पीले पंखोंवाली तितली

पीले पंखोंवाली तितली

उस दिन मौसम बहुत सुहावना था। नवंबर का यह माह पीले पंखोंवाली तितली के लिए सबसे अच्छा था। उसे तलाश थी किसी ऐसे पेड़ की, जहाँ वह अपने अंडे दे सके।

आखिर उसे नारंगी का एक पेड़ दिख ही गया, ‘‘ओह! मेरे लिए तो यही सबसे अच्छी जगह है। अब मैं आराम से अपने अंडे दे सकती हूँ।’’

तितली ने जल्दी से एक अच्छी सी पत्ती की तलाश शुरू कर दी, जहाँ वह अपने अंडों को सुरक्षित रख सके। उसने नारंगी के पेड़ की एक ऐसी पत्ती चुनी, जो पुरानी और दिखने में मजबूत थी। उसने उसपर अंडे दिए और फिर से नील गगन में आ गई।

अचानक उसे चक्कर आने लगा।

‘‘अरे! मुझे यह क्या हो रहा है?’’ उसका माथा चकराने लगा।

तभी उसे याद आया, ‘ओह! अंडों की खुशी में मैं तो भूल ही गई कि अब दुनिया से मेरे जाने का समय आ गया है। मैंने अपना जीवन-चक्र तो पूरा कर लिया। अफसोस, मैं अपने बच्चों को नहीं देख सकूँगी!’ यह सोचते हुए तितली हमेशा-हमेशा के लिए हवा में ही तैर गई।

अब उसके अंडों की सुरक्षा भाग्य-भरोसे थी। कुछ समय बाद अंडों से लार्वे निकल आए। तितली की मेहनत कामयाब हुई। धीरे-धीरे लार्वों का आकार बढ़ने लगा। पर उस दिन ऐसी आँधी आई कि मत पूछो। तेज हवा से वह पत्ती टूट गई, जिस पर माँ ने उन्हें अंडों के रूप में जन्म दिया था। बारिश भी हुई, पर सभी लार्वे सुरक्षित थे, क्योंकि उन्होंने अपना पुराना स्थान बदल जो लिया था।

बीस दिनों के सुरक्षित समय ने उन्हें लार्वे से कैटरपिलर बना दिया। अब वे रस्सी की तरह लहरदार डिजाइनवाले, हरे-हरे सुंदर दिख रहे थे। उन्हें अब मौसम की बेरुखी का भी कोई डर नहीं था। वे पेड़ पर धमाचौकड़ी करने लगे। नारंगी का पेड़ पेरशान हो उठा कि कब वे यहाँ से जाएँ और उसे सुकून मिले, क्योंकि वे उसकी पत्तियों को बुरी तरह से खत्म करते जा रहे थे।

चार-पाँच दिन बीत गए। अब कैटरपिलर अपने को एक विशिष्ट कवच में बंद करके सुरक्षित थे, जिसे चिडि़या भी नहीं खा सकती थी। वे बन गए थे मजबूत कवच से ढके हुए प्यूपा! उन्होंने नारंगी के पेड़ को मजबूती से पकड़ रखा था। उन्हें तो बस इंतजार था, नन्ही-नन्ही, मखमली तितलियों में बदलने का। सप्ताह भर में ही वे प्यूपा से तितलियों में बदलनेवाले थे।

और आखिर वह दिन भी आ गया, जब वे धीरे-धीरे तितलियों में बदलने लगे। यह उनका सबसे सुखद क्षण था। प्यूपा से एक-एक करके तितलियाँ बाहर आतीं और इठलाते हुए खुले आसमान में उड़ जातीं! पीले-पीले रंगों में रँगी हुई वे तितलियाँ बिल्कुल पतंगी कागज सी लहरा रही थीं।

पर एक प्यूपा के साथ कुछ ऐसा दुर्भाग्य हुआ कि वह पेड़ से नीचे गिर गया। दरअसल जब माली बाबा बगीचे की सफाई कर रहे थे तो वह गिर गया। अब बेचारा कर भी क्या सकता था, उसके सब साथी तितलियों में बदलकर उड़ चुके थे।

जब माली बाबा ने जमीन की गुड़ाई की तो प्यूपा मिट्टी में दब गया। अब उसे वह नमी और ताप नहीं मिल पा रहा था, जो उसे एक तितली बनने के लिए चाहिए था। वह बहुत लंबी नींद में चला गया। एक ऐसे समय में, जहाँ वह कब सही वातावरण पाएगा और तितली में बदलेगा, इसकी कोई उम्मीद नहीं थी।

फिर तो दिन गुजरे, महीने गुजरे और साल बीत गए, पर वह मिट्टी में ही दबा रहा। यह फिर से सर्दियों की शुरुआत थी। माली बाबा बगीचे की सफाई कर रहे थे। अचानक प्यूपा के भाग्य ने साथ दिया और वह गुड़ाई करते हुए पत्तियों के ढेर पर जा गिरा। वह उसके भाग्य का सबसे सुंदर दिन था। उसे सही परिस्थितियाँ मिलीं और वह एक नन्ही एवं प्यारी सी तितली में बदल गया।

उसने पहली बार उड़ान भरी और उड़ते हुए दुनिया को देखा। दुनिया का हर एक नजारा उसे बहुत अच्छा लगा। वह भूल चुकी थी कि कभी उसके भाई-बहन भी हुआ करते थे। अब तक तो उनकी बहुत सारी पीढि़याँ बीत चुकी थीं। अब तितली को तलाश थी किसी ऐसे दोस्त की, जो उससे बातें कर सके।

‘‘कहाँ उड़ी जा रही हो, नन्ही पीलू?’’ अचानक किसी की आवाज सुनकर उसने देखा तो एक ड्रैगनफ्लाई उसके साथ-साथ उड़ रहा था। उसे लगा, जैसे वह उसका अच्छा साथी बन सकता है, सो वह बोल उठी, ‘‘अरे! क्या तुम मेरे साथ सैर करोगे?’’

‘‘हाँ पीलू, जरूर करूँगा। पर यह तो बताओ, मैंने तुम्हें जो नाम दिया है, वह तुम्हें पसंद है?’’

‘‘हाँ, बहुत ही प्यारा नाम है! मैं आपको किस नाम से पुकार सकती हूँ?’’

‘‘मुझे ड्रैगू कह सकती हो।’’

‘‘ओह ड्रैगू भैया, क्या मुझे अपना दोस्त बनाओगे?’’

‘‘हाँ-हाँ, क्यों नहीं!’’

‘‘तो चलो, कहीं घूमते हैं।’’

‘‘बिल्कुल, मैं तैयार हूँ।’’ कहकर ड्रैगू उड़ चला।

पर पीलू के लिए ड्रैगू से होड़ ले पाना मुश्किल था। ड्रैगू के पंख छोटे और मजबूत थे। वह हैलीकॉप्टर की तरह कभी इधर जाता तो कभी जूँऽऽऽ करता उधर चला जाता। पीलू तेज उड़ने की कोशिश करती तो शरारती हवा उसे लहरा देती। बेचारी बड़ी-बड़ी पत्तियों जैसे पंखों को ठीक से सँभाल भी नहीं पाती कि हवा फिर गुदगुदी लगाकर चली जाती।

काफी देर हो गई। ड्रैगू ने कहा, ‘‘मुझे तो भूख लग आई। क्या तुम कुछ नहीं खाओगी?’’

‘‘हाँ, भूख तो मुझे भी लगी है।’’ पीलू ने कहा, ‘‘पर मेरे खाने लायक यहाँ है ही क्या?’’ वह चारों ओर नजरें दौड़ाने लगी।

‘‘तो ठहरो, मैं अभी खाने-पीने का बंदोबस्त करता हूँ।’’ कहता हुआ ड्रैगू उड़ चला।

जब थोड़ी देर बाद लौटा तो उसके मुँह में छोटे-छोटे बहुत सारे पतंगे थे। उसने पेड़ की एक पत्ती पर उन्हें रखते हुए कहा, ‘‘आओ पीलू, इन्हें खाते हैं।’’

पीलू चौंक उठी, ‘‘अरे ड्रैगू भैया! मैं यह कहाँ खाती हूँ?’’

‘‘मेरी दोस्ती के नाम ही सही, कुछ तो खा लो।’’ ड्रैगू ने कहा।

‘‘नहीं भैया!’’ पीलू को मिचली आने लगी, ‘‘मैं इसे खाऊँगी तो मर जाऊँगी। मेरा भोजन तो फूलों का ताजा रस है।’’

‘‘ओह! मैं तो यह भूल ही गया था।’’ ड्रैगू शर्मिंदा होता हुआ बोला, ‘‘फिर तुम क्या करोगी?’’

‘‘मैं नीचे जाकर खूब सारे फूलों पर इतराऊँगी-मँडराऊँगी और चुपके-चुपके उनका रस पी लूँगी। तब तक तुम अपना भोजन करो।’’

पीलू की बात सुनकर ड्रैगू को मजा आ गया। वह भी मीठे रस की कल्पना करने लगा। पर वह रस पी भी तो नहीं सकता था, क्योंकि उसके पास पीलू जैसा सूँड़वाला मुँह जो नहीं था।

थोड़ी ही देर बाद पीलू नीचे उतर आई और अपना पेट भरने लगी। उसे नए-नए फूलों से मिलकर बहुत मजा आ रहा था। धीरे-धीरे रात घिर आई। अब पीलू को नींद आने लगी। वह कोई पेड़ तलाशने लगी, जिस पर आराम कर सके। अचानक उसे एक पेड़ दिख गया। पेड़ बरगद का था। वह उसकी एक पत्ती पर चिपक गई।

‘‘वहाँ कहाँ बैठी हो तितली रानी, नीचे आ जाओ।’’

‘‘कौन?’’ तभी किसी अनजानी आवाज को सुनकर पीलू ने कान खड़े किए।

‘‘मैं हूँ, बेले का फूल!’’

‘‘ओह! मैं तो डर ही गई थी।’’

‘‘हाँ, तुम नीचे आकर मुझ पर सो जाओ। यहाँ कोई खतरा नहीं है। उस पेड़ पर तो बंदरों का बसेरा है। सारी रात धमाचौकड़ी करते रहते हैं। कहीं जरा सा धक्का लगा तो जाने क्या हो!’’

‘‘ओह!’’ पीलू बेले के फूल पर आ गई।

‘‘तुम बहुत अच्छी और भोली हो। तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘मैं पीलू हूँ!’’ वह चहक उठी, ‘‘आज का दिन मेरे लिए शुभ है। आज मुझे दो दोस्त मिल गए, एक ड्रैगू भैया और दूसरे आप।’’

फिर तो पीलू देर रात तक बेले के फूल से बातें करती रही। बातें करते-करते उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। अगली सुबह वह ड्रैगू के साथ उड़ने का आनंद लेने लगी और दिन भर मस्ती करती रही।

इसके बाद तो पीलू को ड्रैगू के साथ उड़ने का चस्का लग गया। वह उसके साथ दूर-दूर तक उड़ जाती। धीरे-धीरे चार दिन कैसे बीत गए कि पता ही नहीं चला। उसने उदास होकर कहा, ‘‘ड्रैगू भैया, अब आज के बाद मैं तुम्हें कभी नहीं मिलूँगी!’’

‘‘क्यों?’’ ड्रैगू ने आश्चर्य और दुःख से कहा।

‘‘मेरा समय पूरा हो चुका है। अब मैं इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़नेवाली हूँ!’’

‘‘पर अभी तो एक सप्ताह भी नहीं हुआ है।’’ ड्रैगू उदास हो गया।

‘‘क्या करूँ, हमारा जीवन ही इतना होता है।’’ पीलू ने कहा, ‘‘इसमें हमारा कोई वश नहीं।’’

‘‘मुझे बहुत अफसोस होगा तुम्हें खोकर।’’ ड्रैगू की आँखें भर आईं। तब पीलू ने कहा, ‘‘समय कम है ड्रैगू भैया, क्या तुम मेरे लिए एक काम कर सकते हो?’’

‘‘हाँ, बताओ पीलू, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?’’ ड्रैगू ने उदास होकर कहा। ‘‘क्या आस-पास कोई ऐसा पेड़ बता सकते हो, जहाँ मैं अपनी अगली पीढ़ी को जन्म दे सकूँ।’’

ड्रैगू भावुक हो गया। भर्राए गले से बोला, ‘‘हाँ, यहाँ से पश्चिम की ओर एक नीबू का बाग है। क्या वह तुम्हारे काम का हो सकता है?’’

‘‘हाँ-हाँ, बिल्कुल।’’ पीलू ने कहा, ‘‘वही तो चाहिए।’’ कहती हुई पीलू उड़ चली। पर जाते-जाते वह उदास नजरों से ड्रैगू को देखती रही। ड्रैगू भी उसे भीगी नजरों से आखिरी क्षण तक देखता रहा, जब तक कि वह नजरों से ओझल नहीं हो गई।

ड्रैगू दो-तीन दिन तक उसका इंतजार करता रहा कि हो सकता है वह लौट आए और कहे, ‘ड्रैगू भैया, मैं लौट आई, आपके साथ उड़ने का मजा लेने के लिए! मैंने तो मरने की बात झूठ कही थी।’

पर कई दिन और महीने गुजर गए, लेकिन पीलू वापस न आई। एक दिन ड्रैगू की आँखों से उम्मीद का आखिरी आँसू भी टपक पड़ा, ‘सचमुच! अब पीलू कभी वापस नहीं आएगी। वह अपनी नई पीढ़ी को जन्म देकर हमेशा-हमेशा के लिए चली गई शायद!’

जी.एफ. पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज

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