जय अंबे माँ

आश्विन महिना शुरू हुआ कि प्रतिपदा से लेकर नवमी तक नौ दिन और हाँ, नौ रातें भी नवरात्र-उत्सव की धूम शुरू हो जाती है। नवरात्र देवी का उत्सव है। केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, पूरे भारत के देवी मंदिरों में श्रद्धालु की भीड़ लगी रहती है। देवी के उदय होने की कामना की जाती है। देवी का आह्वान किया जाता है। आदिशक्ति के मातृरूप को अबा, जगदंबा अथवा अंबाभवानी कहते हैं। इसी शक्ति व कुदरत ने निर्गुण को उत्तेजित किया और अखंड ब्रह्मांड का निर्माण किया। वही जन्मदात्री है, पालनकर्त्री है और रक्षणकर्त्री भी है। यही महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली के रूप में त्रिविध और त्रिगुणात्मक बनती है। उसके कई रूप और नाम हैं। मानव ने उनमें अलग-अलग शक्ति की कल्पना की है। उनमें कुछ नाम इस प्रकार के हैं, जैसे भवानी, रेणुका, चामुंडा, शांता दुर्गा, पद्मावती, संतोषी, जोगेश्वरी, शाकांबरी आदि।

जगदंबा का एक रूप महालक्ष्मी है। महाराष्ट्र में कोल्हापुर, केलशी, अडिवरे, कुडाल, वाई आदि जगह महालक्ष्मी के मंदिर हैं। कोल्हापुर की महालक्ष्मी बहुत माहात्म्य है। इसके नाम से ‘पीठा मिठाचा जोगवा’ (आटा और नमक की भिक्षा) माँगते हैं।

माता के नाम से भिक्षा माँगते हुए कोल्हापुर को जाते हुए श्रद्धालु महिलाएँ कहती हैं—

कोल्हापुरवासिनी ग अंबे दे दर्शन मजसी।

तुझ्या कृपेने जाती लयाला पापांच्या राशी॥

(कोल्हापुर में बसनेवाली अंबे माँ मुझे दर्शन दीजिए। आपकी कृपा से मेरे सारे पाप नष्ट हो जाएँगे।)

महिलाएँ आटे, नमक की भिक्षा जल्दी देने के लिए भी कहती हैं, क्योंकि उन्हें बहुत दूर जाना है। देवी माँ को चूडि़याँ, हार, गजरा अर्पण करना है। उन्हें साड़ी-चोली पहनाना है। चोली का कपड़ा और नारियल से उनकी गोद भरनी है। महिलाओं का विश्वास है कि वह सुहाग की देवी हैं। लोगों के मन में ये विचार, संस्कार, आस्था गहरे पैठे हुए हैं।

कोल्हापुरवासिनी अंबा पार्वती का रूप हैं या लक्ष्मी का, इसके बारे में विद्वानों और संशोधकों में मतभेद है। पौराणिक कथा तथा अन्य गं्रथों के आधार से देखा जाए तो वह शिव की पार्वती भी हैं और विष्णु की लक्ष्मी भी। देवी के लक्ष्मी और पार्वती दोनों रूपों के बारे में पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं और जनमानस में मान्यता भी प्राप्त है।

कोल्हापुर आद्य और महत्त्वपूर्ण शक्तिपीठ है। साढ़े तीन शक्तिपीठों में यह पहला और महत्त्वपूर्ण पीठ है। इसके संबंध में यह आख्यायिका प्रचलित है कि दक्ष प्रजापति और असिक्विनी दंपती को जगदंबा के वरदान से कन्या प्राप्त हुई। उस कन्या का नाम रखा गया सती। बड़ी होकर सती ने शंकरजी से विवाह कर लिया। यह बात दक्ष को पसंद नहीं थी। आगे चलकर दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया, वहाँ सती का अपमान हुआ। वह यज्ञकुंड में कूद पड़ी। यह समाचार सुनते ही शंकरजी संतप्त हुए। उन्होंने सती का अधजला निष्प्राण शरीर हवन कुंड से बाहर निकाला और अपने कंधे पर रखकर तांडव नृत्य करने लगे। शिवजी का प्रकोप देखकर पृथ्वी भयभीत हो गई। तब नारायण ने शिवजी को शांत करने के लिए सुदर्शन चक्र और धनुषबाण से सती की देह के अवयव तोड़ने शुरू किए। उस पवित्र देह के अवयव पृथ्वी पर एक सौ आठ जगह पर गिरे। जहाँ-जहाँ ये अवयव गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ का निर्माण हुआ।

कोल्हापुर में (इसे करवीर नगरी कहा जाता था) सती का मस्तक गिरा था। सभी अवयवों में मस्तक प्रमुख माना जाता है, इसलिए सभी शक्तिपीठ में कोल्हापुर सर्वोच्च आद्य शक्तिपीठ माना जाता है। दूसरा शक्तिस्थान तुलजापुर की भवानी माता, तीसरा माहूर की रेणुका माता और आधा वणी की सप्तशृंगनिवासिनी का माना जाता है। कोल्हापुरवासिनी अंबामाता लक्ष्मी का रूप है, यह बतानेवाली आख्यायिकाएँ भी पोथियों में देखी जाती हैं।

एक बार कश्यप मुनि यज्ञ कर रहे थे। नारदजी वहाँ पहुँचे। उन्होंने पूछा, ‘‘यज्ञ की आहुति कौन से देवता को अर्पण करनेवाले हो?’’ आहुति-अर्पण करने के लिए कौन सा देवता योग्य हैं, इस पर विचार-विमर्श शुरू हुआ। यह जिम्मेदारी भृगु ऋषि को सौंपी गई। वे पहले ब्रह्मलोक गए, फिर कैलाश में शंकरजी के पास पहुँचे, लेकिन उन दोनों ने भृगु ऋषि की ओर ध्यान नहीं दिया, तब वे क्रोधित होकर बैकुंठ लोक पहुँचे। वहाँ विष्णुजी लक्ष्मी से बातें कर रहे थे। भृगु ऋषि की ओर उन का भी ध्यान नहीं गया। संतप्त होकर उन्होंने विष्णुजी की छाती पर लात मारी, तब विष्णुजी का उनकी ओर ध्यान गया। उन्होंने भृगु ऋषि का स्वागत किया और कहा, ‘‘आप जैसे महात्माओं का दर्शन बड़े पुण्य से होता है। मेरी वज्र जैसी छाती पर लात मारने से आपको कहीं चोट तो नहीं पहुँची? कहिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’ विष्णुजी का नम्र भाव देखकर भृगु ऋषि का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘आपकी छाती पर मेरे पैरों का जो निशान बना है, वह वैसा ही रहे।’’ फिर वे भूलोक चले गए। वहाँ जाकर उन्होंने बताया कि आहुति देने के लिए विष्णु ही योग्य देवता हैं। तब से विष्णुजी को ‘भक्तवत्सलांछन’ भी कहा जाने लगा। विष्णुजी को ऋषि ने लात मारी, यह लांछन है, लेकिन भगवान् भक्तवत्सल हैं। उन्होंने यह लांछन, लात का चिह्न अलंकार की तरह धारण किया। उस लांछन को भी यश-चिह्न मान लिया और वे हो गए ‘भक्तवत्सलांछन’।

अब हुआ यह कि भृगु ऋषि तो चले गए, किंतु इस घटना पर लक्ष्मीजी को बहुत गुस्सा आया—‘‘आपके हृदय, मेरे आलिंगन के स्थान पर उन्होंने लात मारी है। यह मेरा घोर अपमान है। और आप हैं, जो उन्हें दंड देने के बजाय उनका आगत-स्वागत करते रहे। मैं यह कदापि बरदाश्त नहीं करूँगी। मैं आपका और बैकुंठ का त्याग करके जा रही हूँ।’’

विष्णुजी ने उन्हें समझाने और मनाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वे नहीं मानीं। (लगता है, देवी-देवता भी साधारण मनुष्य की तरह रूठते-मनाते हैं। मराठी नवकविता के आद्य जनक केशवसुतजी ने अपनी एक कविता में लिखा है, देव-दानवा नरे निर्मिले...देवदानव मनुष्य ने ही बनाए हैं। फिर अगर वे मनुष्य की तरह रूठते-मनाते हैं, तो कौन सी बड़ी बात है?)

लक्ष्मीजी रम्य दिव्य महाक्षेत्र करवीर नगरी (कोल्हापुर) में आ बसीं। जाने के बाद विष्णुजी परेशान हो गए। लक्ष्मीजी को पाने के लिए उन्होंने दस वर्ष तक तपस्या की। तब आकाशवाणी हुई कि ‘सुवर्ण मुखरी नदी के उत्तर किनारे पर तपोभूमि तीर्थ स्थापन कीजिए। वहाँ देवलोक के दिव्य कमल तथा खुशबूदार पौधे बोइए। फिर बारह साल तपश्चर्या कीजिए।’

विष्णुजी ने वैसा ही किया। सरोवर-निर्माण किया। उसमें दिव्य कमल उगाए, पौधे लगाए, तपश्चर्या की, तब पद्मतीर्थ में लक्ष्मी प्रकट हुईं। पद्म सरोवर में प्रकट होने के कारण उसे पद्मावती कहने लगे। उन्होंने कृष्णकमल की माला विष्णु को पहनाई। उसके बाद विष्णुजी पुष्करणी के करीब शेषाचल पर रहने लगे। आगे चलकर शेषाचल वेंकटगिरी नाम से मशहूर हुआ। यहाँ वेंकटेश के हृदय पर लक्ष्मी की मूर्ति है, लेकिन बगल में न लक्ष्मी है, न पद्मावती। पद्मावती का मंदिर नीचे सरोवर के पास है। लक्ष्मीजी का निवास कोल्हापुर में है, इसलिए कोल्हापुर वैष्णव क्षेत्र हुआ। लोगों के मन में यह भावना दृढ करने के लिए नवरात्र में तिरुपति देवस्थान से महालक्ष्मी के लिए कीमती शॉल भेजने की प्रथा है। यह प्रथा कब से शुरू हुई, यह भी संशोधन का विषय है।

सर्वसाधारण श्रद्धालु लोगों के लिए देवी जगदंबा जगन्माता हैं। वे शक्तिमान हैं। भक्तों की मनोकामना पूरी करनेवाली तथा दुष्टों का विनाश करनेवाली हैं। उनके लिए इतना काफी है, फिर वह पार्वती हो या लक्ष्मी। देवी ने कई असुरों का वध किया। शुंभ-निशुंभ, धूम्रवर्ण, रक्तबीज और भी कई...देवी माहात्म्य में इसका वर्णन है। प्राचीन काल में कोलासुर नाम का राक्षस महिलाओं को परेशान करता था। तब महिलाओं ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश की प्रार्थना की। उन्होंने कोलासुर का नाश करने का काम महालक्ष्मी को सौंपा। महालक्ष्मी ने कोलासुर का वध करके लोगों को संकटमुक्त किया। उस घटना के कारण ‘करवीर’ नगरी ‘कोल्हापुर’ कहलाने लगी। कोलासुर यानी जंगली सूअर। ये सूअर खेती को नुकसान पहुँचाते हैं। महालक्ष्मी ने उसे मारकर खेती का संरक्षण किया, इसलिए महालक्ष्मी समृद्धि की देवी मानी जाती हैं।

दुर्गा तथा महिषासुरमर्दिनी भी महालक्ष्मी के रूप हैं। इसके बारे में ऐसी आख्यायिका हैं कि देव-दानवों में संग्राम हुआ, जिसमें दानव विजयी हुए। असुरों का राजा महिषासुर इंद्र बना। उसने देवताओं के सारे अधिकार छीन लिये। देवता दीन-हीन हो गए। वे सब ब्रह्मदेव के पहुँचे और उन्हें साथ लेकर शंकरजी तथा विष्णुजी के पास गए। देवताओं की बात सुनकर शंकरजी क्रोधित हुए। उनके मुख से तेजोवलय निकला। वैसे ही तेजोवलय अन्य देवताओं के मुख से निकलने लगे। सब तेजोवलय एक हुए। उसने नारी रूप धारण किया। देवी माहात्म्य में बताया गया है—

तीच भवानी जगदंबा। त्रैलोक्याची जननी अंबा।

जी हरीहराते स्वयंभा। उत्पन्न करती जाहली॥

(वही भवानी जगदंबा हैं। त्रैलोक्य की जननी हैं। उसने हरि, हर को उत्पन्न किया।)

जिसने देवताओं को उत्पन्न किया, उन्हीं के तेज से जगदंबा ने भक्तों के लिए अवतार धारण किया। शिवजी के तेज से मुख, यम के तेज से बाल, विष्णु के तेज से बाहु, इस प्रकार अलग-अलग देवताओं के तेज से उनके अवयव बने। फिर उन्होंने नौ दिन और नौ रातें महिषासुर और अन्य असुरों से युद्ध किया। महिषासुर और असुर सेना का वध किया। देवताओं और पृथ्वी को असुरों के चंगुल से बाहर निकाला। इस कालावधि में देवता तपश्चर्या करने के लिए बैठे थे। अपनी तपस्या का फल देवताओं नें देवी को अर्पण किया। नौ दिन और नौ रातों के घमासान युद्ध के बाद महिषासुर का वध हुआ। दशहरा देवी के विजयोत्सव का दिन है।

इस घटना का संबंध सामान्य व्यवहार से कैसा जोड़ा जाता है, यह भी देखने लायक है। कई घरों में नवरात्र में कुलधर्म ऐसा है कि नवरात्र से पहले दिन देवताओं का पूजन करके उन्हें संदूक में या डिब्बे में रखा जाता है। नवरात्र में इन देवताओं की पूजा नहीं की जाती।

कारण पूछने पर बताया गया, उस समय देवता तपश्चर्या में बैठे होते हैं। उन्हें हिलाने से उनकी तपश्चर्या में बाधा आएगी, इसलिए इन नौ दिनों में उनकी पूजा नहीं होती। इन दिनों देवता बैठे हैं, मराठी में ‘देव बसले’ ऐसा कहा जाता है। ‘देव बसले’ का अर्थ है कि देवता ध्यान और तपश्चर्या में बैठे हैं। अब उन्हें हिलाना नहीं है, इसके कारण उनकी रोज की तरह पूजा नहीं करनी है।

नवरात्र में कई घरों में खास तौर पर कृषि-संस्कृति से जुड़े हुए घरों में घटस्थापना की जाती है। एक पत्तल पर मिट्टी फैलाई जाती है, उसमें नौ प्रकार के बीज बोए जाते हैं। उसपर मिट्टी का घड़ा रखा जाता है तथा उसमें पानी डाला जाता है। बगल में जलता हुआ दीपक रखा जाता है। हर रोज एक फूल की माला चढ़ाकर घट की पूजा की जाती है। यह भू-देवता की पूजा-उपासना मानी जाती है। घर में पत्तल पर मिट्टी डालकर और उसमें नवविधा बीज बोकर प्रतीकात्मक खेत तैयार किया जाता है। घट पानी के स्रोत का प्रतीक है, जबकि दीप सूर्य का।

फसल के लिए मिट्टी, पानी और सूर्य के प्रकाश की जरूरत होती है। यहाँ ये सब प्रतीकात्मक रूप में लाया जाता है। मिट्टी के घट से पानी रिसता है, अंकुर उग आते हैं, धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं। दशहरे के दिन ये अंकुर काटकर सोने के रूप में देने की प्रथा कई घरों में है। कृषि-संस्कृति के लिए अनाज ही धन है, वही सोना है। कई घरों में घर के पुरुष ये अंकुर अपनी टोपी में डालकर मस्तक पर धारण करते हैं। अनाज जीवनावश्यक बहुत है। उसे मस्तक पर धारण करना उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। इस प्रथा से जाहिर होता है कि नवरात्र-उत्सव देवी के मातृरूप का उत्सव है।

माँ जन्मदात्री, पालनकर्त्री और रक्षणकर्त्री होती है। घटस्थापना की प्रथा में उसकी सृजनात्मक शक्ति की उपासना की जाती है। वह पालनकर्त्री भी है। नवरात्र में अलग-अलग पक्वान्न, मिठाइयाँ बनाते हैं। इसकी वजह से शरीर का पोषण ज्यादा स्वादिष्ट रूप में होता है। अब केवल शरीर का पोषण होने से काम तो नहीं चलेगा न, मन का पोषण भी होना चाहिए। नवरात्र में भजन, कीर्तन, प्रवचन, भाषण, गीत, नृत्य और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, उनके आस्वादन से मन तथा व्यक्तित्व का विकास होता है।

माँ रक्षणकर्त्री है। दुश्मन हमेशा बाहर के ही नहीं होते। अपने स्वभाव-दोष, जिन्हें षड्रिपु कहा गया है, वे भी होते हैं। झूठ, अहंकार, मद, मत्सर जैसे कई दोष मनुष्य का व्यक्तित्व बिगाड़ देते हैं। बच्चों में ये स्वभाव-दोष न आएँ, इसलिए माँ प्रयत्नशील रहती है। कभी समझाकर तो कभी डाँटकर उसके दोष हटाने का प्रयास करती है। नवरात्र में होनेवाले भजन, कीर्तन, प्रवचन आदि द्वारा यह सीख तथा अच्छे संस्कार देने के प्रयास किए जाते हैं।

इस प्रकार जन्मदात्री, पालनकर्ती, रक्षणकर्ती ये तीनों दृष्टि से नवरात्र में की गई उपासना उसके मातृरूप की उपासना है। नवरात्र में महाराष्ट्र में कई घरों में आटा और नमक की भिक्षा माँगने का रिवाज है। महाराष्ट्र में इसे ‘जोगवा’ कहते हैं। महिला कहती हैं—

पीठा-मिठाचा जोगवा, द्या ग बायांनो सत्वरी,

मला जायचं दूरवरी ग कोल्हापुरच्या बाजारी।

कोल्हापुर को जाकर वह क्या करेगी? वह कहती है, वहाँ जाकर मैं बाजार में जाऊँगी। देवी माँ के लिए साड़ी, चोली, चुनरी, चूडि़याँ, पूसलमाला, नारियल लाऊँगी, उससे उसकी गोद भरूँगी। देवी माँ की प्रार्थना करूँगी। उससे अपने लिए और अपने परिवार के लिए आशीर्वाद माँगूँगी।

मराठी के ख्यातनाम संत एकनाथजी ने एक बहुत ही सुंदर रूपात्मक जोगवा लिखा है।

एक महिला निःसंग होकर देवी की यात्रा के लिए निकली है। यह महिला अपने स्वभाव-दोष त्यागकर यात्रा को कैसे जाती है, यह देखने लायक है। एकनाथ महाराज लिखते हैं—

अनादि निर्गुण प्रकटली भवानी। मोह महिषासुर मर्दनालागुनी।

त्रिविध तापाची करावया झाडणी। भक्तालागी तू पावसी निर्वाणी।

आईचा जोगवा, जोगवा मागेन॥

नवविध भक्तीचं भक्तीचं नवरात्र। धरोनी सद्भाव अंतरीचा मित्र।

ओटी भरोनी मागेन ज्ञानपुत्र। दंभ सासरा सांडेन कुपात्र॥ आईचा जोगवा...।

आता मी साजणी झाले गे निःसंग। विकल्प नवयाचा सोडियेला संग।

केला मोकव्य मार्ग सुरंग। आईचा जोगवा, जोगवा मागेन॥

इसका अर्थ है, मोह रूपी महिषासुर का निर्दलन करने के लिए अनादि निर्गुण भवानी प्रकट हुई हैं। माँ, हमारे त्रिगुण (सत्व, रज, तम) ताप हरने के लिए तुम प्रसन्न हो जाओ।

नवविधा भक्तिरूपी नवरात्र में मन के सद्भाव को मित्र समझकर मैं तुम्हारी गोद भरूँगी और तुमसे ज्ञानरूपी पुत्र मिलने का आशीर्वाद माँगूँगी। दंभ रूपी ससुर को निकाल दूँगी। अब मुझे किसी का मोह नहीं रहा है। विकल्प रूपी पति को भी मैंने छोड़ दिया है। अब मेरा मार्ग आसान और सुरम्य बन गया है। अब मैं इस मार्ग से ‘जोगवा’ माँगते हुए माँ के पास जाऊँगी।

 

फ्लैट नं-३०३, बिल्डिंग नं. डी-२

शिवसागर कोऑप. सोसाइटी

माणिकबाग, सिंहगढ रोड

पुणे-४११०५१ (महाराष्ट्र)

दूरभाष : ०९९२३०११८१३

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