यात्रा मालवांचल की

यों तो प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में कहीं-न-कहीं यात्रा करता ही है। कुछ स्थल ऐसे भी होते है, जहाँ बार-बार जाने को मन करता है। इसी क्रम में हमें भी मध्य प्रदेश के मालवांचल क्षेत्र में पुनः भ्रमण करने का सुअवसर मिला। हिंदीसेवी डॉ. प्रभु लाल चौधरी ने ८ अप्रैल, २०१७ को नागदा (जिला उज्जैन) में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुझे और सुपरिचित संपादक मित्र उमाशंकर मिश्र को विशिष्ट अतिथि के रूप में विधिवत् आमंत्रित कर लिया। यह तो बहाना बन गया। बस मन में था—मालवांचल की यात्रा, विशेष रूप से महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर और महेश्वर के दर्शन करना। धर्म-कर्म के मामले में हमारी गृहिणियाँ हमसे भी चार कदम आगे रहती हैं। जैसे ही इन्हें मालूम पड़ा, ये पहले से ही तत्पर मिलीं। नेट पर आरक्षण देखा तो किसी भी रेलगाड़ी में उपलब्ध नहीं था, लंबी प्रतीक्षा सूची थी।

फिर सोचा, खिड़की से ही टिकट ले लिया जाए। कम-से-कम ट्रेन में तो घुस जाएँगे। पालम जाकर रेल आरक्षण कराने पहुँचे तो आसानी से आरक्षण मिल गया। इसका अर्थ था कि नेट पर आरक्षण का कोटा अलग होता है और खिड़की से टिकट लेने पर अलग। यही युक्ति मिश्रजी को बताई तो उन्हें भी सपत्नीक आराम से आरक्षण मिल गया।

७ अप्रैल की रात्रि १० बजे हम चारों (मैं, श्रीमती पुष्पा पाल, उमाशंकर मिश्र और श्रीमती ऊषा मिश्र) इंदौर इंटरसिटी के सहयात्री बन गए। संगोष्ठी का उद्घाटन करने के लिए केंद्रीय मंत्री डी. थाबरचंद गहलौत भी इसी गाड़ी से दूसरे डिब्बे में यात्रा कर रहे थे। ८ अप्रैल की प्रातः कोटा पार कर रेलगाड़ी शामगद आ चुकी थी। नागदा से पहले महीदपुर स्टेशन भी पड़ा। तब हमें पता चला कि डॉ. प्रभु चौधरी यहीं के रहनेवाले हैं, जो उज्जैन से ७५ किमी. दूर है, जबकि अभी तक हम महीदपुर को उज्जैन शहर का ही एक मोहल्ला समझते थे। उनका पता भी रहता था—महीदपुर, स्टेशन रोड, उज्जैन। बाद में पता चला, महीदपुर गाँव तो महीदपुर रोड स्टेशन से २०-२५ किमी. दूर है, स्टेशन रोड तो अलग ही बसावट है। इंटरसिटी अपने निर्धारित समय से २० मिनट पहले, यानी ८:२० पर ही नागदा जंक्शन पहुँच गई। स्टेशन पर केंद्रीय मंत्री के स्वागत में उनके अनुयागियों की भारी भीड़़ थी। गहलौतजी यहीं से सांसद हैं और पास के रूपटा गाँव के ही मूल निवासी हैं। प्रभु चौधरी मंत्रीजी के साथ-साथ हमें भी लेने आए हुए थे। मंत्रीजी से हमारा परिचय कराया। मैंने कहा, ‘‘मंत्रीजी, दिल्ली में आपका स्वागत करने का अवसर मिल नहीं पाता। यहाँ आपके अपने शहर नागदा में आपका हम स्वागत कर लेते हैं।’’ मंत्रीजी हमारी व्यंग्योक्ति समझ गए और बोले, ‘‘चलिए, मैं थोड़ी देर में ही आपके कार्यक्रम में आता हूँ।’’

प्रभु चौधरी अपनी कार से हमें स्टेशन के ही पीछे स्थित सरकारी गेस्ट हाउस ले आए। हम दोनों के लिए अलग-अलग दो कमरे खुलवा दिए। यहाँ के रखवाल (केयर टेकर) किशोर सिंह सोलंकी ने गरमागरम कम मीठे की चाय पिलाकर (वरना यहाँ ज्यादा मीठे की चाय पीने का रिवाज है) यात्रा की थकान दूर कर दी। स्नानादि से जल्दी ही निवृत्त होकर हम कार्यक्रम के लिए तैयार हो गए। थोड़ी देर बाद जसवंत सिंह (वाहन चालक) हमें लेने आ गया। नागदा शहर के पूर्वी क्षेत्र से बाहर निकलकर लगभग १०-१२ किमी. दूर एकदम से घनघोर जंगल में स्थित है—स्वामी विवेकानंद शासकीय महाविद्यालय। ‘सामाजिक संदर्भों में डॉ. आंबेडकर चिंतन’ विषयक राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में हम दोनों के व्याख्यान हुए। यहाँ साहित्य मंडल के श्याम प्रकाश देवपुरा और भीलवाड़ा के सत्यनारायण मधुप, अजमेर की डॉ. चेतना उपाध्याय, उज्जैन की डॉ. तारा परमार से सुखद भेंट हुई। सत्र समाप्ति पर सहभोज का आनंद लिया और तृप्त हुए। यहाँ के भोजन में हलकी मिठास रहती है। चाहे समोसे हों या सब्जी, दाल और रायता। लगता है, गुजराती असर है। वैसे भी गुजरात यहाँ से नजदीक ही है। पुष्पा पाल ने तो यहाँ के हलवाइयों से व्यंजनों में मीठा डालने की विधि भी सीख ली।

संगोष्ठी की हमारी औपचारिकताएँ पूरी हो चुकी थीं। अब हमें उज्जैन पहुँचने की जल्दी थी। मालूम किया तो पता चला कि ३ बजे रेलगाड़ी जाती है। तुरंत डी. चौधरी के कार चालक जसवंत को जगाया, उसने अभी भोजन भी नहीं किया था, वह हमें लेकर १० मिनट में स्टेशन छोड़ गया। वरिष्ठ नागरिकता का लाभ उठाकर जल्दी से टिकट लेकर रेलगाड़ी पकड़ी। यह रतलाम-इंदौर पैसेंजर थी। लगभग खचाखच भरी हुई थी। दिल्लीवाली तिकड़म भिड़ाकर टिकने भर की सीट हथिया ली। उमाशंकर मिश्रजी को तो ऊपर (सामान रखने की रेक) बैठकर ही संतोष करना पड़ा। यहाँ पर यात्रियों को समायोजित करने की परंपरा नहीं है। वरना दिल्ली में तो एकवाली सीट पर चार यात्री तक बेहिचक यात्रा करने के अभ्यस्त होते हैं। जिस सीट पर हम कुल पाँच लोग थे, उस पर दिल्ली की सवारी गाडि़यों में ८-९ खुशी-खुशी बैठ जाते हैं। खैर, थोड़ी दिक्कत जरूर हुई, मगर हम नागदा से चलकर शाम को ५ बजे उज्जैन जंक्शन आ गए। फोन कर डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा (कुलानुशासक विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन) को बुलाया। डॉ. शर्मा हमारे लिए ऑटो लेकर आए और महाकाल मंदिर के समीप ही हरे कृष्णा पैलेस होटल भेज दिया। प्रथम तल पर आरामदायक कमरे थे। थोड़ी देर आराम किया, तरोताजा होकर महाकाल दर्शन के लिए चल पड़े।

सामने ही मंदिर प्रतिष्ठित ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर था। हम दोनों तो १०-१२ वर्ष पहले यहाँ दर्शन कर गए थे, मगर मिश्र दंपती पहली बार ही आए थे। अब मंदिर में पहले की व्यवस्थाएँ लगभग पूरी तरह बदल चुकी थीं। जहाँ पहले पूर्वी द्वार से ही मंदिर में प्रवेश की व्यवस्था थी, अब यहाँ से सिर्फ २५० रुपए शुल्क देनेवाले टिकटधारी ही प्रवेश कर सकते थे। सामान्य दर्शनार्थी पीछे दक्षिणी भाग से प्रवेश करते हैं।

भगवान् के दर्शन (वह भी भोले भंडारी के दरबार) के लिए २५० रुपए की परची से वी.आई.पी. प्रवेश देखकर मन क्षुब्ध हो गया। ऐसा नहीं कि हम २५० रुपए प्रवेश शुल्क नहीं दे सकते, मगर ईश्वर या देवता या इष्ट अपने दर्शनों के लिए प्रवेश शुल्क स्वीकार नहीं करते होंगे, ऐसा हमारा विश्वास है। यहाँ पर मोबाइल और चूते-चप्पलें रखने की व्यवस्था काफी दूर अलग दिशाओं में है, जबकि २५० रुपएवालों के लिए पूर्वी प्रवेश द्वार के निकट ही है। हालाँकि ये व्यवस्थाएँ निःशुल्क हैं, फिर भी श्रद्धा के नाम पर कुछ भी प्रतिदान की मनाही भी नहीं है, बल्कि ऐसी अपेक्षा ही सेवारत कर्मियों की रहती है। कई घुमावदार कतारों (बेरीकेटों) से होकर तलघर में स्थित महाकाल के दरबार में आ ही गए। पहले दर्शनार्थी सीधे शिवलिंग तक पहुँचकर दर्शन और अर्चना कर सकते थे, किंतु अब दूर से दर्शन संभव है। अब अपने हाथ से पूजा-अर्चना का अवसर दर्शनार्थियों को नहीं मिल पाता है। कुछ वी.आई.पी. या पैसे देकर दर्शन करने आए भक्तों को थोड़ा निकट बैठने का अवसर मिल जाता है। शेष सभी थोड़ी दूर से ही शिवलिंग के दर्शनों का लाभ उठा पाते हैं।

श्री महाकालेश्वर शिवलिंग भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यह गर्भगृह में स्थित है। भूतल पर ओंकारेश्वर और ऊपरी तल में नागचंद्रेश्वर विराजमान हैं। यहाँ भक्तिभाव से दर्शन करने के उपरांत मंदिर परिसर से बाहर आए। पश्चिम दिशा में कोटितीर्थ नामक विशाल कुंड है। भक्त लोग पहले यहाँ स्नान करने के उपरांत ही महाकाल के दर्शन को जाते हैं। यहीं पर महाराजा विक्रमादित्य का दर्शन स्थान है। इसके निकट ही पश्चिम दिशा में विक्रमादित्य की कुलदेवी हरिसिद्धि देवा दुर्गा के ५२ शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ पर देवी की कोहनी गिरी थी। यहाँ दर्शनों की सुंदर व्यवस्था है। भक्त आराम से गर्भगृह तक जा सकते हैं। बाहर मंदिर प्रांगण में दो विशाल दीप-स्तंभ (दीपक मीनारें) हैं। जिन पर सैकड़ों दीपक एक साथ जलाए जाते हैं। देवी हरसिद्धि के दिव्य दर्शन कर दीप प्रज्वलन का भव्य दृश्य देखा। चार लोग (पुजारी) चारों दिशाओं से जलती हुई मशाल लेकर दिवालों (दीपक रखने का स्थान) पर पैर रखकर ऊपर चढ़ जाते हैं और ऊपर से दीपक को चारों ओर से प्रज्वलित करते हुए नीचे उतरते जाते हैं। जब सभी दीपक प्रज्वलित हो उठते हैं, तो नयनाभिरामी छटा बिखर जाती है। ऐसा अनुपम अनुभव संभवतः अन्यत्र देखने को नहीं मिले। दीपक स्तंभ का देवालयों में निर्माण मराठा वास्तुशिल्प की देन है। मराठा पेशवाओं का इस क्षेत्र में लंबे समय तक शासन रहा है।

हरसिद्धि से लौटे तो महाकाल मंदिर के पश्चिम में स्थित श्री बड़े गणेशजी मंदिर में विशालकाय गणपति के दर्शन किए। इसी मंदिर में पंचमुखी हनुमानजी के भी दर्शन होते हैं। यहीं खगोलीय कक्षाक्रम में नवग्रह भी विराजित हैं। मंदिर प्रांगण छोटा सा ही है।

यहाँ से हमने काल भैरव के लिए ऑटो किया। उज्जैन की सँकरी और भीड़ भरी गलियों से होकर अंकपात क्षेत्र (संदीपनी आश्रम) से होते हुए शहर से बिल्कुल बाहर ५ किमी. दूर क्षिप्रा नदी पार कर पुराण प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर आए। विशाल प्रांगण में ऊँचे टोले पर स्थित कालभैरव को सुरा पिलाने की परंपरा है। ऑटो चालक ने हमसे प्रसाद रूप में मदिरा चढ़ाने को कहा। मैंने कहा, ‘‘जब हम ही मदिरापान नहीं करते तो हमारे देवता क्यों कर मदिरा पान करेंगे।’’ हमने पुष्पादि से ही काल भैरव की अर्चना की। यहाँ के पुजारी आपसी वार्त्तालाप में ही व्यस्त थे, उन्हें दर्शनाथियाँ के आने-जाने से कोई मतलब नहीं था।

मंदिर में यह व्यवहार अशोभनीय ही था। ऑटो चालक ने बताया कि तथाकथित भक्त मदिरापान कर रास्ते में दर्शनार्थियों से अभद्र व्यवहार करते हैं और लूटपाट तक कर डालते हैं।

दर्शन कर अपने ठिकाने (लॉज) पर आए। रात घिर चुकी थी। मिश्रजी हमारे पड़ोसी कमरे में ही थे। उन्हें अचानक उल्टियाँ होने लगीं, जबकि उन्होंने शाम को खाना भी नहीं खाया था। खाली पेट रहना ठीक नहीं था तो मैं नीचे उतर पास की ही दुकान से दूध लेने आया। दुकान की मालकिन बलिष्ठ बुजुर्ग महिला थी, जो सभी कार्य बहू और बेटे से कराने की अभ्यस्त थी। दुकान बढ़ाई (बंद) जाने के कगार पर थी। मालकिन ने दूध देने से पहले प्रश्नों की झड़ी लगा दी। कहाँ से आए हो, क्या करते हो, किस समाज (जाति) के हो आदि-इत्यादि। ऐसे-तैसे दूध लेकर ऊपर कमरे पर आए, लेकिन मिश्रजी ने दूध पिया ही नहीं। आधी रात के तकरीबन उन्हें फिर से उल्टियाँ हो गईं। उनका खाया-पीया सबकुछ निकल गया। मिश्रजी ने कोल्ड ड्रिंक की इच्छा व्यक्त की। मैंने दोनों देवियों को, बाजार जो पास ही था, भेजा। देर रात तक यहाँ खाने-पीने की दुकानें खुली ही रहती हैं। बाद में मिश्रजी को आराम पड़ा तो हमें नींद आ पाई।

अगले दिन ९ अप्रैल को प्रातः रात की जगार के कारण देर से ही जग पाए, अन्यथा हमारा इरादा था कि मंदिर में अंदर न जाकर बाहर स्क्रीन पर ही भस्म आरती के दर्शन कर लेंगे। मंदिर के चारों ओर दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए बड़े-बडे़ टी.वी. स्क्रीन लगे हुए हैं, जिन पर मंदिर के गर्भगृह में चल रही पूजा-अर्चना के लाइव दर्शन किए जा सकते हैं। अब पुनः लंबी लाइन में लगकर दर्शन करना हमें व्यावहारिक नहीं लगा। बस स्क्रीन पर ही देखकर महाकाल को प्रणाम कर लिया। घूमते हुए हरसिद्धि मंदिर आए, प्रातःकालीन आरती में सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त किया।

अब हमें इंदौर अगली यात्रा पर जाने की जल्दी थी। कमरे पर आए, तभी लाइट भी चली गई। सामान पहले ही समेट लिया था। मिश्र परिवार से विदा लेकर बाहर आए। मिश्रजी को आज शाम ही नागदा से इंटरसिटी से दिल्ली वापस लौटना था और हमें अगले दिन इसी गाड़ी से इंदौर से वापस आना था। बाहर से ऑटो करके जल्दी ही रेलवे स्टेशन आए। आज प्रातः होने के कारण भीड़ कम थी इंदौर की टिकट ली। बुकिंग क्लर्क ने ही बता दिया कि सामने उदयपुर एक्सप्रेस खड़ी है इंदौर जाने के लिए। जैसे ही हम प्लेटफॉर्म पर आए गाड़ी तुरंत चलने को खड़ी थी। आराम से सीट मिल गई, तुरंत ही गाड़ी चल दी। मानो हमारे ही आने की प्रतीक्षा कर रही हो। एक्सप्रेस थी तो रास्ते के चिंतामणि गणेश, लकोदा, फतेहाबाद, चंद्रवतीगंज, अजनोद-बालौदा पालिया आदि स्टेशनों पर रुकने का सवाल ही नहीं था। मगर इसकी कसर इंदौर से एक स्टेशन पहले लक्ष्मीबाई नगर पर आधे घंटे से अधिक समय तक सिग्नल की प्रतीक्षा में रुककर पूरी कर ली। इतिहास प्रसिद्ध महारानी अहिल्याबाई होलकर की नगरी इंदौर में लक्ष्मीबाई के नाम पर रेलवे स्टेशन है, देवी अहिल्याबाई के नाम पर नहीं। रेलवे विभाग की यह बलिहारी ही है कि लक्ष्मीबाई की राजधानी रही झाँसी में या इसके आस-पास महारानी लक्ष्मीबाई के नाम पर किसी स्टेशन का नाम नहीं है, जबकि वहाँ से सैकड़ों किमी. दूर इंदौर में है।

इंदौर मराठाकालीन होलकर वंश की राजधानी रहा है। मध्य प्रदेश का प्रसिद्ध औद्योगिक व्यापारिक नगर है। मराठा शासन के प्रभाव से यहाँ पर अभी भी मराठी भाषा शिक्षण का माध्यम है। हमें अभी आगे की यात्रा पर जाना था। स्टेशन से बाहर आकर पूछताछ की तो बताया गया कि दस कदम पर ही सरवटे बस स्टैंड है। यह दस कदम की दूरी कम-से-कम आधा किमी. तो थी ही। अंततोगत्वा हमें यहाँ से महेश्वर जाने की सीधी बस मिल गई। आराम से सीट ली। ठीक १० बजे बस चल पड़ी। इंदौर शहर की चौड़ी साफ-सुथरी सड़कों से बाहर हाईवे पर आए, (इंदौर भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित भी किया गया है।)

यह आगरा-मुंबई राजमार्ग था। लगभग ९० किमी. की दूरी बस ने ढाई घंटे में पूरी की। मालवांचल काली मिट्टी वाला उपजाऊ क्षेत्र है, किंतु कृषि वर्षा आधारित ही है। सिंचाई के अभाव में खेती सामान्य ही है। यह राजमार्ग कई पहाडि़यों को काटकर बीच में से निकाला गया है। इंदौर से २५ किमी. दूर डॉ. आंबेडकर की जन्मस्थली महू इसी राजमार्ग से थोड़ा हटकर ही है। यहाँ के लिए अलग से रेलवे लाइन है। इंदौर से राजेंद्र नगर, राऊ हरियाणा खेरी होकर मात्र २१ किमी. का महू तक रेलवे ट्रैक है। इसी राजमार्ग पर ‘गुजरी’ नामक स्थान से प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मांडू, जो रानी रूपमती और मुसलिम शासक बाजबहादुर की प्रेम कथा का केंद्रबिंदु है, यह इंदौर से १०० किमी. और महू से ८८ किमी. दूर धार जिले में है। हमने राजमार्ग से धामनोद उतरकर १३ किमी. दूर चिर-प्रतीक्षित देवी अहिल्या नगरी महेश्वर में प्रवेश किया।

महेश्वर पुराण प्रसिद्ध माहिष्मती नाम का नगर, पवित्र नर्मदा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित ऐतिहासिक शहर है। स्कंद पुराण के ‘नर्मदा रहस्य खंड’ और महाकवि कालिदास के रघुवंश काव्यग्रंथ में माहिष्मती-माहात्म्य का विशेष वर्णन है। ऐसी मान्यता है कि लगभग ४००० वर्ष पूर्व हैहयवंशी माहिष्मान राजा ने यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की थी। तत्पश्चात् राजा नीलधवज, चेदीवंशी, शिशुपाल, सुबंधु, कार्तवीर्यार्जुन, कलचुरी राजाओं के उपरांत होलकर साम्राज्य की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर (३१ मई, १७२५—१३ अगस्त, १७९८) ने इसे राजधानी बनाकर महत्ता प्रदान की। इतिहासविदों के अनुसार महेश्वर ही वह प्राचीन माहिष्मती नगर है, जहाँ आदिम मानव सभ्यता एवं संस्कृति की २००० से ८०० ई.पू. शुरुआत हुई थी। यहाँ नर्मदा नदी का विशाल पाट, सुरम्य घाटों, छतरियों, अनेकानेक देवालयों और विशाल किले के रजवाड़े में देवी अहिल्याबाई की राजगद्दी, उनका देव पूजा-स्थल आदि के दर्शन करते हुए हम देवी अहिल्याबाई होलकर का पुण्य स्मरण करते हुए श्रद्धानवत होकर मंत्रमुग्ध हो गए।

विकट दोपहरी होते हुए भी हम राजवाड़े के भ्रमण का लोभ सँवरण नही कर पाए। नर्मदा के पवित्र जल से हाथ-मुँह धोकर ऊपर पानी दरवाजे से राजवाड़े में प्रवेश किया। लगभग ५०० फीट ऊँचा यह किला, पुराणेतिहासिक माना जाता है। इसे आधुनिक रूप देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपने शासन काल (१७८८-१७९५ ई.) में दिया। इसकी परिधि २ वर्ग किमी. है। किले में प्रवेश के लिए पाँच दरवाजे हैं—अहिल्या द्वार, कमानी, गाड़ी दरवाजा, मंडसों और पानी दरवाजा। किले में अनेक मंदिर भी हैं, जिनमें प्रमुख हैं—चिंतामणि गणेश, श्री मल्हारी मार्तंड और देवी अहिल्याबाई का देव पूजा-गृह। इस किले के दक्षिण-पश्चिमी कोने में अहिल्याबाई की बैठी हुई सफेद संगमरमर की भव्य प्रतिमा है। इसी कक्ष में बैठकर वे अपने राज्य-कार्य का संचालन करती थीं। एक सशक्त राज्य की साम्राज्ञी कितने साधारण ढंग से रहती थी, इसकी मिसाल विश्व-इतिहास में मिलनी मुश्किल है। उन्होंने राजकोष को जनता-जर्नादन के कल्याणार्थ खर्च कर दिया। देशभर के सभी तीर्थस्थलों में भेंट, पूजा-पाठ, जीर्णोद्धार, मंदिर, घाट, धर्मशाला, अन्नक्षेत्र, सदावर्त और कुएँ-बाबडि़याँ बनवाना। वृक्षारोपण, सड़कों की मरम्मत करवाने के साथ ही मंदिर-मसजिद, मजारों-विप्रों, मुल्ला-फकीरों को अनुदान देकर सर्वधर्म समभाव का शासन कर प्रजा के दिलों में अपना स्थायी प्रभाव बना लिया था। कर्नाटक और गुजरात से मुसलिम बुनकर (रहवा) को बुलाकर महेश्वरी साड़ी-उद्योग राजवाड़ा में स्थापित करवाया। आगुंतकों को रानी महेश्वर में बने वस्त्र ही भेंट स्वरूप प्रदान करती थीं। किले में बनी तीन मजार उनके कार्यकाल में ही बनीं, जो उनके सर्वधर्म समभाव की जीवंत प्रतीक हैं।

राजवाड़ा में खुले मैदान में अष्टधातु की ३ फीट ऊँची देवी अहिल्याबाई की आकर्षक प्रतिमा है, जिसे धुले (महाराष्ट्र) के पूर्व विधायक अनिल अन्ना साहिब गोरे ने स्थापित कराया है। साधारण सा राजदरबार, ऊपर के एक कक्ष में देवी का निवास, शेष कक्षों में उनकी दासियाँ (परिचारिका) रहती थीं। स्वर्ण-झूला, जिसमें दुर्लभ दक्षिणमुखी शंख रखा है, पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहता है। इंदौर के इतिहासविद् साहित्यकार डी. गणेश शंकर मतकर ने इतिहास-संदर्भित अभिलेखों से मार्गदर्शक पट्टिकाएँ लगवाई हैं। किले के नीचे नर्मदा तट पर अहिल्याबाई की छतरी, दहन-स्थल और सुरम्य घाट है, जो भारतीय वास्तुशिल्प की उत्कृष्ट छटा प्रस्तुत करते हैं। इसके अतिरिक्त महेश्वर में विंध्यवासिनी भवानी माता मंदिर, केशव मंदिर, जालेश्वर कालेश्वर, काशी विश्वनाथ, शिवालय, पं. मंडन मिश्र का समाधि क्षेत्र, राजराजेश्वर शिवालय, मातंगेश्वर मंदिर एवं भर्तृहरि गुफा, पंडरीनाथ मंदिर, बाणेश्वर मंदिर (नर्मदा की तेज बहती जलधारा के बीचोबीच स्थित), शालिवाहन मंदिर, श्रीदस्त मंदिर, जैन मंदिर, शाही मकबरा और अनेक मजार भी दर्शनीय हैं।

राजवाड़ा से उतरकर हम नीचे आए। यहाँ मैदान में पंचकोसी यात्रा की तैयारी चल रही थी। ऑटो की प्रतीक्षा की, मगर कोई सवारी उपलब्ध ही नहीं थी। अंततः एक युवक ने अपनी बाइक से हमें बाहर बस स्टैंड तक छोड़ दिया। अब हमारा अगला पड़ाव ओंकारेश्वर था। यहाँ के लिए सीधी बसें कम ही हैं। जब तक बस आई, तब तक पेट-पूजा का कार्य हमने चावलाजी के होटल में संपन्न किया। होटल मालिक जसबीर चावला ने बताया कि विगत २०० वर्षों से उनकी पाँच पीढि़याँ यहीं पर रह रही हैं। संभवतः देवी अहिल्याबाई के शासनकाल में ही यह परिवार पंजाब से यहाँ आया होगा। शुद्ध शाकाहारी, बिल्कुल घर जैसे स्वादिष्ट खाने से मन तृप्त हो गया। लगभग ३ बजे एक छोटी बसवाले संवाहक ने हमें ओंकारेश्वर के लिए अपनी बस में बिठा लिया, जबकि यह बस खंडवा के लिए जा रही थी। बस यात्रा में हम घमनोद-महेश्वर-बड़बाह मार्ग पर आगे बढ़े। नर्मदा की पवित्र जलधारा कुछ दूर तक सड़क के साथ-साथ बह रही थी, फिर यह दूरी बढ़ने के कारण अदृश्य हो गई। सहयात्रियों ने बताया कि यह बस ओंकारेवर नहीं जाएगी। आपको बड़वाह या फिर सनावद छोड़ देगी। वहाँ से दूसरी बस ओंकारेश्वर के लिए मिलेगी। हमें बस संवाहक पर क्रोध आया। मगर उसने बताया कि ६:३० बजे तक आपको ओंकारेश्वर पर पहुँचा दिया जाएगा। स्थानीय सवारियाँ चढ़ती-उतरती रहीं। बड़वाह इंदौर-खंडवा मार्ग का नर्मदा के पश्चिमी तट का प्रमुख शहर है, जो यहाँ का व्यापारिक केंद्र है। प्रातः उज्जैन, फिर इंदौर जनपद से चलकर धार (मांडू से खरगौन (महेश्वर) और अब नर्मदा पार खंडवा (सनवाद) जनपद आ चुके थे।

बड़वाह से आगे पूर्व दिशा में नर्मदा नदी पर रेल और सड़क पुल है। पुल से नर्मदा पार कर मरकट्टा गाँव आए। जहाँ ओंकारेश्वर रोड रेलवे स्टेशन है, जो पूर्व में खंडवा और पश्चिम में इंदौर रेल तथा सड़क मार्ग को जोड़ता है। बस हमें सनवाद कस्बा ले आई। यहाँ से हमारी बस के संवाहक ने ओंकारेश्वर जानेवाली बस में बिठा दिया। शायद एक ही मालिक की बसें होंगी या आपसदारी की होंगी। यहाँ से १० किमी. दूर ओंकारेश्वर था। प्रवेश द्वार पर २ रुपए प्रति यात्री कर लिखा हुआ था। भारत में पहली बार यात्री कर देखा। वाहन कर तो ठीक था, मगर प्रत्येक दर्शनार्थी से यात्री कर लिये जाने का औचित्य जँचा नहीं, जबकि यात्री को कोई अतिरिक्त सुविधा तो मिलती नहीं। यहाँ से अंदर डेढ़ किमी. शहर में जाने के लिए ऑटोवाले यात्रियों को अपनी-अपनी ओर खींचने को तत्पर मिले। दस रुपए प्रति यात्री किराया था मात्र डेढ़-दो किमी. का। महेश्वर में भी मुख्य सड़क से नर्मदा तक, जो डेढ़-दो किमी. ही था। १०-१० रुपए वसूले थे। इक्का-बैलगाड़ी तो कब से बंद हो चुके हैं, इ-रिक्शा अभी यहाँ पहुँचे नहीं हैं। रिक्शेवालों को ऑटोवालों ने खदेड़ दिया होगा। सामान्य ग्रामीण तीर्थयात्री तो पैदल ही यह दूरी पार करने के अभ्यस्त थे। हमारे ऑटो चालक ने पूर्व निर्धारित श्रीराधे-कृष्ण गेस्ट हाउस पहुँचा दिया। मात्र ४०० रुपए प्रतिदिन की दर पर कमरा बुरा नहीं था। शेष यात्री तो स्थानीय धर्मशालाओं में या फिर फुटपाथ पर ही शरण लेकर संतुष्ट थे। हम शहर में रहकर आभिजात्य जो हो चुके थे, वरना बचपन में और विद्यार्थी जीवन में हमने भी फुटपाथों पर रात बिताकर तीर्थ-यात्राओं का आनंद लिया है। होटल में तरोताजा होकर बाहर मंदिर के लिए आए। शहर का तमाम गंदा पानी नर्मदा में सीधे जा रहा था। इसे देखकर वितृष्णा सी हुई और पवित्र-पाविनी नर्मदा में स्नान करने का इरादा छोड़ दिया। वैसे भी सैकड़ों फीट सीढि़यों से नीचे उतर नर्मदा के जल में स्नान करने की हिम्मत भी नहीं थी।

नर्मदा का पुल पार कर हम मंघाता ओंकारेश्वर पर्वत की तलहटी में स्थित भारत के चौथे प्रमुख ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के दर्शन के लिए आए। सामने ही वेदमाता गायत्री मंदिर है। यह नर्मदा की दो धाराओं (नर्मदा और कावेरी) में बँट जाने से बीच में बने शैलद्वीप (मात्र डेढ़ वर्ग किमी. क्षेत्रफल) पर ओंकार तीर्थ है। ऐसी मान्यता है कि जिस प्रकार केदारनाथ में सौ रुद्र हैं, वहीं ओंकारेश्वर में एक सौ एक रुद्र और अड़सठ तीर्थ हैं। पश्चिमी भाग ब्रह्मपुरी, बीच का भाग (नर्मदा का पश्चिमी तट) शिवपुरी, जहाँ ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है और नर्मदा के पूर्वी तट पार का क्षेत्र विष्णुपुरी, जहाँ अमलेश्वर ओंकार हैं। मंदिर में प्रवेश द्वार के पास ही पंचमुखी गणेश और सुखदेव मुनि, अभिमुक्तेश्वर, बटुक-भैरव, मंगेश्वर नाथ, नाग-चंद्रेश्वर, दत्तात्रेय, काल-भैरव तथा घृष्णेश्वर महादेव के मंदिर भी दर्शनीय हैं। ऊपर चढ़ने पर दीवार के सहारे एक कोने में ज्योतिर्लिंग भगवान् शंकर के प्रणब (अनगढ़) लिंग के दर्शन सुलभ हैं। ऊपर अखंड-ज्योति प्रज्वलित है। पहले तो लगा ही नहीं कि यही ज्योतिर्लिंग है, बिल्कुल अनौपचारिक दर्शन। कोई वी.आई.पी. तामझाम नहीं, सर्वसुलभ-दर्शन। अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध बिना किसी जातीय, वर्गीय अथवा धार्मिक भेदभाव के। यहाँ भी बाहर स्क्रीन पर ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के दर्शनों का जीवंत प्रसारण जारी था। बस यहाँ आरती गोपनीय होती है, जिसका प्रसारण नहीं किया जाता। बाहर आकर हमने चौबारे में आराम किया। यहाँ से सैकड़ों फीट नीचे नर्मदा का पवित्र जल कल-कल बह रहा था। नदी के पार अमरेश्वर ज्योतिर्लिंग के शुभ दर्शन हैं। वहाँ से थके-हारे हम होटल आए, मगर दर्शनों की पूर्ण संतुष्टि थी।

अगले दिन १० अप्रैल को जल्दी आकर होटल में ही स्नानादि से निवृत्त हुए। नर्मदा के प्रदूषित जल को देखकर उसमें स्नान करने का मन नहीं हुआ, जबकि असंख्य नर-नारी श्रद्धा भाव से झूला पुल से आगे, जहाँ जल-प्रदूषण कम था, स्नान कर रहे थे और प्लास्टिक की छोटी कैनों में पवित्र नर्मदा जल भरकर घर के लिए ले जा रहे थे। पुल पर एक फोटोग्राफर ने १० मिनट में हमारा फोटो हाथोहाथ बनाकर दे दिया। पुल पार कर ओंकारेश्वर दर्शनों को आए। एक पुजारी के आग्रह और पुष्पा पाल की सहमति पर जलाभिषेक का हमने संकल्प कराया। पुजारी ने बाहर से कलश में पानी भरकर (संभवतः नर्मदा का ही होगा) हमें लाइन से अलग ले जाकर शिवलिंग के ऊपर बनी झारी से जलाभिषेक कराया। झारी से जल ताँबे के पाइपों से होकर सीधे शिवलिंग पर अर्पित हो रहा था। बाहर आकर उसने हमें दूसरे पुरोहित के हवाले कर दिया। उसने अस्थायी चलित शिवलिंग पर पूजा-अर्चना कराई और पूजा के नाम पर निर्धारित राशि से अधिक का दान देने का आग्रह किया। हमने मना कर दिया। पंडे-पुजारियों के हर एक तीर्थ-स्थल पर इसी प्रकार के खाने-पीने के हथकंडे होते हैं। वैसे भी हम किसी मनौती या संकट-निवारण के किए तो वहाँ गए नहीं थे। हमारा तो एकमात्र उद्देश्य प्रभु-चरणों में शीश नवाना भर था और इस तीर्थस्थल के दर्शन भर करने का था।

यहाँ से हम झूला पुल की ओर आए। रास्ते में अनेक देवी-देवताओं के विग्रह हैं। झूला पुल से थोड़ा आगे ममलेश्वर मंधाता मंदिर है। वस्तुतः इस परिसर में अनेक मंदिर समूह हैं, मुख्य ज्योतिर्लिंग है। मराठा, पेशवाओं ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इसके पुनरुद्धार में विशेष योगदान दिया। इस मंदिर की दीवारों और प्रवेश द्वार पर देवासुर से संबंधित भव्य चित्रकारी उत्कीर्ण है। यहाँ के शेष छोटे मंदिर उपेक्षित से ही हैं। यहाँ से पीछे के रास्ते से निकलकर आगे आए। रास्ते में विभिन्न समाजों की अनेक धर्मशालाएँ बनी हुई हैं। काफी पैदल चलकर बीच बाजार में आ निकले। यहाँ से हमारा होटल लगभग एक किमी. दूर था। एक दुकान पर जल-पान किया। मालवांचल में प्रातः पोहा-जलेबी का जलपान विशेष रूप से प्रचलित है। कचौड़ी-समौसा इमली की चटनी के साथ भी मिलते हैं। मीठापन यहाँ के हर व्यंजन की अन्यतम विशेषता है। चाहे कचौड़ी हो या समोसा या छोले। होटल आकर हमने सामान बाँधा और बाहर सड़क पर आए। थोड़ी ही देर में ऑटो मिल गया। वहाँ से बाजार में होकर बाहर बने बस-स्टैंड पर आए। हमारे काफी आगे राजस्थान परिवहन की बस इंदौर जा रही थी। स्टैंड पर प्राइवेट बस भी थी। उसके चालक और संचालक यात्रियों को बहला-फुसलाकर अपनी बस में बैठने को विवश कर रहे थे। हमारे साथ भी यही हुआ, मगर हम सरकारी बस में ही बैठने को अडिग थे। प्राइवेट बसवालों के आगे ऑटोवाले और सरकारी बस के चालक व संवाहक भी इनका प्रतिरोध करने की हिम्मत नहीं करते। संभवतः यह अखिल भारतीय स्वरूप है कि स्थानीय लोगों का सभी जगह प्रभुत्व रहता है।

ओंकारेश्वर से बस १० बजे रवाना हुई। सनावद मरकट्टा (ओंकारेश्वर रोड स्टेशन) होते हुए नर्मदा नदी पुल पार कर बड़वाह बस-स्टैंड आई। बाद में हमें मालूम पड़ा कि बड़वाह हमारे भाषाविद् मित्र डी. हीरालाल बाछोतिया की सुसराल है। मगर इनके अब कोई भी परिजन यहाँ नहीं रहते। सबकुछ बेच-बाचकर बाहर चले गए हैं। प्रव्रजन और विस्थापन मानव समाज का स्थायी स्वभाव रहा है। इस सड़क-मार्ग के साथ-ही-साथ इंदौर-खंडवा रेल मार्ग भी है। यह छोटी रेलवे लाइन है। (संभवतः अब इसका चौड़ीकरण किया जा रहा है, इसलिए यह रेल मार्ग बंद है।) इस लाइन पर बड़वाह, मुख्तियारा, चोरल, कलाखुंद, पातलपानी, महू, राऊ, राजेंद्र नगर और इंदौर रेलवे स्टेशन हैं। इंदौर-खंडवा सड़क मार्ग पहाडि़यों के साथ चढ़ाई-उतराई और घुमावदार मोड़ोंवाला है। जबकि इंदौर-मुंबई राजमार्ग पहाड़ों को काटकर बीच से बनाया गया है। खंडवा सड़क मार्ग के साथ-साथ नर्मदा-क्षिप्रा नदी जोड़ की बड़ी भारी-भरकम जल पाइपलाइन है। इसी पाइपलाइन के माध्यम से सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए नर्मदा का जल उज्जैन की क्षिप्रा नदी में पहुँचाया गया था। यह निश्चय ही बड़ी खर्चीली परियोजना थी। काश! वर्षा के जल-संरक्षण के माध्यम से जल-संग्रह कर लिया जाता तो भारी धनराशि के खर्च को आसानी से बचाया जा सकता था।

बस ने इस यात्रा को बिना कहीं रुके दो घंटे में पूरा कर इंदौर शहर में प्रवेश किया। अब बस बाईपास की ओर मुड़ गई। जो रास्ता मात्र १५-२० मिनट का था, बाईपास के कारण ४५ मिनट का हो गया था। सहयात्रियों से इंदौर के दर्शनीय बिजासन देवी और खजराना गणेश मंदिर एवं राजवाड़े की जानकारी मिली कि ये तीनों अलग-अलग दिशाओं में अवस्थित हैं। सिर्फ एक ही स्थल का भ्रमण संभव है। हमने राजवाड़ा देखने को प्राथमिकता दी। कारण स्पष्ट था कि पुष्पा पाल ने भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की ‘भारत की महान् नारियाँ’ शृंखला के अंतर्गत ‘अहिल्याबाई होलकर’ पुस्तक १९९१ में लिखी थी, जो १९९२ में प्रकाशित हुई, जिसकी रॉयल्टी आज तक उन्हें मिल रही है। पढ़कर और सुनकर लिखी पुस्तक के तथ्यों की जाँच प्रत्यक्षतः देखकर ही की जा सकती है।

सहयात्री बुजुर्ग और युवा ने एक निश्चित स्थान पर हमें अपने साथ बस से उतार लिया। उन्होंने ऑटो किया और इंदौर की सड़कों पर भीड़ भरी गलियों से ऑटो चालक यह कहते हुए कि ‘जब तक आप किसी के फटे में पैर नहीं अटकाओ, तब तक कोई रास्ता नहीं देता,’ राजवाड़े के पास ले आया।

सहयात्रियों ने हमें ऑटो का किराया भी नहीं देने दिया, क्योंकि उन्हें इसी रास्ते आगे जाना था। क्या दिल्ली या अन्य महानगर में सहयात्रियों का यह व्यवहार मिल सकता है? एक फर्लांग की ही दूरी पर था—चिर प्रतीक्षित होलकर राजवंश की विरासत राजवाड़ा। एक गोल पार्क के बिल्कुल सामने। राजवाड़े की बाहर कोई दीवार भी नहीं है, सीधे सड़क पर बना है।

इंदौर का यह भव्य राजवाड़ा अपने आप में अद्भुत है। इस महल के निर्माण में ११० वर्ष लगे थे।

होलकर साम्राज्य के संस्थापक मल्हारराव होलकर ने १७३४ में इसे बनवाना शुरू किया। यह सात मंजिला २९ मीटर ऊँचा और ६७५ वर्गमीटर क्षेत्रफल में बना हुआ है। मराठा-मुगल शैली में बना यह राजवाड़ा फिर १९३४ और १९८४ के भीषण अग्निकांड का शिकार बना। इसे बार-बार पुनर्निर्मित किया जाता रहा। भीतरी संरचना में इसके कक्ष और बरामदे फ्रांसीसी तरीके से बनाए और सजाए गए हैं। खंभे से लेकर दीवारों तक हर जगह रंगीन काँच से बनी है, जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है तो पूरा परिसर सतरंगी चमक से नहा उठता है। यह सोमवार को बंद रहता है। इसलिए हम इसे अंदर से तो नहीं देख पाए, किंतु पश्चिम की दिशा में स्थित श्रीमल्हार मार्तंड मंदिर का सूक्ष्मता के साथ अवलोकन किया।

होलकर वंश के शौर्य, निर्माण-कला, जनकल्याण के कार्यों और अस्त्र-शस्त्रों का प्रदर्शन बखूबी किया गया है। होलकर वंश के कुल देवता मल्हार मार्तंड की भव्य प्रतिमा दर्शकों को सहज ही आकर्षित कर लेती है। हाँ, इसमें दर्शकों के बैठने या विश्राम की कोई व्यवस्था नहीं है। ऊपरी मंजिल की दर्शकदीर्घा में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की जीवन-यात्रा को सुंदर झाँकियों के माध्यम से दरशाया गया है। मंदिर में हमें धुलिया (महाराष्ट) के दो फूल व्यापारी धनगर युवक, जो आपस में जीजा-साले थे, मिले। ये अपने धनगर वंश के राजाओं की विरासत को देखने यहाँ आए थे। राजवाड़ा के चारों ओर इंदौर का व्यापारिक केंद्र है। यहाँ कपडे़, जूते और सोने-चाँदी की असंख्य दुकानें हैं, जैसे दिल्ली का चाँदनी चौक। वहाँ से हम ऑटो से इंदौर रेलवे स्टेशन, सियागंज रोड आए, जहाँ हमसे मिलने इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार रमेश यादव भी आए। ठीक चार बजे हमारी इंटरसिटी ट्रेन अपने गंतव्य दिल्ली की ओर चल पड़ी।

६८४, इंद्रापार्क, नई दिल्ली-११००४५

दूरभाष : ०९८१०९८१३९८

 

हमारे संकलन