प्रेम की अनन्य पुजारिन मीरा

प्रेम की अनन्य पुजारिन मीरा

मध्यकालीन संत-भक्तों में मीराबाई संभवतः एकमात्र महिला थीं और फिर राज-परिवार से संबंध रखती थीं, इसलिए वे और उत्सुकता का कारण बनीं। उनकी रचनाओं में उनके व्यक्तिगत जीवन की विशेषताएँ बिंबित-प्रतिबिंबित होती हैं। राज-परिवार में पैदा होने और विवाह होने के पश्चात् उनका जीवन अति संघर्षपूर्ण, घटना-प्रधान, राजकीय मर्यादा, कुल मर्यादा, पारिवारिक बंधन, चारों ओर व्याप्त धार्मिक वातावरण, कट्टरतापूर्ण विषम परिस्थितियों, विविध संप्रदाय, पूजा-ज्ञान, वैराग्य, उपासना, सत्संग, भक्तियोग, लोक-व्यवहार और दर्शन आदि के दुर्गम मार्ग से होकर गुजरा था। इन समस्त स्थितियों-परिस्थितियों के बीच जीवन की सारी शक्ति लगाकर चलना पड़ा था उन्हें, इसलिए उनके पदों में सगुण ब्रह्म के साथ निर्गुण ब्रह्म के प्रति गहरी आस्था और भक्ति-भावना की विश्वसनीयता मिलती है।

प्रेम की अनन्य पुजारिन मीरा के भक्तियोग-दर्शन पर बात करने से पूर्व उनकी जन्मतिथि, स्थान, गुरु-पक्ष पर विचार करना निहायत जरूरी है। मीराबाई का जन्म संवत् १५६० के आस-पास हुआ था। वे जोधपुर नगर (सं. १५१५ वि.) बसानेवाले राव जोधाजी (सं. १४७३-१५४५ वि.) के चतुर्थ पुत्र राव दूदाजी की पौत्री और उनके सबसे छोटे पाँचवें पुत्र रत्नसिंह (मृत्यु संवत् १५८४) की इकलौती पुत्री थीं। राव दूदाजी को अपने पिता की ओर से मेड़ता जागीर के रूप में मिला था। इसीलिए उन्होंने संवत् १५१८ (सन् १४६१ ई.) में मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया। कालांतर में उनके वंशज मेड़ता में रहने के कारण ‘मेड़तिया राठौर’ कहलाने लगे। रतनसिंह को अपने पिता से जीवन-निर्वाह के लिए बारह गाँव मिले थे। मेड़ता के निकट ‘पांडलू’ उन्हीं में से एक गाँव था। इसी गाँव में भक्ति की उस महादेवी ‘मीरा’ का जन्म हुआ था। ऐतिहासिक तथ्यों से भी इसकी पुष्टि होती है।

डॉ. ब्रिजेंद्र कुमार सिंघल ने अपने ग्रंथ ‘मीराबाई’ में उनकी प्रामाणिक जीवनी एवं मूल पदावली का गंभीरता से अध्ययन करते हुए उक्त तथ्यों को प्रस्तुत किया है और माना है कि मीरा का जन्म मेड़ता में हुआ था।

मीराबाई की जन्मतिथि के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है, जिसका अंतराल वि.सं. १४६० (सन् १४०३) से सं १५६३ (सन् १५१६ ई.) तक फैला हुआ है। किंतु नवीन अनुसंधानों और विलंब से प्राप्त कुछ अकाट्य प्राचीन प्रमाणों के आधार पर अब यह निश्चित हो चुका है कि उनका जन्म सं. १५६१ (सन् १५०४ ई.) में और मृत्यु सं. १६१५ (सन् १५५८ ई.) से सं. १६२० (सन् १५६३ ई.) के मध्य हुई। डॉ. ब्रजेंद्र सिंघल ने मीराबाई का जन्म श्रावण शुक्ल एकम वि.सं. १५६१ में मेड़ता में तथा द्वारकाधीश के विग्रह में विलय वि.सं. १६०३ (सन् १५४६ ई.) में माना है। इसके अनुसार ४२ वर्ष में उनका देहावसान द्वारका में हुआ।

मीराबाई के जीवन संबंधी ऐतिहासिक तथ्यों से विदित होता है, उनको जन्म से कुशाग्र बुद्धि, चेतना और ज्ञान प्राप्त था। उनके पदों में उनकी अंतर्वेदना, विरह-भावना, भक्ति-भावना, अदम्य शक्ति-साहस को देखकर उनके महान् व्यक्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता है।

इतिहास गवाह है, बाल्यावस्था में ही उनकी माता वीर कुँवर (झाला राजपूत सुरतान सिंह की पुत्री) का देहांत हो गया था, इसलिए उनका लालन-पालन मेड़ता में उनके पितामह राव दूदाजी ने किया। सब दूदाजी परम वैष्णवी और भगवान् विष्णु के उपासक थे। उनके संपर्क में रहने के कारण मीरा के बाल-हृदय पर उनकी भक्ति-भावना का गहरा प्रभाव पड़ा। इस बाल स्नेही और बालपने की प्रीति का मीरा ने अपने पदों में उल्लेख किया है।

विक्रमी संवत् १५७२ में मीरा के पितामह राव दूदाजी का देहांत हो गया और उनके स्थान पर रतनसिंह के सबसे बड़े भाई वीरमदेव (सं. १५३४-१६०० वि.) गद्दी पर बैठे। उन्होंने सं. १५७३ (सन् १५१६ ई.) की अक्षय तृतीया के दिन मीरा का विवाह (बारह वर्ष में) चित्तौड़ के सिसोदिया वंशीय राणा साँगा सं. १५३९-८५ वि.) के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराज के साथ कर दिया। राणा साँगा की मृत्यु के पश्चात् भोजराज के छोटे भाई रतनसिंह सं. १५८४ में चित्तौड़गढ़ के राणा हुए। रानी हांडी से उत्पन्न उनके सौतेले भाई विक्रमादित्य के मामा राव सूरजमल ने बूँदी की सरहद पर रतनसिंह को मौत के घाट उतार दिया।

इस प्रकार सं. १५८८ में मीरा के सिर से रतनसिंह का साया भी उठ गया।

राणा विक्रमादित्य (सं. १५८८-९३ वि.) बहुत कठोर और अत्याचारी शासक थे। उन्होंने मीरा को कभी चैन से रहने नहीं दिया। चूँकि मीरा, जो बचपन से ही गिरधर गोपाल को अपना इष्ट मानती थीं, पति के जीवनकाल में भी वे अपने गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) को नहीं भूली थीं। पति की मृत्यु के पश्चात् तो पूर्णतः गिरधर गोपाल की ही हो गईं। लोक-लज्जा त्यागकर वे उन्हीं के प्रेम में लीन हो गईं। खुलेआम साधु-संतों का सत्संग करने लगीं और अपने गिरधर गोपाल के सामने करताल बजा-बजाकर नाचने लगीं। यह देखकर विक्रमादित्य ने उनपर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए, किंतु अपनी धुन की पक्की मीरा ने उनके प्रतिबंधों की परवाह नहीं की, बल्कि दूने उत्साह से भक्ति में लीन हो गईं। अपनी विधवा बहू का शृंगार धारण करना, योगिनी वेश बना लेना, नाचना, गाना, साधु-संतों से मिलना उन्हें अमर्यादित लगता था।

कुपित होकर राजा विक्रमादित्य ने मीरा को अनेक शारीरिक-मानसिक कष्ट दिए, यहाँ तक कि विष का प्याला भेजा और मीरा चरणामृत समझकर पी गईं, फिर उन्हें काल कोठरी में बंद तक कर दिया। जब उनकी सारी युक्तियाँ असफल हो गईं तो मीरा के गिरधर गोपाल की मूर्ति को जमीन में गड़वा दिया। कहते हैं, दूसरे दिन प्रातःकाल वह मूर्ति सिंहासन पर स्वयं प्रकट हो गई। फिर राणा ने एक विषैला साँप पिटारे में बंद करके भेजा। मीरा ने उस सर्प को अपने गले में डाल लिया, वह सर्प उनके गले में पड़ते ही माला बन गया। इस चमत्कार के बारे में सुनकर वह अचंभित रह गए। ऐसी अनेक यातनाओं को सहते-भोगते हुए भी मीरा अपनी अटूट भक्ति में लीन रहीं। उन्होंने अपने अनेक पदों में इन सबका जिक्र किया है।

मीरा के कष्टों की कथा सुनकर उनके पितृत्व वीरमदेव (सं. १५८८-८९ वि.) ने उन्हें मेड़ता बुला लिया। वे और उनके पुत्र जयमलजी उनका बहुत आदर-सत्कार करते थे। वहाँ पहुँचकर मीरा भी निर्विघ्न रूप से भजन-कीर्तन और पूजन में मग्न रहती थीं। किंतु अधिक समय तक वहाँ भी न रह सकीं। तीर्थाटन और सत्संग के मनोभाव से वे वृंदावन गईं, जहाँ चैतन्य-संप्रदाय के श्रीजीव गोस्वामी से उनकी भेंट हुई। इसके बाद वे द्वारका (सं. १६०० वि.) चली गईं। वहाँ उन्हें मेवाड़ के राणा का निमंत्रण-पत्र मिला, जिसमें वापस लौट आने का आग्रह था। लौटने के लिए जब वे रणछोड़जी से आज्ञा लेने मंदिर में गईं तो वहीं उनकी मूर्ति में समा गईं। यह घटना सं १६०३ विक्रमी की है। कहीं-कहीं उनकी मृत्यु सं. १६१५ और १६२० वि. (हिंदी साहित्य का इतिहास, संपा. डॉ. नगेंद्र, पृ. २५०) लिखी हुई है। इसके अनुसार मीरा की मृत्यु ५४ वर्ष की उम्र में हुई थी, मेरे मतानुसार भी सं. १६१५ वि. (सन् १५५८ ई.) प्रामाणिक सिद्ध होता है। जबकि डॉ. सिंघल और कुछेक अन्य के शोध के अनुसार उनकी उम्र ४२ वर्ष ही ठहरती है।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अब मीरा के जन्मस्थान और वंश के विषय में कोई मतभेद की गुंजाइश नहीं बचती, फिर भी ‘जने-जने मतिर्भिन्ना’, क्योंकि कोई भी कथन या तथ्य-तर्क-प्रमाण अंतिम नहीं कहा जा सकता। सदियों की बारीकियों और विश्लेषण क्षमता से ऐसे किसी भी संत—कबीर, सूर, तुलसी, रैदास, नंददास, संत सींगा आदि के जन्म तर्कातीत नहीं कहे जा सकते।

मीरा की भक्ति कांता-भाव की भक्ति थी। कुछ समालोचक उनपर चैतन्य संप्रदाय का प्रभाव ले कुछ निंबार्कीय परंपरा का प्रभाव देखते हैं। लौकिक दृष्टि से भोजराज उनके पति हैं, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से गिरधर गोपाल उनके ‘परमपति’ हैं। अपने भक्ति क्षेत्र में उन्होंने अपने परमपति को कहीं सगुण, कहीं निर्गुण रूप से चित्रित किया है। किंतु उनके राम तुलसीदास के ‘दशरथ सुत’ राम नहीं, कबीर आदि संत कवियों के आराध्य निर्गुण-निराकार राम हैं। जहाँ उन्होंने अपने ‘परमपति’ को निर्गुण-निराकार रूप में याद किया है, वहीं कबीर आदि ज्ञानी भक्तों के प्रभाव से उनकी भक्ति भावना रहस्यात्मक हो गई है—

मेरो को नहिं रोकणहार, मगन होइ मीरा चली।

लाज-सरम, कुल की मरजादा, सिर सैं दूरि करी।

मान-अपमान छोड़ घर पटके, निकसी हूँ ज्ञान-गली।

ऊँची अटरिया, लाल किवडि़या, निर्गुन सेज बिछी।

संत सच्चे ज्ञानी थे। संतों ने अपनी साधना पद्धति में नाथ संप्रदाय के निर्गुण बहन, हठयोग, ज्ञान की अंतर्मुखी साधना को अपना लिया था। उनके समय समाज के अंधविश्वास-कर्मकांडों में बलि-प्रथा, धर्म के नाम पर हिंसा, छुआछूत, ऊँच-नीच, जात-पाँत का बड़ा भेदभाव था। हिंदू-मुसलमानों का सांप्रदायिक विरोध भी चारों ओर फैला हुआ था। परंतु संत कवि समदर्शी थे, मानवतावादी थे, अहिंसावादी, सदाचारी और पाखंडों के विरोधी थे। उनकी तरह मीरा ने भी समाज में व्याप्त तमाम बुराइयों, अंधविश्वासों का पुरजोर विरोध किया। एक योगी की सीधी-सच्ची भक्ति-भावना मीरा में भी मिलती है। वे सहिष्णु हैं, क्षमाशील हैं, अहिंसक, करुणा-दयाशील हैं, सत्यवादी हैं, प्रेम की पवित्रता उनमें थी। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी लिखा है कि ‘मीराबाई अत्यंत उदार मनोभाव संपन्न भक्त थीं। उनके काव्य में हठयोग साधना के संकेत भी मिलते हैं, भले ही वे प्रतीकात्मक हैं। श्रीकृष्ण के प्रति उनकी अनन्यता ध्यान की एकाग्रता, संसार से विमुखता, माया-मोह से त्याग, आत्मचिंतन दर्शन की उत्कट लालसा पाई जाती है। उन्होंने अपने समकालीन अनेक संत-साधकों से सत्संग किया और उनके प्रभाव को ग्रहण कर अपने जीवन में उतारा, अपनी साधना में डाला। मीरा के विरह-वर्णन में गोस्वामी की सभी अंतर्दशाएँ मिलती हैं। उनके अतिरिक्त बल्लभ संप्रदाय का भी प्रकारांतर से प्रभाव परिलक्षित होता है। उनकी भक्ति का आधार पुष्टिमार्गी है। इस संप्रदाय ने साधना और व्यवहार-क्षेत्र में शुद्धाद्वैत दर्शन के साथ भक्ति को स्थान दिया है। मीरा ने भी अपने एक पदांश में इसकी पुष्टि की है—

गौर कृष्ण की दासी मीर, रसना कृष्ण बसै।

वृंदावन श्रीकृष्ण का परम धाम माना गया है, जो कि नित्य और परम आनंदमय है। वृंदावन की सजीव और निर्जीव प्रकृति श्रीकृष्ण से अभिन्न है। पुष्टिमार्गी कवियों ने उसकी खूब प्रशंसा की है। मीराबाई ने वृंदावन की छवि को इन पंक्तियों में व्यक्त किया है—

आली, म्हारे लागा वृन्दावन नीका।

घर-घर तुलसी, अंकुर पूजा, दरसन गोविंदजी की।

निरमल नीर बहत जमणा माँ, भोगन दूध-दही का।

रतन सिंहासण आप विराज्यै, मुकुट धरेवा तुलसी का।

कुंजन-कुंजन फिरत साँवरा, संवाद सुण्या मुखी का।

मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीका।

इस प्रकार श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरण सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, साख्य, आत्मनिवेदन नवधा भक्ति के नौ भेद हैं। पुष्टिमार्गी भक्ति में नवधा-भक्ति की बड़ी मान्यता है। मीरा की भक्ति दांपत्य भाव की है, यथा भज मन चरण कमल अविनासी। डॉ. सिंघल ने लिखा है, मीराबाई का गिरधर गोपाल से संबंध स्वकीया भाव का था, परकीया भाव का नहीं। मीरा ने होली के पद निर्मित किए हैं। विरह पद लिखे हैं, किंतु कहीं भी उन्होंने अपने पदों में दांपत्यभाव को व्यक्त नहीं किया है। श्रीकृष्ण अन्य स्त्रियों के प्रति अनुरक्त हैं, इसलिए मेरे से मिलते नहीं, बोलते नहीं, सेज सुख देते नहीं। इतना ही नहीं, उनको न मुरली से शिकायत है, न गोपियों से शिकायत है और न सखाओं से। यदि शिकायत है तो मात्र श्रीकृष्ण से है कि वह आकर विरहिणी मीरा में मिलते क्यों नहीं? दर्शन देते क्यों नहीं?

यहाँ यह विशेष ध्यातव्य है कि मीरा ने अपने समय के सभी संतों जैसे रामानुज, मधवाचार्य, रैदास, चैतन्य, विट्ठलनाथ तथा गोस्वामी भक्तों को अपना ‘गुरु’ माना है। वास्तविक रूप में गुरु वह होता है, जो अपने शिष्य को ‘गुरु मंत्र’ दीक्षा देता है और शिष्य उसका जीवन भर पालन करता है। कबीर ने कहा—

यह तन विष की बेलरी गुरु अमृत की खान।

सीस दिए जो गुरु मिलै तो भी सस्ता जान॥

इसी संदर्भ में गुरु माहात्म्य को प्रतिपादित करते हुए तुलसीदास लिखते हैं, ‘बिन गुरु होई न ज्ञान।’

तत्त्वतः गुरु वही है, जो आत्मज्ञान द्वारा मोक्ष-साधन का पाठ पढ़ाता है और आचरण कराता है। मनुष्य (भक्त) में जो बीड़ा रूप में रहता है, गुरु उसी को विकसित करता है, मंद सुगंध को बाहर निकालता है। मीरा के गुरु के बारे में कुछ विद्वानों का मत है कि रैदास उनके गुरु थे और उन्होंने काशी में जाकर उनके दर्शन किए थे। लेकिन यह भी सच है कि मीराबाई कभी काशी गई ही नहीं थीं। रैदास उनके भावनात्मक गुरु थे। इसी तरह उन्होंने सत्संग के दौरान जिन आचार्यों-महात्माओं, संतों के दर्शन किए, ज्ञान लिया, उन्हें अपने गुरु के रूप में मान लिया। यहाँ यह भी तथ्य विचारणीय है कि वे विभिन्न संप्रदायों से प्रभावित थीं।

प्रेम-योगिनी मीरा की भक्ति के संबंध में कई भ्रांतियाँ हैं। वे पगली-दिवानी, भक्ति में डूबी स्त्री नहीं थीं, बल्कि उनका लालन-पालन एक स्वाभिमानी, आत्मनिर्भर और जीवन की उठापटक से अवगत विवेकशील युवती के रूप में हुआ था। वे श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका थीं। वे प्रारंभ से ही श्रीकृष्ण को पति रूप में मानती थीं, अतः उनके आराध्य श्रीकृष्ण ही उनके सर्वस्व हैं—

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई।

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई॥

वह कहती हैं, मैं तो कृष्ण के रंग में रँग गई हूँ। वे मेरे पति हैं। अतः मैं विधवा नहीं, सौभाग्यशालिनी हूँ। इसलिए सभी शृंगार सजाकर, पैरों में घुँघरू बाँधकर और लोकलाज को छोड़कर मैं नाचती हूँ। साधुओं की संगति से मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई है और मैं सच्ची भक्तन बन गई हूँ। उन्होंने गिरधर लाल से रसीली (रागानुज) मधुर-भक्ति माँग ली है। क्योंकि—

मैं तो साँवरे के संग राची।

साजि सिंगार बाधि पग घुंघरू लोकलाज तज नाची।

गई कुमति, लई साधु की संगति, भगत रूप भई साँची।

गाय, गाय हरि के गुण निसदिन, काल व्याल मू बाँची।

उठा बिन सब जग खाटी लागत और बात सब काँची।

मीरा श्री गिरधर लाल सूं भगति रखीली जाँची।

वे श्रीकृष्ण को केवल पति रूप में ही नहीं मानतीं, उनकी इसी रूप में उपासना भी करती हैं। वे अपने पति के गुणों का गान करती हैं, उनकी मूर्ति के सामने नाचती हैं, गाती हैं और मुग्ध होती हैं। उनसे मिलने की उत्कट अभिलाषा अभिव्यक्त करती हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण पर अपना सर्वस्व निछावर कर दिया है। वे श्रीकृष्ण के युवारूप की उपासिका हैं। उन्हें अपने नैनों में बसा लेना चाहती हैं, ताकि वे हर समय उनके ध्यान में प्रतिबिंबित होते रहे—

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनी सूरत, साँवरी सूरत, नैना बने बिसाल।

अधर सुधारस मुरली राजत, उर वैजयंती माल।

छुद्र घंटिका कटि तट सोभित नूपुर सबद रसाल।

मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल।

ऐसे अनेक उदाहरण पेश किए जा सकते हैं, पर यहाँ मेरा उद्देश्य दृष्टांत देना नहीं, बल्कि उनकी भक्ति और उनके व्यक्तित्व के उन अछूते प्रसंगों पर प्रकाश डालना है, जो अब तक उजागर नहीं हुए। मीरा की भक्ति में निम्नांकित तत्त्वों का सुंदर समन्वय था, जिससे वे सिद्धि की ओर बढ़ी थीं। डॉ. मदनलाल शर्मा ने इन्हें तीन रूपों में माना है—

१. शांता भक्ति : जिसमें ज्ञान, सदाचार, सत्संग, तप, वैराग्य और सहिष्णुता होती है।

२. कांता भक्ति : जिसमें प्रेम, श्रद्धा, विरह ताप आदि का समावेश होता है। इसे माधुर्य भक्ति भी कहते हैं।

३. दास्या भक्ति : जिसमें भागवत की नवधा भक्ति और दास्य भावना की प्रधानता रहती है।

मीरा यद्यपि श्रीकृष्ण के माधुर्य भाव की संपोषिता थीं, परंतु उन्होंने ज्ञान, वैराग्य, सदाचार और सत्संग का पूर्ण परिपालन किया था।

मीरा की भक्ति के मुख्यतः दो प्रकार हैं—साधन रूपा और साध्य रूपा। साधन रूपा भक्ति को नवधा भक्ति भी कहते हैं। इसके अंतर्गत श्रवण-कीर्तन, पूजन, पाठ-सेवन आदि का विधान होता है। साध्य रूपा भक्ति प्रेममयी होती है। इसके अंतर्गत भक्त भक्ति की भी चिंता नहीं करता। मीरा की भक्ति साधन रूपा है और साध्य रूपा भी। उनकी साधन रूपा भक्ति पर एक ओर बल्लभ संप्रदाय का प्रभाव है तो दूसरी ओर वे चैतन्य संप्रदाय से भी प्रेरित-प्रभावित थीं।

यहाँ यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि भक्ति-भावना को लेकर उत्तरी भारत में मध्ययुग (भक्तिकाल) में भक्ति की जो धारा प्रवाहित हुई, वह दक्षिण से आई थी। निंबकाचार्य हों या श्री वल्लभाचार्य, दोनों दक्षिण के ब्राह्मण थे। कुछ विद्वान् निंबार्कीय संप्रदाय को वैष्णव भक्ति का प्राचीनतम संप्रदाय मानते हैं। यह संप्रदाय सनकादि संप्रदाय के अंतर्गत आता है। इस संप्रदाय का दार्शनिक सिद्धांत भेदाभेदवाद या द्वैतवाद है। जीव अवस्था भेद से ब्रह्म के साथ भिन्न भी है तथा अभिन्न भी है। जीव ब्रह्म का अंश है, ब्रह्म अंशी है। जीव अणु है, अल्पज्ञ है। भक्ति ही मुक्ति का साधन है। विष्णु के अवतार रूप में कृष्ण ही उपास्य हैं। राधा-कृष्ण (यानी गोलोक बिहारी कृष्ण) का विधान इस संप्रदाय में है। इसे चैतन्य संप्रदाय भी कहते हैं। मीरा में स्वकीया मधुरा भाव के साथ परकीयामूलक सख्य भाव भी मिलता है। वह राधा और गोपी दोनों रूपों में श्रीकृष्ण को अपना पति और सखा मानती हैं—‘मीरा के प्रभु श्याम मनोहर प्रेम पियारा मीत।’

बल्लभाचार्य का राधा-कृष्ण संप्रदाय आज संपूर्ण उत्तरी भारत में विख्यात है। सम्राट अकबर भी उनकी विद्वत्ता से प्रभावित थे। मीरा उक्त दोनों संप्रदायों के अतिरिक्त अपने आध्यात्मिक जीवन में तत्कालीन अन्य संप्रदायों, भक्तिधाराओं से प्रभावित थीं। उनके भक्ति-भावों को आत्मसात् कर उन्होंने अपनी भक्तिधारा को प्रवाहित किया। मीरा में कबीर और तुलसी की तरह आत्मनिवेदन भक्ति-भाव है। आत्मनिवेदन भक्ति का मूलाधार है। वे असहाय अबला नारी थीं, फिर विधवा होने के कारण समाज से तिरस्कृत भी थीं। अतः उन्होंने अपना हृदय अपने सच्चे प्रियतम श्रीकृष्ण के सामने खोलकर रख दिया—‘हरि मेरे जीवन प्राण आधार।’

उक्त दोनों आचार्य भक्तिधारा के दो मजबूत कगार थे, जिनके बीच पूरी कृष्णभक्ति-सरिता प्रवाहित रही। मीरा इन दोनों कगारों की सेतु सी थीं। दोनों के ज्ञान-गुण-वैशिष्ट्य उनकी भक्ति में सम्मिलित थे। कर्नल टोंड ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘एनल्स एंड एक्टिंटीज ऑफ राजस्थान’ में लिखा है कि असाधारण सौंदर्य और रूहानी भक्ति के कारण वे अपने समय की सर्वाधिक यशस्वी राजकुमारी थीं। उनका इतिहास एक प्रेमाख्यान है। वे उत्कृष्ट कोटि की कवयित्री थीं और उनकी कविता जनसाधारण में लोकप्रिय थी।

मीराबाई के समस्त पदों में न तो श्रीकृष्ण के रूप-वर्णन की विशेषता है और न लीला-वर्णन की। उसमें भक्ति की गहरी भावना और समर्पण, सदाचार, वैराग्य, विनय, त्याग, तप-सहिष्णुता और संतोष के साथ अप्रतिम प्रेम, विरह, मिलन का भाव व्यंजित हुआ है। कहीं-कहीं उनके पदों में उन्माद—‘आयो सजना, फिरी गए अंगना में अभागन रही सोय री’ और मूर्च्छा भाव की अभिव्यक्ति देखिए—

पग घुंघरू बाँधि मीरा नाची रे!

मैं तो मेरे नारायण की आप ही हो गई दासी रे!

लोग कहें मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे!

विष का प्याला राणा भेज्या पीवत मीरा हँसी रे!

मीरा के प्रभु गिरधर नागर सहज मिले अविनासी रे!

मीराबाई जहाँ सगुण ब्रह्म की उपासिका थीं, वहीं निर्गुण ब्रह्म के प्रति भी उनमें गहरा आस्था-भाव निहित था। यानी वह सगुण-निर्गुण दोनों भक्तिधाराओं से प्रभावित थीं। बचपन में ही श्रीकृष्ण की मूर्ति प्राप्त होने से उनके मन में कृष्ण के प्रति असीम श्रद्धा और भक्ति ने जन्म ले लिया था, जो आगे चलकर और प्रगाढ़ होती गई और वे पूर्णतः कृष्ण को समर्पित हो गईं—‘मीरा मगन भई हरि के गुण गाय। मस्त भजन भाव में भरत डोलती गिरधर पैदल जाय।’

भले ही मीरा की सगुण भक्ति में निर्गुण उपासना का कोई स्थान नहीं है, लेकिन यह तय है कि वे ‘नाथपंथ’ से प्रभावित थीं। यही कारण है कि नाथपंथियों की निर्गुण भक्तिधारा की कुछ लहरें इनके काव्य में दिखाई देती हैं। साधना शौर्य में मीरा को सगुण-निर्गुण भक्ति के बीच की कड़ी कह सकते हैं। उनके पद (काव्य) अनुभूतिजन्य हैं, इन्हें आध्यात्मिक अनुभूतियों का संघट्ट कह सकते हैं। अपने युग की सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतियों प्रवृत्तियों और परंपराओं का भी प्रकारांतर से उन्होंने अपने पदों में उल्लेख किया है। ये उनके काव्य के सहज स्वाभाविक चित्रण हैं। उनके द्वारा रचित पूर्ण और अपूर्ण जो रचनाएँ प्राप्त हैं अथवा जिनका उल्लेख मिलता है, कुल ग्यारह हैं। डॉ. ब्रजेंद्र कुमार सिंघल ने भी अपने शोधात्मक लेखों में उनकी कई प्रामाणिक रचनाओं का जिक्र किया है।

मीराबाई के काव्य उनके हृदय से निकले सहज प्रेम-भावों, उच्छ्वासों का शब्दांकन हैं। उनमें उनकी वृत्ति सर्वथा प्रेम-माधुरी से सिक्त है। अपने आराध्य ‘गोपाल’ की विराट् छवि-छटा का वर्णन वे अनेकशः रूपायामों में करती हैं—

विरहनी बाबरी सी भई।

ऊँची चढि़ अपने भवन में टेरत हाय दई।

ले आंधरा मुख अंसुवन पोछत उघरे गात सही

मीरा के प्रभु गिरधर नागर बिछुरत कछुन कही॥

× × ×

जब से मोहि नंदनंदन दृष्टि पड्यो भाई।

तब से परलोक लोक कछुना सुहाई।

× × ×

मेरी उनकी प्रीति पुराणी उन बिन पल न रहाऊँ।

जहाँ बैठाए तितही बैठूँ बेचे तो बिक जाऊँ।

इस प्रकार मीरा का संपूर्ण काव्य आत्म-व्यंजक काव्य है। उनके भक्ति-भावों का उनके जीवन से सीधा संबंध है। उनके पदों में उनके जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख, बरताव, व्यवहार क्रमशः निर्धारित हुए हैं। उनके काव्यों में प्रेम, प्रकृति, सहस्य, दर्शन, अध्यात्म से योग-वियोग आदि मनोवृत्तियों के चित्र मिलते हैं—

१. फागुन के दिन चार रे, होरी खेल मना रे!

२. भज मन चरण कमल अविनासी

३. रमिया बिन नींद न आवै

४. ऊची चढ़-चढ़ पंथ निहारूँ रोय-रोय अँखिया राती।

अस्तु, संक्षेप में कह सकते हैं कि मीरा का काव्य उच्च कोटि का साधना-काव्य है। वे प्रतीकात्मक और लाक्षणिक शब्दावली का प्रयोग करती थीं। लाक्षणिकता के कारण उनके कथन में चमत्कार, सजीवता और साहित्यिकता का अंश बढ़ गया है। कविता करना उनका उद्देश्य नहीं था, बल्कि उनकी भावनाएँ अनायास ही काव्यधारा में बहने लगती हैं—गीत की गुणात्मक ऊँचाई और गेयता की लयात्मकता उसका वैशिष्ट्य है। गेयता के तीनों तत्त्व—स्वर, ताल और लय का सुंदर समन्वय है। नाद-सौंदर्य पूर्ण रूप से संयत्र और व्यवस्थित है। अतः यह कहना अत्युक्तिपरक न होगा कि गेयता की दृष्टि से मीरा के पद सर्वोत्कृष्ट हैं।

साहित्य कुटीर, साइट २/४४

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