जब शिवशंकर ने होली खेली

जब शिवशंकर ने होली खेली

शिवशंकर जब होली खेलने गए थे, तब बिल्कुल ठीक तरह थे, किंतु जब लौटकर आए तो विचित्र दशा में थे। उनका शरीर विभिन्न रंगों से आच्छादित था। उनकी जटा बिखरी हुई थी। न उनके गले में नाग-माला थी, न माथे पर चंद्रमा और न सरकारी नल की तरह निरंतर बहनेवाली गंगा। उनके साथ नंदी भी नहीं था, जो उनके साथ बॉडीगार्ड की तरह रहता।

जैसे ही पार्वतीजी की दृष्टि भोलेनाथ पर पड़ी तो वे ललिता पवार की तरह गरजकर बोलीं, ‘‘यह क्या हुलिया बनाकर आए हो? तुम्हारे वस्त्रालंकरण क्या चोरी हो गए। यह लाल-पीला और सुनहरी रंग कहाँ से लगाकर आ गए?’’

‘‘शांत हो देवी! एक साथ इतने सारे प्रश्न! जरा मुझे सुस्ताने तो दो।’’ शराबी की तरह डोलते हुए महादेव मृगासन पर जा विराजे।

‘‘लगता है, भंग पीकर आए हो।’’ पार्वतीजी उसी स्टाइल में बोलीं तो नीलकंठेश्वर मुसकराते हुए बोले, ‘‘भंग ही नहीं, धतूरे का भी सेवन किया है।’’

‘‘ओह माँ! यह तुम्हें क्या हो गया, जो ऐसा नशा करने लगे?’’

‘‘देवी! आज होली है न? आज के दिन सब चलता है। कहते हैं न ‘बुरा न मानो होली है,’ इसलिए मैं भी आज छककर आया हूँ। साल में एक यही दिन तो आता है, जब मैं देवताओं के साथ थोड़ी लगा लेता हूँ।’’ चंद्रमौली भगवान् ने कहा तो पार्वतीजी ने स्त्रीसुलभ मुँह बिचकाते हुए कहा, ‘‘तुम ठहरे भोले भंडारी। तुम्हें सब मूर्ख बनाते हैं। तुम उनकी सोसायटी के लायक तो हो नहीं, इसलिए वे तुम्हारे साथ हँसी-दिल्लगी करते हैं।’’

‘‘नहीं देवी! जो तुम कह रही हो, वह बात नहीं है। मैं इंद्र के दरबार में गया था। वहाँ पूरी महफिल जमी हुई थी। देव-ऋषि, मुनि, अप्सरा, गंधर्व, किन्नर, लोकपाल, दिक्पाल सभी थे। सभी ने मेरा ऐसा सम्मान किया कि मैं गद्गद हो गया।’’

‘‘कैसा सम्मान किया, जरा मैं भी तो सुनूँ?’’

जब पार्वतीजी ने चिढ़ते हुए प्रश्न किया तो सदाशिव पीठ टिकाते हुए बोले, ‘‘पहले तो देवताओं ने मुझ पर रंग और गुलाल मला, फिर कुछ ने सुनहरी रंग पोत दिया। मैं न-न करता रहा, परंतु किसी ने एक न सुनी।’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, ब्रह्माजी अपना बुढ़ापा भूलकर मुझ पर टूट पड़े और बाल्टी के रंग से रँग दिया। मेरी दशा विचित्र हो गई। ठंडा पानी और मुझ पर ऐसा लगा, जैसे बर्फ  से स्नान करा दिया हो। इसके बाद भगवान् विष्णु के संकेत से अग्नि, मित्र और वरुण को कुछ कहा। तीनों यमदूत की तरह आए और मुझे हाथों में उठा लिया। मैंने कहा, ‘अरे भैया, मुझे कहाँ ले जा रहे हो?’ इस पर सब खिलखिला पड़े। तीनों ने मुझे उठाकर रंग के हौद में फेंक दिया। जब मैं निकलकर बाहर आया तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि कहाँ और क्या कर रहा था। सारे देवता और ऋषिगण हो-हो कर हँस रहे थे। इसके बाद भंग का कार्यक्रम चला। देवराज इंद्र ने आग्रह करके मुझे भंग पिलाई। मैं मना करता रहा, किंतु उनकी जिद के आगे मेरी एक न चली।’’

‘‘लेकिन तुम्हारे नाग, चंद्रमा, डमरू, त्रिशूल, गंगा और नंदी कहाँ रह गए?’’

‘‘देवी! जाते समय तो सब थे मेरे साथ। अब कहाँ रह गए या टपक गए, इसका मुझे ध्यान नहीं है।’’

‘‘तुम्हें कुछ ध्यान भी रहता है?’’

‘‘अरे, जब हमारा ही ध्यान तुम्हें रहता, तब स्वयं का कहाँ से रहेगा।’’ पार्वतजी ने उलाहना दिया।

‘‘अच्छा, यह तो बताओ, कोई यहाँ तो होली खेलने नहीं आया था?’’

‘‘आए थे, वही तुम्हारे भूत-प्रेत और पिशाच। तुमने भी अच्छे लोगों का साथ किया। न ढंग से रहते हैं और न तुम्हें ढंग से रहने देते हैं।’’ पार्वतजी ने नीलकंठेश्वर के मित्रों की बुराई करते हुए कहा तो उन्हें बड़ा बुरा लगा। वे बोले, ‘‘देवी! मेरे मित्रों को बुरा-भला कहने की कोई आवश्यकता नहीं। आज होली का दिन है, हँसी-ठिठोली, आनंद का, ऐसे में मेरा मूड ऑफ  न करो।’’

‘‘ठीक है, नहीं करती, पर एक बात तो बताओ, तुम होली पर क्यों बाहर जाते हो। कभी घर पर भी होली मनाया करो।’’

‘‘क्या है, देवी कि मैं घर पर बोर हो जाता हूँ, इसी कारण होली के खास मौके पर चला जाता हूँ। देवताओं के साथ कुछ क्षण गुजार लेने से मन प्रफुल्लित हो जाता है।’’ जटाधारी ने जैसे ही अपने मन की बात प्रकट की तो पार्वतीजी स्त्रीसुलभ स्वभाव से बोलीं, ‘‘हाँ, तुम पुरुष हो! भला तुम्हें घर क्यों अच्छा लगेगा। तुम्हें घर तो काटने को दौड़ता होगा। यह दुःख तो स्त्री के साथ बँधा है कि वह घर में अकेली और बोर होती रहे।’’

‘‘तुम भी क्या बे-सिरपैर की बात ले बैठीं! अच्छा, कार्तिकेय और गणेश कहाँ गए?’’ अचानक रुद्रदेव को अपने दोनों पुत्रों की याद आई।

‘‘जाएँगे कहाँ, वे भी होली खेलने अपने मित्रों के यहाँ गए होंगे। साथ में अपने वाहन मयूर और चूहा भी ले गए हैं। आखिर बेटे किसके हैं?’’

पार्वतजी का उलाहना सुनकर कैलाशपति मृगासन पर लेट गए और मधुर मुसकान बिखेरते हुए बोले, ‘‘देवी, तुम सही मौके पर अपनी बात कहने में माहिर हो। मान गया तुम्हें मैं!’’

यह वार्त्तालाप चल ही रहा था कि इतने में ‘नारायण-नारायण...’ की ध्वनि सुनाई पड़ी।

‘‘लगता है, नारदजी आए हैं।’’

‘‘और कौन होगा, छड़ा आदमी है, जिधर सींग समाता है, चला आता है। न कोई काम है, न कोई काज।’’ कहती हुई पार्वती पर्वत की गुफा में प्रविष्ट हो गईं।

आते ही नारद ने प्रणाम करते हुए कहा, ‘‘प्रभो, प्रणाम!’’

‘‘चिरंजीव भव नारद। कहो कैसे कष्ट किया?’’

‘‘भगवन्! मैंने सुना है कि आप होली खेलने इंद्रलोक गए थे। वहाँ आपके नंदी, चंद्रमा, नाग आदि गायब हो गए, क्या यह सच है?’’

‘‘हाँ नारद, बिल्कुल सच है। क्या उनका कुछ पता चला?’’

‘हाँ देवाधिदेव! मुझे विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि नाग, चंद्रमा और नंदी को यमराज ने गिरफ्तार कर लिया है।’’

‘‘लेकिन क्यों, उन्हें गिरफ्तार करने का तो कोई कारण नहीं है, नारद।’’

‘‘कारण है प्रभो! वे स्वर्ग के उद्यानों और सड़कों पर आवारागर्दी कर रहे थे। उन्हें इस तरह की हरकत करते देखकर यम के सैनिकों ने उन्हें हवालात में डाल दिया है।’’ नारदजी ने विस्तारपूर्वक बताया तो औघड़दानी चिंतित हो उठे। थोड़ी देर तक चिंता की मुद्रा में रहने के बाद बोले, ‘‘और गंगा का कुछ पता चला?’’ प्रभो! मैंने सुना है कि कोई फिल्म निर्माता उसे फुसलाकर ले गया है। यह कहकर कि वह उसपर एक फिल्म बनाएगा।’’

१०१-सी, पार्श्वनाथ नगर, अन्नपूर्णा मार्ग

इंदौर-४५२००९ (म.प्र.)

दूरभाष : ८३१९७८२२१८

हमारे संकलन