ब्रज में मनुष्य ईश्वर नहीं, ईश्वर मनुष्य है

अद्भुत आश्चर्य है कि ऐतिहासिक घटनाओं के दवाब में जिस क्षेत्र में नफरत की परत जमनी चाहिए, वहाँ प्यार, कामहीन प्यार उभरता रहा। दूसरा अचरज यह है कि यहाँ की समृद्धि धन-लोलुपों को इतना ललचाती रही कि उसके कारण इस क्षेत्र को दर्जनों बार रौंदा गया, बस्ती-की-बस्ती टीला बनती गई और टीलों पर नई बस्ती बनी, परंतु यहाँ आर्थिक, सामाजिक विषमता के स्थान पर बराबरी या समता की भावना पनपती रही। प्यार और समता के इस योग के होते हुए लोग कहते हैं कि भक्ति-केंद्र ब्रज-संस्कृति के तो मानवीय आयाम तो कुछ हैं ही, लौकिक आयाम भी नहीं हैं, वहाँ तो बस अलौकिक अतिमानवीय रूप की छटा है या ठीक कहें, घनघटा है। यहाँ मानवीय आयाम की बात करनी ही व्यर्थ है, यहाँ भक्ति ने मनुष्य को उसके अस्तित्व से वंचित कर दिया है।

प्रश्न है कि मानवीय या लौकिक कोई ऐसी चमत्कार की कोटि है, जिसमें भक्ति कीर्तन हो जाए या उलटकर दूसरा प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या भक्ति स्वयं केवल लोकोत्तर की चिंता है, क्या भक्ति मानवीय नहीं है? दोनों प्रश्नों का उत्तर एक ही है कि ऐसा कुछ नहीं और कम-से-कम ब्रज में अपनी तरुणाई फिर से पानेवाली, फिर से नई शक्ति पानेवाली वैष्णव-भक्ति के संदर्भ में दोनों प्रश्न अर्थहीन हो जाते हैं।

एक तो यहाँ परमेश्वर स्वयं मनुष्य के, बहुत सामान्य मनुष्य के सहज सलोने अपनाव के चाहक हैं। उनकी भूख बिना माखन माखन-सा मानव-मन चखे जाती ही नहीं। उनकी प्यास यशोदा के दुलार के बिना नहीं बुझती, दूसरे मनुष्य की मनुष्य मात्र के लिए, व्यक्ति की समष्टि के लिए और एक की अनेक के लिए चिंता हो तो भक्ति का चरम चरितार्थ है। सबसे बड़ी कामना यहाँ मोक्ष नहीं है, क्या करेंगे पत्थर जैसा मोक्ष-पद लेकर, जहाँ खुद पत्थर होने का जोखिम है, हमें तो ऐसी भूमिका चाहिए, जहाँ दूसरे की पीड़ा अपनी पीड़ा हो जाए, दूसरे का दर्द अपना हो जाए और विशाल व विपुल के सुख में ही अपना सुख समा जाए। हमें तो एक साथ दीया होना है—अर्थात् मिट्टी की काया, स्नेह का आपूरण और अपने को जला के रोशनी करनेवाली बत्ती की चित्तवृत्ति—तीनों का एक अस्तित्व के रूप में संपुंजन—और होना है ओस-बिंदु की ढरकन, आकाश जैसे खुले मन का ऐसे द्रव में रूपांतरण, जो मोती की तरह एक क्षण झलकता है, पर छूने में नहीं आता; वह दिखता भी नहीं, बस थोड़ा-सा भिगो देता है। मनुष्य की ऐसी भूमिका को, जहाँ जीवन की सबसे ऊँची भूमिका माना जाए, वहाँ अलग से कौन और मानवीय आयाम ढूँढ़ने की जरूरत रह जाती है?

श्रीमद्भागवत में उद्धव जब गोपियों के सहज भाव से विभोर होकर मथुरा लौटते हैं तो सोचते हैं—

तासामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां,

वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।

या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा,

भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥

जिन गोपियों ने सारी निजता विसर्जित करके स्वजन तजकर, लोक-परलोक की चिंता छोड़कर अच्छा और भला कहलाने लायक रास्ता छोड़कर एकांत भाव से श्रीकृष्ण की पदवी पाई, श्रीकृष्ण के चरणों में स्थान पाया, उन गोपियों की पद-रज से उमगनेवाला काश! मैं कोई झाड़ ही होकर यहाँ रह जाता, कोई औषधि होकर यहाँ पसर जाता, यह वृंदावन का पथ ही मेरा पड़ाव बन जाता। जिसे ऋषियों की दिव्यदृष्टि नहीं पा सकी, उस श्रीकृष्ण भाव को गोपियों ने ऐसे सहज, निश्छल आत्म-निषेधी प्यार से पा लिया। देवता होना व्यर्थ है, तप व्यर्थ है, नैष्कर्म्य व्यर्थ है, ज्ञान व्यर्थ है, जब तक कि माटी की काया में भाव की देह बनने की संभावना की तलाश नहीं होती। सबकी देवर्षि गंधर्व का यही तो तरस है—‘हम न भई वृंदावन रेनु’, कुछ न होते, हम वृंदावन की रज ही हो जाते—विशाल रस के पारावार का स्पर्श तो पा सकते, और कभी उस पारावार में और उद्वेलन होेता, तो हम रज न रहकर रस में कभी-न-कभी विलीन होने की बाट जोहते रहते। उद्धव की यह आकांक्षा देवताओं-मुनियों की यह तरस जिस मानवीय आयाम के लिए है, वह क्या है, इसे थोड़ा और गहराई में जाकर समझा जाए। ब्रज में सभी लोग शुद्ध-निश्छल तो होंगे नहीं, कुछेक बावले होंगे और होते रहेंगे। अधिकतर लोग छल-प्रपंच में लिपटे पडे़ रहेंगे, और जहाँ भगवद्भक्ति को ही छल-प्रपंच का सामान बनाने की सुविधा हो, भगवान् के चाहक गाहक बनकर उपस्थित हों, वहाँ तो और अधिक सुरक्षित सुविधा मिल जाती है, वहाँ तिलक-छापे और जपमाला प्रवंचना के सहज साधन बन सकते हैं, फिर कैसे वहाँ संस्कृति का निर्माण होगा? संगमरमर के फर्श से होगा, सोने-हीरे के मुकुट से होगा या मखमली-रेशमी पहरावे से होगा या छप्पन प्रकार के भोगों से होगा? आज के संदर्भ में यह प्रश्न कुछ और तीखा हो उठता है, कल का वंचक वैष्णव भी चिंता करता है कि ब्रज की जमीन का जर्रा-जर्रा साफ-सुथरा होना चाहिए, पानी निर्मल होना चाहिए, हवा परब्रह्म की वंशी की फूँक से एक बार शुद्ध हो चुकी है, उसे उतना ही शुद्ध बना रहना चाहिए, कँटीले करीलों को वहाँ वैसे ही बने रहना चाहिए, क्योंकि वे ही तो श्रीकृष्ण की रस-सृष्टि के प्रत्यक्ष साक्षी हैं, उनकी जड़ों में श्रीकृष्ण की उस वेदना का रस आज तक मिला हुआ है, जो वेदना उन्हें प्रियाजी के पैरों में चुभे काँटे को निकालते समय हुई होगी। वह ब्रज के अस्तित्व के लिए कुछ-न-कुछ गुहार तो लगाता, पर आज तो किसी को चिंता नहीं। आज हम मनुष्य हो गए हैं न। यह जरूरी है कि ब्रज-संस्कृति मनुष्य को उसके परिवेश, उसके समूचे अस्तित्व से काटकर नहीं रखती; मनुष्य, पहाड़, नदी, पेड़-पौधे, पक्षी, रात-दिन, चाँद-सूरज सभी से मिलकर बड़ा मनुष्य बनता है, दूसरे शब्दों में नर-रूप में कृष्ण, गोपाल और बनवारी का योग ही नारायण है। पर मनुष्य कितना भी वंचक क्यों न हो जाए, कभी-कभी उसके मन में हूक उठती है : बच्चों की निर्व्याज हँसी क्यों नहीं हँसी जाती? किशोर मन का आवेग सत्यानाशी पर समूची सुख-चाह से तिरस्कृत करनेवाला आवेग क्यों नहीं उच्छ्वासित होता? गाँव के जंगल के आदमी की सीधी समझ क्यों नहीं समझ में आती? सब उस हूक के कारण रहीम, रसखान, हरिराम, व्यास, हरिदास, हरिवंश, मीरा, सूरदास नहीं बनते; पर अकबर जैसा प्रतापी बादशाह साधारण लिबास में छिपकर ब्रज का होना चाहता है, ब्रजभाषा में कुछ कहना चाहता है; ग्राउज जैसा परदेसी हाकिम ब्रजभाषा की कवि-गोष्ठी राजा के तौर पर नहीं, सहृदय भावुक के तौर पर करना चाहता है। यह सब यही सिद्ध करता है कि ब्रज-संस्कृति में एक विचित्र बात है। वह एक ओर परायों को अपना बना लेती है तो दूसरी ओर अपनेपन के भाव को सीमित अपनेपन के भाव को, अहमंता को ऐसा नष्ट करती है कि आदमी अपने से पराया हो जाता है। चैतन्य के परकीयाभाव का वास्तविक काव्यार्थ यही है कि श्रीकृष्ण के लिए प्यार करने का अर्थ है अपने से अपने भाव से वंचित हो जाना, ऐसे वंचित हो जाना कि पराया होकर करुणावश अपने लिए चिंता करने लगे। ऐसा परकीय भाव जब धारा बनकर उमड़ता है तो अपने आप ऐश्वर्य देह में लगी उबटन की तरह धुल जाता है। कुल-जाति के साथ जुड़ाव दूर किनारे छूट जाता है, सारी विद्या की सुधि-बुधि जाने कहाँ बिला जाती है। केशों में गुँथे फूलों के साथ और धार में बहते हुए अस्तित्व अपने आप कागद की नाव बन जाता है। वह नाव भी गल जाती है, अस्तित्व पानी बन जाता है। क्या मनुष्य-जीवन की चरम सार्थकता इससे कुछ अधिक होनी चाहिए? क्या कोई जगह सुरक्षित नहीं रहनी चाहिए, जहाँ मीरा को बावली बनाने के लिए, हरिदास के करवा में रखे जल को अमृत बनाने के लिए, राजाओं के मुकुट को भूलुंठित करने के लिए, चैतन्य को नए चैतन्य का रसमय चैतन्य का साक्षात्कार करने के लिए, रहीम-रसखान, ताज जाने कितने ऐसे लोगों के भीतर एक ऐसी चाह भरने के लिए, जिसमें न बैकुंठ की चाह रहे, न बैकुंठ में रहनेवाले हरि की चाह रहे, केवल चाह की चाह रह जाए, प्यास की प्यास रह जाए, जीवन एक अंतहीन उत्कंठा बन जाए और समस्त विश्व और विश्वात्मा उस उत्कंठा में ही आकार पा जाएँ? वह जगह अब भी ब्रजभूमि है, आज भी, इतनी सारी अमानवीय विडंबनाओं के बावजूद। आज भी ब्रज-संस्कृति में, ब्रज में पूरी तरह ब्रज की कल्पना से एकदम अलग हो जाने के बाद भी स्वप्न-रूप में ही सही, आँखों के छलावे के रूप में ही सही, मानवीयता का इतना सामान्य, इतना निर्विशेष, पर इतना ओर-छोरहीन आयाम देखने को मिल सकता है, कोई देखे तो सही, अपने को किनारे करके कोई भीतर झाँके तो सही। यह सपना ही सही बड़ा बनाता है, यह स्मृति ही सही मधुर बनाती है और यह छलावा ही सही मनुष्य को अनंत की ममता देता है।

 

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