प्रेत

प्रेत

“है… कौन है?’’ संतरी ने आवाज दी।

लेकिन धुंध, हवा और पेड़ों की सरसराहट के बीच वह साफ सुन सकता था कि कोई सामने से जा रहा है। मार्च की रात हमेशा की तरह बदरीली और कोहरीली थी।

‘‘कौन है?’’ उसने फिर आवाज दी और लगा जैसे उसने कानाफूसिया या दबी हुई हँसी सुनी हो।

‘‘यह मैं हूँ।’’ एक काँपती और बूढ़ी आवाज ने जवाब दिया।

‘‘मैं कौन?’’

‘‘एक राहगीर...’’

‘‘राहगीर से तुम्हारा मतलब?’’ अपना भय दिखाने के लिए संतरी ने चिल्लाकर कहा, ‘‘रात में कब्रगाह में किसलिए घूम रहे हो?’’

‘‘ओह! नहीं प्यारे भाई, मुझे कुछ नहीं दिखता, ईश्वर मेरी आत्मा को शांति दे।’’ बूढे़ ने गहरी साँस ली, ‘‘अँधेरा इतना गहरा है, क्या यह कब्रगाह है?’’

‘‘कब्रगाह नहीं तो और क्या है?’’

‘‘...?’’

‘‘तुम कौन हो?’’

‘‘एक घुमंतू तीर्थयात्री।’’

‘‘बहुत अच्छे! दिन को पीते हो, रात को कब्रगाह में घूमते हो, बुरा हो तुम्हारा।’’

बूढे़ के खाँसने और आवाज से संतरी का भय दूर हो गया।

‘‘तुम अकेले नहीं, तुम्हारे साथ दो-तीन लोग और हैं।’’

‘‘एकदम अकेला, ईश्वर हम पर दया करे।’’

संतरी उछलकर उसके पास पहुँचा—‘‘तुम अंदर कैसे आए? क्या बाड़ फाँदकर?’’

‘‘मैं रास्ता भूल गया, मुझे मित्री की चक्की पर जाना है।’’

‘‘क्या यह मित्री की चक्की पर जाने का रास्ता है? बेवकूफ, उसका रास्ता बाईं ओर से है, जो तुम्हें कस्बे से ही पकड़ लेना था। फिजूल तीन मील का चक्कर लगाया। लगता है, अब भी पिये हो।’’

‘‘बिल्कुल पी थी, अब किस रास्ते से जाना चाहिए?’’

‘‘दीवार के साथ नाक की सीध में चले जाओ। दीवार खत्म होने पर बाएँ मुड़ना। कब्रगाह पार करो, फाटक खोलो और हाई रोड पर पहुँचो, वहाँ से सीधे मित्री की चक्की पर। और हाँ, किसी गड्ढे में मत गिर पड़ना।’’

‘‘ईश्वर तुम्हारी सेहत सलामत रखे। माँ मरियम तुम्हें आशीष दे। क्या मेरे साथ गेट तक चल सकते हो? मुझ पर दया करो।’’

‘‘तुम्हें लगता है, मेरे पास फालतू समय है। अकेले जाओ।’’

‘‘मेहरबानी करो, मुझे कुछ नहीं सूझता। मैं हर रात तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा।’’

‘‘मेरे पास समय नहीं। अगर सबके साथ यह करने लगूँ तो नौकरी से निकाल दिया जाऊँगा।’’

‘‘ईसू से प्रेम की खातिर। सच, मुझे दिखाई नहीं देता। इसके अलावा कब्रगाह में अकेले डर लगता है।’’

‘‘मेरे लिए एक सिरदर्द...! अच्छा चलो।’’

 * * * * *

दोनों साथ-साथ चलने लगे, दोनों कंधे-से-कंधा मिलाकर बिना कुछ बोले चल रहे थे। बर्फानी हवा का एक झोंका, अदृश्य पेड़ों की सरसराहट...वे बड़ी-बड़ी बूँदों में भीगने लगे। पूरा रास्ता पानी से भर गया।

‘‘एक बात मुझे हैरान करती है, तुम अंदर कैसे आए! गेट पर ताला पड़ा है। दीवार फाँदकर क्या?’’

‘‘ऐसा हो सकता है? मैं खुद नहीं जानता कैसे? मुझ पर शैतान सवार था। ईश्वर ने मुझे सजा दी। तुम यहाँ के दयालु संतरी हो?’’

‘‘हाँ।’’

‘‘पूरी कब्रगाह की चौकसी के लिए?’’

‘‘नहीं, हम तीन लोग हैं। एक बीमार है, दूसरा सो रहा है। हम बारी-बारी से ड्यूटी देते हैं।’’

‘‘समझा, हे ईश्वर! अंधड़ कैसा जंगली जानवर की तरह चिंघाड़ रहा है।’’

‘‘और तुम कहाँ से आए हो?’’

‘‘बहुत दूर...बोलोग्ना से तीर्थस्थानों के दर्शन करता और नेक लोगों के लिए प्रार्थना करता हूँ। हे ईश्वर! हम पर दया कर।’’

संतरी अपना पाइप जलाने के लिए रुका। पल भर के लिए तीली की हिलती हुई रोशनी में एक कब्र का सफेद पत्थर और उसपर उकेरा हुआ देवदूत एवं काला क्रॉस दिखा।

‘‘हमारे प्रियजन गहरी नींद में सो रहे हैं।’’ अजनबी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, ‘‘अमीर और गरीब, बुद्धिमान और मूर्ख सब चैन से सो रहे हैं, तुरही बजने तक सोते रहेंगे और सभी स्वर्ग जाएँगे।’’

‘‘अभी हम यहाँ चल रहे हैं। पर समय आने पर हम भी अपनी कब्र में लेटे होंगे।’’

‘‘बहुत सही! ऐसा कोई नहीं, जो मरे नहीं। हम सभी पापी हैं, हमारे कर्म बुरे हैं। मैं पाप में डूबा हुआ हूँ, धरती पर बोझ हूँ।’’

‘‘तो भी तुम्हें एक दिन मरना पडे़गा।’’

‘‘मैं नहीं जानता।’’

‘‘तीथयात्रियों के लिए मरना हम जैसों से आसान है।’’

‘‘तीर्थयात्री दो तरह के होते हैं, पहले ईश्वर से डरनेवाले; जो अपनी आत्मा की फिक्र करते हैं। तुम्हारी भेंट ऐसे किसी तीर्थयात्री से भी हो सकती है, जो तुम्हारे सिर पर कुल्हाड़ी चला सकता है।’’

‘‘मुझे ऐसी डरावनी बातें क्यों सुनाते हो?’’

‘‘सिर्फ बतियाने के लिए, गेट आ गया है, ताला खोलो।’’

संतरी ने ताला खोला और अजनबी को बाँह पकड़कर बाहर निकाला।

‘‘कब्रगाह खत्म। अब सीधे मुख्य सड़क पर पहुँचो और चलते रहो, जब तक मित्री की चक्की न आ जाए।’’

‘‘प्यारे भाई, अब मित्री की चक्की पर जाने की जरूरत नहीं। वहाँ किसलिए जाना?’’

‘‘मैं तुम्हारे साथ यहीं कुछ देर रुकूँगा।’’

‘‘किसलिए?’’

‘‘तुम्हारे साथ आनंद आ रहा है।’’

‘‘मैं कोई मसखरा हूँ? तुम ऐसे तीर्थयात्री हो, जो मजाक पसंद करता है।’’

‘‘बिल्कुल करता हूँ।’’ अजनबी ने कहा।

‘‘और तुम, प्यारे भाई, मुझे लंबे अरसे तक याद रखोगे।’’

‘‘भला किसलिए याद रखूँगा?’’

‘‘क्योंकि मैंने तुम्हें बड़ी चालाकी से बंदर बनाया। क्या तुम मुझे तीर्थयात्री नहीं समझते हो? नहीं, बिल्कुल नहीं।’’

‘‘तो कौन हो?’’

‘‘एक प्रेत। मैं अभी-अभी अपनी कब्र से निकला हूँ। गुलारोव को याद करो, नल जोड़नेवाला मिस्त्री, जिसने फाँसी लगा ली थी। मैं उसी गुलारोव का प्रेत हूँ।’’

‘‘कोई और किस्सा कहो।’’

संतरी ने उसका विश्वास नहीं किया, पर डर गया। एक कदम पीछे हटा और गेट की ओर भागने की कोशिश की।

‘‘कहाँ भाग रहे हो? रुको।’’ अजनबी ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, ‘‘तुम अकेले हो, तुम मुझे अकेला नहीं छोड़ सकते।’’

‘‘मुझे जाने दो।’’ हाथ छुड़ाते हुए संतरी चीखा।

‘‘जब मैं कहूँ कि खडे़ रहो तो खडे़ रहो। अगर जिंदा रहना चाहता है तो चुपचाप खड़ा रह कुत्ते! मैं इस समय खून नहीं बहाना चाहता, वरना कभी का काम तमाम कर देता। चुपचाप खड़ा रह।’’

संतरी के घुटने काँप रहे थे, उसने पूरी ताकत से फेंस को पकड़ लिया और चिल्लाने की कोशिश की। लेकिन जानता था, उसकी आवाज किसी के मकान में नहीं पहुँचेगी। कुछ मिनट सन्नाटे में गुजरे। एक बीमार पड़ा है, दूसरा सो रहा है और तीसरा एक तीर्थयात्री को गेट पर पहुँचा रहा है। अजनबी ने बड़बड़ाकर कहा, ‘‘बढि़या! और इसके लिए तुम्हें वेतन मिला है। ओह नहीं, प्यारे भाई! चोर संतरियों से हमेशा ज्यादा चालाक होते हैं। चुपचाप खडे़ रहो, हिलो मत।’’

पाँच या दस मिनट यों ही गुजरे, एकाएक हवा को चीरती हुई एक तेज जफील की आवाज आई।

‘‘अब जा सकते हो।’’ अजनबी ने संतरी का हाथ छोड़ते हुए कहा, ‘‘ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम जिंदा हो।’’

अजनबी ने भी एक तेज जफील बजाई और संतरी को छोड़कर गेट की ओर भागा। भय से थरथराते हुए संतरी ने गेट खोला और आँखें मूँदकर बाहर भागा। तभी उसे तेज कदमों की आहटें और फुसफुसाहट सुनाई पड़ी।

‘‘क्या तुम हो त्रिकोन? मिटका कहाँ है?’’

* * * * *

जब संतरी मुख्य सड़क से काफी दूर निकल गया तो उसने अँधेरे में टिमटिमाती हुई एक मद्धिम रोशनी देखी। वह रोशनी के जितने करीब पहुँच रहा था, उसका भय उतना ही बढ़ता जा रहा था। और किसी वारदात के होने की आशंका बढ़ती जा रही थी।

‘‘लगता है, रोशनी चर्च के अंदर है। ईसूमाता मरियम मुझे माफ करें, मैं इसी से डर रहा था।’’

एक मिनट बाद वह चर्च की टूटी खिड़की के पास खड़ा चर्च के दालान को देख रहा था। एक पतली मोमबत्ती, जिसे चोर बुझाना भूल गए थे, हवा के झोंकों में टिमटिमा रही थी। पूजागृह में एक टूटा हुआ बक्सा औंधा पड़ा था, इधर-उधर सामान बिखरा पड़ा था। कम्युनियन टेबल के पास अनगिन पैरों के निशान छूटे हुए थे।

कुछ मिनट गुजरे, फिर चर्च में खतरे की घंटी बज उठी, जिसे हहराती हुई हवा कब्रगाह के पार ले गई।

मऊरानीपुर, झाँसी (उ.प्र.)

दूरभाष : ०७६०७०३८५६२

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