वसंत फिर आ गया

हर वर्ष की तरह वसंत फिर आनेवाला है। वसंत के आगमन का आभास खेतों में खिले सरसों के पीले फूलों से होता है। वसंत ऋतु-महोत्सव के अवसर पर हम बच्चे अपनी सफेद कमीज को हलदी से रँगकर पहनकर स्कूल जाते थे। पूरे विद्यालय का वातावरण वसंतमय बना प्रफुल्लित नजर आता था। वाग्देवी माँ सरस्वती के चित्र पर हम बच्चे हजारे के पीले फूलों की माला चढ़ाया करते थे। ज्ञानी और विद्वान् बनने की प्रार्थना करते थे। धन से अधिक ज्ञान को सम्मान देते थे। धनवान् से ज्यादा विद्वान् व्यक्ति के प्रति सम्मान का भाव अपने मन में रखते थे। हमारे संस्कृत पढ़ानेवाले गुरुदेव ने सिखाया था कि धनी व्यक्ति का सम्मान केवल अपने गाँव, नगर या क्षेत्र में ही होता है, किंतु विद्वान् व्यक्ति की पूजा सारे संसार में होती है। धन को चोर चुरा सकता है, डाकू लूट सकता है, किंतु ज्ञान को चोर चुरा नहीं सकता, डाकू लूट नहीं सकता है। अतः धन से बड़ी विद्या है। हम स्कूली बच्चे प्रतिदिन ज्ञान की देवी सरस्वती की प्रार्थना ही गाया करते थे—‘जयती-जय जय माँ सरस्वती। जयती वीणा धारिणी॥’

या महाकवि पं. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित ‘वर दे वीणा वादिनी!’ गाया करते थे। देखते-देखते समय कितना बदल गया है। अब हम ज्ञान की नहीं, धन की उपासना में जुट गए हैं। धन की शक्ति के आगे ज्ञान की शक्ति कमजोर हो गई है। धन का संबंध सत्ता और शक्ति से है। किंतु ज्ञान का संबंध गहन साधना, चिंतन, मनन और मंथन से है। ज्ञान का पथ अत्यंत कठिन तथा दुर्गम है, जबकि धन का पथ कुछ सहज है। छल और छद्म से धन पाया जा सकता है, किंतु ज्ञान निर्मल मन, विनम्रता और जिज्ञासा से ही प्राप्त किया जा सकता है। आजकल मान्यता, मत, धर्म, संप्रदाय की दीवारों के बीच वसंत भी सकुचा गया है। अब हमारा ज्ञान तमाम प्रकार के संप्रदायों से घिर चुका है। हम जरूरत से ज्यादा जातिवादी, क्षेत्रवादी बन गए हैं। बाल की खाल निकालने में माहिर हो गए हैं। हमारे पर्व, त्योहार, महोत्सव राजनीति और जातिवाद के रंग में रँग दिए गए हैं। असल में हमें बड़ा बनना था, पर हम छोटे हो गए हैं। हम और हमारा मन बौना बन गया है। हमारी सीमाएँ भी संकुचित हो गई हैं।

विस्तार और व्यापकता विलुप्त हो गई है। हमारा आकाश अब टुकड़ों में बँट चुका है। अपार विस्तार का गीत गानेवाले डॉ. भूपेन हजारिका भी अब हमारे बीच नहीं हैं। प्रतीक रूप में ही सही, पर ज्ञान की देवी की परिकल्पना मात्र से हमारे सोए हुए आत्मविश्वास को मारा जा रहा है। रंगों की दुनिया भी धार्मिक बन गई है। वैराग्य का प्रतीक, भारतीय ऋषि-परंपरा का द्योतक भगवा रंग आज कितना अर्थहीन और संकुचित बन गया है। रंग के ठेकेदारों ने रंगों की आभा को छीन लिया है। इन दिनों अर्थात् पाँच दशक बाद हम वाग्देवी सरस्वती को इतना भूल जाएँगे, सोचा भी न था। ज्ञान का महोत्सव भी कट्टरपंथी सोच के सामने अर्थहीन बना दिया गया है।

वसंत का आगमन प्रकृति का धर्म है, प्रकृति ने अभी अपना धर्म नहीं त्यागा है। वसंत आता रहा है। वसंत आता रहेगा। जब तक धरती पर एक भी बीज और फूल जिंदा है, तब तक वसंत अपने आगमन का बोध कराता रहेगा। आम के पेड़ों पर बौर आता रहेगा, भ्रमर मधुसंचय करते रहेंगे। सरसों के सहस्रों खेतों में मधुमक्खियाँ मधुसंचय कर हमें मिठास देती रहेंगी। सरसों के खेतों में छाया पीलापन हमारी आँखों में सौंदर्यबोध जगाता रहेगा। प्रकृति के इस सौंदर्य-जागरण के मध्य हर वसंत में मुझे ललित निबंध लिखने का अवसर मिलता रहेगा। मैं वसंत पर लिखे ललित गद्य की आनंदानुभूति से अपने को समृद्ध करता रहूँगा और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय तथा गुरुवर्य ललित निबंधकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र का पुण्य स्मरण करता रहूँगा।

वसंत है तो कोयल भी है। वसंत है तो फूलों के नन्हे पौधे हैं और नन्हे पौधे हैं तो नन्हे बच्चे हैं। फूलों का हँसना अर्थात् खिलना ईश्वरत्व से साक्षात्कार है। वसंत हमें अपने से, अपने मन से, अपनी आत्मा से भी मिलाता है। अपने खोए मन से हमारा साक्षात्कार कराता है। वसंत जीने की, आगे बढ़ने की, खिलते रहने की प्रेरणा देता है। वसंत कबीर के ढाई आखर की भी याद दिलाता है। वसंत भीतर छुपी हुई कविता को जगाता है और जब कविता पैदा होती है, तब वसंत राग अमर हो जाता है। वसंत का स्मरण मात्र आत्मा की जीवन-ज्योति को जगा देता है। इसीलिए वसंत को ऋतुराज कहा जाता है।

वसंत के आगमन के साथ ही रसराज आम्र का बीजारोपण आम्र वृक्ष पर बौर के आने से हो जाता है। ऋतुराज वसंत ही रसराज आम्र फल देने की क्षमता रखता है। जो प्रकृति सँवारने की सामर्थ्य रखता है, वही फलों में मीठापन भर सकता है। हम प्रकृति एवं प्रकृति के परिवर्तन को भूलते जा रहे हैं, क्योंकि हम हर दिन प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। जो प्रकृति को जानता है, वही वसंत को जानता है। वसंत मौन रहकर भी हमें स्फूर्ति देता है। हमारी वाणी का वसंत भी हमारे भीतर हिलोर नहीं भरता, क्योंकि कृत्रिम और अर्थहीन जीवन से वाणी की मधुरता गायब हो गई है। फिर भी वसंत हर बार आता रहेगा और गुलाब भेंट कर काँटों को धन्यवाद देता रहेगा।

क्षेत्रीय निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान

गुवाहाटी केंद्र (असम)

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