उत्तर-पूर्व की यात्रा

उत्तर-पूर्व की यात्रा

सुनता रहा हूँ कि भारत में जो चार धाम की यात्रा कर लेता है, उसका जीवन सफल हो जाता है। धार्मिक महत्त्व के चार धामों की तर्ज पर शुरू में मेरे स्वनिर्णीत लेखकीय चार धाम थे—मुंबई, दिल्ली, चैन्नई और कोलकाता। चालीस की उम्र तक आते मैंने इन महानगरों की यात्रा येन-केन (ऑफिशियल/व्यक्तिगत) कर ली थी और अपनी संवेदनात्मक साहित्यिकता को धन्य मान बैठा था कि अनुभवों के भौगोलिक स्तर पर मैंने पूर्णता का दायित्व पूरा कर लिया है। अब पच्चीस साल बाद महसूस हुआ कि यह अदूरदर्शितापूर्ण भ्रम था। इस बीच अमरीका, यूरोप और एशिया भी हो आया, पर जब पूर्व में कोलकाता से आगे बँगलादेश पार करके पूर्वोत्तर राज्यों में जाना हुआ तो लगा, परंपरागत धाम (जगन्नाथ पुरी जैसे) से आगे चारों ओर ग्रेटर धाम भी हैं। यथा दिल्ली से आगे उत्तर में बदरीनाथ, कश्मीर, हिमाचल; पश्चिम में सोमनाथ, द्वारका, बाघा बॉर्डर; दक्षिण में कन्याकुमारी, कोचीन, त्रिवेंद्रम और पूर्व में पूर्वोत्तर राज्य एक तरह से ग्रेटर धाम कहे जा सकते हैं, जो चहुँ ओर देश की सीमाओं को छूने के बाद अब पूरे हुए से लगते हैं।

१०-१७ जनवरी, २०१६ को नॉर्थ ईस्ट में था। पहली बार जाने का रोमांच निमित्त प्रोफेशनल था। साउथ एशियाई गेम्स के स्टेडियमों का एनर्जी ऑडिट—गोहाटी, शिलांग और अगरतला में। विद्युत्-ऊर्जा (व्यावसायिक) के समांतर, शब्द-ऊर्जा (साहित्यिक रुचिपरक) सदैव मेरे जेहन में जीवंत रहती है, सो अवकाश मिलते ही चेरापूँजी, कामाख्या मंदिर और बँगलादेश बॉर्डर की यात्रा भी कर डाली।

सात बहनों (सेवन सिस्टर्स) कहे जानेवाले पूर्वोत्तर के सात राज्य हैं—असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर। इनमें से तीन बहनों (असम, मेघालय और त्रिपुरा) से मिलने का अवसर इस यात्रा में मिला।

बहन नंबर-१ (असम)

गुवाहाटी विमान तल से निकलकर सीधे शिलांग (मेघालय) जाना था। यद्यपि मुख्यतः दक्षिण एशियाई खेल ५ फरवरी से गुवाहाटी में ही आयोजित होने हैं, पर हमारा कार्यक्षेत्र शिलांग था, जहाँ  तीन स्टेडियमों में गेम्स की ७ प्रतियोगिताएँ होनी थीं। गुवाहाटी शहर में प्रवेश करते ही एक सफेद आकर्षक स्मारक की ओर ध्यान गया। ड्राइवर ने बताया यह भूपेन हजारिका का समाधि स्थल है। सुनते ही चेतना में ‘गंगा आए कहाँ से, गंगा जाए कहाँ रे’ और ‘धूम-धूम...’ जैसी धुनें गूँजने लगीं।

गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर के बारे में बहुत सुना था। जब हिमाचल में नैना देवी मंदिर देखने गए थे तो एक साथी ने जानकारी दी थी कि पौराणिक कथा के अनुसार जब शोक संतप्त क्रोधित भगवान् शिव पिता यक्ष द्वारा अपमानित होने के कारण सती हुई उमा का शव कंधे पर रखकर ब्रह्मांड में तांडव करते हुए भटक रहे थे, तब शांति हेतु भगवान् विष्णु के चक्र से शव के जो १०८ टुकड़े हुए थे, उनमें से यहाँ सती उमा के नैन गिरे थे। कहा जाता है, नीलांचल पर्वत स्थित गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में योनि और गर्भाशय अंग गिरे थे, इसलिए काम-क्रिया की दृष्टि से यह स्थान स्त्रियों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। चूँकि फिलहाल समय नहीं था, सो सोचा कि लौटते हुए इस मंदिर को अवश्य कवर करेंगे।

जैसा सोचा था, आज शिलांग (मेघालय) से गुवाहाटी लौटते हुए कामाख्या मंदिर देखने का संयोग बन ही गया। गुवाहाटी से अगरतला (त्रिपुरा) की फ्लाइट दोपहर दो बजे थी। शिलांग से हम सुबह छह बजे निकल गए, ताकि फ्लाइट पकड़ने से पहले दो-ढाई घंटे मंदिर में भी बिता सकें। ड्राइवर ने पहले ही बता दिया था कि मंदिर में अंदर दर्शन हो पाना मुश्किल है, क्योंकि वहाँ सुबह छह बजे से ही पूजा करनेवाले भक्तों की लाइन लग जाती है और नंबर आने में तीन-चार घंटे लग ही जाते हैं। पूजा की बजाय मात्र दर्शन की इच्छा थी, सो हम पहुँच ही गए दस बजे तक, लगभग डेढ़ घंटे थे हमारे पास। लाइन देखकर अंदर प्रवेश का इरादा छोड़ दिया, पर चारों ओर घूमने में कोई बाधा नहीं थी। एक कोण से अंदर की झलक भी मिल रही थी।

दक्षिण की यात्रा के समय प्रख्यात तिरुपति मंदिर में भी यही स्थिति थी। इसमें कोई शक नहीं कि श्रद्धालुओं की अपार भीड़ ही स्थल को महत्त्वपूर्ण बनाती है, उससे ज्यादा किस धार्मिक स्थान के दर्शन से मनोकामना पूर्ण होगी, यह प्रवृत्ति प्रेरक होती है, यहीं मेरा अपने आप से मतभेद था। मनोकामना-पूर्ति से ज्यादा उत्सुकता मेरे मन में ऐसे स्थलों से जुड़ी दंतकथाओं को जानने में रहती है, यहाँ भी थी। आस-पास की प्राकृतिक छटा का आकर्षण बेशक अनुपम था ही, उसको महसूस करने के लिए किसी लाइन में लगने की आवश्यकता नहीं थी। मंदिर के कार्यकर्ताओं सहित पूजा-सामग्री लिये हुए कुछ भक्तजनों से भी चर्चा करके जानकारी चाही तो उन्होंने न केवल अरुचि, वरन् अनभिज्ञता भी दरशाई। उनका सारा ध्यान पूजा विधि, सामग्री और मध्यस्थ बने कारोबारी पंडितों के कर्मकांडी निर्देशों का पालन करने पर केंद्रित था। इतना जरूर समझ आया कि हर परिवार अपनी महिलाओं को पूजा में आगे कर रहा था।

एक दिन पहले ही इंटरनेट से मंदिर के बारे में जो जानकारी ली थी, उसकी पुष्टि करना चाहता था, सो मंदिर की व्यवस्था के लिए सूचना केंद्र पर तैनात उद्घोषिका से ही बातचीत शुरू की; पर निराशा ही हुई, क्योंकि उसे सिर्फ अपने काम से सरोकार था। यानी लिखकर दी गई सूचनाओं की घोषणा करना। मंदिर के बारे में अतीत और दंतकथाओं से कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी मैंने उसे उकेलने के लिए पूछ ही लिया—‘‘मंदिर के परिसर में कबूतरों के बीच इतने बकरे क्यों घूम रहे हैं?’’

‘‘कई भक्त इन्हें यहाँ दान-स्वरूप छोड़ जाते हैं, जिनकी मनोकामना पूरी हो जाती है, वे...’’

‘‘इनकी बलि भी होती है क्या?’’

‘‘वह अलग बात है, त्योहार पर बलि तो होती है, पर मनोकामना पूरी होने पर दान दिए गए बकरों का लालन-पोषण यहीं होता है, इन कबूतरों के साथ ही।’’ वह बोली, पर प्रकट था कि मेरे अवांछित प्रश्नों से वह खिन्न हो रही थी। इस मंदिर के बारे में मुझे कहीं पढ़ा हुआ याद आ रहा था कि यह मंत्र-तंत्र की देवी का भी मंदिर है। कहते हैं, साधक स्त्रियाँ जिस पुरुष को पसंद करती थीं, उन्हें मंत्र-तंत्र से दिन में बकरा बनाकर अपने पास रख लेतीं और रात्रि में पुरुष बनाकर उनके साथ अभिसार करती थीं। काली देवी के अन्य सात अवतारों (धूमवती, मातंगी, बगोला, तारा, कमला, भैरवी, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी और त्रिपुरा सुंदरी) का भी यहाँ वास माना जाता है। कहते हैं, शाप के कारण कामदेव जब अपना पुरुषत्व खो चुके थे, तो उससे मुक्ति उन्हें यहीं प्राप्त हुई थी, इसलिए इसे प्रेम की देवी का मंदिर भी कहा जाता है। मान्यता है कि नीलांचल पर्वत के इसी स्थान पर शिव-पार्वती ने काम-क्रीड़ा की थी।

कामाख्या देवी को ब्लीडिंग गॉडेस (रक्तिम देवी) के नाम से भी जाना जाता है। आषाढ़ (जून) माह में तीन दिनों के लिए मंदिर बंद रखा जाता है, क्योंकि वे तीन दिन देवी के मासिक धर्म के रक्तस्राव के दिन माने जाते हैं। कहते हैं, उन दिनों में पास से बहनेवाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है। उस जल को पवित्र मानते हुए भक्तगण उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

बहन नंबर-२ (मेघालय)

शिलांग के स्टेडियमों में साथ आए अपने साथियों (सचिन और अजीत) के साथ प्रकाश के स्तर (लक्स लेवल) का आकलन करते हुए बारंबार मन में अपने पाँचवें प्रौद्योगिक आध्यात्मिकता वाले उपन्यास ‘टावर ऑन द टेरेस’ का स्मरण आ रहा था।

शिलांग शहर का केंद्र है पुलिस बाजार। जिस होटल में जगह मिली, वहाँ कमरे में हीटिंग नहीं थी और तापमान काफी कम। रह-रहकर सन् १९८५ के इंग्लैंड प्रवास की याद आ रही है। वहाँ भी ऐसी  ही सर्दी और ढलानवाली सड़कें थीं। कुछ-कुछ शिमला सा भी लग रहा था। संयोग से मैंने वही जैकेट पहनी हुई थी, जो तब इंग्लैंड में उतरते ही खरीदी थी और जिसने सर्दी के समंदर में डूबने से बचाव हेतु मेरे लिए लाइफ बोट का काम किया था। इतना अंदाज तो था कि हिल स्टेशन और जनवरी का माह होने के कारण शिलांग में ठंड होगी, लेकिन इंग्लैंड की तुलना में भयावह अंतर यह था कि वहाँ कमरे में हीटिंग थी, यहाँ नहीं है। बाहर खुले से अंदर कमरे में आने के बाद भी राहत नहीं मिलती थी, गरम कपड़े पहनकर हुए कंबल लपेटे रहने पर ही थोड़ा सामान्य लग पा रहा था, जो असुविधाजनक था। इसी कारण जब कोई स्थानीय व्यक्ति यह पूछता कि आपको हमारा शिलांग कैसा लगा तो अनायास मेरे मुँह से निकल जाता ‘बिल्कुल इंग्लैंड जैसा।’ ‘सुंदर लोगों का सुंदर देश, तभी तो इसे इंडिया का स्विट्जरलैंड कहते हैं।’ उधर से जवाब मिलता।

स्टेडियमों में लाइट जलाकर प्रकाश के स्तर को मापते हुए एकाएक खयाल आया, ऐसा ही होता है जीवन में। जब स्रोतों से आनेवाली आय या सुरक्षा कम हो तो कितना अधूरा-अधूरा लगता है और इसी चिंता में डूबा रहता कि कैसे लाइट्स की संख्या की तरह तमाम स्रोतों की संख्या अथवा क्षमता और भी बढ़ाई जाए? उन छोटी सुंदर बच्चियों ने भी ध्यान खींचा, जो मेघालय की परंपरागत पोशाक और मुसकान धारण किए हुए निर्माणाधीन स्टेडियमों में थैला लिये, न केवल पान और कच्ची सुपारी बेच रही थीं, बल्कि स्वयं खाती हुई, रचे होठों की दीप्त लालिमा (अज्ञात वाटेज की) भी बिखेर रही थीं।

दो दिनों लगातार विद्युत् ऊर्जा के व्यावसायिक कामकाज के पश्चात् आज थोड़ा अवकाश मिला तो निकल पड़े चेरापूँजी की तरफ। पहला पड़ाव था एलिफेंट फॉल, जो सदियों पुराना है। मेघालय के ‘खासी’ लोग इसे ‘फिशोलाई पेटेन खडव्यू’ (अर्थात् तीन चरणोंवाला झरना) कहते थे, पर आधुनिक सभ्यता की जानकारी में आया अंग्रेजों की खोज से। तीन चरणों में ढलता हुआ यह प्रपात प्रकृति की कारीगरी का अद्भुत नमूना है। अंग्रेजों ने इसका नामकरण एलिफेंट प्रपात इसलिए किया था, क्योंकि इसके बाईं ओर की चट्टान हाथी के आकार की थी। वह चट्टान १८९७ में आए भूकंप में ढह गई, पर उसके अवशेष टुकडे़-टुकडे़ होकर चट्टानों के रूप में बिखरे पड़े हैं, यानी अब वहाँ हाथी तो नहीं दिखता, सिर्फ उसका नाम है। तीसरे चरण तक पहुँचने के लिए काफी गहराई तक नीचे उतरना था, मैं बीच में रुक गया, क्योंकि उतरना आसान था, पर फिर वापस आने के लिए चढ़ पाना मेरी कमर के लिए बेहद दुरूह! तब फाल से जीवन हेतु यह सीख लेकर तसल्ली कर ली की फॉल, यानी गिरना तो आसान है, पर ऊपर चढ़ना उतना ही मुश्किल। आस-पास तथा रास्ते में मिले जंगल में एक संभ्रांत शालीनता का आभास हो रहा था। मानो साफ-सुथरे पेड़ अदब और अनुशासन से जीवन जी रहे थे। पत्तों के बिखरने में भी नजाकत देखी जा सकती थी। कहीं कोई गंदगी या ऊबड़-खाबड़ जमीन नजर नहीं आ रही थी, मानो देश में चल रहे स्वच्छता अभियान का यहाँ जंगल में पूर्ण रूप से अनुकरण हो रहा हो।

सचिन ने टिप्पणी की—‘‘यहाँ जंगल में जो ज्यादातर पेड़ हैं, उनकी पत्तियाँ छोटो-छोटी हैं, इसलिए जल्दी मिटटी में घुल जाती हैं फिर बरसात भी ज्यादा होने से उनके गलने और बहने में आसानी रहती है, जबकि नॉर्थ में पेड़ों की पत्तियाँ बड़ी साइज की होती हैं, उनका ढेर लग जाता है। गलने में समय भी ज्यादा लगता है।’’

‘‘मुझे लगता है, यहाँ जंगल में भी मैनेजमेंट का वही आई.एस.ओ. १२००१ सिस्टम फॉलो किया जाता है, जो हमारे प्लांट्स में होता है, तभी सबकुछ कितना नीट और क्लीन है।’’ मैंने चुटकी ली।

‘‘वह देखो, टी गार्डन्स!’’ अजीत चाय बागान की झाडि़यों को शायद पहली बार देख रहा था।

रास्ते में ‘धुवानसिंग पॉइंट’ पर रुकना हुआ। दो पहाडि़यों को जोड़ते, घाटी के बीच केबल्स खिंचे हुए थे। पता लगा कि यहाँ एडवेंचर्स स्पोर्ट्स ‘जिप लाइनिंग’ होता है। केबल्स का स्लोप ऐसा है कि ट्रॉली में लटके लोग ग्रेविटी से झूलते हुए घाटी को इधर-से-उधर और उधर-से-इधर पार कर जाते हैं। वाकई दुस्साहस का काम था। अपनी शारीरिक सीमाओं का आदर करते हुए मैं पीछे हट गया, पर सचिन ने स्पोर्ट्स का आनंद लिया, अजीत ने वीडियोग्राफी की और मैं एक मूक दर्शक की तरह लाइव शो देखकर आनंद लेता रहा।

चिकनी सपाट दीवार जैसी हरी-भरी पहाडि़याँ देखकर मेरे मन में विचार आ रहे थे कि प्रकृति कितनी उम्दा कलाकार है। इन पहाडि़यों के कैनवास पर बौछारों की कूची/छैनी से उसने साफ-सुथरे लैंडस्केप बनाए हुए हैं। आर्ट गैलरी सा लग रहा था वातावरण, जैसे यहाँ पर्यावरण प्रतिदिन स्नान करके नियमपूर्वक धर्म ध्यान करता है, पहाडि़यों पर रोज बौछारों की फूल बुहारी झाड़ू लगाने के बाद हवा अपने आँचल से पौंछा करती होगी। चेरापूँजी (सोहरा) की तरफ जाते हुए ऐसा लगा कि किसी मल्टी स्टोरी इमारत की उपरी मंजिलों पर क्रमशः चढ़ते हुए टेरेस की ओर बढ़ रहे हैं। सचमुच जैसे बादलों के डेरे (मेघालय) में पहुँच गए हों। यह दुनिया का सर्वाधिक बारिशवाला क्षेत्र है, फिलहाल बारिश नहीं हो रही थी, हलकी धूप थी, स्वच्छ नहाई-धोई और चप्पा-चप्पा गवाही दे रहा था कि यहाँ का कण-कण भरपूर बारिश से संपन्न है।

निस्संदेह बारिश का पानी बेहद कलात्मक ढंग से बहता हुआ ढलान उतरता होगा, तभी तो सर्वत्र उसके चरण-चिह्नों की सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है। कालचक्र और कलाचक्र के समन्वय का अद्भुत नमूना! और पहुँच ही गए दुनिया की छत पर, यानी चेरापूँजी, जिसे सोहरा भी कहते हैं शायद। इक्का-दुक्का मकान, वह भी अत्यधिक बारिश के कारण मैलापन लिये हुए। लगा, आबादी कम है, सरकारी पोस्टिंगवाले लोग ही रह रहे होंगे। अर्थ-साइंस विभाग का विशाल ग्लोब देखकर जयंत विष्णु नार्लीकर की विज्ञान कथाएँ याद आ गईं। चारों ओर भीगी हुई रहस्यमय चुप्पी फुसफुसा रही थी। एकाएक आस-पास की पहाडि़यों पर कब्रों की कतारें उभरने लगीं। कुछ जर्जर-जीर्ण छोटी-छोटी और कुछ एकदम चमक-दमकवाली विशाल वास्तु की दृष्टि से संभवतः इस स्थान को आदिकाल से महत्त्वपूर्ण माना जाता रहा है, तभी तो यहाँ जीवित व्यक्तियों की तुलना में मुरदों का ज्यादा बोलबाला है। दुनिया की छत पर परम शांति से सो रहे मृतकों की कॉलोनी। सहसा लगा, किसी भूतही जगह पर आ गए हैं—रूहानी सन्नाटे से सराबोर। यह स्थान बादलों का तीर्थ लगा, जहाँ समुद्र से जल लाकर मेघ शिखरों पर चढ़ाते हैं।

‘इको पार्क’ में थोड़ी देर विश्राम किया और दुनिया की छत पर होने का गौरव महसूस किया। इको पार्क को यहाँ का टेरेस गार्डन कहा जा सकता है। अपनी छत से पड़ोसी का मकान देखने का जो रोमांच होता है, वह अवसर तब आया, जब आगे जाकर नीचे घाटी में बसे पड़ोसी बँगलादेश को भौगोलिक तौर पर देखा। ‘मास्मआ गुफा’ प्रकृति की एक अनन्य कलाकृति है। १५० मीटर लंबी, नाल के आकार की गुफा। एक छोर से घुसो और लगभग आधे घंटे बाद दूसरे छोर से बाहर निकलो, क्योंकि बीच में एकदम सँकरा रास्ता, जिसमें केवल एक व्यक्ति ही जोड़-तोड़ करके पार हो सके। दर्शनार्थियों की भीड़ के कारण पहली ही बाधा से मैं हिम्मत हारकर लौट आया। रास्ते में नजर उन पहाडि़यों पर भी गई, जहाँ कटाई का छुटपुट काम चल रहा था, निश्चित ही उपयोगी खनिज का खनन हो रहा होगा। पहाड़ की दीवार पर लगभग हर जगह एक गुफा सी बना ली गई थी, ताकि वीराने में बारिश आने पर मजदूरों को आड़ मिल सके। लगा, यहाँ ग्राउंड स्तर पर ही प्राकृतिक एवं मानवीय तौर पर गुफा संस्कृति का बोलबाला है।

बहन नंबर-३ (त्रिपुरा)

संयोग है कि गुवाहाटी से अगरतला की फ्लाइट में पढ़ने के लिए मैंने अपने बैग से ज्ञनोदय का जो नया अंक निकाला, उसमें राजेंद्र उपाध्याय की कविताएँ थीं—‘अगरतला स्टेशन’, ‘अगरतला में बांग्लादेशी छतरी’, ‘धूप में चमकती पटरियाँ’ और ‘धूप को आने दो’। अपने गंतव्य पर केंद्रित साहित्यिक सामग्री अकस्मात् पाकर रोमांचित होना स्वाभाविक था। बड़े चाव से कविताएँ पढ़ गया। अगरतला पहुँचकर उसके बिंबों का मर्म भी साक्षात् महसूस कर पाया।

रेल संपर्क के धरातल पर यह क्षेत्र सचमुच दयनीय स्थिति में है। दिल्ली वाकई दूर है। यहाँ तक कि भारतीय सीमा में चलते-चलते कोलकाता पहुँचने में ही चौबीस घंटे लग जाते हैं, बँगलादेश को सीधे-सीधे लाँघकर कोलकाता जल्दी पहुँचा जा सकता है, लेकिन उस यात्रा की वीजा संबंधी औपचारिकताओं का अलग ही झंझट है। कुल मिलाकर वहाँ रह रहे अन्य क्षेत्रों के लोगों की लाचारी सहानुभूति के योग्य लगी। राजेंद्र ने अपनी कविताओं में इन्हीं संवेदनाओं को सूक्ष्मता से सहेजा है, जिनसे कुछ हद तक मैं रूबरू हो सका। अगरतला से लगभग चालीस किलोमीटर चलकर रोकिया पहुँचे गैस पावर प्लांट के गेस्ट हाउस में सैटल होते ही राजेंद्र उपाध्याय को दिल्ली फोन लगाया और कविताओं के लिए बधाई दी एवं बताया कि मैंने न केवल कविताओं को पढ़ा है, बल्कि उनकी जन्मस्थली पर साक्षात् बिंबों को देख रहा हूँ। राजेंद्र ने बताया, वह पिछले दिनों केंद्रीय विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर दो हफ्ते अगरतला में था और ये कविताएँ उसी प्रवास का परिणाम हैं। उसने सलाह दी कि वहाँ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में जय कौशल हैं, हो सके तो जरूर मिलना। रविंद्रनाथ टैगोर का मकान भी देखना, बँगलादेश का खास बाजार भी है वहाँ बॉर्डर...महल वगैरह-वगैरह। समय-सीमा की विवशता के कारण सभी  सुझावों पर अमल न कर सका, बॉर्डर जरूर गए और अगरतला रोकिया के रास्ते में आनेवाले केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर के बाहर से ही दो-तीन बार दर्शन किए।

एक दिन के लिए बारामूला के गैस प्लांट में भी जाना था। जब गए तो इस बार रास्ते में किनारे की उन पहाडि़यों को जरा इतमीनान से देख पाए, जिन पर केले के झाड़ जंगलों की तरह फैले थे। अन्य फलदार वृक्षों और बाँस आदि की भरमार भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। वाह! जमीन के ऊपर इतनी प्राकृतिक संपदा और जमीन के नीचे छिपा उससे भी ज्यादा कीमती गुप्त धन, यानी प्राकृतिक गैस तेल के कुएँ और उनसे निकलती नैचुरल गैस। साथ के स्थानीय इंजीनियर श्री विक्टर ने बताया—‘‘त्रिपुरा तो तेल के ऊपर तैरने वाला प्रदेश है।’’

दोपहर में बारामूला से लौटकर हमने सीधे रुख किया बॉक्स नगर की ओर, यानी बँगलादेश सीमा की तरफ। चेरापूँजी में बँगलादेश को दूर से देखा था—मानो पहाड़ की बालकनी से घाटी का स्क्रीन देख रहे हों। यहाँ तारोंवाली फेंस के किनारे-किनारे चलते हुए ऐसा लग रहा था, जैसे एक खेत को बाँटनेवाली मेंड़ पर चल रहे हों। दोनों तरफ की झोंपडि़यों के वासी फेंस के आर-पार खड़े-खड़े आपस में यों बातें कर रहे थे, जैसे एक कॉलोनी के दो पड़ोसी अपनी अपनी छतों पर खड़े हुए वार्त्ता करते हैं। बताया गया—यहाँ दोनों तरफ कई लोग ऐसे हैं, जिनके खेत दूसरी तरफ भी हैं और उनका आना-जाना लगा रहता है। सीमाओं की विडंबना और उसकी कटुता का आभास तब हुआ, जब सीमा के किनारे चलते हुए एक गाँव में हमने देखा कि बी.एस.एफ. के चार जवान बंदूक ताने एक अधनंगे लुँगीधारी आदमी को घेरकर खड़े हैं। बताया गया, यह बँगलादेश से यहाँ घुस आया होगा, जवानों ने दबोच लिया। एक बूढ़ी औरत बार-बार उस दुबके हुए आदमी के पास पहुँचने की कोशिश कर रही थी, पर जवान उसे परे धकेल रहे थे। दृश्य मार्मिक था और संवेदनात्मक सोच को कई आयामों की तरफ प्रेरित कर रहा था। मेरा ध्यान सीमा पर तारों की फेंस के नीचे जगह-जगह बनी पुलियों की ओर भी जा रहा था, जिनमें सीमेंट के मोटे-मोटे ह्यूम पाइप दोनों देशों को आर-पार जोड़ रहे थे। ऊँचाई पर होने के कारण भारतभूमि पर बरसनेवाला बरसात का पानी पाइप से बहकर दूसरी ओर बँगलादेश में जा सकता है, बिना रोकटोक, बगैर किसी वीजा या पासपोर्ट के।

फेंस के किनारे-किनारे ड्राइव करते हुए उस पार के खेतों, घरों और लोगों का हम स्वच्छंदतापूर्वक जायजा ले रहे थे कि एकाएक सामने आकर बी.एस.एफ. के एक जवान ने हमारी गाड़ी रुकवाई और पूछताछ करने लगा। हमने जब बताया कि हम लोग दिल्ली से हैं और बॉर्डर घूमने आए हैं तो उसने मेरे आईकार्ड की माँग की। पहचान-पत्र की कड़ी जाँच के पश्चात् उसने बताया, इस रोड पर निजी वाहनों को चलने की इजाजत नहीं है, आप लोग आगे आनेवाले मोड़ से दाईं ओर गाँव की तरफ चले जाएँ। हमने वैसा ही किया और जिस गाँव में पहुँचे, वह मुसलिम बस्ती थी। बड़ी सी मसजिद भी दिख रही थी। वहीं मिला दसवीं सदी के बौद्ध स्तूपों का एक पुरातन स्थल। एक तरफ मसजिद और दूसरी तरफ बौद्ध पूजास्थलों के भग्नावशेष। विशाल सीढि़यों एवं कक्षों के खँडहर नालंदा की याद दिला रहे थे। यानी पंद्रह सौ वर्ष पहले उस वक्त अखंड भारत में बौद्ध प्रचारक यहाँ भी आए थे। अब यह क्षेत्र दो देशों और संप्रदायों के बीच बँटकर कितना संवेदनशील हो गया है।

यद्यपि इस यात्रा में पूर्वोत्तर की सात में से सिर्फ तीन बहनों से ही मिल पाया, किंतु जो अनुभव हुए, उनसे उनके परिवार के अंतरंग समीकरणों का संपूर्ण अनुमान लगाया जा सकता है और फिर मेरी यह व्यक्तिगत अन्यतम उपलब्धि तो है ही कि पूर्व में देश की सीमा को छूकर मैंने अपने चार ग्रेटर धाम भी पूरे कर लिये।

४० करिश्मा अपार्टमेंट्स

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