कन्नड़ देवरगुड्डों के काव्य

कन्नड़ देवरगुड्डों के काव्य

मैं जब ‘देवरगुड्डों’ का काव्य कहती हूँ, विश्वास के साथ कह सकती हूँ, हिंदी के किसी व्यक्ति की समझ में यह शब्द नहीं आता। विश्वास मानिए, कन्नड़ के कई विशेषज्ञों के लिए यह शब्द अपरिचित है। जिस तरह सिर्फ शब्दों को जोड़कर वाक्य बनाने से अर्थाभिव्यक्ति नहीं होती, उसी तरह सामान्य शहराती के लिए भी यह शब्द अपरिचित ही है। ‘देव’ शब्द तो सामान्य रूप से कई भारतीय भाषाओं में सीधे समझ में आता है, मगर यह ‘र’ कन्नड़ भाषा का प्रत्यय है। ‘गुड्डा’ भी इसी तरह एक छोटी सी पहाड़ी या टेकरी का अर्थ देता है, मगर यह तक नामवाची संज्ञा शब्द है। इस संदर्भ में वह वाच्यार्थ नहीं देता। यह शब्द कर्नाटक के विशेष प्रांत और समुदाय में प्रचलित शब्द है। कर्नाटक के केल्लेगाल नामक प्रांत में महादेव पहाड़ी पर मले महादेव के आगे अपने आप को समर्पित करनेवाले भक्तों को दिया गया नाम है। इस कारण उन्हें देवगुड्डा ही कहा जाता है।

कर्नाटक के पेशेवर धार्मिक गायकों में कंसालेगायक अथवा देवरगुड्डों का प्रमुख स्थान है। मैसूर जिले के दक्षिण भाग में ये लोग विशेष रूप से दिखाई देते हैं। बंगलुरु, चामराज नगर और मंड्या जिले के कुछ भागों में भी हैं। कभी-कभी तमिलनाडु के चैन्नई में भी दिख जाते हैं। मले महदेश्वर के इन परमभक्तों को ‘कंसाले’ कहते हैं, इन्हें ‘कैसाले’ भी कहा जाता है।

कांस्यजाल नामक संस्कृत शब्द का कन्नड़ रूप कंसाले है। देवरगुड्डा अपने को कंसाले भी कहते हैं। कंसाले ताल को पकड़ने के लिए उस व्यक्ति का गुड्डा बनाना जरूरी होता है। कहते हैं कि मले मादेश्वर कंसाले को हाथ में लिये कारण्य भिक्षा माँगने जाया करता था। इस कारण कंसाले लोगों का यह विरुद पवित्र तथा पूजनीय है। इसी वजह से कंसाले लोग काँसे की थाली में खाना नहीं खाते और भिक्षा माँगने जाते समय या कथा वाचन करते समय वे पदत्राण नहीं पहनते। जूते पहनकर वे दुलहन को नहीं छूते। जूते पहनकर छूने को वे भयंकर अपराध मानते हैं। उनके कुल दैव या आराध्य देव महदेश्वर ही हैं।

गुड्डा का मतलब महदेश्वर का बेटा है। हो सकता है, किसी शब्दकोश में ढूँढ़ने पर आपको यह अर्थ मिले। उनकी अपनी सीमित परिधि में वह अर्थ गृहीत है। गुड्डा बनाने की परंपरा कंसाले लोगों की अपनी विशिष्टता रही है। सिक्खों में जिस तरह परिवार के एक पुरुष को सरदार की दीक्षा अनिवार्य रूप से दी जाती है, उसी तरह मले महदेश्वर के भक्तों के परिवार के एक पुरुष सदस्य को गुड्डा बना दिया जाता है, इसके अलावा भी कुछ विशेष संदर्भों में अन्य को भी गुड्डा बनाते हैं। जीवन में बुरे दिन आने पर या संतानहीनता की हालत में पहली संतान/लड़के को गुड्डा बनाने की मनौती मानते हैं। देवरगुड्डों के काव्यों के कुछ उदाहरण हैं—

आदिशक्ति मादप्पा की पंक्ति

आदि शक्ति कवट्ल

मलेय मादेव बरुव चंदवा

नोडे नम्म शिउना॥ सोल्लु॥

आदि पराशक्ति

भूमि सोर्ग पाताळ हुट्टुवक्मुंचे

इष्णु ब्रम्म मादेश्वर हुट्टुवक्मुंचे

मूरु जीवक्के मुंचे

आदिशक्ति हुट्टिद्दाले

बेळीता बेळीता

आकास वेणि अक्क नागिद्दाळे

अउळु पादऊरिद स्थळवे तंगियागिद्दाले।

 

नीलेवेणि

अत्ते इद्दरे ननगे नोडय्य

नन्न दोरेये

विद्या बुद्दि हेलुतिकु

अत्ते इक्कदे अडकविल्लड

नन्न मतिये

अत्ते इल्लद मेले फलवेनु

अत्ते मावर पाद पूजेय

नानु माडिदरे

स्वर्ण बेन्न हिंदे इरुडदु

अत्ते मानंदिरनु निंदिसि

बाकुतिद्दरे

तप्पदय्य यमर नरकउ

उस तरह पैदा होनेवाले बच्चे को गुड्डा बनाते समय एक विशेष समारोह का आयोजन करते हैं। गुड्डा पर उन्हें सिवाय उनकी शादी के और कुछ खर्च करना नहीं पड़ता। गुड्डा लोगों के भी मुखिया होते हैं। उसे ‘पुरुसकारी’ कहते हैं। उसके नेतृत्व में गुड्डा बनाने (छोड़ने) का कार्यक्रम संपन्न होता है। यह दीक्षाकार्य साधारणतया सोमवार के दिन मात्र संपन्न होता है। अगर संभव नहीं हुआ तो शुक्रवार के दिन भी चला लेते हैं। मादेश्वर के पहाड़ पर ही संपन्न होने पर किसी भी दिन कर लेते हैं।

सोमवार के दिन संपन्न करते समय घर-दरवाजे झाड़ू-बुहारकर साफ-सुथरा बना लेते हैं। गुड्डा बनानेवाले का कमर-पट्टी निकालकर आगे से उसके बाल काटते हैं। पूर्व दिशा की तरफ लड़के का चेहरा कर उसे बिठा-बिठाकर एक गुड़ का टुकड़ा रखकर छह केले, पान-सुपारी, पाँच पाव भर चावल, एक सिक्का, एक दुकूल रखकर पूजा कर उसे चौकोर बनाकर पूरी तरह बाल काटा जाता है, फिर सारी वस्तुएँ उसकी झोली में डालते हैं, फिर उसे नहलाते हैं।

नहाने के लिए दी जानेवाली हाँड़ी को खूब माँजकर, उसकी पूजा कर हलदी का पानी गरम कर रिश्तेदार एक-एक कर लोटा भर पानी उसे लड़के के सिर पर डालते हैं, उस तरह पानी डालते समय ‘मादेव, तुम्हारे इस बच्चे की रक्षा करते रहो, उसका उद्धार करो’ कहते हैं।

लड़के के नहाने के बाद उसे नए कपड़े पहनाकर भगवान् को बुला लाने निकलते हैं। मिट्टी के पाँच घड़े उठाकर कंसाले लोगों के साथ पाँच विवाहित महिलाएँ तालाब-कुआँ जाकर भगवान् की मूर्ति को उठा लाती हैं। एक जवान बकरी और झोली में ये पाथेय बाँधकर कंसाले पैसे, छोटाताल रखे रहता है या नहीं, उसके हाथ लाग बेंट होती है। अरणी, घड़े माँजकर पानी भरकर सुपारी के फूल रखकर पाथेय लेकर पूर्व दिशा में सब्जीवाले पाथेय के तीन गाँठ बाँधकर झोली में कंसाले पैसे छोटा ताल रखे रहता है। इसके अलावा सुपारी के फूल रख पाथेय लगाकर पूर्व दिशा में मुड़कर पूजा करते हैं। अब बाजा बजाते हुए कंसाले झनझनाकर भगवान् की मूर्ति को लाकर आवरण में रखते हैं।

अब गुड्डा बननेवाले लड़के को माता-पिता यह कहते हुए कि ‘यह हमार बेटा नहीं, मादेव का बेटा है’ पुरुसकारी के हाथ सौंपते हैं। उसे काले पीढ़े पर बिठाकर काली कंबल, बिस्तर ओढ़ाकर उसके ऊपर पूर्वाभिमुख में बिठाकर उसके आगे जोर से इस तरह मानो सिर पर पिटाई कर रहे हों, चावल भरकर सेर से (माप) उसके सिर पर रखकर उसका दायाँ हाथ नीचे रखवाकर उसके ऊपर दूध-मक्खन फैलाकर, फूलों से सजाकर कपूर, लोवानावाले काड़ी से पूजा करते हैं (धूपबत्ती से पूजा करते हैं)। जमीन पर रखवाए उसका हाथ उठाकर उसमें लगे चावल के दाने निकालकर उसके माथे पर पाँच बार लगाते हैं। यह विश्वास बना है कि यह अक्षत अगर माथे पर रह गया तो वह मादप्पा का प्रिय बेटा है। उसके बाद पाँच सिरेवाले हलदी की जड़ को सोना-चाँदी के टुकड़ों के साथ हलदी पुते एक कपड़े पर लपेटकर उसे काले धागे से बाँधकर पूजा कर सभी लोगों से उसकी पूजा करवाते हैं। सभी के छूकर पुनः कंसाने के बाद उसे वहाँ के पैरदार को दिया जाता है। तब वह यह कहते हैं कि ‘बेटे, अब तक तुम अपने माता-पिता के बेटे रहे। आगे से तुम मादप्पा के बेटे रहोगे।’ इस बालक के गले में रुद्राक्ष की माला पहनाई जाती है। वहाँ पर जमे रिश्तेदार, निकटवर्ती लोग उस बालक के सिर पर अक्षत डालकर ‘अक्षय बनो’ कहकर आशीर्वाद देते हैं। उसके बाद पुरुषकारी उससे कुछ प्रश्न कर उत्तर पाता है, जैसे—

‘तुम किसके बेटे हो?’—‘मैं’ मादेश्वर का बेटा हूँ, जी। ‘ऐसा है तो यह ले मादेश्वर की झोली’, कहते हुए उस बालक के गले में झोली डालकर हाथ नागबेंट देता है। नए गुड्डे अपने साथ लेकर कंसाले लोग भिक्षा माँगने निकलते हैं। घर के दरवाजे पर माता-पिता दरवाजा खोलकर गुड्डा के चरण धोकर पूजा करते हैं, नमस्कार करते हैं, फिर पाँच सेर (माप) चावल, एक गुड़ का बड़ा टुकड़ा उसकी झोली में डालते हैं। आगे भी चार-छह घरों में उपादान करवाते हैं। उपादन के समय यदि झोली भर उपादान नहीं मिल सकता तो अथवा लड़का लौटकर झोली को खूँटे से लटकाता है तो झोली नीचे सरकती है। यह विश्वास बना है कि उसी तरह उसका घर भी नीचे उतर जाएगा।

भिक्षा माँगकर लौटनेवाले बेटे को दरवाजे पर ही खड़ा कर, चरण धोकर, पूजा कर, लाल पानी डालकर सांति (शांति) करने के लिए एक मुरगी लाकर, धोकर पूजाकर, उसका खून लड़के के माथे पर लगाते हैं। उस रक्त को विरुदों के साथ पीढ़े पर रखते हैं।

पुरुषकारी पहले जैसे ही पूजा कर कंकण खोलता है। कंकण को खाना बनानेवाले घड़े में रखे सुपारी के फूलों के साथ घर के कंगूर से कटवाकर धूप जलाते हैं। इसके बाद गुड्डों के बीच वह खाना खाने बैठता है। पीढ़े की पूजा के बाद घर में बना ‘कडुमूल पंचामृत’ (गुजिया, कज्जाय, घी) को सभी के पत्तल पर परोसते हैं। भोजन करने बैठे सभी गुड्डा लोग अपने-अपने झोले से थोड़ा-थोड़ा कज्जाय-घी निकालकर नए गुड्डा के पत्तल पर परोसते हैं। इसे ‘पंति सेवा’ कहते हैं। खाना खाने के बाद सारी भिक्षा को गुड्डा की झोली में पाँच हाथ भर चावल डालकर, पाँच पच्चीस पैसे डालकर उसे ‘अक्षय बनने’ का आशीर्वाद देकर निकलते हैं।

महिलाओं को ‘गुड्डम्मा’ अथवा ‘गुड्मि’ बनाने की परंपरा बहुत कम, मगर अस्तित्व में है। कुछ लोगों का यह मत भी है कि माहवारी होनेवाली महिलाओं को गुडिम बनना नहीं चाहिए। गुडिम मादेव की शिशु पुत्री होने के बाद उसका विवाह नहीं होता, यदि कोई गुडडा उसे पसंद कर जाए तो उसकी सेवा करते इसको समय गुजारना पड़ता है। तीज-त्योहार के समय उसका सम्मान बढ़ जाता है। आजकल गुडिम बनने की परंपरा बहुत घट गई है। मगर रोज ही पुरुषों का, बालकों के गुड्डा बनने का क्रम निरंतर चला आ रहा है।

इस प्रकार गुड्डा बनने के बाद उसे मादेश्वर की कथा सीखनी पड़ती है और उसके आगे से कथावाचन करना उसकी जीवन शैली का एक अंग बन जाता है। सोमवार के दिन उसे कथा सिखाना शुरू किया जाता है। तब उस लड़के को ‘तिम्गड दुडि बडब्राहमण्य्या’ शब्दों का उच्चारण एक साथ करने को कहा जाता है। जब यह गुड्डा बिना रुके सहज रूप से उच्चारण कर देता है तो यह निर्णय लिया जाता है कि इसकी जीभ सहज कथावाचन के अनुकूल है। गुड्डा की आवाज के लिए जहाँ ट्रेनिंग की आवश्यकता महसूस करते हैं, तब एक नया मिट्टी का घड़ा मँगा लेते हैं, उसका सिर उसके मुँह के अंदर डालकर कुछ भी गाना गाने को कहा जाता है। इस तरह एक महीने की टे्रनिंग देने के बाद जब यह बात समझ में आती है कि लड़के का गला कथावाचन के अनुकूल बना है, तब उसे कथा सिखाना शुरू करते हैं। यदि वह अयोग्य साबित हुआ तो उसे बीच में पुनरावृत्ति करने के लिए या ढोल बजाने के लिए रख लेते हैं।

इसके बाद से हर सोमवार-शुक्रवार के दिन शुद्ध होकर भक्ति से पूजा कर कारण्य (भिक्षा माँगने) के लिए निकल पड़ता है और तभी कथावाचन करने के लिए यदि वह अपरिपक्व हो तो ‘बिडोलग’ या ‘कट्टोलग’ करता है। कथावाचन की प्रक्रिया में परिणत हो गया हो तो भक्त जहाँ भी पसंद करें, वहाँ वह वाचन करता है। मनौती कर जनमे इस लड़के को माद्प्पा, मादु, चिक्कमाद्र, द्रोड्ड माद, पुट्ट माद, मद्दु माद, दुंडु मादेव, मादेव, महादेव, मरु देउरु, मादेव स्वामी आदि नाम रखते हैं।

गुड्डा लोगों को गाना सिखाने के लिए तैयार होनेवाले गुरु को सालाना एक बार ‘गुरु मनेहण’ (गुरुजी के घर धन) कहते हुए पाँच धन देने पड़ते हैं। कहीं यह नियम नहीं है कि गुड्डा को शादी-शुदा नहीं होना चाहिए। घर-बार बनाकर ही अपने व्यवसाय को वह आगे बढ़ा सकता है। मगर यह नियम जरूर है कि गुड्डा के घर कम-से-कम एक लड़के का गुड्डा होना जरूरी है। उनका शाकाहारी होना भी जरूरी नहीं। उनका अंत्य संस्कार भी गुड्डा लोग ही करते हैं, उनके शव को अन्य कोई नहीं छू सकता।

गुड्डा लोग सोमवार और शुक्रवार मात्र उपादान के लिए जाते हैं। बाकी दिन जो भी बुलाए, वहाँ चले जाते हैं। गुड्डों के तीज-त्योहारों में से दीवाली और महाशिवरात्रि का विशेष महत्त्व है। तब वे लोग बड़ी भक्ति के साथ भगवान् का कीर्तन कर तृप्त होते हैं। उस समय वे मांसाहार नहीं करते। स्वयं मादेश्वर की पूजा नहीं करते। दूसरों के हाथ करवाते हैं। कंसाले कथावाचन के लिए कम-से-कम तीन गुड्डों का होना जरूरी है। बड़े ‘राण्या’ के लिए चार गुड्डों का होना जरूरी है, जिनमें से दो गुड्डा ‘जम्मदृगि सट्लु’ होय्तारे कहते गाते हैं, दो गुड्डा उनकी पृष्ठभूमि के गायक बनते हैं। एक चिटगि ताली बजाता है तो दूसरा दम्मडि वादन करता है। गुड्डा ‘मले मादेश्वर’ से संबंधित महाकाव्य और धार्मिक, लौकिक, ऐतिहासिक विषयों से संबंधित तीस से अधिक काव्य गाते हैं। मंटेस्वामी की संतान नीलगार भी मादेश्वर महाकाव्य को छोड़कर अन्य सभी काव्यों का गायन करते हैं। इन दोनों पेशेवर गायकों के बीच अंतर यह कि पहलेवाले नीलगार मादेश्वर काव्य के सिवा बाकी सभी काव्यों का वाचन करते हैं। वे मंटेस्वामी का कथावाचन बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं। नीलगार तानपूरे का इस्तेमाल करते हैं, कंसाले कंसाले ताल का इस्तेमाल करते हैं। गायन के तराने उनके अपने वाद्यों के अनुकूल हुआ करता है। नीलगार कंसाले में और कंसाले नीलागार में भी परिवर्तित हो सकते हैं।

देवरगुड्डों ने अपनी प्रतिभा के बल पर कई लोककाव्यों की रचना की है, जिनमें उनके धर्मगुरु मादेश्वर को लेकर रचा गया काव्य ही प्रधान है। इसे ‘मले मादेश्वर’ महाकाव्य कहा जाता है। १९७३ में पहली बार १५ कथा भागोंवाला मले मादेश्वर महाकाव्य प्रकाशित हुआ। इसके बाद से लोक महाकाव्यों की तलाश विद्वत् समाज द्वारा विशेष रुचि के साथ शुरू हुई तो कई आश्चर्यजनक विवरण सामने आए।

देवरगुड्डों का धार्मिक महाकाव्य ‘मले मादेश्वर काव्य’ है तो नीलगारों का महाकाव्य ‘मंटेस्वामी काव्य’ रहा।

देवरगुड्डोंवाले मले मादेश्वर महाकाव्य में यद्यपि पंद्रह कथा भाग हैं, कोई भी कथावाचक इस पूरे महाकाव्य का पूरी तरह अकेले वाचन नहीं करता। साधारणतया मादप्पा के जन्म-पालनवाली पंक्तियाँ, मंदिर बनवाकर सिवय्यावाली (शिवजी-दलितों की भाषा में सिवय्या) पंक्ति, संकम्मा की पंक्ति, श्रवण राजा की पंक्ति, नीमवाली कालम्मा की पंक्ति को लेकर गाते हैं। कुछ गायकों को जन्म-पालनवाली पंक्ति में कुंडूर मठ का कथाभाग और संकम्मा काव्य के कथाभागों को छोड़कर बाकी कथा भागों का गायन नहीं आता।

‘मले मादेश्वर महाकाव्य’ में ‘ब्रह्मांड सृष्टि’ वाला भाग अद्भुत ढंग से वर्णित है। मादेश्वर काव्य का आदिशक्ति कउट्लु माँ और संतान की संबंध आदिम संस्कृति के अवशेष सा है। दायाँ-बायाँ हाथवालों के जन्म का कवट्लु जाति पुराण है। श्रवणय्या को वर दिए जाने का कवट्लु में भगवानों से अपने साथ अन्याय बरता गया है। इस अन्याय के प्रतिरोध में देवताओं को बंधन में लेने की पुकार है। ये तीन कथाभाग महाकाव्य के सतही भाग के हैं। ‘मादेव भूमि बंद कनट्लु’ में मादप्पा बनकर सात पहाड़ों पर बसने के कवट्लु हैं।

‘लव कुशर काकग’ शेष रामायण जैसा ही है। इसमें लोक काव्य के सॉनेट भरे पड़े हैं। कनकपुर के आस-पास रहनेवाले देवरगुड्डों के बीच मान उपलब्ध होनेवाला ‘नीलवेणी’ काव्य के अंदर एक रमानेवाली कथा है। अध्यापक के कुंतल का शिकार बनकर नीलवेणी जंगल में फँस जाती है। उसका भाग्य अच्छा होता है, जिससे वह एक राजकुमार की पत्नी बनती है। वहाँ पर भी एक मंत्री कुमार की दुष्टता के कारण उसे कई तरह की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। एक आश्रयदाता के मिलने के बावजूद वह एक चोर के हाथ फँस जाती है। बहुत कुशलता से वहाँ से छूटकर एक राजकुमार से शादी कर लेती है।

‘गिराजम्मन कथे’ और ‘पिरियापवृणद् काकग’ (लड़ाई) भी देवरगुड्डों द्वारा रचित काव्य हैं। उन्हीं लोगों द्वारा रचित ‘मैदु रामण्णा’ भी इस लोगों के बीच प्रचलित है। देवरगुड्डों द्वारा रचित सभी काव्य प्रकाशित नहीं हैं।

नं. २, एन.एच.सी.एस. लेआउट

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