हे भगवान्, हर साल नोटबंदी होती रहे

हे भगवान्, हर साल नोटबंदी होती रहे

उस परिवार में विमुद्रीकरण ने उन कहावतों को साकार कर दिया कि ‘बेटा नंबरी, तो बाप दस नंबरी।’ अथवा चोर का माल चंडाल खाए, मूँजी हाथ मलता रह जाए।’ या ‘पुत्र, पिता न भैया, सबसे बड़ा रुपैया।’

नोटबंदी से पहले कमाऊ विभागवाले पुत्र से पिता ने दो-चार बार कहा था, ‘‘बेटे, इन दिनों मैं आर्थिक तंगी से जूझ रहा हूँ, तेरे पास तो पैसे की अच्छी आवक है, मेरी थोड़ी मदद कर दे।’’

बेटा हर बार उत्तर देता, ‘‘मेरे पास पैसा बचता ही कहाँ है, जो मैं आप की मदद कर सकूँ। इस हाथ से कमाता हूँ, उस हाथ से चला जाता है। जब इकट्ठा हो जाएगा, तब मदद कर दूँगा।’’

ऐसा करते-करते कई वर्ष निकल गए। पिता ने पूरी तरह आशा छोड़ दी कि बेटा कभी कोई सहायता करेगा। अब उसने कुछ भी कहना बंद कर दिया। बेटा धीरे-धीरे धनी होता जा रहा था। उसने धन तो भरपूर कमाया, किंतु इतना रसवत (रिश्वत) का पैसा बैंक में जमा करने में आयकर विभाग की काररवाई का खतरा था, इसीलिए काला धन एक थैले में भरकर घर में छुपाकर रख लिया। इसी बीच विमुद्रीकरण का प्रेत आ धमका। अब उस काली कमाई को कहाँ रखे? देश के क्रूर शासक पर क्रोध व्यक्त करते हुए बड़बड़ा रहा था, ‘किस पर भरोसा किया जाए? जिसके पास अभी पैसा रख देगा, बाद में जब जरूरत होगी, तब वापस मिलेगा या नहीं?’ बहुत विचार-मंथन के बाद सोचा, ‘बाप कैसा भी हो, हितचिंतक ही होता है। सोचा, ‘पिता के बैंक खाते में राशि डाल दूँ। पिताजी वरिष्ठ नागरिक हैं, वर्षों पूर्व रिटायर्ड हुए हैं, इनके पास काले धन होने की कोई शंका भी न करेगा।’ अतः बेटे ने पिताजी से निवेदन किया, ‘‘पिताजी, आपको पैसे की जरूरत थी, दे दूँ? खाते में बड़ी राशि डाल दूँगा।’’

‘‘फिर उस राशि का मैं उपयोग कर लूँ?’’ पिता ने पूछा।

‘‘किंतु कुछ दिनों बाद वह राशि आपसे ले लूँगा।’’

पिता ने मन-ही-मन आकलन कर लिया, ‘अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे।’

बाप भी कम घुटा हुआ नहीं था, उड़ती चिडि़या को पहचान लेता था। समझ गया कि आखिर बेटा इस बार पिता के प्रति इतनी उदारता क्यों दिखा रहा है? उत्तर दिया, ‘‘मैं तुझसे क्यों माँगूँ? माँगते-माँगते थक गया, तूने तब तो एक छदाम नहीं दी। मेरे किस काम की वह राशि, अब जहाँ फेंकना हो, उसे फेंक आ।’’

विमुद्रीकरण के कारण बेटे की पिता के लिए मुद्रा बदल चुकी थी। उसने अतिरिक्त नम्रता दिखाते हुए पिता से कहा, ‘‘आपकी सेवा करना मेरा दायित्व है। यह राशि आपके खाते में डालता हूँ।’’

पिता मौन रहा।

इस तरह बेटे ने जितनी कही थी, उससे भी अधिक राशि पिता के खाते में डाल दी। बेटा विमुद्रीकरण के पूर्व भले ही ‘चमड़ी जाए, पर दमड़ी न जाए’ में विश्वास करता था, किंतु विमुद्रीकरण होते ही दानवीर कर्ण हो गया। दोनों हाथों से लुटाने को बेटा तत्पर। नोटबंदी की रट में खैरात लगी बँटने। कई दिनों तक प्रतिदिन बेटा पिता के खाते में अच्छी राशि जमा कराता रहा।

उधर पिता जान-बूझकर अनदेखी करता रहा। जब विमुद्रीकरण का भूत चला गया, सबकुछ सामान्य सा होने लगा तो एक दिन बेटे ने पिता से निवेदन किया, ‘‘अब मैं आपके खाते से वह राशि निकाल लूँ, जो मैंने विमुद्रीकरण के दिनों में जमा कराई थी?’’

‘‘देख बेटा, जब भगवान् देता है तो छप्पर फाड़कर देता है, विमुद्रीकरण के कारण मैं तो मालामाल हो गया और तू कंगाल। यदि नोटबंदी न होती तो मुझे भी तू क्यों देता? मैं तो भगवान् से प्रार्थना करता हूँ कि हर साल एक बार इसी तरह नोटबंदी हो जाया करे।’’

वस्तुतः बेटा नंबरी था तो बाप भी दस नंबरी। उसने उत्तर दिया, ‘‘जैसे पैसा जमा कराया था, वैसे ही निकाल ले।’’

‘‘लेकिन आपके हस्ताक्षर से अब पैसा निकलेगा।’’ बेटा बोला।

‘‘बुढ़ापे में हस्ताक्षर बदल जाते हैं, मेरा पैसा ही नहीं निकल पा रहा है, तो तेरा कैसे निकालूँ?’’

‘‘लेकिन मुझे तो अब जरूरत है, मुझे रुपए चाहिए।’’

‘‘कौन, कैसे रुपए? अरे भाई, तूने तो कुछ भी पैसा जमा नहीं किया। फिर किसी के खाते में कोई कुछ डाल दे और उसे भूख लगी हो तो वह कुछ छोड़ता है? सबकुछ खा जाता है। मैं तो कई दिन से भूखा था, कई बार जब तुमसे माँगा था, तुमने कभी दिया नहीं। और मैंने तो तुम्हें मेरे खाते में पैसा डालने को कभी कहा नहीं। मेरे खाते में तुमने कुछ भी नहीं डाला। हाँ, मैं आई हुई लक्ष्मी का कभी अपमान नहीं कर सकता। उसे बाहर कैसे निकाल दूँ? बिन माँगे मोती मिलें, माँगे मिले न भीख।’’

इस तरह पिता ने बेटे को दो टूक उत्तर दिया—‘‘मेरे खाते में जितना पैसा है, वह मेरा है। तेरे खाते के पैसे को मैं हाथ भी लगाऊँ तो कहना। मेरे पास ही अतिरिक्त पैसा कहाँ है, जो मैं तेरी मदद कर सकूँ। जब आएगा, तब कर दूँगा।’’ और पिता ने यह कहते हुए चर्चा बंद कर दी कि ‘पुत्र, पिता न भैया, सबसे बड़ा रुपैया।’

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