बुद्धिजीवी का बदलाव

बुद्धिजीवी का बदलाव

वह शहर का जाना-माना बुद्धिजीवी है। उसका जीव जो है वह बुद्धि के सहारे ही पला-बढ़ा है। वह बचपन से ही बुद्धि की प्राथमिकता का कायल है। पहले वह अपने सहपाठियों को लड़़वाता था, एक से दूसरे का कान भरकर। ‘‘रामू कह रहा था कि श्यामू ने उसकी नोटबुक चुरा ली है, वरना पढ़ाई में सिर्फ इस लड़के की क्लास में पोजीशन कैसे आती?’’ श्यामू जब रामू से सच्चाई का सामना करने की चुनौती देता तो वह समझाता कि बात पारस्परिक विश्वास में उससे कही गई थी, यदि श्यामू ने ऐसा कुछ किया तो वह और रामू दोस्त कैसे रहेंगे? तब आगे की सूचना का स्रोत ही बंद हो जाएगा।

इतना ही नहीं, वह प्राध्यापकों का भी विश्वास-पात्र बनता, उनसे अपने साथियों की शिकायत कर—‘‘सर! मुरारी ने ही ब्लैकबोर्ड पर लिख दिया था कि ‘गधा हमारा क्लासटीचर है।’ आपने इसके लिए सारी क्लास को बेंच पर खड़ा किया था। आप जैसे टीचर के प्रति ऐसा लिखने का हमने विरोध भी किया था, पर हमारी सुनता कौन है? चूँकि हमें बुरा लगा तो हमने सोचा कि आपको सच्चाई बता दें।’’ उसके बुद्धिजीवी होने की नींव इसी समय से पड़ गई थी। अब तो उस नींव पर बुद्धि की एक शानदार अट्टालिका खड़ी है। उसके व्यक्तित्व के निर्माण में दूसरे बुद्धिजीवियों का भी योगदान है। उनकी देखा-देखी उसने भी ‘हँसना मना है’ की एक होर्डिंग अपने चेहरे पर चस्पाँ कर ली है। जब कभी-कभार वह अपनी कामयाबी पर प्रफुल्लित होता है तो अकेले में ठट्ठा मारकर हँस लेता है कि दूसरों को किस चालाकी से ठगा, वरना अब उसे मुसकराने तक से परहेज है। दुनिया भर के दुःख-दर्द से पीडि़त गंभीर व्यक्ति की छवि उसने परिश्रम से बनाई है। इसीलिए वह उत्सव-त्योहार से भी कतराता है। उसे किसी विचारधारा से खास लगाव नहीं है। उसका लगाव सिर्फ स्वार्थ सिद्धि का साधन है।

आजादी के बाद रूस से प्रभावित सरकार ने मार्क्स-लेनिन के पढ़े-लिखे चेलों को राजकीय संरक्षण बख्शा है। जाहिर है कि अपना उल्लू साधने को लेखक-प्राध्यापकों ने ऐसी हस्तियों का अनुकरण ही उचित समझा है, वह भी इस हद तक कि प्रगतिशीलता ही बुद्धिजीवी की परिभाषा बन गई है। कुछ समय तक तो हाल यह था कि जब तक बुद्धि के सहारे जीवित व्यक्ति जहाँ नौकरी करता था, उस निजी संस्थान के मालिक को शोषण के लिए गाली न दे ले, उसे खाना हजम न हो। इसे ‘जिस थाली में खाओ, उसी में छेद करना’ भी कहते हैं। ऐसी हरकत वह यूनियन की बैठकों में ही करता था। यूनियन का सक्रिय सदस्य वह बना भी इसीलिए था कि कामचोरी का बहाना मिल सके।

कुछ जानकारों की मान्यता है कि ‘यूनियन’ नामक संस्था ऐसे निठल्लों का संगठन है, जो काम से विरक्त हैं, साथ ही राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा से भी ग्रसित हैं। कामचोर जीवन के हर क्षेत्र में पाए जाते हैं। इसीलिए ‘यूनियन’ नामक संगठन हर संगठित क्षेत्र की शोभा है। कुछ शिक्षाशास्त्रियों ने अनुभव के आधार पर इस भोगे हुए सच को स्वीकार किया है कि जैसे एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा करने में समर्थ है, वैसे ही पढ़ाई से विमुख, पर सियासत से प्रेरित कुछ छात्र, किसी भी कॉलेज-यूनिवर्सिटी में यूनियन बनाकर करते हैं। ये ऐसे पेशेवर छात्र हैं, जो साल-दर-साल विभिन्न विषयों में एम.ए. की डिग्री एकत्र करते हैं और उसके बाद पी-एच.डी. के नाम पर संस्थान और छात्रावास पर कब्जा बरकरार रखने के विशेषज्ञ हैं। इन्हीं की देखा-देखी अब तो प्राध्यापकों ने भी यूनियनों का गठन कर लिया है। करेला और नीम चढ़ाकर इस सुखद माहौल में शिक्षा की गुणवत्ता के पतन का अनुमान ही संभव है। देश में हम कितनी भी डींगें मार लें, ईमानदारी के समान दुनिया के शिक्षा संस्थानों में हम प्रथम दस में भी नहीं आते हैं, भले ही हमारे यहाँ के छात्र दसनंबरियों में अग्रणी हों।

जाहिर है कि हमारा नायक अपने शहर के कॉलेज के प्रबंधन से जुड़ा था। यह जुड़ाव भी उसने अपने प्रयास से साधा था। दरअसल उसका दावा था कि इस निजी कॉलेज के संस्थापक का वह दूर का रिश्तेदार है। शोध करके पाए इस संबंध का उसने पूरा फायदा उठाया। कुछ दिनों तक तो नए संबंधी उससे कतराए। उन्हें भी मन-ही-मन संदेह था कि यह नया और अजनबी रिश्तेदार कहाँ से आ टपका है? उन्हें पता था कि सफलता संबंधों की जननी है। यदि कल वह असफल रहे तो यही रिश्तेदार उससे मुँह चुराएँगे। बुद्धिजीवी अपनी मुहिम में लगा रहा। जैसे कुत्ते दुम हिला-हिलाकर इनसानों का दिल जीतने में सफल हैं, उसने भी जुबान हिला-हिलाकर यही करतब किया। कभी शहर में उसके द्वारा बनाई गई शिक्षण-संस्था की बढ़ी ख्याति की चर्चा करके, कभी उसके इस परोपकार की प्रशंसा करके। ‘‘लोग आज भी याद करते हैं कि आपने इस शहर में पहली निजी शिक्षण-संस्था बनाई है। कई उद्योग लगाकर लाभ कमाने का सोचते हैं, आपने शिक्षा की ज्योति जलाकर दूसरों की जिंदगी का अँधेरा दूर करने का कार्य किया है। दूसरों के भले का ऐसा चिंतन ही व्यक्ति को बड़ा बनाता है।’’

उसके निरंतर जुबान हिलाने से संस्थापक प्रभावित हुए बिना न रह सका। उसने एक दिन बुद्धिजीवी से पूछ ही लिया, ‘‘भैया, कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में दो-तीन वेकेंसी हैं, आप भी किसी में क्यों नहीं अप्लाई कर देते? सिलेक्शन तो हो ही जाएगा।’’ हमारा नायक असलियत से परिचित था। दुनिया के सामने अपने थर्ड डिवीजन की पोल क्यों खुलने दे? उसकी ही क्यों, कई ज्ञानियों की मान्यता है कि परीक्षा किसी के भी ज्ञान की वास्तविक परख नहीं है। उसे विश्वास है कि वह शिक्षा व्यवस्था की इसी खामी का शिकार रहा है। लोग जब उसकी स्वयं की शिक्षा के बारे में पूछते हैं तो वह बड़ी विनम्रता से उत्तर देता है, ‘‘हमने भी एम.ए. किया है।’’ इसके आगे चर्चा पर पूर्ण विराम लग जाता है।

यों तो वह हर विषय पर मुखरित है, स्त्री-विमर्श से लेकर सामाजिक सौहार्द तक। श्रमिकों से लेकर किसानों की हर समस्या का उसने अध्ययन ही नहीं किया, बल्कि उनका मौलिक निदान भी सुझाया है। ‘दैनिक टंकार’ उसका प्रिय अखबार है। उसमें बिला नागा वह हफ्ते में ‘कॉलम’ लिखता है। किसानों की कठिनाई का हल, उसके अनुसार एक ही है कि सरकार उनकी फसल खरीदे और मुफ्त में बीज वितरित करे। हर पंचायत प्रमुख को सरकारी खर्चे पर ट्रैक्टर दिया जाए, ग्रामवासियों के उपयोग के लिए। डीजल और ड्राइवर का खर्चा पंचायत उठाए, गुड़ाई के एवज में शुल्क लगाकर।

इसके अलावा जब मॉल-संस्कृति का आगमन हुआ तो उसने अपने लेखन के माध्यम से उसका जमकर विरोध किया। मॉल सिर्फ मालदार लोगों के लिए है। यह छोटे व्यापारियों की हत्या की साजिश है। किसी ने उससे प्रश्न किया कि विकास को वह साजिश किस अर्थ में निरूपित करता है, जबकि मॉल तो एक सुगम और सस्ता बाजार है, हर उपभोक्ता सामग्री, जैसे जूते से लेकर जैम तक के लिए। उसका तर्क था कि साजिश शब्द का प्रयोग उसने जान-बूझकर किया है। मॉल अपनी थोक खरीद के कारण सब्जी से लेकर सॉस तक फुटकर बाजार से कम दरों पर बेचने में समर्थ है। जब कमजोर की हार हर प्रतियोगिता में निश्चित है तो छोटा व्यापारी मॉल के सामने कैसे टिक पाएगा? जैसे-जैसे मॉल का चलन बढ़ेगा, वैसे छोटे व्यापारियों का उन्मूलन भी।

वह मॉल के विरुद्ध सड़क पर आंदोलन भी चला चुका है, इससे वह व्यापारियों के बीच खासा लोकप्रिय है। किसी मंत्री-मुख्यमंत्री या राज्यपाल से व्यापारियों का प्रतिनिधि मंडल मिलने जाता है तो वह उसमें शामिल किया जाता है। आजकल कोई समान धंधे का हो न हो, उसका प्रवक्ता तो हो ही सकता है। यों बिना किसी लाभ की प्रेरणा के कोई इनसान कुछ भी नहीं करता है। हमारा बुद्धिजीवी इस नियम का अपवाद नहीं है। बाजार में आज उसकी पहचान है। उसकी हर खरीद ‘डिस्काउंट’ पर होती है। उसे उधार पर माल देने में कोई हिचकिचाता नहीं है। रसद-राशन की सस्ती डिलीवरी फोन करने पर घर में ही हो जाती है। ‘दैनिक टंकार’ में नियमित रूप से उसकी फोटो भी छपती रहती है—कभी नई दुकान के उद्घाटन, कभी व्यापारी सम्मेलन तो कभी दुकानदारों के डेलीगेशन के साथ। कुछ का खयाल है कि छोटे व्यापारियों का ऐसा हितचिंतक मिलना कठिन है, वह भी बिना वेतन और बिना किसी स्वार्थ के!

शायद ही किसी को पता हो कि मॉल के मालिक से उसकी निजी खुन्नस है। वह उसके शहर में इतना बड़ा बाजार एक छत के नीचे लेकर आए और उसको कोई लिफ्ट तक नहीं दी। उसको उद्घाटन तक पर नहीं बुलाया। उसके अहं को ठेस लगी। कोई शहर में बाहर से आए और उसके महत्त्व को नकारे, यह वह कैसे बरदाश्त करता? उसने वही किया, जो वह कर सकता था। छोटे व्यापारियों के साथ साँठगाँठ कर मॉल-संस्कृति के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया।

विद्वानों की मान्यता है कि अकसर ऐसे आंदोलन अहं के टकराव के नतीजे हैं। जिस परिवार के बेटे या बेटी प्रजातंत्र में राजशाही के अनुरूप प्रधानमंत्री बनने के लिए ही जन्म लेते हैं, वहाँ कोई दूसरा प्रधानमंत्री बन जाए तो यह पद के पारिवारिक उत्तराधिकारी को कैसे सुहाएगा? अगर कहीं कार के नीचे सड़क पर गड्ढा भी दिखे तो प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण माँगना उसके आहत अहं के नजरिए से उचित प्रक्रिया है। बिना किसी खास बैकग्राउंड के प्रधानमंत्री ने देश के पारिवारिक प्रजातंत्र में उसका नैसर्गिक हक छीना है। उसे पूरा अधिकार है प्रधानमंत्री से अंट-शंट सवाल पूछने का। और कोई है, जिसमें ऊल-जलूल सवाल उठाने का साहस हो? अन्य के अभाव में मूर्खता के इस दायित्व का वहन भी उसे ही करना पड़ रहा है। वह सोचता है कि न्याय के इस युद्ध में वह इकलौता वीर व साहसी योद्धा है, जो जनतंत्र विरोधी ताकतों के प्रतीक प्रधानमंत्री को अकेला चुनौती दे रहा है। उसकी समझ में इस मुहिम में देश का नुकसान हो, तब भी चलता है। इस संघर्ष में उसे चीन के साथ खड़े होने में भी कोई आपत्ति नहीं है। उसे मुगालता है कि यह उसके नेतृत्व क्षमता की स्वीकृति है एक महाशक्ति द्वारा। जैसे अपनी गुलेल से गौरैया गिराकर बच्चा प्रसन्न हो कि उसने हवाई जहाज मार गिराया। ऐसी उपलब्धि का कोई कर ही क्या सकता है? जहाँ राजनीति में सामान्य नेताओं का जन्म ही पचास साल की आयु के बाद होता है, वही खानदानी दावेदार तो जन्मजात नेता है।

कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने स्वयं के आकलन में पैदाइश से ही महान् होते हैं। यह चारित्रिक गुण बहुधा लेखकों और छोटे-बड़े परदे के नायक-नायिकाओं में पाया जाता है। अपने आकलन को सच साबित करना ही उनकी प्रेरणा है, नहीं तो वे कागज काले करते ही क्यों? अथवा उभरते कलाकार क्यों मैदान में टिके रहते? हमारे बुद्धिजीवी ने भी कॉलेज के संस्थापक के लैक्चरर बनने के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि ‘‘सर! आपकी सेवा में जो सुख है, वह कॉलेज की नौकरी में कहाँ से आएगा?’’ वह उम्रदार संस्थापक को यह बताना भी नहीं भूला कि उसे अपने पिता की सेवा का पावन अवसर नहीं मिल पाया था। इधर उसका जन्म हुआ, उधर उनकी मृत्यु हो गई। अब उम्रदार संस्थापक का सान्निध्य और सेवा ही उसके जीवन का लक्ष्य है। उसे दूसरों को बेवकूफ बनाने की अपनी पैदाइशी प्रतिभा पर गर्व है।

बुजुर्गवार ने अपने दम पर कॉलेज की स्थापना की थी, उसे स्नातक स्तर तक पहुँचाया था। वे कोई बुद्धू तो थे नहीं, पर खुशामद ऐसी हिना है, जो धीरे-धीरे रंग लाती है। बुद्धिजीवी भी कौन कम था? वह जुबान की दुम हिला-हिलाकर संस्थापक को पटाने में लगा रहा। उसे पता था कि घर में बूढ़े-बुढि़या के अलावा और कोई नहीं है। एक बेटा है, जो उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गया और अब वहीं का होकर रह गया है। साल-दो साल में एक बार आता है अपनी अमेरिकन पत्नी के साथ। संपर्क तो ‘फेस-टाइप’ से हो ही जाता है। बेटा जब पहली बार अमेरिकन वाइफ  को लेकर पधारा था तो संस्थापक ने एक ‘रिसेप्शन’ दिया था घर की नई बहू के उपलक्ष्य में। पर इस औपचारिक स्वागत के बाद बेटा-बहू दोनों का आगमन कम हो गया। कुछ हद तक इसमें मियाँ-बीवी की व्यस्तताएँ थीं और कुछ फेस-टाइप की करामात।

हमारे बुद्धिजीवी नायक ने अपने सतत संपर्क से यह भी सूँघ लिया था कि बूढ़े-बुढि़या इस अमेरिकन बहू से खास खुश नहीं हैं। वह तो इकलौती संतान के कारण भला-बुरा सहना ही पड़ता है। उसके पास यह भी जानकारी थी कि लड़का आई.टी. उद्योग में बड़ा पदाधिकारी है। उसके पास कंपनी के शेयर भी हैं और करोड़ों का वेतन भी। कभी-कभी वृद्ध उससे अंतर की पीड़ा भी शेयर कर लेते, ‘‘अब राजीव तो शायद ही भारत आए, वहाँ की लगी-लगाई नौकरी और घर-गृहस्थी छोड़कर। ऐसे भी यहाँ कौन उसके अनुरूप वेतन या अवसर देगा?’’ बुद्धिजीवी के मन में इसी समय एक योजना का जन्म हो चुका था, पर वह सही मौके की तलाश में था—बूढ़े से उसके अनुपालन की आशा में।

इस बीच वृद्धा कुछ अस्वस्थ हो गई, खाँसी आए तो आती ही चली जाए। शहर के सबसे योग्य और महँगे डॉक्टर ने उनकी जाँच की। आजकल डॉक्टर कितना भी काबिल हो, पर उसकी योग्यता, महँगी फीस के साथ ही जुड़ी है। पड़ोस के युवा डॉक्टर ने मोहल्ले की माताजी के नाते उनका परीक्षण किया तो दमे की शिकायत बताई और दवा दी। गनीमत है कि सभ्यता की इतनी प्रगति के बाद भी भारत के छोटे शहरों में गली-मोहल्लों के रिश्ते अभी जिंदा हैं, वरना महानगरों में तो पड़ोसी भी एक-दूसरे को पहचानते तक नहीं हैं। बेटे को जैसे ही खबर लगी, वह अगली फ्लाइट से आ पहुँचा। पहले तो उसने अपनी माँ को अस्पताल शिफ्ट करवाना चाहा। शायद बीमार को अस्पताल में ही रखते हैं अमेरिका में। घर पर दूसरों को क्यों संक्रमण हो? उन्होंने साफ इनकार कर दिया ‘‘प्रवीण है तो! बड़ा अच्छा डॉक्टर है।’’ फिर बेटे ने उन्हें अमेरिका ले जाने का प्रस्ताव दिया, ‘‘वहाँ हमें इलाज की बड़ी सुविधा है।’’ पर माँ में जिद का गजब का माद्दा था। उन्होंने स्पष्ट स्वर में उत्तर दिया, ‘‘मुरदे जहाँ के होते हैं, वहीं फुँकते हैं। हम न शहर छोड़ेंगे, न घर।’’

बुद्धिजीवी इस पूरी बीमारी के दौरान खुद व्यस्त हो गया था अपने ससुर की गंभीर हालत के कारण। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। बुद्धिजीवी व उनकी पत्नी की उपस्थिति में वह प्रभु को प्यारे हो गए। बुद्धिजीवी जब एक दो-सप्ताह बाद लौटकर आया तो वृद्धा बेहतर थीं और बेटा लौट चुका था। बुद्धिजीवी ने मतलब की बात के लिए एक-डेढ़ सप्ताह का इंतजार किया, फिर वह अपनी योजना की बौद्धिक उलटी रोक न पाया, ‘‘सर! एक कॉलेज ने आपको इतनी प्रसिद्धि दी है। हम चाहते हैं कि एक और तकनीकी शिक्षण संस्था आप खोलिए। कौन जाने, अमेरिका वाले भैया को भी उसमें रुचि हो?’’

बुद्धिजीवी इनसानों को नचा सकता है, नियति को नहीं। संस्थापक ने इस सुझाव पर विचार करने का आश्वासन तो दिया, पर वह तीन-चार वर्ष तक इस पर विचार ही करते रहे। इस अंतराल में बुद्धिजीवी कॉलेज का काम देखते-देखते शिक्षा-शास्त्री बन बैठा। ‘दैनिक टंकार’ में अब उसके लेख शैक्षणिक सुधार के मसले पर आने लगे है। वह यूनिवर्सिटी की सीनेट का सदस्य है। उसका नाम कुलपति के पद के लिए प्रचारित होता है। सबको पता है कि इसके पीछे किसका हाथ है। अब उसका झुकाव प्रगतिशील धारा की ओर न होकर कुछ दक्षिणपंथी होने लगा है। वह रोज मंदिर जाता है, पर उस थर्ड डिवीजन का क्या करे? सरकार उसे कुलपति बनाना चाहती है, पर तृतीय श्रेणी हमेशा आड़े आ जाती है।

संस्थापक और उनकी पत्नी आयु के कारण शिथिल पड़ चुके हैं और अकसर बीमार भी रहते हैं। बुढ़ापा स्वयं में एक रोग है। अब वृद्ध दवा पर जीवित हैं, अन्यथा संभावना कभी भी टें बोलने की है। बुद्धिजीवी कोशिश में है कि शिक्षण संस्था का काम-काज अपने नाम करवा ले, पर बूढ़ा है कि राजी ही नहीं होता। अचानक एक दिन वह घर में गिरा और उसके प्राण-पखेरू उड़ गए।

बेटे को सूचना दी गई। बेटा भी पत्नी से संबंध-विच्छेद के बाद वहाँ अकेला था। वह सब छोड़-छोड़कर भारत आ गया। घर पहुँचने पर सबसे पहले वह बुद्धिजीवी से टकराया। ‘आप कौन?’ बुद्धिजीवी ने प्रश्न किया। वास्तविकता जानकर वह संबंधों का हवाला देने लगा। वसीयत में बूढ़ा सबकुछ अपने इकलौते बेटे के नाम छोड़ गया था। धीरे-धीरे बुद्धिजीवी का शिक्षा संस्था से आधिपत्य समाप्त हो गया। अब बेटा अनुभव व ज्ञान के कारण शहर की बौद्धिक हस्ती बन गया है। बुद्धिजीवी इस बदलाव से आकुल है।

आजकल वह अपने प्रगतिशील संपर्कों से भेंट-मुलाकात में लगा है और अकसर बड़बड़ाता है, ‘‘क्या करें मति मारी गई थी, जो इस संस्थापक के चक्कर में पड़ गए। उसने हमारा खूब दोहन किया है।’’ शिक्षा के क्षेत्र से निराश होकर बुद्धिजीवी इधर अपने पुराने अड्डे—प्रगतिशीलों के बीच, नहीं तो छोटे व्यापारियों के मध्य देखा जाता है। ‘टंकार’ के लेखों में वह परीक्षा प्रणाली के पीछे पड़़ा है। महिला-पुरुषों की बराबरी उसका प्रिय विषय है। सरकार द्वारा व्यापारियों के शोषण पर भी उसकी कलम चलती है। उसका निष्कर्ष है कि ‘‘शोषण कोई भी करे, हम शोषित के साथ हैं।’’ यों शोषण की शिकार महिलाओं में उसकी विशेष रुचि है। लगता है कि उसका वैचारिक आस्था बदलने का वक्त आ गया है।

९/५, राणा प्रताप मार्ग

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