रद्द होनी चाहिए।

‘‘क्या सच है?’’

‘‘आज सुनवाई है।’’

‘‘पागल लगता है?’’

‘‘मुझे सबकुछ यथार्थ ही लिखना था।’’

‘‘तलाक के लिए वह कारण काफी नहीं है।’’

‘‘वह तलाक नहीं माँग रहा है। उनके वकील का तर्क है कि सन् १९५५ ई. हिंदू विवाह कानून के अनुसार, यदि फरियादी को फ्रॉड करके शादी के लिए मनवाया जाता है तो वह शादी नहीं चलेगी।’’

‘‘क्या अदालत ने स्वीकार किया?’’

‘‘वकील बड़ा बुद्धिमान है। मेरे दामाद के पास पैसा और जिद बहुत ज्यादा है।’’

वर्मा ने बहुत सारी बातें बताईं। मीडिया ने इस केस को बड़ी तूल दी। चर्चा हुई। कुछ लोगों ने कहा कि दो अंगुल बढ़ाकर झूठ बताना कन्या के पिता के लिए शुक्र नीति के समान ही है। शादी के लिए कहे गए झूठ से पाप नहीं होता है। बड़े-बड़े झूठों के बीच जिंदगी गुजार रहे हैं। कुछ लोगों ने साधु की नैतिक दृष्टि से कहा कि इतना छोटा सा झूठ तो आटे में नमक के बराबर है।

कठिन नैतिक दृष्टि को अपनाते हुए और कुछ लोगों ने कहा, ‘‘छोटा हो या बड़ा, आखिर झूठ तो झूठ ही है। कानून के मुताबिक यह जुर्म साबित हो या नहीं, लेकिन यह गलत ही है। कुछ गलतियों को इसी दुनिया में भुगत लेते हैं। यहाँ बच जाने पर भी वहाँ बच नहीं सकते हैं।’’

कुछ लोगों का प्रश्न था कि लंबाई उसके लिए यदि उतना मायने रखती तो शादी से पहले ही क्यों नहीं नाप लिया? एक चीज को खरीदते समय उसकी गुणवत्ता और माप आदि को परख लेना क्या उपभोक्ता की जिम्मेदारी नहीं है?

उत्तर में कुछ लोगों ने कहा कि एक वस्तु को इस्तेमाल करने के बाद यदि पता चले कि बनावट में ही कमी है, तब उसे अस्वीकार करने का अधिकार उपभोक्ता को है। जातीय असमानता की बात को उठाते हुए कुछ लोगों ने कहा कि क्या स्त्री वस्तु है? वस्तु गुणवत्ता की परख युगों से स्त्री के संदर्भ में लागू होती आ रही है। कुछ ने यह भी जोड़ा कि असल में खरीदारी होती है तो धन देकर स्त्री ही खरीदी जाती है।

कुछ और लोगों ने कहा कि इस केस में भी मर्द के पक्ष में न्याय नहीं होगा, क्योंकि आज प्रत्येक कानून में स्त्री पक्षधरता और सुरक्षा ही अधिक है। दृश्य एवं अक्षर माध्यमों ने कुछ समय तक इस पर चर्चा करने के बाद भाग लेनेवालों के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर पल्ला झाड़ लिया। वर्मा के बताए गए विषयों के साथ अपनी विवेचना-बुद्धि को जोड़कर मैंने सुना।

‘‘आप क्या कहेंगे?’’ वर्मा ने कहा।

‘‘मैं मुसलमान हूँ। मेरा धर्म इसलाम है।’’ मैंने कहा।

लेकिन उनके स्वर में क्या मतलब! जैसे प्रश्नार्थक शब्दों के प्रतिध्वनि से पता चला कि वे दंग रह गए हैं।

‘‘मेरे नाम से आपको मेरा धर्म पता है। इसलाम जानते हैं?’’

‘‘बताइए!’’ वर्मा ने पूछा।

‘‘सृष्टि के सभी प्राणी और पदार्थ मुसलमान ही हैं। अल्लाह परवरदिगारे आलम हैं, जिनका हुकुम सबके लिए सिर आँखों पर। उस खुदा के प्रति समर्पण ही इसलाम है—ला इल्लाह इल्लइल्लाह मुहम्मदरसुलउललउल्लाह की कलिमा को मानने पर यह सबकुछ अलग से समझ में आएगा।’’

‘‘ऐसी मान्यताएँ हिंदुओं में भी हैं। सभी धर्मों में भी होती हैं।’’ बीच में ही बोल उठा।

‘‘क्या आप हिंदू नहीं हैं?’’

‘‘मैं नास्तिक हूँ। फिर भी मेरे विश्वास और अविश्वास से इसका कोई संबंध नहीं है। आप जो कह रहे हैं, उसका मेरी बेटी की स्थिति पर आपके विचारों से क्या संबंध है, वह मुझे पूरी तरह से समझ में नहीं आ रहा है।’’

‘‘कुछ तो समझ में आया है न, वह क्या है?’’ मैंने कहा। वर्मा हँसकर उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘कहते हैं कि वकील लोग अपनी बातें सामनेवालों की मुँह में ठूँसकर उन बातों को ही उगलवाते हैं बस, और क्या है? सबकुछ प्रारब्ध मानकर भोगो, चाहे धर्म जो भी हो, यही तो कहता है।’’ जाने से पहले मैंने अपना विजिटिंग कार्ड दिया। वह उसे सँभालकर रखेगा और बाद में उसका उपयोग करेगा, ऐसा मैंने नहीं सोचा।

मुझे बड़ी झुँझलाहट महसूस हुई। मुझे सबको समझना पड़ता है, लेकिन कोई भी मुझे समझने की कोशिश नहीं करता है। अधिक-से-अधिक दया दिखा सकते हैं। क्या मुसलिम शरीयत ऐसे केस का सामना करेगा? शादी को एक अनुबंध माननेवाले समाज, उसे एक दैवी निर्णय माननेवाले समाज, मेरा विचार है कि स्त्री सुरक्षा से संबंधित जिस समस्या का सामना कर रही है, उसकी त्रुटियों पर मैं कुछ बोलूँ। लेकिन उस आवाज की नरमी मेरा पीछा करती ही रही।

अम्मीजान सुनकर फोटो में से बोलीं, ‘देखनेवालों को चेहरा ही सबकुछ बताता है, लेकिन सुननेवालों को आवाज ही सबकुछ बताती है।’ अम्मीजान की बात मेरे लिए ईमान है।

मेरा मोबाइल मेरे इ-मेल्स पढ़कर सुना रहा था। वर्मा ठीक उसी समय आ धमका। सत्या ने खुदकुशी की कोशिश की...जब वर्मा ये बातें कह रहा था, तो उसकी आवाज में सिहरन बिल्कुल स्पष्ट थी।

मृत्यु चाहे जिसकी भी क्यों न हों, वह खबर कष्ट देती है। उन व्यक्तियों के साथ हमारी आत्मीयता के आधार पर कष्ट की तीव्रता निर्भर होती है। सत्या के साथ मेरा परिचय स्वल्प ही था। बतानेवाला पिता होने के कारण आवाज में हलचल जरा अधिक थी। लेकिन मुझमें उससे भी कहीं अधिक हलचल का कारण...? हर व्यक्ति और इससे संबंधित एक समूह होता है। उसका एक नाम भी होता है। धर्म, जाति, भाषा, प्रांत, राज्य, देश...इस तरह अनेक। कभी-कभार इन सभी समूहों से परे भी हम प्रतिस्पंदित होते हैं। तब प्रश्न उठ खड़ा होता है कि हमें हिला देनेवाला और मिला देनेवाला तत्त्व क्या है।

उस क्षण ये प्रश्न, विचार कुछ भी नहीं थे, केवल एक उद्विग्नता के सिवा। उनके साथ जाकर पुलिसवालों और डॉक्टरों से मिलकर बातें कीं कि यदि आत्महत्या पाप हो और फैसले के दिन जवाब देना पड़े, तो कोई समस्या ही नहीं है। कानून उसे जुर्म करार देता है। जीवित बचे लोगों को मुजरिम कहता है। जीवित रहने में विफल होकर मरने के प्रयास में असफल होकर व्यक्ति मुजरिम बन जाता है।

सत्या के अस्पताल से सुरक्षित लौटने और कानून से बच निकलने में जो कुछ भी बन पड़ा, मैंने किया। इसके बाद एक दिन वर्मा मेरे घर पर मुझसे मिला और एक विनती की। बातचीत शुरू करते हुए बोला, ‘‘गलती मेरी और सजा उसे मिली?’’

मैंने हँसकर कहा, ‘‘इस जुर्म का निर्धारण करना और फैसला देना, क्या आप ही का काम है?’’

देखनेवाले कहते हैं कि हँसने पर मैं अच्छा लगता हूँ। मेरे गाल पर छोटा सा डिंपल पड़ता है। वह भी जहाँ पड़ना चाहिए, वहीं पड़ता है। उस समय मैं काला चश्मा लगाए हुए था। सफेद कुरता-पजामा पहना था। एक बड़े कमरे में था। वह कमरा एक विशाल बँगले में था। वह बँगला बड़ी सावधानी से देखभाल किए जा रहे सुंदर बगीचे के बीचोबीच था। वह वैसी ही बड़ी-बड़ी खुली जगहों, बँगलों और बगीचों से बने कतार में था। अतः मैं अच्छी लगनेवाली पृष्ठभूमि में ही था।

‘‘आपके कहने का मतलब...’’ हकलाकर रुक गया।

मैंने कहा, ‘‘दो अंगुल बढ़ाकर बताने का जुर्म आपने किया। अदालती मुकदमा, शादी का टूटना, खुदकुशी, उसे सजा—यह सब आपने कहा।’’ कुछ देर तक चुप रहा, फिर पूछने पर बोला, ‘‘आप खुद अपनी आँखों से नहीं देख सकते हैं, लेकिन आपमें अंतर्दृष्टि है और मुझसे अधिक देख सकते हैं।’’

‘‘इतना आसमान पर मत चढ़ाइए! गिरूँगा तो हड्डी-पसली एक हो जाएँगी।’’ हँसी की लहरें चारों ओर फैल गईं।

‘‘आपकी मित्रता सत्या को दृढता प्रदान करेगी।’’

उस क्षण में उनका ऐसा कहना मुझे बड़ा अच्छा लगा। उस समय उसकी नरम आवाज ने और नरम होकर मेरी यादों को छुआ।

उसके चले जाने के बाद लगा कि क्या वाकई वह आवाज इतनी नरम है? विचारना चाहूँ तो मुझे न आए हुए सत्या का मेल पढ़ने की शक्ति मेरे मोबाइल में ही नहीं, बल्कि मुझमें भी नहीं है। वर्मा अकसर फोन कर रहा है। जब-तब मिल भी रहा है। एक-दो बार सत्या को भी साथ में ले आया। एक-दो बातों को छोड़कर सत्या अधिकतर मौन ही रही। उस आवाज की नरमी मन को स्पर्श करती ही रही। मन यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा है कि सत्या में कुछ खासियत है। वर्मा को ईश्वर पर, नियति पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं है। अपनी इस आस्थाहीनता से पत्नी को खूब सताया। बेपरिवार का बना दिया। बेटी को अनाथ बना दिया। दुनियादारी के खिलाफ सोचनेवालों को दुनिया के विरुद्ध ही जिंदगी गुजारनी चाहिए। अंदर के विचारों को पूरी स्वतंत्रता देकर बाहरी दुनिया के सामने अदृश्य शृंखलाओं में जकड़कर जिंदगी गुजारनेवालों से निस्सहाय कोई नहीं है। वर्मा की स्थिति आस्थाहीनता नहीं है, बल्कि उससे निर्मित होनेवाली परिस्थिति है।

‘‘वर्माजी! आप अपने में अब विश्वास बढ़ा सकते हैं न?’’

‘‘जिस रास्ते पर विचार डग भरते हैं, उस पर विश्वास अंकुरित नहीं होते हैं।’’

‘‘ढेर सारे अविश्वासियों के आस्थावान बनने की बात मैंने सुनी है।’’

‘‘नहीं, नास्ति के विश्वास से अस्ति के विश्वास में बदले हैं। यह संभव है। वैचारिक प्रवृत्ति में सत्य की खोज करनेवालों में कोई आस्था नहीं होती है।’’

‘‘मैं समझा नहीं। मैं मानने को तैयार नहीं हूँ।’’

‘‘आप जैसा भी समझें। मेरी जिंदगी तो बीत गई। सत्या की जिंदगी तो अभी भी बहुत लंबी है। यदि मेरे विचारों का प्रभाव उस पर होता तो शायद वह ऐसा नहीं करती।’’ उनका गला रुँध सा गया, ‘‘बेसहारा-सी बन गई है। आप फिर से उसमें आस्था जगा सकते हैं।’’ उस आवाज में हार, दृढता, आशा तीनों मिश्रित होकर ध्वनित हो रहे थे। मेरी बातों को उन्होंने अनसुना कर दिया। असत के भ्रमजाल से सत्या बड़े धीरे से मेरे जीवन में प्रवेश कर गई। मैं जो कुछ भी कहता, बड़े ध्यान से सुनती। कोई प्रश्न नहीं थे। टीका-टिप्पणी भी नहीं थी। उसके चेहरे को देखकर उसे परखने का अवसर मेरे पास नहीं है। बातें सुनकर कुछ समझने का अवसर सत्या नहीं देती थी। बस एक मार्मिक मौन। एक-दो बातें बनाकर मेरे हृदय को छूकर मुझे किसी कसावदार फंदे में कसती थी। पिता के प्रोत्साहन से ही वह मुझसे मिल रही थी। मेरा मन मुझे खूब प्रोत्साहित कर रहा था। बताया गया कारण, उसमें जीवन के प्रति आशा जगाना, ईश्वर में आस्था बढ़ाना था। ध्वनित होनेवाला कारण जीवन देना था। नास्तिक के लिए धर्म के बाधा बनने का अवसर ही नहीं था।

‘‘आप जवाब नहीं दे रही हैं।’’ कुछ दिनों के बाद एक दिन अपनी निराशा को ढकते हुए मैंने कहा।

‘‘प्रश्न हो तो उत्तर होंगे, सर!’’ वह स्वर अपने में और अधिक नरमी भरते हुए बोली शायद पहली बार उसमें उत्साह की एक छोटी-सी लहर उमड़ती हुई सुनाई पड़ी।

‘‘तो आपका मतलब है कि मैं सब स्टेटमेंट्स ही दे रहा हूँ।’’

‘‘अवसर मिलने पर बेजुबाँ वकील के सामने जुबान चलानेवाले पब्लिक प्रासिक्यूटर के जैसे।’’

हँसी की गुनगुनी गरमी से बर्फ पिघलने लगी और कुछ बातों के बाद—‘‘पहले आपको धन्यवाद ज्ञापित करती हूँ।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘मेरे पापा ने मेरी खुदकुशी की कोशिश का कारण बताया। उनका मानना है कि यह फिर से न दोहराई जाए, जिसका उपाय आपके पास है। आपको भी इसका विश्वास दिलाया गया। आपने जो जिम्मेदारी ली है, उसे पूरी लगन से निभा रहे हैं, है न?’’

‘‘आप जो कहना चाह रही हैं, कहिए।’’

‘‘मेरे पापा में कुछ अंधविश्वास हैं। लोगों को देखते ही, जो राय बनती है, उसी के मुताबिक उनके साथ पेश आना, उनमें से यह एक है। पिछले दिनों की उनकी बातों और व्यवहार पर गौर करने से मुझे एहसास हुआ कि मेरे बरताव ने उन्हें कितना शैटर किया है, इतना ही नहीं...’’

‘‘कहिए-कहिए।’’

‘‘आपके साथ हुई इन चार-पाँच मुलाकातों से मुझे लगा कि आपके प्रति मेरे पापा का इंप्रेशन गलत नहीं है। सचमुच आप बहुत अच्छे हैं। क्या आप मेरी एक मदद कर सकते हैं?’’

‘‘कर सकनेवाली हो तो जरूर करूँगा।’’

‘‘मेरे पापा से कहिए कि मैं वह काम नहीं दोहराऊँगी। जरूरत पडे़ तो उन्हें यकीन दिलाने के लिए’’...रुककर फिर बोली कि ‘‘पापा को यह भी बताइए कि मेरी आस्था ईश्वर में हो गई है या बताइए कि आस्था आप ही ने दिलवाई है, मेरी काउंसलिंग करने का बोझ भी आपके सिर से उतर जाएगा।’’

‘‘तो आप चाहती हैं कि मैं झूठ बोलूँ।’’

‘‘इन...न...मेरा मतलब यह नहीं है।’’

‘‘आप तो वही कह रही हैं। मैं झूठ नहीं बोलूँगा।’’

सत्या ने कुछ नहीं कहा।

‘‘मेरे अंदाज से आपके पापा कुछ अलग ढंग से जिंदगी बिताए हैं, विवाह किए हैं। आपकी परवरिश भी वैसे ही किए हैं। शायद वे चाह रहे थे कि आप कुछ अलग जीवन बिताएँ। ऐसे आदमी को महसूस हुआ ही होगा कि आप शादी के मामले में फैसले स्वतंत्र होकर करें। आखिरकार...’’ कहकर मुझ जैसे अकिंचन पर निर्भर होना भी उनके अलग से बरताव का संकेत है, कहते हुए जुबान की नोक तक आई बात को काटकर मैंने आगे कहा, ‘‘ठीक है, एक पिता की हैसियत से उनकी वह बात कहना, शायद ध्वनित होने का साहस भी उनमें नहीं रहा हो। खुद उन्होंने ही शादी के प्रयत्न किए, जिसका परिणाम ऐसा निकला। यदि उसने कोई बहाना बनाकर आपको इनकार किया तो आपको अपने पापा से कहना था कि पापा, क्या मैं इस कमीने के बिना जिंदा नहीं रह सकती हूँ? चलिए, तलाक दे देते हैं। आपने वह भी नहीं किया। अदालत, मुकदमा, कहाँ और क्यों आपका धीरज जवाब दे गया? आखिर आपने ऐसी कोशिश की और उनकी कमर तोड़ दी। मुझ जैसे अनजाने से आपने कहा न कि उस काउंसलिंग के लिए भी हाँ कह दी। आप खुद झूठ नहीं बोलती हैं। सच है, आप कुछ भी नहीं कहती हैं!’’

मुझे जो कहना था, पूरा हो गया। बहुत देर तक मौन राज करता रहा।

‘‘सर! मैं चलती हूँ।’’

‘‘क्या नाराज हो गई हैं?’’

‘‘आपने स्पष्ट कर दिया कि अब मुझे ही फैसला लेना है। मुझे थोड़ा वक्त चाहिए।’’

सत्या चलने को तैयार हुई। ‘‘एक मिनट...’’ कहकर बिल अदा कर काफी डे से बाहर आकर गाड़ी की ओर चलते हुए जरा रुककर...‘‘मेरे साथ चलेंगी, जहाँ चाहें पहुँचा दूँगा।’’ मैंने कहा।

‘‘मुझे कुछ अलग काम है।’’ वह बोली।

हँसने का प्रयत्न करते हुए मैंने कहा, ‘‘जानता हूँ!’’

पहली बार सत्या ने स्पर्श किया।

‘‘आज आप मुझे एक बात बताकर मेरे गुरु बने। ध्वनित नहीं होना चाहिए। आपने कहा कि बताना है—मैं इस देश की औरत हूँ न! ध्वनित होना ही हमारी जिंदगी है। आपको भी उसका आचरण करना है। मैंने जो कहा, उसको ही आपको लेना चाहिए’’ हँसी में नरमी भरते हुए बोली। उसकी वह हँसी, आवाज, स्पर्श मेरा पीछा कर रहे हैं।

मेरा सारथी मुझ अकेले को ही लेकर चला।

एक महीना गुजर गया। इस बीच बहुत सारी घटनाएँ घट गईं। आपसी समझौते पर सत्या तलाक के लिए मान गई। लंबाई के मामले में मीडिया के हलचल का कारण बनी सत्या को तंग करने की कोशिश करनेवाले और उसकी खुदकुशी के प्रयत्न का कारण बने सहकर्मी अध्यापक के बारे में सत्या ने मैनेजमेंट को शिकायत की। उन्होंने तुरंत काररवाई नहीं की तो सहकर्मियों को इकट्ठा कर और महिला संस्थाओं की मदद से उस पर काररवाई करवाई। निडर होकर स्कूल जाने लगी।

वर्मा ने मिलकर कहा कि मेरी बातों का असर उसकी बेटी पर खूब हुआ है। यथार्थ में मैंने भी सत्या में ऐसे परिवर्तन की कल्पना तक नहीं की थी। मुझे ऐसा भी नहीं लगा कि मैं ही इस परिवर्तन का कारण हूँ। मैंने सोचा कि अल्लाह बड़ा दयामय है।

मेरा स्पर्श करनेवाली वह नरमी उसकी आवाज में ही नहीं, उसके पूरे व्यक्तित्व में है। एक बार उसने कहा कि आपने साहित्य खूब पढ़ा होगा?

‘‘जरा-सी फेर-बदल। पढ़ा नहीं है, सुना है। मेरे पिताजी संस्कृत के विद्वान् थे। कई साहित्यकारों को सुनाया। शास्त्री मेरा जिगरी दोस्त है। आज मेरे इस स्थिति तक पहुँचने में और यों खड़े हो सकने में मेरी अम्मीजान-बाबाजान का जितना हाथ है, उतना उसका भी। मेरे साहित्यिक परिचय और मेरी पढ़ाई का एक आधार वही है।’’

शास्त्री के बारे में बातें। अम्मीजान-बाबाजान का एक्सीडेंट। पिठापुरम् से हैदराबाद के लिए परिवार की शिफ्टिंग।

एक बार शास्त्री ने मेरी दृष्टिहीनता के बारे में कहा, ‘‘मेरी अम्मी और अब्बू का सगे भाइयों की संतान होना ही है।’’ अम्मीजान ने उसका उत्तर देने को कहा। मैंने दिया। तुम्हारी अम्मी और अब्बू भी तो भाई-बहन की संतान हैं, फिर तुम्हें प्रॉब्लम क्यों नहीं हुआ? तुरंत शास्त्री बोला, ‘‘हाँ, यह भी सच है। यह है हमारा शास्त्री।’’ मैंने कहा। सत्या की हँसी सुनाई पड़ी। मन में हलचल सी मची।

‘‘क्यों इतना हँस रही हैं?’’ मैंने पूछा। फिर से हँसी, और अधिक सच्चाई और स्वच्छता से।

‘‘ध्वनित नहीं होना चाहिए। कहना चाहिए।’’ फिर से मैंने कहा। मेरी आवाज में बेकाबू होती एक मादकता थी।

‘‘ठीक है, बताती हूँ। मेरी हँसी को आपने एन्ज्वॉय किया। फिर भी सवाल करना नहीं छोड़ा। दूसरी बार हँसने का कारण यही है। आपका तर्क मान लेनेवाले हों तो वे आपके बहुत निकट हो जाते हैं। आपके शास्त्रीजी के जैसे हर तरफ हँसी बिखर गई।

सत्या से जब भी मिलता, मुझमें दो ऊँची लहरें उठकर गिर पड़तीं। पहली, भावना की तरंग, उसका साथ मेरे जीवन को पूरा करेगा। दूसरी तरंग, वह मुझे प्राप्त नहीं होगी। एक का पीछा करती दूसरी। प्राप्त हो तो भी उसका कारण मेरी स्थिति भी हो सकती है और उसकी भी। ऐसी हालत में इसे प्राप्य माना जाए या अप्राप्य? अम्मीजान कहती थीं कि यकीन करके धोखा खा जाओ, लेकिन अविश्वास करके अवसर मत खोना। अम्मी की बात मेरे लिए ईमान है। लेकिन विश्वास और वह भी साथ रहनेवाले मनुष्यों पर तथा वह भी मेरी इस स्थिति में बहुत कठिन है। आशा अपने लिए अविश्वास को रक्षा का कवच बना लेती है।

आखिरकार मैं खुद को थाम नहीं सका। तब तक एक साल गुजर चुका था।

एक दिन जान-बूझकर ओल्गा के साहित्य पर चर्चा छेड़ी। कई बार मैंने गौर किया कि जब भी सत्या ओल्गा का नाम सुनती तो उसमें एक उत्साह उमड़ने लगता। मुझे आशा थी कि चर्चा अवश्य शादी पर होगी।

सत्या बड़े उत्साह से कहती जा रही थी, ‘‘मेरे पापा का मानना है कि उपन्यास में प्रतिपादित स्वतंत्रता, ओल्गा द्वारा अपेक्षित स्वतंत्रता, स्त्रियों को आवश्यक स्वतंत्रता, ये सब अलग हैं। वे उपन्यास के बारे में, लेखक के बारे में, समाज के बारे में अलग-अलग बातें करते हैं। ओल्गा से उन्हें बड़ा लगाव है। ओल्गा को पढ़ने के बाद मुझे लगा कि स्त्रियों की समस्याओं का हल मात्र आर्थिक स्वावलंबन में ही नहीं है।’’

मुझे कड़वी गोली निगलने का अनुभव-सा हुआ। मेरी नजर में ओल्गा आज की पढ़ी-लिखी लड़कियों की वैवाहिक आशाओं की एक प्रेरणा है। मेरा मानना है कि जब भी ओल्गा का उल्लेख आता है तो औरत, यदि शादीशुदा हो तो अपने जीवन के बारे में, कन्या हो तो अपने विवाह के बारे में अवश्य कुछ-न-कुछ विचार व्यक्त करेगी। सत्या अपने साहित्यिक विचारों और पिता के विचारों की खिचड़ी बनाकर लगातार कुछ कहती ही जा रही थी।

मेरे संयम का बाँध टूट गया। संयम को बरबस तोड़ डालने का जोश मुझ में उमड़ आया। ‘‘ज्ञानोदय को परिभाषित करते हुए कांट कहता है कि उसके लिए अत्यंत आवश्यक तत्त्व मात्र स्वेच्छा ही है। उसका कथन है कि अत्युन्नत मानव-समाज जनता को वह स्वेच्छा प्रदान कर सकता है। ओल्गा जिस स्वेच्छा का उल्लेख करती हैं, वह एक उन्नत समाज से, पुरुषों की स्वेच्छा से बिना किसी संबंध के कदापि संभव नहीं है।’’ मैंने कहा।

इसके बाद के वार्त्तालाप में सत्या ने जो कुछ कहा, मैं बिल्कुल समझ नहीं सका। विषय के प्रति उत्सुकता से मैंने उसमें भाग ही नहीं लिया। वह केवल एक बहाना ही था। अब फिर विचारता हूँ तो महसूस होता है कि सत्या की व्यथा को समझने का एक अवसर मैं फिर खो चुका हूँ। उसे एक वस्तु के रूप में पाने के लिए मेरे द्वारा किए गए प्रयत्न का शतांश भाग भी उसके प्रति एक व्यक्ति के रूप में सामीप्यता पाने की कोशिश मैंने नहीं की।

ध्वनियों को त्यागकर जब मैंने सीधे विवाह का प्रस्ताव रखा, तब भी मुझे यह बात समझ में नहीं आई।

‘‘सत्या! मेरी इच्छा है कि मैं तुम्हारे लिए एक नया प्रकाश बनूँ और तुम मेरे जीवन का आधार बनो।’’

बहुत दिनों के प्रयास से बनाया गया यह वाक्य मुझे ही बिल्कुल कृत्रिम सा लगने लगा। उसी क्षण मुझे पता चला कि वाक्य कितना कमजोर था।

‘‘जरूर।’’ तुरंत सत्या ने कहा।

उस स्वीकृति से मुझे अपार आनंद हुआ। असीम शंका भी हुई।

‘‘तुम्हारे पापा से बात करूँगा।’’ मैंने कहा।

‘‘किसके बारे में?’’

‘‘शादी के बारे में, कब और कैसे?’’

‘‘जरा रुको तो, किसके बारे में?’’ उसने पूछा।

‘‘हमारी शादी के बारे में!’’ जरा संशयात्मक स्वर में मैंने कहा।

बहुत देर तक सत्या की ओर से कोई बात नहीं हुई।

मैंने भी उस मौन को जारी रखा। मुझे लगा कि उस थोड़े से मौन में उसे दे सकनेवाला आधार मेरे पास कुछ भी नहीं है। यह बात कहने के बाद क्या मैं उसे खोने जा रहा हूँ? अगले ही क्षण उसका स्तर बहुत बढ़ गया। फिर सत्या ने किसके बारे में ‘जरूर’ कहा?

‘‘सत्या!’’ बहुत देर के बाद मैंने पुकारा।

‘‘हाँ।’’ बोली। मैं जिस नरमी को ढूँढ़ रहा था, वह उसमें वैसी ही थी। उतने हलचल में भी वह वैसी ही अनुभूति दे रही थी।

‘‘कैसे मान लिया कि मैं शादी करूँगी? याद कर रही हूँ कि मैंने तुम्हें कहाँ और कब ऐसा अवसर दिया है।’’ वह बोली। उसकी बात पूरी ही नहीं हुई। मैं कुछ कहने ही वाला था...उसकी आँखें थीं...उपयोग करती हुई मेरा हाथ पकड़ा। मेरे हाथ ने उससे क्या कहा पता नहीं?

‘‘हममें विवाह करने की योग्यता नहीं है, फिलहाल हम जिन परिस्थितियों में हैं, उनमें विवाह हमारे सत्संबंधों के लिए समाप्तिसूचक होगा। प्लीज समझो!’’ सत्या ने कहा।

‘‘हाँ, सच ही है—एक अंधे के साथ शादी और वह भी एक मुसलमान के साथ!’’ मैं बेकाबू हो गया।

‘‘तुम ऐसे कैसे बोल रहे हो!’’ सत्या के हाथ में मेरा हाथ वैसे ही था। उसे झटक देने के मेरे जोश को सत्या समझ रही थी।

‘‘तुम्हारी बातों का और क्या मतलब है?’’ मैंने कहा।

समझ आई—समाज के बारे में, वैवाहिक बंधनों के बारे में, अपने अनुभव से बने निर्णयों के बारे में, व्यक्तियों की आत्मीयता को विनष्ट करनेवाले शादी के असर के बारे में, बोली कि उसका मन विवाह को स्वीकार नहीं कर रहा है। मेरा मन कुछ भी स्वीकार नहीं कर रहा है। उसके निराकरण की भावना से मेरा मन बाहर निकल नहीं पा रहा है। वह उन वाक्यों को जितनी भी सरलता से क्यों न कह रही थी, परंतु मुझे उनमें निराकरण के अलावा और कुछ ध्वनित नहीं हो रहा था।

समझा-समझाकर, मुझे सुन-सुनकर, देख-देखकर आखिर में सत्या बोली, ‘‘आँखों का न होना कोई कमी नहीं है। दूसरे इंद्रियों का, किसी वैज्ञानिक उपकरण का उपयोग कर उस कमी को पूरा किया जा सकता है, लेकिन शायद तुम और भी आहत होगे!’’

‘‘कहो, इससे ज्यादा और क्या आहत कर सकोगी?’’

‘‘आँखें बंद कर लेना न सुधारी जा सकनेवाली कमी है। मेहरबानी करके जरा सोचो कि शादी अलग है। दोस्ती अलग है। काम अलग है। प्रेम अलग है।’’

‘‘फिलहाल मैं मान रहीं हूँ कि इन चारों में से किसी एक के लिए किसी दूसरे को अपनाना सही नहीं है। मुझ पर यकीन करो। शादी के बारे में मेरी भावनाओं को मेरी बातें व्यक्त कर रही हैं। मेरी भावनाओं को स्वीकार कर सकते हो, चर्चा कर सकते हो, इनकार कर सकते हो, लेकिन तुम मान रहे हो कि मैं उन्हें अपने निराकरण के लिए ही उपयोग कर रही हूँ। इसका कारण तुम्हारा वाच्यार्थ की अपेक्षा ध्वनि पर ही अधिक निर्भर होना है।’’

‘‘सत्या,’’ अनजाने में ही मेरा मन मेरी आवाज में भर आया।

‘‘अधिक संख्यावालों में अधिक प्रतिशत से, कम संख्यावालों को कम आँककर देखा जाता है कि भावना कम संख्यावालों का पीछा करती ही रहती है। बहुत कम लोग इसी तथ्य का सहारा लेते हुए दुनिया में अनेक अवांछनीय कृत्य करवाते जा रहे हैं। ऐसे लोग अधिक संख्यावालों के भी हो सकते हैं या कम संख्यावालों के भी। वे अपने लक्ष्यों की घोषणा अलग से भी कर सकते हैं। लेकिन उन कम लोगों का लक्ष्य एक ही है—मनुष्य को मनुष्य से जोड़नेवाले सभी मार्गों को बंद कर देना। यथार्थ में ऐसे कम लोग ही पूरी मानवजाति पर मानसिक स्तर पर शासन कर रहे हैं। सबसे पहले हमें व्यक्तियों के रूप में इस स्थिति से बाहर निकलना है। हमें चर्चा करना सीखना चाहिए। विचारों को बदलने का प्रयत्न प्रेम से, संयम से करना चाहिए। हम पर शासन करनेवाली भावनाओं में कौन सी अपनी हैं! कौन सी थोपी जा रही हैं! बीज और छिलकों को अलग करने में सक्षम होना चाहिए, उसमें हमे संगी-साथी बनना चाहिए। दोस्त! चलो, ध्वनि को मात्र ध्वनि ही मानकर कोई भी किसी भी बात को सीधे कहनेवाली दुनिया का सपना देखेंगे। मेरी विनती एक ही है कि जहाँ तक बन पड़े, हमें बातों पर और उनके वाच्यार्थ पर ही निर्भर होना चाहिए, जिससे कि हमारे एक होने के अवसरों की संभावना कुछ हद तक बनेगी। प्लीज, सीधे समझने की कोशिश करो।’’

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