दान-पुन्न

दान-पुन्न

मेज पर गुड़ की पेसी पड़ी थी, जो अब चींटियों का भोजन  बन गई थी।

मियाँ-बीवी जाने लगे तो आदित्य ने अपनी माँ से कहा, ‘‘जरा निन्नी के यहाँ जाना है पटेल नगर। बस दो घंटे में वापस आ जाएँगे। आप अंदर बैठकर टी.वी. देखते रहें। मैं बाहर से ताला लगा देता हूँ।’’

‘‘बाहर से ताला क्यों?’’ वह चौंकी, गाँव में ऐसा नहीं होता। हम स्वयं अंदर से कुंडी लगा लें तो घबराहट नहीं होती, लेकिन कोई बाहर से ताला लगा दे तो अजीब सी अनुभूति होती है।

‘‘यह दिल्ली है। यहाँ हर रोज लुटेरे घरों में घुसकर लूटपाट करते हैं और बाद में बुजुर्गों का मर्डर भी। बड़े बेरहम और जालिम लोग हैं। हम गए और आए। आप आराम से बैठें।’’ कहकर उसने कमरे को बाहर से ताला लगा दिया।

ओम अंदर से चिल्लाती ही रही—‘‘अरे, मेरी साँस घुटी जाती है। मैं मर जाऊँगी! मैं हूँ न यहाँ। फिर ताले की क्या जरूरत है?’’

लेकिन उनपर कोई असर नहीं हुआ। वे दोनों धप-धप करते हुए सीढि़याँ उतर गए।

कमरे में बंद माँ के लिए आर.के. पुरम् का वह सरकारी आवास श्मशान की साँ-साँ में डूब गया था।

* * * 

उसे लगा, वह गलत दरवाजे पर आ खड़ा हुआ था।

सीढि़याँ चढ़ते-चढ़ते उसका साँस फूल गया था। एक बार ओम ने कहा भी था, ‘तुम डॉक्टर को दिखा क्यों नहीं लेते?’

‘तुम्हारी लाडली बहू ने तो बहुत पहले ही डिक्लेयर कर दिया था कि मुझे श्वासी है और इसीलिए उसने वर्षों तक अपने बच्चों को मेरे पास नहीं आने दिया। कहती थी कि पापा गुल्फे फेंकते हैं। दमा नामुराद बीमारी है।’ थोड़ा रुककर उसने फिर कहा, ‘आजकल इसलिए सहन करती है, क्योंकि उसकी नजर मेरे बैंक बैलेंस पर है। जीवनशैली में कितना अंतर आ गया है। आजकल हर बच्चे को अलग-अलग तौलिए चाहिए। अलग कमरा चाहिए। हम आठ बहन-भाई एक ही तौलिए से काम चला लेते थे।’

उसने प्रथम तल पर पहुँचते ही घंटी बजाई। अंदर से कविता बाहर आई। ससुर के पाँव छूने के बाद उसने बैग पकड़ा और बिना किसी संकोच के कहा, ‘पापा, आप बुरा न मानना। दौड़कर पासवाली मार्केट से पाँच किलो आटा तो ले आओ। आज इन्हें दफ्तर में बहुत काम था, इसलिए बाजार नहीं जा पाए।’

कबीर ने कुछ नहीं कहा। उसने केवल कविता की ओर आश्चर्य से देखा। आह, कितने बेबाक हैं ये शहरी लोग! उसे लाहौरी राम की  याद आ गई। किसी ने उसके नाम पत्र दे दिया था कि कबीर और उसकी धर्मपत्नी आए तो उन्हें घर पर ठहरा लेना।

उन्होंने मसूरी जाना था। एक रात देहरादून में काटनी थी। वह मित्र की चिट्ठी लेकर लाहौरी राम के घर पहुँचे। चिट्ठी देखते ही उसने कहा, ‘मैं नहीं जानता, यह व्यक्ति कौन है, जिसने तुम्हें चिट्ठी दी है।’

कबीर ने कई संदर्भ दिए, परंतु उसने पहचानने से साफ  इनकार कर दिया। वह बहुत परेशान हुआ था। उन दिनों आम आदमी कहाँ ठहरते थे—होटलों में। दूर-पास की पहचानवाले के पास रुक जाना आम बात थी, लेकिन आजकल तो सभी होटलों या गेस्ट हाउस में ही ठहरना पसंद करते हैं। उसे याद है, वह रात उसे रेलवे स्टेशन पर ही बितानी पड़ी थी।

कविता बिना किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए अंदर चली गई थी। कबीर धीरे-धीरे सीढि़याँ उतर रहा था।

* * * 

वह बार-बार अंदर-बाहर आ-जा रहा था। शायद अपनी माँ से कुछ कहना चाहता था, परंतु कह नहीं पा रहा था। उसकी जीभ पर झेंप चिपक गई थी। माँ ने ही पूछ लिया, ‘बेटा, क्या बात है? तुम परेशान लगते हो।’

तभी कविता ने अंदर आते हुए बिना किसी भूमिका के कहना शुरू किया—‘माँजी, पैसे पेड़ पर तो नहीं लगते और फिर बीमारी पर खर्च तो निरंतर झरते हुए पत्तों की तरह होता है।’

आदित्य उसे अवाक् देखता रहा। बोला कुछ नहीं।

‘तो फिर क्या चाहती हो?’

‘माँजी, सारा खेल पैसे का है। रिइंबर्समेंट आते-आते तो देर लगेगी। फिर नेहा ने नया पंगा डाल दिया है। पति से लड़-झगड़कर घर आ बैठी है। एक साल हुआ नहीं, अब डाइवोर्स चाहती है।’

‘तो रिइंबर्समेंट के पेपर भर दो न।’

‘सरकारी पैसा है, इतनी आसानी से नहीं मिलता।’

‘आश्रितों के बिल जल्दी पास नहीं होते।’ आदित्य ने दबी जबान में कहा। थोड़ा रुककर कुछ सोचने का अभिनय करते हुए बोला, दर-असल पापा ने तुम्हारे खाते में बहुत सा सरप्लस मनी डाल रखा है। वह साहस नहीं बटोर पा रहा था। जानता था कि वह झूठ बोल रहा था, परंतु कविता का उसपर दवाब था। वास्तव में जब हमारे मन में चोर होता है, तो उसकी उपस्थिति हमें किसी-न-किसी रूप में झकझोरती अवश्य है, भले ही हम स्वार्थवश मन की उस बात को अनसुना कर देते हैं।

ओम समझ गई। वह जानती है कि उसका बेटा अपने बाप से पैसा निकलवाता रहता है, कभी कोई बहाना बनाकर तो कभी कोई। अब उसकी नजर बुढ़ापे के लिए रखे पैसे पर टिक गई है। वह सोचने लगी कि खुद इतना पैसा कमानेवाला बेटा भी पैसे के लिए जीभ लपलपाने लगा है। शायद माँ-बाप का पैसा भी बच्चों को सरकारी पैसा लगने लग जाता है। दरअसल बिगाड़ा तो खुद इन्होंने ही है।

‘फिर क्या? वह तो किसी और काम के लिए रखे हैं। फरीदाबाद वाला जो प्लॉट बेचा था, उसके पैसे भी तो तुम्हारे पास ही हैं, उसमें से खर्च कर लो।’ ओम ने सुझाया।

‘माँ, वह तो मैंने बच्चों की शादियों के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट में रख दिए। कुछ अपने पी.पी.एफ . में जमा करवा दिए और फिर रवि अमरीका में एडमिशन लेना चाहता है।’

‘सो तो ठीक है, परंतु तुम्हारे पापा ने सबकुछ तो तुम्हें दे दिया है। तुम इतने बड़े अफसर हो, खुद भी कुछ करना चाहिए। हमने तो उम्र भर पेट काट-काटकर जो पैसा जोड़ा, वह सब आप लोगों को दे दिया। अभी लड़कियों को तो कुछ भी नहीं दिया।’ ओम की आवाज में उपालंभ भी था और एक आक्रोश भी।

कविता ने अपनी सास की बात अनसुनी करते हुए कहा, ‘माँजी, आप चलने-फिरने लायक हो गईं, यही क्या कम है। घुटने बेकार हो जाएँ तो जिदंगी बेकार हो जाती है। अब इतना पैसा लगा है, तो उसकी रिइंबर्समेंट तो लेनी ही है न। सरकारी पैसा मिलता है, तो क्यों छोड़ें?’

‘तो ले लो न, कौन रोकता है।’ ओम ने सहज भाव से कहा।

‘सरकारी पैसा ऐसे ही थोड़े मिल जाता है। इसके बड़े सख्त कायदे-कानून होते हैं।’ वह फिर बोली।

‘तो कायदे-कानून से भर दो न कागज।’

‘रिइंबर्समेंट तो हो जाएगी, लेकिन माँ तुम्हारे अपने खाते में ज्यादा पैसे रहेंगे तो बिल पास नहीं होगा।’ भोली सी सूरत बनाकर आदित्य ने कहा।

‘फिर क्या चाहिए?’

‘तुम्हारे खाते में जो बीस लाख जमा हैं न, उसे टेंपोरेरेली मेरे खाते में डाल दो। जब मेडिकल बिल का भुगतान हो जाएगा तो मैं पैसा वापस आपके खाते में डाल दूँगा। आप इस ट्रांसफर वाउचर पर हस्ताक्षर कर दो। फिर सब ठीक हो जाएगा।’

ओम ने क्षण भर के लिए चौंककर देखा, लेकिन फिर सँभलते हुए बोली, ‘मैंने तो ऐसा कानून कभी देखा-सुना नहीं। तुम्हारे पापा से पूछ लूँगी।’

वह जानती है कि एक बार पैसा गया तो फिर तो वापस आने का प्रश्न ही नहीं। आज तक इसने कोई पैसा हाथ पर नहीं रखा और न ही कभी लेकर लौटाया है।

कविता को लगा, बना-बनाया खेल बिगड़ गया, परंतु सोचा कि जरा चालाकी से काम लेना होगा। सोने का अंडा चाहिए तो मुरगी को पुचकारना भी तो होगा।

* * * 

सीढि़याँ चढ़ते-चढ़ते वह हाँफने लगा था। जब भी वह किसी से अपने दम चढ़ने की बात करता तो तुरंत सलाह मिलती कि यह तो नामुराद बीमारी दमा है, जिसका कोई सहज इलाज नहीं। वह चुप हो जाता।

कबीर खड़ा देखता रहा। आर.के. पुरम की बत्तियाँ झिलमिल-झिलमिल कर रही थीं। उसे लगा कि वह गलत दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया था। कैसे लोग हैं, जो समय पर रसोई का सामान भी पूरा नहीं रखते। मैं छह सौ किलोमीटर का सफर करके आया हूँ और आते ही हुक्म मिल गया कि पहले आटा लाऊँ तो रोटी मिलेगी।

वह धीरे-धीरे सीढि़याँ उतरने लगा।

* * * 

घर में कोहराम मचा हुआ था। कबीर वापस आ गया था। भाइयों को यह जरा भी अच्छा नहीं लगा। राजन ने तो कहा था, ‘इतना पढ़-लिख बीमारी चिपक गई। मैं ड्रिल करता तो साँस फूलने लगता। हाँफकर बैठ जाता, परंतु यह सब तो फौज में नहीं चलता, सो वापस आ गया हूँ।’

वह हैरान था कि उसके भाइयों में उसके प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी। वह तो उन्हें अवांछित लग रहा था, मानो वह सबका हक छीन लेगा।

‘पढ़-लिखकर भी अगर घर में ही बैठना था, तो व्यर्थ में क्यों इतना खर्च करवाया।’

कबीर सेना में भरती हो गया था। बहुत खुश था। सेना में मिलनेवाली सुख-सुविधाएँ भला किसे अच्छी नहीं लगतीं। अनुशासन भरा जीवन। लेकिन दो साल बाद ही उसे डिस्चार्ज दे दिया गया, क्योंकि वह अनफिट घोषित कर दिया गया था। उसने कहा, ‘मैं कब वापस आना चाहता था। पता नहीं, कहाँ से साँस की नामुराद बीमारी लग गई।’                                                                            

माँ-बाप के लिए तो सभी बच्चे बराबर होते हैं। बूढ़े पिता ने पूछा, ‘बच्चा, क्या करना चाहते हो। मैंने तो परमात्मा का लाख शुक्र मनाया था कि तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई, परंतु कौन जानता था कि तुम यहीं लौट आओगे। तुम्हीं बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?’

‘आप मुझे भी थोड़ी जमीन खेती के लिए दे दें, तो काम चल जाएगा। बाद में कोई नौकरी मिल गई तो देख लूँगा।’

‘बावड़ी के पासवाली जमीन ही खाली है, वह ले लो। वैसे है तो पथरीली, लेकिन उसे खेती लायक बनाया जा सकता है। थोड़ी मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी।’

‘मुझे मंजूर है। खाली तो मैं बैठ नहीं सकता।’

उसने खूब मेहनत करनी शुरू कर दी। जल्दी ही उसके अन्न के भंडार भरने लगे, परंतु जेब में पैसे फिर भी नहीं होते थे। कुछ खरीदना हो या बच्चों को फीस आदि के लिए पैसे भेजने होते तो वह इंतजाम तो कर लेता, परंतु थोड़ी मुश्किल जरूर होती।

घर में कोई उत्सव था। उसके सेनावाले दोस्त भी आए हुए थे। बातों-ही-बातों में रमणीक ने कहा, ‘कबीर, कई बार मेरा मन होता है कि मैं भी फौज की नौकरी छोड़कर खेती-बाड़ी शुरू कर लूँ। कितना सुखमय एवं शांत जीवन होता है और स्वतंत्र भी।’

‘बात तो ठीक है, परंतु ऐसी गलती मत कर बैठना। ठीक है, खेती तपस्या है। इसमें शांति है और स्वतंत्रता भी। परंतु किसान की जान तो महाजन के पिंजरे में बंद रहती है।’

‘क्या मतलब?’

‘किसान के पास हार्ड कैश तो होता नहीं। अनाज है, लेकिन यह मंडियों में जाएगा। महाजन की कृपा होगी, तभी खरीदा जाएगा। तुम्हारी तन्ख्वाह तो हर महीने की पहली तारीख को सिरहाने के नीचे पड़ी होती है।’ कबीर ने टिप्पणी की।

‘वेतन भी तो काम करने पर ही मिलता है।’

‘सो तो ठीक है, परंतु आज भी इतने किसान आत्महत्या क्यों करते हैं? जानते हो, पूस की रात का हल्कू आज भी महाजन की ‘बाकी’ चुकाते-चुकाते मर जाता है; पर बाकी है कि खत्म ही नहीं होती। फर्क सिर्फ इतना है कि आज बैंक महाजन बन गए हैं और उनके रिकवरी एजेंट यमदूत।’ कबीर रुआँसे स्वर में बोला।

गटारियाँ मस्ती से खेतों में कीड़े-मकौड़े चुग रही थीं और कबीर उन्हें खड़ा गड़रिये सा निहार रहा था अपलक।

* * * 

वह आया तो इस बार ओम ने फिर बात छेड़ दी कि बेटियों को भी उनका हिस्सा मिलना चाहिए।

आदित्य भड़क उठा, ‘कैसा हिस्सा? उनके विवाह पर इतना तो खर्च कर दिया गया है। अब और क्या देना बाकी है?’

‘खर्च तो तुम्हारे विवाह पर भी हुआ है।’ कबीर ने कहा।

‘यदि आपने जमीन या घर उनके नाम किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। पहले ही आपने तीन लाख रुपए बाजार में डुबो दिए हैं। ज्यादा ब्याज के लालच में बाजार में पैसा फेंकना कहाँ की अक्लमंदी है।’ बेटे के तेवर ही बदले हुए थे।

कबीर को बुरा तो बहुत लगा, लेकिन वह चुप ही रहा। बोला, ‘वह मेरा पैसा है। तुम्हारे से तो नहीं लिया। यह मेरी बनाई-कमाई हुई जायदाद है। मैं चाहूँ तो तुम्हें भी हिस्सा न दूँ।’

‘तो क्या छाती पर रखकर ले जाओगे? या पड़ोसियों को खुश कर जाओगे?’ बौखलाया हुआ आदित्य बोला था, ‘और हरि पाधे का हाल तो आपने देखा ही है। बेटों ने ही उसे पंखे से लटका दिया था और बाद में उनमें से एक बहन ने अपने भाई को ही...।’

कबीर सोचने लगा कि उसने गलती की। दरअसल ईजी मनी मिलते रहने से इनसान की प्यास वैसे ही बढ़ती है, जैसे नमकीन पानी पीने से प्यास भड़कती है। आदित्य नहीं जानता, उसके पापा ने किस प्रकार डाकघर के खाताधारकों का एजेंट बनकर कैसे पैसा कमाया। बस उसे तो पता है कि पापा से जब भी जितना माँगा, उससे दुगुना-तिगुना ही मिला। अब लहू मुँह को लग गया है, तो पैसा न मिलने पर तल्खी भी दिखाने लगा है।

मेज पर पड़ी गुड़ की पेसी और उससे लिपटी असंख्य काली-भूरी चींटियाँ, यह उनके लिए दान-पुन्न ही तो है। और माँ-बाप से लिपटी संतान। उन्हें पैसा देना दान-पुन्न ही है क्या या रैंजम? शब्दों का हेर-फेर हो सकता है, परंतु बात तो वहीं पहुँच जाती है।

आदित्य आता तो कबीर और ओम एकदम खिल जाते। माँ-बाप के लिए तो संतान-सुख सबसे बड़ा सुख होता है, लेकिन कभी-कभी कबीर को लगता कि बेटे का व्यवहार अलग-अलग समय पर अलग-अलग होने लगा। कभी वह कठोर शब्दों का प्रयोग करता और कभी बिल्कुल कोमल पदावली का। इस बार वह आया तो बड़ा मिठास भरा था। बोला, ‘पापा, माँ के घुटनों में तकलीफ बढ़ गई लगती है। मैं चाहता हूँ कि मैं उनका चैकअप दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में करवा दूँ।’

कबीर सोचने लगा, बात तो ठीक है, परंतु पिछली बार बात चली थी तो कविता ने कहा था, अब तो पहाड़ में भी सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल हैं। शायद वह नहीं चाहती कि कोई उसके पास दिल्ली में ठहरे; हालाँकि आदित्य को बड़ा घर मिला हुआ है, पाँच बेड रूमवाला। उसने कहा, ‘यहीं करवा देंगे। दिल्ली बहुत दूर है।’

‘पापा, क्या बात करते हो। बस या टैक्सी में यदि सफर मुश्किल लगता है, तो हम बाई एयर भी जा सकते हैं।’ उसे पता था, पैसा तो बापू ने ही देना था।

ओम ने कहा, ‘दर्द तो सचमुच बहुत होता है, परंतु डर भी लगता है कि यदि ऑपरेशन के बाद भी ठीक न हुआ तो? मिसेज हांडा ने दोनों घुटनों का ऑपरेशन करवाया और बिल्कुल ही बैठ गईं।’

‘सबके साथ ऐसा थोड़े होता है। बाकी अपने-अपने भाग्य की बात है।’ आदित्य ने कहा।

फैसला दिल्ली के ही पक्ष में हुआ।

जाने से पहले आदित्य ने कहा, ‘पापा, मम्मी की चैकबुक और अपना ए.टी.एम. दे देना। कोई एमरजेंसी हो सकती है।’

पिता ने पुत्र की ओर घूरकर देखा, परंतु कहा कुछ नहीं।

पैसा लेना हो तो इनसान कितना मधुर हो जाता है और यह कोई नई बात तो नहीं। दरअसल आदत तो खुद कबीर ने ही बिगाड़ी थी। बेटा क्लास वन अधिकारी है। हर वर्ष आयकर भी भरना होता है। एक बार उसने कह दिया था, ‘बेटा, अगर जरूरत हो तो इनकम टैक्स भरने के लिए पैसे मुझसे ले लेना।’ फिर तो उसे चटक ही पड़ गई थी। वह न केवल टैक्स के लिए हर साल पैसा मँगवा लेता, बल्कि पी.पी.एफ. में जमा करने के लिए भी कोई-न-कोई बहाना बनाकर लाख-दो लाख रुपए मँगवा लेता।

पैसा मँगवाना आम बात हो गई थी। बाद में कबीर को पता चला कि कविता अपने माँ-बाप के लिए भी उसी पैसे का उपयोग कर लेती थी।

कबीर बड़ा दुःखी होता, परंतु कर कुछ नहीं सकता था। आदित्य के लिए टकसाल खुल गई थी।

* * * 

ओम का एक घुटना बदल दिया गया था और आदित्य ने कोई तीन लाख रुपए अपनी माँ के खाते से निकाल लिए थे। उसने पूरी बिरादरी में यह सूचना फैलाने में कोई कोर-कसर न छोड़ी कि आदित्य ने अपनी माँ का इलाज एम्स में करवाया है और अब उसकी माँ घोड़ी की तरह दौड़ सकती है।

सबने कहा, ‘बेटा हो तो ऐसा! कलयुग में अन्यथा कौन किसकी परवाह करता है।’

अब घर में ओम थी, जो चौबीस घंटे अपने कमरे में बंद रहती और कविता को मटरगश्ती के लिए खूब टाइम मिल जाता। थेरैपी के लिए एक महिला आती और ओम उससे ही बातचीत करके संतुष्ट हो जाती।

ओम को एक पुराना फोन आदित्य ने दे दिया था और वह अपने बहन-भाइयों से कभी-कभार बात कर लेती। उसका मन वापस अपने घर आने को करता, लेकिन अभी उपचार चल रहा था और फिर बीच-बीच में कबीर भी आ जाता था।

पहाड़ में घरों को ताला लगाने की जरूरत बहुत कम पड़ती है, लेकिन दिल्ली में लोग अपने आप से भी डरते हैं। और अगर एक ही सदस्य ने पीछे घर पर रहना हो तो वे बाहर से ताला लगा जाते हैं। पहली बार उन्होंने ओम को ताले में बंद किया तो वह चिल्ला उठी—‘‘नहीं, मेरा साँस घुट जाएगा। मैं ऐसे बंद नहीं रह सकती। मैं तो मर जाऊँगी।’’

आदित्य ने कहा, ‘‘माँ, चिंता न करो। अंदर से भी यह चाबी से खुल सकता है।’’

‘‘जब मैं घर में हूँ, तो ताला लगाते ही क्यों हो?’’ उसने ताला नहीं लगाने दिया था।

* * * 

आर.के.पुरम् के सेक्टर चार में पहुँचते-पहँुचते रात के नौ बज गए थे।

वह सरकारी आवास के बाहर खड़ा था। हैरान-परेशान। मुख्य द्वार पर ताला लटका हुआ था।

फिर उसे लगा, घर के अंदर कोई हलचल है। एक छाया बेचैनी से इधर-उधर घूम रही थी। कबीर चिल्लाया ‘‘ओम, ओम!’’ लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

थका-हारा कबीर धड़ाम से फर्श पर बैठ गया।

पुष्पांजलि, राजपुर

पालमपुर-१७६०६१ (हि.प्र.)

दूरभाष : ९४१८०८००८८

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