संस्कार स्कूल ऑफ हिंदुस्तान

संस्कार स्कूल ऑफ हिंदुस्तान

उनकी, यानी वर्माजी की दो चिंताएँ हैं। एक तो धीरे-धीरे देश से संस्कारों का लुप्त, दूसरा आर्थिक अभाव। स्थिति इतनी पतनोन्मुख है कि बेटा बड़ों को देखकर चरण-स्पर्श तो दूर, फिल्मी गानों की सीटी बजाता है। लड़की कौन कम है, वह अपनी माँ को सूचित करती है, ‘‘मम्मी! रात को लौटने में देर हो जाएगी। मुझे दोस्त की बर्थ-डे पार्टी में जाना है।’’ दोस्त कौन है—लड़का या लड़की? माँ को यह पूछने की अनुमति भी नहीं है। ऐसा प्रश्न लड़की के निजी जीवन में हस्तक्षेप होगा। यह नई पीढ़ी को कतई बरदाश्त नहीं है। माता-पिता से अनुमति लेने के दिन कब के लद गए। उन्हें खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए कि पुत्री ने उन्हें अपने कार्यक्रम की सूचना तो दे दी, वरना बिना बताए देर से आती तो चीखने-चिल्लाने के अलावा कर ही क्या लेते?

उन्हें अपने जमाने का ध्यान आता है। कैसे आज्ञाकारी पुत्र थे वे! स्कूल से आकर खेलने तक जाते तो माता या पिता की अनुमति लेकर। हाँ, इतना जरूर है कि उन्होंने चोरी-चोरी सिगरेट पीना शुरू कर दिया था, बिना किसी को खबर दिए या इजाजत लिये। पर यह भी उनके संस्कारित चरित्र का ही हिस्सा था। वह रात को पेड़-पौधे, फूल-पत्ती नहीं तोड़ते थे, इस आशंका से कि कहीं उनकी नींद में खलल न पड़े, तो सिगरेट-सेवन की सूचना से माँ-बाप का दिल कैसे दुखाएँ? इनसान की सिफत है। वह अपने हर सही या गलत कर्म को उचित ठहराने में समर्थ है। कौन कहे, हत्यारा भी हत्या को न्यायसंगत ठहराता है। हमदर्द तो इसी मत के हैं कि उसे पुलिस ने वसूली के चक्कर में फँसाया है। उसकी तो यह पहली वारदात है। पेशेवर हत्यारे भी दे-दिवाकर छूट जाते हैं। देश में दहेज-बिके पतियों की बहुतायत है। उन्हें इस हत्यारे से हमदर्दी है। इस बेचारे ने पत्नी की हत्या ही तो की है। जरूर साहसी होगा। उन्हें अपनी कायरता पर कोफ्त होती है। हसरत तो उनकी भी यही थी, पर हिम्मत नहीं पड़ी। वर्माजी कॉलेज आते-आते शराब भी चख चुके थे, पर यह भी उन्होंने बिना माता-पिता के दिल दुखाए किया। जैसे संस्कार संस्कार न होकर नैतिक पलायन का वह द्वार है, जिससे कोई भी हरकत करके चुपचाप निकला जा सके।

यों सार्वजनिक रूप से वे अब संस्कारों के प्रबल पक्षधर हैं। जब सुबह वे घूमने जाते हैं तो चिडि़यों को दाना डालना नहीं भूलते, ‘किसी भी भूखे को भोजन देना भारतीय संस्कारों की मूलभूत शिक्षा है।’ दीगर है कि गृह-सेवक रामू खाना बनाता तो है, पर उसे वहाँ कुछ भी चखना वर्जित है। उनकी और पत्नी की पूरी निगरानी रहती है कि सब्जी से लेकर रोटी तक वह अपनी लाई हुई ही खाए। गाहे-बगाहे किचन के चक्कर लगाकर अपने निरीक्षण के द्वारा मियाँ-बीवी यह सुनिश्चित करते रहते हैं। वह कहने को सबको सुनाते हैं कि मेहमान भगवान् होता है, पर यह उनके लिए केवल जुबानी जमा खर्च है। पहले तो ‘बाहर जाना है,’ ‘यह आने का सही समय नहीं है,’ ‘वायरल फैला हुआ है,’ जैसी बातों से वे अतिथि को टालते हैं।

यदि वह बेशर्म फिर भी आ ही जाए तो पाता है कि उसे खटमल भरे सोफे पर सोना पड़ता है। घर में कोई अतिरिक्त कमरा उपलब्ध नहीं है। महानगर में रहने का अर्थ ही फ्लैट के कबूतरखाने की अनिवार्य कैद है। सुबह वह बिना दूध की चाय पाता है—‘‘क्या करें भैयाजी! ऌफ्रिज से निकालकर गरम करते ही दूध फट गया।’’ वर्माजी माफी की मुद्रा में मेहमान को सूचित करते हैं। दिन में उसे काम है तो बाहर रहना है। यों भी महानगरों में ‘डिब्बा संस्कृति’ है। सब अपना डिब्बा ले जाते हैं, खाने के वास्ते। ऐसा कोई सौभाग्यशाली ही होगा, जो भोजन के लिए घर आए अथवा कोई असहाय वृद्ध-वृद्धा, जो घर से बाहर निकलने को लाचार हैं। शाम को थका-माँदा मेहमान घर लौटता है तो पाता है कि दरवाजे पर ताला लटका है और एक नोट चिपका है, ‘हमें एक पारिवारिक आयोजन में सम्मिलित होना है, आप भी आमंत्रित हैं। ४३०, बसंत कुंज में आ जाइए।’

आस-पास की खोज-खबर से उसकी ज्ञानवृद्घि होती है कि मेट्रो वहाँ नहीं जाती, दो बसें बदलकर ही उसका वांछित स्थल पर पहुँचना संभव है। वक्त तो लगेगा ही। एक-डेढ़ घंटा आसानी से। फिर बसंत कुंज का गंतव्य कोई राष्ट्रपति भवन या प्रधानमंत्री का आवास तो है नहीं, उसे भी खोजना होगा। यह विकल्प उसे व्यावहारिक नहीं लगता। वह ढाबे में खाना खाकर निरुद्देश्य घूमता है अपने मेजबान के इंतजार में। एक कानून का रक्षक निजी स्वार्थवश गतिविधि को संदेहास्पद मानकर थाने ले जाने की धमकी से उसकी जेब की तलाशी लेकर पूरी नकदी धरवा लेता है। वह क्या करे, बस फ्लैट के सामने बैठकर ऊँघता है—प्रतीक्षारत! मध्यरात्रि के लगभग वर्मा परिवार पधारता है, चहकता-गुनगुनाता। वर्माजी की उससे सहानुभूति है, पर जाना विवशता थी। उनके संस्कारों की सीख है कि संबंध निभाए जाएँ, विशेषकर उन परिस्थितियों में, जहाँ खान-पान का प्रश्न हो। सामान्य हालात में मिलना-जुलना भी कहाँ होता है? बहुत हुआ तो फोन पर हाल-चाल ले लिया। फिर भी उन्होंने मेहमान से क्षमा-याचना की। पुलिसिए ही नहीं, पूरी व्यवस्था को कोसा। इस बार सुबह मेहमान दूध की चाय पीकर विदा हो लिया। बिना अनखाए, वर्माजी ने ऐसी मेहमाननवाजी की उसकी कि वह मेहमान बनने के पहले दस बार सोचे।

हमारे शहर में आज भी चाय-पान की दुकान ही इंग्लैंड की ‘पब’ का पर्याय है। पूरे देश के हालात की विवेचना यहीं होती है, वर्माजी की संस्कारों पर नसीहत भी। मेहमान के संकट से छुटकारा पाकर आज वे खासे मुखर हैं, ‘‘हमारे यहाँ तो स्त्री को देवी माना गया है, स्नेह की प्रतिमा, पूजा की पात्र। फिर आजकल सड़कों पर खुलेआम दुर्व्यवहार और छेड़छाड़, अपहरण के हादसों से हमें लगता है कि हम या तो अपने संस्कारों को भूल गए हैं अथवा उनसे परिचित नहीं हैं। यह वाकई देश का दुर्भाग्य है और हमारे पारिवारिक जीवन की असफलता का प्रतीक।’’ वे वक्त के हालात का बचाव भी करते हैं। आज किसके पास समय है, बच्चों के संस्कार के बारे में सोचने का भी? पति-पत्नी दोनों जीवन की चूहा-दौड़ में मिलकर ऐेसे लगे हैं कि उन्हें फुरसत ही नहीं है बच्चों पर ध्यान देने की। झुग्गी-झोंपड़ी हो या कोठी-बँगले, आर्थिक स्थितियाँ भले भिन्न हों; पर परवरिश की उदासीनता दोनों में समान है। कुछ को सत्ता भरमाए है, कुछ को भूख, पर संतुष्ट कोई नहीं है। ऐसी असंतुष्ट पीढ़ी बच्चों को असंतोष तो दे सकती है, संस्कार नहीं। भले ही बार-बार दोहराए जाने से वाक्य घिसा-पिटा लगे, पर जब तक मानसिक या शारीरिक कुपोषण आड़े न आए, सच्चाई यही है कि किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चे ही हैं। जब वे ऐसी भूमिका बाँधते तो पान के तलबगार जर्दा-किवाम भूलकर उनकी बातों पर गौर करते। स्वाभाविक भी है। ज्यादातर बाल-बच्चोंवाले लोग ही श्रोता हों तो सबको बच्चे या बच्चों के भविष्य की चिंता रहनी ही रहनी। फिर वर्माजी यह भी बताते कि संस्कारयुक्त बच्चे ही देश के अच्छे नागरिक बनते हैं। उनके प्रवचन के दौरान एक ‘सिविक’ ने सवाल उठाया—सुनने में यह सब अच्छा लगता है, पर इसका कोई क्या करे, जब बच्चों को शुरू से ही झूठ और फरेब सिखाया जाता है? पापा आराम से धूप सेंक रहे हैं, पुत्र उनके मोबाइल से खेल रहा है कि उसकी घंटी बजती है। पापा नाम देखकर फोन बच्चे को देते हुए फुसफुसाते हैं, ‘बेटा, कह दो कि पापा घर पर नहीं हैं और फोन यहीं भूल गए हैं।’ इस वास्तविकता के साथ बड़ा हुआ बच्चा झूठ का पैगंबर नहीं तो क्या सत्य का साधक बनेगा? बस जैसे इसी प्रश्न का वर्माजी को इंतजार था। वह सुनते ही बोले, ‘‘इन्हीं तथ्यों से प्रेरित होकर हमने निश्चय किया है कि हम अपना बचा हुआ जीवन देश की सेवा में लगाएँगे, संस्कारों का ‘स्कूल ऑफ हिंदुस्तान’ खोलकर।’’

एक अन्य परिचित श्रोता ने नाम पर आपत्ति की—‘‘यह अंग्रेजी-हिंदी का मिश्रण क्यों? आप इस नई संस्था का नामकरण ‘संस्कारों की पाठशाला’ क्यों नहीं कर सकते? एक अन्य ने दुःख जताया कि विज्ञान ने इतनी प्रगति की है, पर कोई ऐसा जादुई घोल क्यों नहीं बनाया, जिसे पी लो तो संस्कारयुक्त हो जाओ या संस्कार का विटामिन खा लो! वर्माजी ने संतोष की साँस ली। अपने प्रस्ताव पर सुननेवालों की रुचि से वे प्रभावित हुए—‘‘आप के सुझावों में दम है, पर आप देश के हिंदी क्षेत्र का ही मत सोचिए। अपने देश की विविधता पर ध्यान दीजिए। हम तो चाहते हैं कि संस्कार का अभियान पूरे मुल्क में चले। कोई माने या न माने, अंग्रेजी आज भी साक्षरों की समझ में आनेवाली अखिल भारतीय भाषा है। ‘संस्कार स्कूल ऑफ हिंदुस्तान’ कहने और सुनने में प्रभावी लगता है, साथ ही हमारी सामाजिक संस्कृति का भी प्रतीक है। कौन कहे, इस नाम से आकृष्ट होकर विदेशी छात्र भी इसमें प्रवेश लें और फिर हम साइंस के न सही, संस्कारों के विश्वगुरु बनने में सफल हों।’’

चाय-पान की ‘पब’ की इस चर्चा के बाद से वर्माजी मिशनरी भावना से अपनी नई संस्था के गठन में जी-जान से जुटे हैं। सबसे पहले उन्हें रियायती दर पर सरकारी जमीन ‘लीज’ पर चाहिए। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र तो भेजा ही है, वे एक आकर्षक फोल्डर भी अपने मित्र की प्रिंटिंग प्रेस में छपवा रहे हैं। इसके मुख्य तत्त्व हैं कि संस्कारों से लैस बच्चे देश के विकास, कानून-व्यवस्था के अनुपालन, अपने कर्तव्य के निर्वहन तथा बराबरी के समाज के निर्माण में सहायक ही नहीं, प्रेरक भी सिद्ध होंगे।

स्वयं तो ठनठन गोपाल हैं, क्या पता वर्तमान में संस्कार के लोकप्रिय बाजार से ही कुछ पैसा मार लें? फोल्डर इसमें मददगार होंगे। वर्माजी का एक सहपाठी पढ़ाई में ‘जीरो’ था। वही आज शिक्षा के क्षेत्र में ‘हीरो’ है। उसके पिताजी की परचून की दुकान थी। उसने कुछ वहाँ से उठाया, कुछ बैंकों से और पुश्तैनी जमीन पर पहले एक कमरे में, फिर धीरे-धीरे पूरी इमारत बनवाकर स्कूल से कॉलेज तक तरक्की की है। अब तो उसके मेडिकल कॉलेज भी चलते हैं, यानी तख्ती, स्लेट-पूजन से लेकर, हारी-बीमारी, जन्म-मरण तक का मुकम्मल इंतजाम। कहाँ रिक्शा-स्कूटर की सवारी को तरसते थे, कहाँ अब कारों की पूरी कतार है। हफ्ते में हर रोज वे कारें बदल-बदलकर सवारी करने में समर्थ हैं। जब शिक्षा के मिशन को कामयाब और कमाऊ उद्योग में तब्दील किया जा सकता है तो संस्कार को क्यों नहीं? वर्माजी की इकलौती महत्त्वाकांक्षा इस कीर्तिमान को स्थापित कर उसका पहला उद्यमी बनना है।

उनके पिता ने तो जमीन छोड़ी नहीं थी, पर वे जन-कल्याण समर्पित शासन को माई-बाप सरकार का दर्जा देते हैं। संस्कार स्कूल की जमीन तो उससे हड़पनी-ही-हड़पनी है, वरना संस्कार के अस्तित्व पर प्रश्न-चिह्न लगने का खतरा है। संस्कार और राष्ट्रहित उनकी नजर में गड्ड-मड्ड हो गए हैं। वे जानते हैं कि मात्र पत्र से सरकार के पहाड़ का टस-से-मस होना नामुमकिन है, लिहाजा उन्होंने एक ओर व्यक्तिगत त्याग किया है। सिद्धांत से स्वार्थ तक प्रगति कर वर्माजी ने शासकीय दल की सदस्यता हथिया ली है। उसके चार-पाँच विधायकों को संस्कार स्कूल के संभावित लाभ में हिस्सा देने के वादे से फँसाया है और अब फोल्डर के साथ मुख्यमंत्री को पटाने में प्रयत्नशील हैं। वे एक बार मुख्यमंत्री के दर्शन भी कर आए हैं और जमीन के लिए प्रार्थना भी। हाल ही में उन्होंने ‘संस्कार का देश के विकास में योगदान’ पर एक राष्ट्रीय गोष्ठी का भी आयोजन किया है उधार चंदे की मदद से। जाहिर है कि इसके उद्घाटन के लिए वे मुख्यमंत्री से निवेदन करें। अपनी ही पार्टी का कार्यक्रम जानकर मुख्यमंत्री भी आने को राजी हो गए हैं। कौन कहे, वे जमीन देने की घोषणा भी इसी मंच से कर दें।

उनका चंदा-उगाही कार्यक्रम भी जोर-शोर से चालू है। अपने एक चार्टर्ड एकाउंटेंट मित्र की सहायता से वे चंदे का नियमित हिसाब रख रहे हैं, पर उन्हें जमीन के आवंटन की प्रतीक्षा है। वहाँ स्कूल तो होगा ही, संस्कारी कैंटीन व भोजनालय भी होगा। उनकी योजना है कि एक संस्कारी अतिथि-गृह निर्मित हो। इसमें सस्ती दरों पर सैलानियों को कमरे उपलब्ध कराए जाएँ। वे दुःखी हैं, यह सोचकर कि जिस रफ्तार से सपने देखते हैं, उसी रफ्तार से सरकार उन्हें जमीन क्यों नहीं आवंटित करती है? कमाई की जुगत तो जमीन में है।

इधर जब वे पूरे समर्पण से ‘संस्कार स्कूल ऑफ हिंदुस्तान’ के निर्माण से राष्ट्र के विकास में लगे हैं, उधर उनके निजी जीवन में त्रासदियाँ भी घट रही हैं। एक दिन वे घर पहुँचे तो रात तक लड़की कॉलेज से नहीं लौटी थी, दूसरे दिन तक भी उसके दर्शन नहीं हुए। खोजने पर उसके कमरे से एक नोट मिला, जिसमें सूचना थी कि वह अपने मित्र के साथ ‘लिव-इ॒न’ के लिए जा रही है, उसे ढूँढ़ने के प्रयास न किए जाएँ।

वर्मा-पुत्र अपनी हरकतों से बाज क्यों आते? उन्होंने कॉलेज व उसके बाहर अपने मित्रों के साथ मिलकर लड़कियाँ छेड़ने की ऐसी जोरदार मुहिम चलाई कि नतीजतन, कॉलेज से वह निष्कासित किए जा चुके हैं, लड़कियों की शिकायत पर। वहीं से उठाकर पुलिस ने अनौपचारिक रूप से बिना केस दर्ज किए उनकी ऐसी धुनाई कर दी है कि एक टाँग में फ्रैक्चर हो गया है। संस्कारित पिता किस मुँह से अपनी पीड़ा बयान करे? बेचारे कर्तव्यवश उसकी सेवा-इलाज में लगे हैं। मोहल्ले में कानाफूसी प्रारंभ हो गई है कि वर्माजी ही ‘संस्कार स्कूल ऑफ हिंदुस्तान’ चलाने के सुयोग्य सुपात्र हैं, क्योंकि संस्कारों की सर्वाधिक दरकार इनके परिवार को ही है। उन्हें सरकारी जमीन का अब भी इंतजार है। क्या पता, उसके बाद जेब भरने का कुछ जुगाड़ लगे!

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