सियाचिन का पेड़

ऐसा लग रहा था, वह पहली बार कोई पेड़ देख रहा है। पेड़ तो वैसा ही था, जैसे और थे। हरे-हरे पत्तों से भरे-पूरे, छायादार। पर मानो वह हरियाली को टकटकी लगा पी लेने का यत्न कर रहा हो!

पागल है क्या? जाँचने के लिए पीछे से मैंने कंधे पर अहिस्ता से हाथ धर कहा, ‘‘पेड़ है!’’

न वह चौंका, न अचकचाया। उसी तरह आँखें गड़ाए रहा, ‘‘तीन साल नई देका!’’

‘‘जानता पेड़ ऐ! सात में खेल के, खेल के बड़ा हुआ!’’

मद्रासी है, उसकी हिंदी ने बता दिया था; इसलिए मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। ‘‘तीन साल...?’’ मैंने हैरानी ओढ़ ली।

सीयाचीन में बाई साप काली वेट है...।

‘‘ह्नेट छोड़कर कुछ बी नई ए।’’ मेरी तरफ मुड़कर बोला, ‘‘एक बार बी चूटी नई मिला।’’

‘‘तीन साल ओर कुचबी न...’’ मैंने बीच में टोका, ‘‘वहाँ तो काजू के पैकेट, टीन के डिब्बे हवाई जहाज से गिराए जाते हैं। खाने-पीने के बहुत मजे हैं! अखबार में सब छपता है। एक-एक जवान पर सरकार करोड़ों रुपए खर्च करती है। स्पेशल सूट है।’’ मैंने उसकी वरदी को ताड़ा, यह तो वही सूती चालू जवान की वरदी है!

उसने दाँत दिखाए, ‘‘टूट जाता! काजू नहीं टूटता! माइनस टेंप्रेचर है! रम है तो बंदा जिंदा है। सरदार है तो चौकी जिंदा है! सब बरप में दब जाता सर!’’ मुझे गौर से देखकर उसने सँभाला खुद को। लगभग सावधान सा। उसकी आँखों में भी पेड़ का हरा रंग कहीं गहरा उतर गया, ‘‘कागज देना बीर सिंह की माँ को! पिंड जाना ए। ओ नीचे से, नीचे से रोला पाया—माँ को देना...माँ को देना, ट्रंक में रखा है पॉलसी का कागज...’’

‘‘क्या आल-बाल बक रहा है। कभी कुछ बोलता है, कभी किधर की हाँकता है।’’ मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा था।

‘‘एक पगड़ी से दूसरा पगड़ी बाँध के...बाँध के उतरा, बोला, मैं खड्ड सैड से फ्री होकर आता है नायडू, वाज मारूँ तो खींच लेना। मे कीचा...कीचा वो तो आया, आया आधा आया पिर गीटा कुल गिया...बीर सिंह ऊधर पत्तर पकड़ के, पकड के चीका, बौत चीका। सब बरप में दब गया सर।’’ उसकी आँखों में बर्फ की सफेद दहशत उभर आई थी, लगता दोनों पत्थर की हैं, वह जारी था ‘‘नायडू...नायडू, माँ को देना ट्रंक में है कागज!’’

सुनसान सियाचिन का बर्फीला विस्तार रोज दिन, सालोसाल लगातार बंदा, पागल हो जाए, उसकी मनःस्थिति अब खुलने लगी थी, क्यों वह स्टेशन के बाहर लगे झाड़ को पागलों-सा ताक रहा था। बीर सिंह के पिंड, छुट्टी मिलते ही पहला काम, मरनेवाले की अंतिम इच्छा, कागज पहुँचाकर करना चाहता था। तब वह अपने गाँव जा सकेगा, आत्मा का भार उतारकर। पर कैसे वह पेड़ से शायद यही पूछ रहा था! मसले पर गंभीरता की जकड़ हटाने के लिए मैंने कहा, ‘‘इतनी बर्फ में आप लोग नहाते थे?’’

‘‘मिट्टी तेल का स्टोव होना। आग जलाके नई रक सकते! दुआँ से मर जाते। ऑक्सीजन कम है।’’ टूटी-फूटी हिंदी में सही, उसने सब समझा दिया था, ‘‘ऑक्सीजन है नहीं तो ईंधन जलेगा कैसे? धुएँ से भर जाएगा।’’ कितने दिनों बाद उसे कोई बात करनेवाला मिला है, मैं सुनते-सुनते सोच रहा था। वह सोचते-सोचते बोल रहा था, ‘‘रम पी के नहीं नहाना...मर जाता! नहा के आओ! बाद में पीओ। पीने के बाद ट्री देको! बरप का ट्री! सब ह्नैट ऐ! पीक है, काई है, बंकर है वैट! बीर सिंह है, उसका पाल्सी है, माँ को देना। उसके पिंड में ट्री है। मेरे को बोला, नायडू, माँ बैटा बोड तल्ले!

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