मनोहारी केरलम्

मनोहारी केरलम्

केरल, मालाबार तट पर स्थित तथा अरब सागर से तटरेखा बनाता यह दक्षिणी राज्य ‘गॉड्स ऑन कंट्री’ यानी ईश्वर का अपना देश कहा जाता है। यह ‘वाक्य’ पर्यटक लुभावन जुमला मात्र नहीं है, वरन् केरल के ईश्वर प्रदत्त अप्रतिम सौंदर्य व संस्कृति का प्रतीक है।

४ अक्तूबर, २०१७ को इंडिगो एयरलाइन के साथ सवेरे जयपुर से ९:०५ बजे यह सफर शुरू हुआ और बंगलुरु होते हुए लगभग १२:५५ बजे कोच्चि (कोचीन) पहुँच गई। कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विश्व का पहला सौर ऊर्जा संचालित हवाई अड्डा है।

कोचीन भौगोलिक रूप से दो क्षेत्रों—एर्नाकुलम (मुख्य भूमि क्षेत्र) तथा प्रायद्वीपीय क्षेत्रों फोर्ट-कोच्चि व मत्तनचेरी में बँटा है। मैंने यात्रा हेतु सर्वप्रथम फोर्ट-कोच्चि को चुना। लगभग दोपहर तीन बजे मैं अपने ‘अस्थायी ठिकाने’ यानी होम स्टे पहुँच गई। होम स्टे हमेशा मुझे स्थानीय लोगों के बीच रहने, उनकी संस्कृति, रहन-सहन को प्रत्यक्षतः जानने का अवसर देता है। अपने कमरे में सामान व्यवस्थित करने व थोड़ा सुस्ताने के बाद मैंने अपने कदमों से ही फोर्ट कोच्चि की गलियों को मापने का मानस बनाया।

प्रिंसेस स्ट्रीट, बर्गर स्ट्रीट व लिलि स्ट्रीट कहीं चौड़ी, कहीं संकरी, ये गलियाँ, जो छोटी दुकानों, रेस्टोरेंट्स, होम स्टे से अँटी हैं। ये गलियाँ अंतर्जाल बनाती हुई मुख्य सड़कों के.बी. जेकब रोड, एलफिंस्टन रोड, रीवर रोड इत्यादि से जुड़ती हैं। फोर्ट कोच्चि के ये रास्ते शहरी खचाखच, भागमभाग व शोरगुल से बिल्कुल अलग सुकून व असीम शांति का एहसास करवाते हैं।

५ अक्तूबर की सुबह का आगाज मुरगे की बाँग, भोर की अजान, मलयालमी आरती और बॉलीवुड गानों के संगम से हुआ। नाश्ते में परोसे गए डोसा-आलू कढ़ी से तो आत्मा तृप्त हो गई।

पर्यटक के रूप में मेरा पहला गंतव्य स्थल था—मत्तनचेरी पैलेस। लगभग सुबह १० बजे मैं यहाँ पहुँची। ‘डच पैलेस’ के नाम से मशहूर यह पैलेस केरल के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक स्वरूप का विशाल भंडार है। यहाँ केरल के शाही परिवार की पीढि़याँ उनकी जीवन-शैली, सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक पहलुओं को सुंदरता से सँजोकर रखा गया है। रामायण-महाभारत की गाथा कहते तथा विष्णु-शिव को साक्षात् उकेरते भित्ति चित्रों ने मन मोह लिया।

लगभग ११ बजे एंटीक म्यूजियम का सफर तय किया, जो आश्चर्य में डालनेवाला था। १२० वर्ष पूर्व के केरोसिन पंखा व फ्रिज, १५० वर्ष पुरानी कुरान और ५००० वर्ष पुरानी नियोलिथिक एक्स किसी को भी आश्चर्य में डाल सकती है। इसी म्यूजियम के सामने स्थित है—पर्यटन पुलिस म्यूजियम। केरल पर्यटन पुलिस की उत्तरोत्तर प्रगति, पुलिस वाहन एवं हथियारों का उद्विकास तथा यूनिफॉर्म व फिंगर प्रिंट्स को साक्षात् देखना अनूठा अनुभव था।

केरल भ्रमण हो और कथकली का आनंद न उठाया जाए, यह तो हो ही नहीं सकता। फोर्ट-कोच्चि के केरल कथकली केंद्र में हर शाम ६ से ७:३० बजे तक कथकली शो होता है, जिसकी ऑनलाइन टिकट मैं एडवांस में बुक करवा चुकी थी। कथकली में भाव-भंगिमा, नवरसों का संप्रेषण जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही चेहरे का मैकअप भी। शो शुरू होने से पहले कलाकार मंच पर लाइव मैकअप करते हैं। प्राकृतिक रंग, चावल की लुगदी व नारियल तेल इत्यादि का प्रयोग मुख सज्जा हेतु किया जाता है। सुमधुर संगीत, चेंदा की थाप और कलाकारों की मेहनत कथकली को मनमोहक बनाते हैं।

अगले दिन यानी ६ अक्तूबर को मेरी मंजिल थी—कुमली। सवेरे ही केरल स्टेट ट्रांसपोर्ट बस से मेरा सफर ६:१५ बजे शुरू हुआ। स्थानीय लोगों के बीच बस का सफर बड़ा ही रोचक था। कॉर्डेमम पहाडि़यों के घुमावदार रास्ते और सुपरफास्ट बस—कभी दाएँ, तो कभी बाएँ जाती, मेरा आनंद तो दुगुना हो उठा। बस में ‘इजी मित्तायी (अदरक चॉकलेट) व उन्नी अप्पम्’ (उत्तर भारतीय गुलगुले जैसा व्यंजन) का लुत्फ उठाने से मैं नहीं चूकी।

कुमली, थेकड्डी के पास (इडुक्की जिला) स्थित उपनगरीय पर्यटन स्थल है। एक ‘सोलो बूमर ट्रेवलर’ को देख ऑटो रिक्शा चालक या स्थानीय लोग आपकी परेशानी का सबब नहीं बनते, बल्कि सहर्ष व उत्साह से वे आपकी मदद के लिए आगे आते हैं। ऑटो रिक्सा चालक की मदद से मैं कुमली में अपने ‘होम स्टे’ तक पहुँच गई।

कुमली में शाम ६ बजे के लिए मैं पहले ही कलारीपयट्टू शो की टिकट बुक करवा चुकी थी। ‘कलारीपयट्टू’ केरल की प्राचीन मार्शल आर्ट पद्धति है। शो का प्रारंभ पुत्तारा यानी सात परतों में दीप-प्रज्वलन के साथ हुआ। हवा में गुलाटी खाते, मुद्रा तथा कदम का तारतम्य बनाते कलाकारों की चपलता एवं शारीरिक लचीलेपन ने मन मोह लिया। आक्रांता की गति और शक्ति का अनुमान लगाते हुए आत्मरक्षा करने की कला ने सभी को अचंभित कर दिया। कुमली में ही केरला पराँठा, चेट्टीनाद डोसा और मेजबान द्वारा परोसी गई कडाला कढ़ी-चावल से जिह्वा आस्वादित हो उठी।

अगले सवेरे ७ अक्तूबर को लगभग ७:३० बजे कुमली स्थित केरल पर्यटन केंद्र पहुँची, जहाँ से बस द्वारा यात्रियों को पेरियार राष्ट्रीय पार्क ले जाया गया। यहाँ से लगभग सुबह सवा नौ बजे मैं बोट में सवार हो गई और शुरू हुआ पेरियार झील से गुजरते हुए प्रकृति की अकूत संपदा को आत्मसात् करने का सफर। नावों के लिए रास्ता बनाते, झील में डूबे हुए वृक्ष ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो पटकथाकार मनोहारी प्रकृति की गाथा को सूत्रों में पिरोने के लिए स्वयं मंचस्थ हो। सदाबहार, शुष्क एवं आर्द्र वनों की छटा, हरीतिम दिशाएँ तथा झील के पानी पर लहराती सूरज की किरणें एक जादुई एहसास करवाती हैं। एक बात और, हथिनी जयलक्ष्मी के साथ थेकड्डी के जंगलों का सफर तो मैं कभी नहीं भूल सकती।

अगली सुबह ८ अक्तूबर को चार घंटे का सफर तय कर मैं अलप्पी-वेनिस ऑफ द ईस्ट (अलापुझा, प्राचीन नाम) पहुँची। शाम के वक्त अलप्पी समुद्र तट पर कुछ वक्त बिताया। समुंदर की अथाह लहरें जब पैरों के तलवों को स्पर्श करती हैं तो लगता है, मानो संग चलने का बुलावा दे रही हों। इन लहरों की आवाज के सामने बाहरी-आत्यंतिक किस्म-किस्म का शोर भी शांत होने लगता है। इंडियन कॉफी हाउस की केरल स्पेशल ब्लेक कॉफी और केरल कोयर इंटरनेशनल फेस्टिवल के जुट उत्पादों ने यात्रा के आनंद को दुगुना कर दिया।

९ अक्तूबर को मैं अलप्पी से कोट्टयम के बीच बैकवाटर्स की यात्रा का लुत्फ उठाने को तैयार थी। सवेरे ९:३० बजे मैं केरल गवर्नमेंट बोट जेटी स्थल पर पहुँच गई और १० बजे अलप्पी से बोट रवाना हुई। बैकवाटर्स यानी झीलों व लैगून की लंबी शृंखला, जहाँ स्ट्रीम्स व कैनाल का संगम होता है। ढाई घंटे की इस यात्रा के दौरान केरल का ग्रामीण जीवन साकार हो उठा। मोटरबोट में लगी घंटी के टन-टन करते ही बोट रुकती-चलती, सवारियों को उतारती-चढ़ाती आगे बढ़ती है।

बैकवॉटर्स में हाउसबोट्स शिकारा में सवार यात्री और डोंगी या छोटी नाव खेते सैकड़ों माँझी देखे जा सकते हैं। आश्चर्य तो तब हुआ, जब मैंने डोंगी में आइसक्रीम की चलती-फिरती दुकान बैकवाटर्स से गुजरती देखी। जहाँ भी नजर दौड़ाओ, वहाँ कुररी के झुंड और उड़ान भरती किंगफिशर चिडि़या। चहुँओर पाम के पेड़ व केवड़े की झाडि़याँ तथा पत्तेदार पौधे, तो वहीं धान के खेतों की धनक। इन मनोहारी दृश्यों को शब्दों में बाँध पाना सहज नहीं है।

केरल यात्रा के समापन का वक्त नजदीक आ गया था। ११ अक्तूबर को सवेरे जयपुर के लिए एयर इंडिया की फ्लाइट लेनी थी। १० अक्तूबर को ही अलप्पी से एर्नाकुलम आने का मानस बनाया, क्योंकि कोच्चि हवाई अड्डा यहाँ से महज ४५ मिनट की दूरी पर है। ‘केरली’ केरल राज्य हैंडीक्राफ्ट स्टोर से कसाओ (केरल), साड़ी कथकली मुखौटा तथा छोटे हाथी का आइकन यात्रा की स्मृति के रूप में जरूर खरीदा। ११ अक्तूबर को मैं केरल की मनोहारी स्मृतियों को लेकर इस उम्मीद के साथ जयपुर पहुँची कि २०१८ का आनेवाला ओणम पुनः केरल स्मृतियों को जीवंत कर देगा।

 २०५, सुभाष नगर, वार्डन नं.-२३

सरदार शहर, जिला-चुरू-३३१४०३ (राजस्थान)

दूरभाष : ०९६८०२६८०९०

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