स्वप्नदर्शी

स्वप्नदर्शी

आज इंजीनियरिंग कॉलेज पूना का वार्षिक परीक्षा-परिणाम घोषित हुआ। विश्वेश्वरैया प्रथम श्रेणी में विशेष योग्यता के साथ पास हुए। कई मित्रों ने आ घेरा और विश्वेश्वरैया को इस विशेष सफलता के लिए बधाई देने लगे। ‘‘अब आगे क्या करने का इरादा है?’’ विश्वेश्वरैया के घनिष्ठ मित्र अर्जुन केलुस्कर ने पूछा।

‘‘सबसे पहले तो अपने गाँव जाकर माँ के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना है। माँ ने बहुत मुश्किलों में रहते हुए, बहुत कठिनाइयाँ झेलते हुए मुझे पढ़ाया है। मेरे मामा ने भी मेरी पढ़ाई में बहुत मदद की। आज का दिन मेरी माँ और मेरे मामा के लिए बहुत खुशी का दिन है। सबसे पहले मुझे उनसे मिलकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना है।’’ विश्वेश्वरैया ने मुसकराते हुए अर्जुन से कहा। रामानुज, केशव और अब्बास ने भी विश्वेश्वरैया को बधाई दी। विश्वेश्वरैया ने प्रसन्नचित्त होकर सबको धन्यवाद दिया।

‘‘विश्वेश्वरैया! तुमने इंजीनियरिंग के तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को केवल ढाई वर्षों में पूरा कर लिया, इसलिए तुम्हें ‘जेम्स बोर्कले मेडल’ दिए जाने की भी घोषणा की गई है।’’ अर्जुन ने मुसकराते हुए कहा।

‘‘मेरी सारी सफलताओं का श्रेय मेरी माँ और मामा को है। उन्होंने कभी मुझे कोई कमी महसूस नहीं होने दी। मैं किशोरावस्था में था, तब मेरे पिता इस दुनिया से चल बसे। मेरी पढ़ाई का पूरा बोझ मेरी माँ के ऊपर आ गया। छह भाई-बहनों के बड़े परिवार को मेरी माँ ने तब किस प्रकार पाला होगा, यह सोचकर मैं बहुत दुःखी हो जाता हूँ। एक कट्टर ब्राह्मण परिवार में तरह-तरह के बंधन होते हैं। मेरी माँ ने घर-परिवार की सारी मर्यादाओं का पालन करते हुए घर का और पास-पड़ोस के धनी परिवारों का कार्य करते हुए हम सब भाई-बहनों का पालन-पोषण किया। लगातार मेहनत करना और खूब मेहनत करना मैंने अपनी माँ से ही सीखा। मुँह-अँधेरे सुबह उनके दिन की शुरुआत होती और रात्रि बारह बजे जब तारीख बदल जाती, तब उनके हाथ-पैर विश्राम पाते। उनकी दिनचर्या ही मेरी जिंदगी का पहला पाठ है, जिसके कारण मैंने खूब मन लगाकर पढ़ा। आज मैंने जब इंजीनियरिंग की परीक्षा प्रथम श्रेणी में ‘जेम्स बोर्कले मेडल’ के साथ पास की है, तब मुझे अपनी माँ द्वारा पढ़ाया गया पहला पाठ ‘अथक परिश्रम’ याद हो आता है। मैं अब जल्द-से-जल्द अपनी माँ के पास पहुँच जाना चाहता हूँ।’’

विश्वेश्वरैया की बातें सुनकर अर्जुन की आँखें भर आईं। उसने पुनः एक बार विश्वेश्वरैया को बधाई दी। गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया और उसे गाँव जाने के लिए विदा किया।

आंध्र प्रदेश के कुरूनूल जिले में मोक्षगुंडम् गाँव है। इस गाँव में उस समय अधिकांश ब्राह्मण परिवार निवास करते थे। कभी किसी मुखिया ने यह गाँव ब्राह्मणों को दान में दिया था। यह एक तीर्थस्थल है। यहाँ कई छोटे-बड़े कुंड हैं। जन विश्वास है कि इनमें डुबकी लगाने से लोगों के पाप धुल जाते हैं। विश्वेश्वरैया के पूर्वज कभी इसी गाँव में रहते थे। विश्वेश्वरैया के नाम के आगे एम. इसी गाँव के नाम से लगा है। बहुत दिन हुए जब विश्वेश्वरैया के पिता मोक्षगुंडम् छोड़कर बंगलुरु से साठ किलोमीटर दूर मुड्डेनहल्ली गाँव में आकर रहने लगे थे। विश्वेश्वरैया का जन्म इसी गाँव में हुआ था। विश्वेश्वरैया जब पाँच वर्ष के ही थे, तब एक रात उनके घर में चोरी हो गई। पिता किसी काम से दूसरे गाँव गए हुए थे। घर में विश्वेश्वरैया की माँ और उनके भाई-बहन थे। रात को खाना खाकर सब लोग सो गए। सुबह उठकर देखा तो पूरा घर खाली हो चुका था। मानो चोर बहुत दिनों से इस घर की टोह ले रहे थे। जैसे ही घर का मुखिया घर से बाहर गया कि उन्होंने अपना कारनामा कर दिखाया। माँ के जेवर, कपड़े, बरतन और रसोईघर में रखा साल भर का अनाज तक चोर बड़ी होशियारी से उठाकर ले गए।

विश्वेश्वरैया की माँ श्रीमती वेंकटालक्षम्मा इस घटना से बहुत दुःखी हुईं। विश्वेश्वरैया के पिता श्रीनिवास शास्त्री को दूसरे गाँव में खबर भिजवाई गई। वे अपनी यात्रा स्थगित करके तुरंत घर लौट आए। घर का हाल बेहाल था। चोरों ने कुछ नहीं छोड़ा था। उनका बस चलता तो वे घरवालों को वहीं छोड़कर समूचा घर उठा ले जाते। परिवार के लिए भोजन के लिए अनाज तक न बचा था। गृहस्वामी श्रीनिवास शास्त्री धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने इस घटना को विधि का विधान मानकर स्वीकार कर लिया। वे अपने मित्र-परिचितों के पास से अनाज ले आए। सबसे पहले रसोई-घर को भरा जाए, जिससे घर के सदस्यों के पेट भर सकें। बाकी सामान तो धीरे-धीरे फिर आ जाएगा, ऐसा सोचकर वे घर-गृहस्थी को नए सिरे से जोड़ने लगे। वे इस गाँव के जाने-माने वैद्य थे। उनकी ख्याति दूसरे गाँवों में भी फैली हुई थी। दूर-दूर से उनके पास लोग अपना इलाज कराने आते रहते थे। उनके घर में इतनी बड़ी चोरी हो गई, यह जानकर उनके मित्र-परिचित बहुत दुःखी हुए और मदद के लिए खुलकर सामने आए।

विश्वेश्वरैया की माँ इस चोरी की घटना से बहुत बेचैन थीं। कैसे तो तिल-तिल करके उन्होंने गृहस्थी जोड़ी थी और एक रात में वर्षों की कमाई चली गई। शास्त्रीजी उन्हें ढाढ़स बँधाते, परंतु उनका मन न मानता। वे बहुत व्यथित रहने लगीं। सहसा एक दिन उन्होंने घोषणा की—‘‘अब हम इस गाँव में नहीं रहेंगे। इस गाँव ने हमारा सबकुछ छीन लिया। यहाँ मेरे बच्चे दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए। हम किसी दूसरे गाँव में चलकर अपनी गृहस्थी बसाएँगे।’’

शास्त्रीजी अपनी पत्नी की घोषणा सुनकर दंग रह गए। उन्होंने कई प्रकार से अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश की, ‘‘भागवान, इस गाँव में अपनी प्रतिष्ठा है। लोग भलीभाँति जानते-पहचानते हैं। इस गाँव के लोग तो अपने यहाँ इलाज कराते ही हैं, दूर-दूर से कई गाँवों के लोग अपना पता पूछते हुए इलाज कराने यहाँ आते रहते हैं। घर का सारा सामान चोरी में चला गया, इसका मुझे भी दुःख है। शायद भाग्य में यही लिखा था। अब जो हो गया सो हो गया, उस घटना के लिए अफसोस करना व्यर्थ है। यहीं रहकर हम अपनी गृहस्थी फिर से जोड़ लेंगे। इस घटना के कारण गाँव छोड़ना ठीक नहीं है।’’

‘‘इस गाँव में लोग आपसे ईर्ष्या-द्वेष रखते हैं। लोग जलते हैं आपकी प्रतिष्ठा देखकर। यह चोरी यों ही नहीं हो गई। बहुत दिनों से चोर इस घर की टोह ले रहे थे। किसी परिचित का भी इसमें हाथ है। घर आने-जानेवाला कोई इसमें मिला हुआ है। चोरों को इस घर की एक-एक बात मालूम थी कि कौन चीज कहाँ रखी है? घर में क्या-क्या सामान है? उन्हें सब पहले से मालूम था। वे गृहस्वामी के दूसरे गाँव जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही आप दूसरे गाँव गए, उन्होंने घर का पूरा सामान चुरा लिया। मेरे बच्चों के लिए रसोई में एक दाना तक नहीं छोड़ा। मुझे नहीं रहना इस गाँव में। कहीं और चलने की तैयारी करिए आप।’’ शास्त्रीजी की धर्मपत्नी वेंकटालक्षम्मा ने अपनी बात बहुत स्पष्ट रूप से सामने रखी।

‘‘दूसरे गाँव में जाकर बसेंगे। पता नहीं कैसे लोग मिलें? यहाँ तो हम लोग कई वर्षों से रह रहे हैं। नए गाँव में, नई परिस्थितियों में हमें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।’’ शास्त्रीजी ने यहीं रहने का आग्रह दुहराया।

‘‘आप मरीजों को देखने के लिए एवं दूसरे कामों से अकसर बाहर जाते रहते हैं। मुझे अकेले अपने घर में छोटे-छोटे बच्चों के साथ रहना पड़ता है। आगे भी यहाँ कोई दुर्घटना हो सकती है। चोरों ने इस गाँव में हमारा घर देख लिया है। मुझे डर लगता है। मैं इस गाँव में अब नहीं रहना चाहती। चिकबल्लापुर में हमारे कई रिश्तेदार रहते हैं। अब हम वहीं चलकर रहेंगे।’’ विश्वेश्वरैया की माँ ने अपना दो-टूक निर्णय सुनाया।

शास्त्रीजी को उनके सामने हथियार डालने पड़े। इस प्रकार श्रीनिवास शास्त्री का परिवार मुड्डेनहल्ली छोड़कर चिकबल्लापुर में आकर रहने लगा।

आज इंजीनियरिंग की परीक्षा ‘जेम्स बोर्कले मेडल’ के साथ प्रथम श्रेणी में पास करके विश्वेश्वरैया अपने गाँव चिकबल्लापुर में अपनी माँ के पास जा रहे हैं। चिकबल्लापुर से विश्वेश्वरैया की बहुत यादें जुड़ी हुई हैं। छह भाई-बहनों के परिवार में विश्वेश्वरैया अपने माता-पिता की दूसरी संतान हैं। उनकी हाई स्कूल तक की शिक्षा इसी गाँव में हुई। उनके बचपन के मित्र, स्कूल के सहपाठी सब इसी गाँव में रहते हैं। उनके स्कूल के शिक्षक श्री कृष्णागिरि राघवेंद्रराव उन्हें बहुत याद आते हैं। वे स्कूल के दिनों में विश्वेश्वरैया को खूब पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करते रहते थे।

घर पहुँचते ही विश्वेश्वरैया ने माँ के चरणों में अपना सिर रख दिया। बड़े भाई गाँव में ही खेतों में काम करते थे। छोटे भाई-बहन वहीं गाँव में रहते हुए शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। सबने विश्वेश्वरैया को चारों ओर से घेर लिया। विश्वेश्वरैया की माँ संघर्षों की आँच में तपी हुई एक देवी तुल्य महिला थी। उन्होंने इतना बड़ा परिवार अपनी मेहनत और लगन से अकेले पाला और पाल रही हैं। विश्वेश्वरैया के पिता श्रीनिवास शास्त्री तो चिकबल्लापुर आने के कुछ वर्षों बाद स्वर्ग सिधार गए थे। उस समय विश्वेश्वरैया की उम्र पंद्रह बरस रही होगी।

विश्वेश्वरैया को अपने पिता के साथ रामेश्वरम् तक पैदल तीर्थयात्रा करने की खूब याद है। चिकबल्लापुर आने के बाद एक बार श्रीनिवास शास्त्री ने अपनी पत्नी श्रीमती वेंकटालक्षम्मा और द्वितीय पुत्र विश्वेश्वरैया के साथ रामेश्वरम् तक की पैदल यात्रा की। उसी समय से विश्वेश्वरैया को खूब पैदल चलने की आदत हो गई। कभी भी कितनी भी दूर जाना हो, विश्वेश्वरैया पैदल ही निकल पड़ते थे। उनके पिता श्रीनिवास शास्त्री एक कुशल वैद्य और अत्यंत धार्मिक व्यक्ति थे। उन्हें पुराने धार्मिक ग्रंथों का बहुत ज्ञान था। बात-बात पर संस्कृत के श्लोक सुनाते थे। विश्वेश्वरैया ने बहुत सारी पौराणिक कथाएँ अपने पिताजी से सुन रखी थीं, परंतु हर छोटी-छोटी बात पर अपने पिता द्वारा भाग्य का जिक्र करते रहना उन्हें कभी पसंद नहीं आया।

माँ ने विश्वेश्वरैया के सिर पर मैसूरी पगड़ी रखते हुए कहा, ‘‘बेटा, इसे हमेशा पहना करना। यह पगड़ी हमारी आन-बान और शान की प्रतीक है। तुझे आगे चलकर अपने खानदान का नाम रोशन करना है। तेरे पिता नामी वैद्य थे। प्रसिद्ध चिकित्सक रहे वे। तुझे बड़ा इंजीनियर बनना है।’’

माँ, शायद इंजीनियर के काम को पूरी तरह न जानती थीं, परंतु उन्हें इतना जरूर पता था कि उनके बेटे ने इंजीनियरिंग की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की है। उनकी नजर में इंजीनियर का काम विभिन्न प्रकार की मशीनों को बनाना और सुधारना है। पिता लोगों की सेहत सुधारते थे। बेटा लोगों के काम आनेवाली मशीनों को सुधारेगा, यह सोचकर उन्हें खुशी है। विश्वेश्वरैया अपने छोटे भाई-बहनों के लिए कुछ कपड़े और मिठाइयाँ लाए थे। वे अपने थैले से उन्हें निकालकर बाँटने लगे। इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई। विश्वेश्वरैया ने देखा, दरवाजे पर उनके गुरु श्री कृष्णागिरि राघवेंद्रराव खड़े हैं। विश्वेश्वरैया दौड़कर दरवाजे की ओर लपके और बढ़कर उनका स्वागत किया। सामने बिछे हुए तख्त पर उन्हें सादर बिठाकर विश्वेश्वरैया ने उनके चरण स्पर्श किए। वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हुए बोले, ‘‘बेटा, मुझे मालूम हो गया है कि तुम इंजीनियरिंग की परीक्षा में विशेष योग्यता के साथ पास हो गए हो। पूना में मेरे एक मित्र रहते हैं। उन्होंने अपने खत में तुम्हारे विषय में सूचना दी थी। मुझे तो पहले ही विश्वास था कि तुम एक दिन जरूर इस गाँव का नाम रोशन करोगे।’’

‘‘सब आपका आशीर्वाद है, गुरुजी। आपने हमारी नींव मजबूत की। आप लगातार हमें खूब पढ़ने की प्रेरणा देते रहे। एक-एक विषय को आपने हमें बहुत विस्तार से समझाया। जीवन में हमेशा धैर्य रखना आपने ही हमें सिखाया। आपके आदर्शों पर चलते रहकर ही मैंने यह सफलता पाई।’’ विश्वेश्वरैया ने विनम्रतापूर्वक कहा। इतने में माँ एक प्लेट में मिठाई और पानी का गिलास लेकर बैठक में हाजिर हुईं। राघवेंद्ररावजी ने तुरंत खड़े होकर उन्हें प्रणाम किया और कहा, ‘‘इसकी क्या जरूरत थी?’’

‘‘कुछ ज्यादा नहीं, आपका मुँह मीठा करा रही हूँ। आपकी मेहनत का ही नतीजा है कि विश्वेश्वरैया आज कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके घर आ गया।’’ माँ ने कहा।

‘‘इसने इतने अच्छे नंबरों के साथ परीक्षा पास की है कि नौकरी मिलने में कोई देर नहीं लगेगी। अब यह घर में नहीं बैठेगा। इसकी शादी करो और इसे देश की सेवा करने दो।’’ रावजी ने कहा।

‘‘बंगलुरु में इसके मामा रहते हैं। उन्होंने अपने घर में रखकर इसे पढ़ाया-लिखाया, इस योग्य बनाया। इसकी शादी के लिए वे ही कोई योग्य कन्या की तलाश करेंगे।’’ माँ ने कहा।

विश्वेश्वरैया ने मिठाई की प्लेट अपने गुरुजी की ओर आगे बढ़ाई। रावजी ने मिठाई का एक टुकड़ा उठाया और मुँह में रख लिया।

‘‘मिठाई अच्छी है, तुम पूना से लाए होगे?’’ उन्होंने विश्वेश्वरैया की ओर मुसकराकर देखा। पानी पीकर वे विश्वेश्वरैया से फिर बोले, ‘‘बेटा, पढ़ाई का कभी अंत नहीं होता। पढ़ाई अर्थात् सीखना, यह काम जीवन भर चलेगा। जहाँ नौकरी पर जाओगे, वहाँ नए लोग मिलेंगे। वे तुमसे ज्यादा जानकार और अनुभवी होंगे, तुम्हें उनसे भी बहुत कुछ सीखना होगा। इसी प्रकार नए शहरों में जाओगे, तुम्हें विलायत जाने के भी अवसर मिल सकते हैं, वहाँ सब जगह सीखने को, जानने को बहुत कुछ है। वह सब तुम्हें खुली आँखों से देखना और जिज्ञासु मन से समझना है। एक अच्छा इंजीनियर बनने के लिए अपनी जिज्ञासा को कभी मरने मत देना। यह जिज्ञासा ही आदमी को महान् बनाती है।’’ इतना कहकर रावजी चलने को हुए।

विश्वेश्वरैया ने उन्हें विश्वास दिलाया, ‘‘सर, आपकी बातें हमेशा याद रखूँगा। मैं अपनी जिज्ञासा को हमेशा जीवंत रखूँगा, कभी उसे शांत नहीं होने दूँगा। अभी मैंने जाना ही क्या है? दुनिया में जानने, सीखने और समझने के लिए बहुत कुछ शेष है।’’

‘‘बस, तुम्हारे ऐसे ही विचार बने रहें, यही मेरी कामना है। अपनी माँ और मामा का हमेशा खयाल रखना। इन्होंने बहुत कष्ट उठाते हुए तुम्हारे जीवन को सँवारा है।’’ इतना कहकर रावजी चले गए। एक सप्ताह जाने-कैसे बीत गया, विश्वेश्वरैया को पता ही नहीं चला। स्कूल के सहपाठी, बचपन के मित्र और छोटे भाई-बहन सबके बीच रहते हुए विश्वेश्वरैया को बहुत अच्छा लग रहा था। विश्वेश्वरैया को तैरने का बहुत शौक था। जब वे हाई स्कूल में यहाँ पढ़ते थे, तब रोज सुबह दोस्तों के साथ तालाब में नहाने जाते थे। माँ रोकती, ‘‘बेटा, गहरे पानी में मत जाना।’ वे माँ को विश्वास दिलाते, ‘माँ, मुझ पर भरोसा रखो। मेरे दोस्तों की तो जरा में ही साँस भर जाती है। मैं पूरा तालाब इस ओर से उस ओर तक तैरकर चला जाता हूँ और साँस नहीं फूलती। कोई कहे तो दोबारा भी मैं ऐसा ही कर सकता हूँ।’ ‘परंतु तुम दोबारा ऐसा कभी नहीं करोगे।’ माँ डपटते हुए विश्वेश्वरैया से कहती। एक दिन माँ ने विश्वेश्वरैया से कहा, ‘तेरे मामा तुझे बहुत याद करते रहते हैं। कुछ दिनों के लिए उनके पास बंगलुरु होकर आ जा। उनसे भी आशीर्वाद ले ले।’’

विश्वेश्वरैया ने अगले दिन ही बंगलुरु जाने का इरादा किया। उसे लगा कि मैंने स्वयं माँ से क्यों नहीं कहा कि उसे मामा के पास बंगलुरु जाना है। मामा उसे बहुत प्यार करते हैं। चिकबल्लापुर में हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद मामा ने उसे अपने पास बंगलुरु बुला लिया था। मामा का बड़ा परिवार है, फिर भी उन्होंने मेरी पढ़ाई की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली और उच्च शिक्षा के लिए सेंट्रल कॉलेज में मेरा एडमिशन कराया। मामा की आमदनी कम थी और उसी में उन्हें मेरी पढ़ाई का खर्चा भी उठाना होता था। मितव्ययिता का पाठ मैंने वहीं रहकर सीखा। उन दिनों मामा के घर में बहुत आर्थिक तंगी रहती थी। मामा एक-एक पैसा बहुत सोच-विचारकर खर्च करते थे। मैं इस स्थिति को भलीभाँति समझ रहा था। मैं इस कठिन स्थिति में अपनी पढ़ाई पूरी करते हुए मामा पर अतिरिक्त आर्थिक भार नहीं डालना चाहता था। मैंने घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। कॉलेज की अपनी पढ़ाई और दूर-दूर के परिवारों में जाकर बच्चों को पढ़ाना, मुश्किल काम था, परंतु मैंने हार नहीं मानी। रोज आठ-दस किलोमीटर पैदल चलता था। दिन में कॉलेज की अपनी पढ़ाई पूरी करते हुए शेष समय में विभिन्न परिवारों में जाकर उनके बच्चों को पढ़ाया करता था। देर रात तक अपनी पढ़ाई भी करता रहता। मेरी कड़ी मेहनत देखकर मामा बहुत प्रसन्न रहते थे। वे हमेशा कहते, ‘सफलता के लिए जीवन में कड़ी मेहनत के अलावा कोई रास्ता नहीं है।’ मैंने उनकी यह बात हमेशा याद रखी। पूना में रहते हुए मुझे मामा और उनके परिवार की बहुत याद आती थी। मैं कल ही बंगलुरु के लिए रवाना होता हूँ। मामा और उनके परिवार से मिलकर मुझे बहुत खुशी होगी।

सुबह ८ बजे की बस है बंगलुरु जाने के लिए। माँ ने सुबह से बहुत सारा नाश्ता बना दिया। मैंने भी अपना बैग तैयार कर लिया। तीन-चार दिन तो बंगलुरु में रहना ही है। वहाँ कॉलेज के बहुत से सहपाठी हैं। उनसे मिलकर उनके हालचाल पूछना होगा। जिन परिवारों के बच्चों को मैं उन दिनों पढ़ाने जाया करता था, उनके यहाँ भी मिलने जाऊँगा। अपने विद्यार्थियों से मिलकर मुझे बहुत खुशी होगी।

मामा ने बड़े उत्साह के साथ विश्वेश्वरैया को गले लगाया। मामी और बच्चों ने भी विश्वेश्वरैया को अपने बीच पाकर बहुत हर्ष मनाया। आज विशेष भोजन बनाया गया। विश्वेश्वरैया ने जब मामा को बताया कि उसने इंजीनियरिंग की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली है, तब खुशी के मारे उनकी आँखें छलक आईं। विश्वेश्वरैया ने अपनी सारी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में पास कर लीं, यह बात तो उन्हें पहले मालूम हो चुकी थी। पूना में उनके कई मित्र रहते थे, जिनसे उनका पत्र-व्यवहार बना रहता था। वे प्रायः अपने भानजे के विषय में उनसे मालुमात करते रहते थे। लेकिन यह बात उन्हें विश्वेश्वरैया से ही मालूम हुई कि उसने इंजीनियरिंग का त्रिवर्षीय कोर्स ढाई वर्षों में ही बहुत अच्छे नंबरों के साथ पूरा कर लिया था। इसी विशेषज्ञता के कारण उसे ‘जेम्स बोर्कले मेडल’ प्रदान किया गया। कॉलेज में एडमिशन के समय विश्वेश्वरैया ने घर के पतेवाले कॉलम में बंगलुरु में मामा के घर का पता ही लिखवाया था। कॉलेज से विश्वेश्वरैया के नाम कोई सूचना आती तो वह मामा के पते पर ही आती थी।

खाना खाने के बाद मामा ने विश्वेश्वरैया से उसके भविष्य की योजनाओं के विषय में पूछा। विश्वेश्वरैया ने विश्वासपूर्वक कहा, ‘‘पूना विश्वविद्यालय से सर्वप्रथम आनेवाले छात्रों को नौकरी नहीं ढूँढ़नी पड़ती। बंबई राज्य को उनकी सूची विश्वविद्यालय द्वारा भेज दी जाती है। फिर राज्य शासन सुविधानुसार उन्हें नौकरी पर रख लेता है। इस प्रकार मैं सोचता हूँ कि कुछ दिनों में ही मेरा नियुक्ति-पत्र आपके पते पर यहीं बंगलुरु में आता ही होगा।’’

‘‘देश में अंग्रेजों का शासन है। नौकरियों में उच्च पदों पर पहले अंग्रेजों को ही मौका दिया जाता है। कई विभागों में तो सर्वोच्च पद सिर्फ उन्हीं के लिए आरक्षित हैं। ऐसी स्थिति में तुम्हें अपने काम में विशेष योग्यता दिखानी होगी, वरना ये विदेशी तुम्हें आगे नहीं बढ़ने देंगे।’’ मामा ने अपना मंतव्य बताया।

‘‘हाँ, यह बात तो है, मामा। अंग्रेज भारतीयों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते। वे हम लोगों को द्वितीय स्तर का नागरिक मानते हैं, जबकि भारतीयों में योग्यता की कमी नहीं है। कई क्षेत्रों में तो भारतीय अंग्रेजों से कई गुना ज्यादा प्रतिभाशाली साबित हुए हैं। शासन अंग्रेजों का है, इसलिए वे हमें जान-बूझकर आगे नहीं बढ़ने देते।’’ विश्वेश्वरैया ने अपनी बात कही।

‘‘कोई कितने ही रोड़े अटकाए, लेकिन मेहनत, लगन और योग्यता एक-न-एक दिन रंग लाती है। तुम्हें अपनी नौकरी के दौरान जो भी काम सौंपा जाए, उसे निर्भीक होकर पूरी तन्मयता के साथ करना। अंग्रेज अफसर उसका मूल्यांकन करें, न करें, उसकी चिंता कभी मत करना। कभी-न-कभी तो अंग्रेजों का शासन समाप्त होगा। वैसे भी इन दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ भारतीय जन में बहुत असंतोष फैल रहा है।’’ मामा ने विश्वेश्वरैया को फिर समझाया।

विश्वेश्वरैया को आज अपने विद्यार्थियों से मिलने उनके घर जाना है। मामा के घर से विश्वेश्वरैया के उन विद्यार्थियों के घर बहुत दूर हैं। लगभग आठ-दस किलोमीटर विश्वेश्वरैया को पैदल चलना होगा। विश्वेश्वरैया उनके घर उनसे मिलने न भी जाएँ तो क्या! उनसे उन्हें कोई काम थोड़े ही है, परंतु अपने विद्यार्थियों के हालचाल पूछना। उस दौरान उनके पढ़ाई का, क्या हुआ जब वे पूना में रहे? क्या दूसरे शिक्षक से वे आगे की पढ़ाई पूरी करते रहे? या हार मानकर बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी? किसी काम-काज में लग गए क्या? यह सब जानने की विश्वेश्वरैया के मन में बड़ी इच्छा है।

वे तैयार होकर पहले की भाँति पैदल ही निकल पड़े। आज उन्होंने मैसूरी पगड़ी पहन रखी है। कभी-कभी वे इसे पहन लेते हैं। हमेशा पहनने की अभी आदत नहीं बनी। विश्वेश्वरैया को लगता था कि सामाजिक कार्यक्रमों, उत्सवों में और किसी के घर जब उनसे भेंट करने जाएँ, तब इस पगड़ी को जरूर पहनना चाहिए। आज वे अपने सिर पर पगड़ी पहने हुए शान से बंगलुरु की सड़कों पर पैदल चले जा रहे हैं। हालाँकि उन्हें सिर पर पगड़ी बाँधना अभी ठीक से नहीं आता। आज तो पगड़ी बाँधने में मामा ने उनकी मदद की थी।

सबसे पहले वे अपने प्रिय विद्यार्थी बसंतराव के घर पहुँचे। दरवाजा बसंत ने ही खोला। सिर पर पगड़ी के कारण एक क्षण उसे विश्वेश्वरैया को पहचानने में मुश्किल हुई, परंतु जैसे ही विश्वेश्वरैया ने कहा, ‘‘बसंत कैसे हो?’’ अगले ही क्षण उसने अपने गुरु विश्वेश्वरैया को पहचान लिया। बसंतराव ने तुरंत विश्वेश्वरैया के चरण स्पर्श किए और भीतर दीवान पर बैठने का आग्रह किया। इतने में बैठक में बसंत के माता-पिता भी आ गए। उन्होंने विश्वेश्वरैया को तुरंत पहचान लिया और बहुत खुश होकर बोले, ‘‘ओह, आप! पूना से कब आए? बसंत तो आपको खूब याद करता है।’’

‘‘इसकी पढ़ाई कैसी चल रही है? इन दिनों इसे पढ़ाने कौन आता है?’’ विश्वेश्वरैया ने उत्साहपूर्वक पूछा। ‘‘बसंत ने हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में पास कर लिया। आजकल सेंट्रल कॉलेज में आगे की पढ़ाई कर रहा है।’’ पिता ने सहर्ष बताया।

बसंत की माँ ने नाश्ते की प्लेट सामने रखते हुए कहा, ‘‘आपके पूना जाने के बाद इसने किसी और से पढ़ने के लिए मना कर दिया। कहता था कि आपने सारे विषय इतनी अच्छी तरह से समझा दिए हैं कि अब आगे घर पर किसी टीचर से पढ़ने की जरूरत नहीं है। अब वह अच्छी तरह मन लगाकर पढ़ रहा है।...और बेटा, तुम्हारी पूना में पढ़ाई पूरी हो गई?’’

‘‘हाँ माँजी, मैंने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है।’’

‘‘खुश रहो बेटा! खूब तरक्की करो।’’

‘‘सर, मैं भी सेंट्रल कॉलेज की परीक्षाएँ पास करके आगे इंजीनियरिंग की शिक्षा लेना चाहता हूँ।’’

‘‘जरूर, क्यों नहीं! मेरे गाँव के शिक्षक श्री कृष्णागिरि राव कहा करते हैं कि एक अच्छा इंजीनियर बनने के लिए अपनी जिज्ञासा को कभी नहीं मरने देना चाहिए। निरंतर जिज्ञासा बनाए रखनेवाला व्यक्ति ही जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है।’’ विश्वेश्वरैया ने एक फल का टुकड़ा मुँह में रखते हुए कहा।

‘‘सर, मैं आपकी यह बात हमेशा याद रखूँगा।’’

बसंत को भविष्य की शुभकामनाएँ देकर और उसके माता-पिता से नमस्ते करके विश्वेश्वरैया अपने दूसरे विद्यार्थी से भेंट करने के लिए सामने की सड़क पर तेज डग भरने लगे।

अपने दूसरे विद्यार्थी सुधीर पाल के यहाँ पहुँचकर उन्होंने पाया कि उनके पूना जाने के पश्चात् उसने हाई स्कूल की परीक्षा पास करके पढ़ाई छोड़ दी।

‘‘आपके पूना जाने के पश्चात् सुधीर का मन पढ़ाई से उचट गया। एक-दो लोगों को घर पर पढ़ाने के लिए बुलाया भी, परंतु उसका फिर मन नहीं लगा। वह हमेशा आपकी ही तारीफ करता रहता। घर का कारोबार है। इकलौता बेटा है हमारा, इसलिए हाई स्कूल की परीक्षा के बाद हमने उसे व्यापार में लगा दिया। यहाँ वह मन लगाकर काम कर रहा है, परंतु अपनी प्रारंभिक शिक्षा के लिए वह आपको हमेशा स्मरण करता है।’’ सुधीर के पिता ने विश्वेश्वरैया का स्वागत करते हुए कहा।

दूसरे कमरे से सुधीर ने आकर तुरंत विश्वेश्वरैया के पैर छुए।

‘‘जो भी करो, नौकरी अथवा व्यवसाय। पूरा मन लगाकर करो।’’ विश्वेश्वरैया ने कहा।

इसी प्रकार विश्वेश्वरैया अपने दो और विद्यार्थियों से मिले। उन्हें भी अपने पूर्व शिक्षक से मिलकर खुशी हुई। उसमें से एक आगे डॉक्टरी की पढ़ाई करने के लिए बाहर जाना चाहता था। दूसरा, जिसका बड़ा परिवार था। उसके पिता उसे आगे नहीं पढ़ा सकते थे, उसने वहीं बिजली विभाग में नौकरी कर ली, जबकि वह विश्वेश्वरैया का होनहार विद्यार्थी था। विश्वेश्वरैया को उसके परिवारवालों से मिलकर यह महसूस हुआ कि ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करना चाहिए, ऐसा होने से बच्चों की परवरिश और शिक्षा-दीक्षा ठीक से नहीं हो पाती। बड़े परिवार को पालने में ही घर के मुखिया की सारी आमदनी खर्च हो जाती है। वह अपने लिए और बच्चों के लिए कोई योजना नहीं बना पाता।

विश्वेश्वरैया शाम तक अपने सभी पूर्व विद्यार्थियों से मिलकर घर आ गए। आज उन्होंने बीस किलोमीटर से ज्यादा पैदल यात्रा की थी। वे चाहते तो आते समय रिक्शा में बैठकर भी घर आ सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। लंबी दूरी तक लगातार पैदल चलते रहने की उन्हें आदत है। पूना में भी वे मीलों पैदल चला करते थे। हालाँकि साइकिल चलाना उन्हें पसंद है। वे साइकिल को बहुत अच्छा वाहन मानते हैं। इसके हैंडिल में तीन-चार थैले लटका लो, पीछे कॅरियर में भी सामान का बोझा बाँध लो, कोई परेशानी नहीं। धीरे-धीरे साइकिल के पैडल भरते हुए जहाँ जाना चाहो, चले जाओ। सामान ज्यादा हो तो सब तरफ से साइकिल पर लादकर हैंडल पकड़कर पैदल ही उसे ढुलकाते हुए ले जाओ। इस प्रकार साइकिल आमजन के कामकाज के लिए बहुत अच्छी सवारी है। विश्वेश्वरैया के पास अपनी साइकिल नहीं है, परंतु मामा की साइकिल उन्होंने कई बार चलाई है। घर पहुँचते ही मामा ने उनके हाथ में एक लिफाफा थमाते हुए कहा, ‘‘यह लिफाफा आज ही तुम्हारे नाम डाक से आया है। मैंने खोला नहीं। हालाँकि मैंने अनुमान लगा लिया है कि इसमें क्या है? लिफाफे पर सरकारी मुहर है, इसलिए इसमें अवश्य तुम्हारा नियुक्ति-पत्र होना चाहिए।’’

विश्वेश्वरैया ने लिफाफे पर सरकारी मुहर देखी। निश्चित ही यह एक शासकीय पत्र था। उन्होंने तुरंत लिफाफा खोला और उसमें रखा हुआ पत्र निकालकर फटाफट पढ़ गए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मामा को बताया, ‘‘आपका अनुमान बिल्कुल सही है। बंबई राज्य में मुझे सरकारी नौकरी मिल गई है। ‘लोक कर्म विभाग’ के प्रमुख कार्यालय बंबई में मुझे तीन दिनों के भीतर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है। तत्पश्चात् वहाँ से वे मुझे कार्यस्थल पर पदस्थ करेंगे।’’

‘‘बड़ी खुशी की बात है, बेटा।’’ कहकर मामा ने विश्वेश्वरैया के सिर पर हाथ रखा। मामी और बच्चों ने भी मामा-भानजे का यह वार्त्तालाप सुन लिया था। विश्वेश्वरैया को बंबई राज्य में सरकारी नौकरी मिल गई, यह जानकर सबको बहुत खुशी हुई।

‘‘मामा, मैं आज रात में ही चिकबल्लापुर निकल जाता हूँ। माँ को यह खुशखबरी देकर कल ही बंबई के लिए प्रस्थान कर जाऊँगा। बंबई राज्य बहुत बड़ा है। इसकी सीमाएँ महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक तक फैली हुई हैं। पता नहीं मुझे किस जिले में भेजा जाता है, इसलिए पूरी तैयारी के साथ ही मुझे बंबई जाना होगा।’’ विश्वेश्वरैया ने कहा।

‘‘ठीक है बेटा, तुम आज रात को निकल जाओ। खाना बन गया है, भरपेट खाकर निकलना। बंबई पहुँचकर अपनी कुशलता का तुरंत समाचार देना और पत्र में अपनी नियुक्ति का ब्योरा जरूर लिख भेजना। इसी प्रकार जीवन में आगे बढ़ो। मेरी शुभकामनाएँ और आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ हैं। जीजाजी के देहांत के पश्चात् मेरी बहन वेंकटालक्षम्मा ने बहुत कष्ट उठाए हैं। अब उसकी आशाएँ तुमसे बँधी हैं। तुम आगे बढ़ो और अपने छोटे भाई-बहनों को भी आगे बढ़ाओ।’’ मामा ने विश्वेश्वरैया को समझाया।

(महान् अभियंता मोक्षगुंडम् विश्वेश्वरैया के जीवन पर आधारित उपन्यास का एक अंश)

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