बोन्साई की कला और भारत

बोन्साई की कला और भारत

बड़े पेड़ों का लघु संस्करण बनाकर उन्हें गमले में लगाने की तकनीक चीन ने ईजाद की। जापान से बुद्ध धर्म के छात्र अध्ययन के वास्ते चीन जाते थे। उन्हीं के माध्यम से यह तकनीक जापान तक जा पहुँची। जापान ने इसका विकास किया, वह भी इसे कला का दर्जा देने की हद तक। कुछ ऐसे अज्ञानी भी हैं कि वे जानते ही नहीं कि बड़े पेड़ों को छोटा कर उन्हें बोन्साई बनाने की इस प्रक्रिया में भारत का कितना प्रमुख योगदान है। दुनिया में बौद्ध धर्म का प्रवर्तक यदि कोई देश है तो वह भारत है।

स्पष्ट है, न बौद्ध धर्म होता, न बोन्साई। हमारे यहाँ आबादी का ऐसा विस्फोट है कि संसार भर में आज भारतीय बसे हैं। हमने अवचेतन में ऐसी सिफत विकसित की है कि देश के अंदर किसी हिंदुस्तानी की शोध, वैज्ञानिक उपलब्धि अथवा किसानी के योगदान पर हम अमनस्कता की चुप्पी साध लेते हैं, अपनी बोन्साई विरासत से प्रेरित होकर। वहीं कोई आप्रवासी भारतीय कुछ भी हासिल करे तो हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। अखबार की सुर्खियाँ उसकी प्रशंसा के गीत गाती हैं। टी.वी. चैनलों की चर्चा का वह आकर्षण केंद्र बनता है। कुछ इसका औचित्य भी बताते हैं। दूसरों का उत्साहवर्धन हमारा कर्तव्य है।

वहीं उनका मानना है कि अपनों की उपलब्धियों की प्रशंसा भारतीय विनम्रता की संस्कृति के विपरीत है। इतना ही नहीं, अपनी तारीफ  से वह कहीं फूलकर कुप्पा हो गया तो यह उसकी भविष्य की प्रगति में बाधक होगा। इसलिए ऐसे महानुभावों की सराहना से वह जी ही नहीं चुराते, बल्कि उनकी निंदा के मौके की तलाश करते हैं। उसे भूले-भटके भी महानता का मुगालता न होना चाहिए। वह जाने, न जाने, ऐसे निंदक उसके वास्तविक हित-साधक हैं। वह उसी के हित में उसके पैर लगातार प्रयासों की खुरदुरी जमीन पर रखने को उसकी आलोचना में जुटे हैं। उनका दावा है कि ऐसा कतई नहीं है कि उन जैसे निंदा-विशेषज्ञ उसकी सफलता को पचा नहीं पा रहे हैं। दीगर है कि उनका पेट डाह की मरोड़ से पीडि़त हो। उसकी प्रसिद्धि से उनके तन-बदन में जलन की ऐसी अदृश्य आग लगे क्या मजाल कि कोई भी फायर-बिग्रेड उसे बुझाने में कामयाब हो! विभिन्न निदान पद्धतियाँ भी सम्मिलित कोशिशों से शायद ही उनके इलाज में समर्थ हों। ऐसी आग तन क्या मन तक को फूँक देती है। पर निंदक हैं कि दूसरे के हित में अपना तन-मन सब कुरबान करने को प्रस्तुत हैं।

जापानी बोन्साई कला केवल झाड़-झंखाड़ तक ही सीमित है। यह विशिष्ट योगदान हमारा ही है कि हमने इसे जीवन के हर क्षेत्र में लागू कर दिया है। इसके विशेष शिकार देश के महापुरुष हैं। गांधी के जीवन दर्शन, अहिंसा या ट्रस्टीशिप का सिद्धांत समझने के बौद्धिक झंझट में कोई क्यों वक्त जाया करे? लिहाजा, उनके नाम के नारे को दोहराने का आसान विकल्प अपना कर हमने उनकी छुट्टी  कर दी है। बस वर्ष में एक बार गांधी जयंती मन जाती है, बहुत हुआ तो नेताजी ने राजघाट के चक्कर लगाकर अपना कर्तव्य निभा लिया।

इसके अलावा गांधीजी चुनाव में याद आते हैं, एक राष्ट्रीय दल द्वारा अपनी विरोधी पार्टी को उनकी हत्या के लिए दोषी ठहराने को। कोई यह नहीं सोचता है कि उनके आदर्शों का हनन किसने किया? गाँवों की दुर्दशा और दारू के ठेकों के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या गांधी बढ़ती सामाजिक हिंसा और अपने तथाकथित अनुयायियों का फलता-फूलता भ्रष्टाचार बरदाश्त कर पाते? हमें यकीन है, एक दिन गांधी के आमरण अनशन की खबर छपती और कुछ समय बाद उनके प्राण उत्सर्ग करने की। गांधी के विचारों के हत्यारे शोक-सभाएँ करते। उनके अंतिम संस्कार में विश्व की हस्तियाँ पधारतीं। गांधी की विरासत को हथियाने के लिए दल हिंसक संघर्ष पर उतरते। बुद्धिजीवियों और टी.वी. चैनलों को बहस का बहाना मिलता। कुछ दिनों तक उनकी आत्मा की शांति के लिए मंदिरों में यज्ञ-हवन होते, शहरों में मोमबत्ती जुलूस निकलते। उसके बाद समृद्ध धंधा बढ़ाने की जुगाड़ में जुटते और भूखे पेट भरने की।

ऐसी ही बोन्साई प्रक्रिया के अंतर्गत हम देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने को जवाहरलाल का जाप करते हैं और मुखर व सार्थक विरोध के लिए लोहिया, जयप्रकाश व आंबेडकर का। क्या कोई लोहिया या जयप्रकाश के उसूलों में परिवारवाद के समर्थन की एक पंक्ति भी खोज सकता है? यह चर्चा और विचार का विषय है कि उनके समर्थकों ने किस आधार पर अपनी जाति और परिवार को दल का नाम देकर सत्ता का ढाँचा खड़ा कर लिया है? आंबेडकर शायद ही व्यक्तिपूजा का समर्थन करते या फिर अपने नाम पर जेब भरने का। अब वह विरोध करने से तो असमर्थ हैं। पर यदि कभी स्वर्गवासी बोल पाते तो शायद उपरोक्त महानुभाव यही कहते, ‘‘इन चेलों से तो भगवान् बचाए। इन्होंने तो मरने के बाद भी हमारी मिट्टी पलीद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।’’

देश के जितने विशाल व्यक्तित्व हैं, मूर्तियों द्वारा उनका बोन्साईकरण करके मृत्योपरांत भी उनके मखौल का प्रबंध करने में हमने कोई कसर नहीं छोड़ी है। कभी वह चिडि़यों के दुलारे बनते हैं, घोंसलों की तलाश में, कभी धूप-बारिश, आँधी-अंधड़ के। कभी शहर के विध्वंसक तत्त्व उनपर निशानेबाजी की रियाज में व्यस्त हैं, कहीं पार्टी विरोधी उनके नाक-कान-हाथ उखाड़ने में। ले-देकर कोई इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जीते-जी वह सिद्धांतों के संघर्ष में जुटे रहे और मरने के बाद इनसानों और कुदरत द्वारा की गई सम्मिलित छीछालेदर में। उसूलों का अनुपालन न करके उनके बुत बनवाना इन दिवंगत महापुरुषों को मौत की दोहरी सजा देने के समान है। कुछ जीते-जी अपनी मूर्ति लगवाकर यह सिद्ध करते हैं कि जीवन में उनका इकलौता उद्देश्य अपने मुँह मिया मिट्ठू बनना है। सत्ता में रहकर नाम और नाम के अलावा कुछ और उपलब्धि भी तो होनी चाहिए। निजी समझ से उन्होंने अमरता का इंतजाम कर लिया है। यह इतिहास का विषय है कि लोग उन्हें किसलिए और कितना याद रखेंगे। हमने अपने महापुरुषों के विराट् व्यक्तित्व का सफल बोन्साईकरण करके उन्हें गमलों में सजा लिया है और अब खुद ही इतराते हैं कि वह कितने आकर्षक और मनभावन लगते हैं।

इससे भी कारगर प्रशासनिक व्यवस्था का बोन्साईकरण है। पहले नियम-कायदे होते थे, जिनसे कार्यालय चलता था। जनता की शिकायतें हल होती थीं। अब सबकुछ ताख पर रखा है। कोई शिकायत करे और कार्यालय से पावती भी पा जाए तो वह अपने आराध्य को धन्यवाद देता है। इतना ही क्या कम है कि सरकार ने उसकी अर्जी का अस्तित्व स्वीकार कर लिया? अब वह बार-बार पत्र लिखकर अपनी शिकायत की याद तो दिला सकता है। उसे क्या पता कि सरकार में एक आम बीमारी कागज, पत्राचार व फाइलों का खोना है।

कुछ कार्यालय एक कदम आगे हैं। उनमें सालाना आग लगकर हर समस्या का शुद्धीकरण हो जाता है। कभी-कभी आग ऐसी भयंकर होती है कि कंप्यूटर, डिस्क, फ्लॉपी आदि सब राख हो जाते हैं। कुछ कम साहसी दफ्तर हैं, वे बेचारे फाइलों और कागज खोने तक ही पहुँच पाए हैं।

वे पावती पाकर धन्य होनेवाला व्यक्ति एक दिन किसी स्मरण-पत्र का उत्तर न पाकर खुद कार्यालय जाने का निश्चय करता है। वहाँ पहली बार उसे सरकार की शक्ति का एहसास होता है, जब दो वरदीधारी उससे पास की माँग करते हैं। बिना पास या पहचान-पत्र के वह क्या पता आदमी न होकर आतंकी हो? अभी तक वह व्यर्थ में सुनता आया है कि सरकारी मुलाजिम प्रजातंत्र में जनता की सेवा के लिए हैं। यानी जनसेवक हैं। एक वरदीधारी यह सिद्ध करने को उसे निकट बने एक स्वागत-कक्ष की ओर जाने का निर्देश देता है, ‘‘यहाँ पास बनवा लो, फिर आओ।’’ उसके सौभाग्य से स्वागत केंद्र खाली है। न बाहर कोई पास बनवानेवाला न अंदर कोई बनानेवाला, कतई उसके विधायक के वादों सा। अब वह क्या करे? अंदर न जाने देने को वरदीवाले हैं और ‘पास’ देनेवाला गुम है। वह विवशता में खड़े रहने का कर्तव्य निभाता है। हिम्मत जुटाकर वरदीधारी को सूचित करता है कि ‘यहाँ तो कोई नहीं है।’ वह उसे आश्वस्त करता है, ‘आएगा, इंतजार करो।’ आगंतुक को लगने लगा है कि सरकार के पास एक रामबाण इंतजार है, जो हर समस्या का हल है।

इतने में आहट होती है और एक सज्जन साधिकार प्रवेश कर स्वागत-कक्ष की कुरसी पर धमक लेते हैं। वह उनके सामने जाता है। काँच के पीछे से आवाज आती है, ‘‘किससे मिलना है?’’ उत्तर में वह अपनी शिकायत की पावती उन्हें सौंपता है। वह बिना बोले उसे ऊपर से नीचे तक देखते हैं और एक कागज पर उसका नाम दरयाफ्त कर अंकित करते हैं। शायद वहाँ बोलने की कीमत है। ‘‘इसे लेकर कहाँ जाएँ?’’ के प्रश्न के पश्चात् सरकारी कर्मचारी उसे निर्देशित करता है, ‘‘सेकेंड फ्लोर पर पेंशन सेक्शन में।’’ आज तीन दिन से रोज पास बनवाकर प्रार्थी लगन से पेंशन सेक्शन जा रहा है। पेट भरने को माँ की फैमिली पेंशन का ही सहारा है। वहाँ उसे एक ही उत्तर मिलता है—कोई ‘डीलिंग असिस्टेंट’ नामक हस्ती है, जो अभी उपलब्ध नहीं है। तीन दिन से गुमशुदा की तलाश में सुबह से शाम तक लगा है वह। जाने कब तक लगा रहेगा। घर में बैठने से बेहतर है; भले इंतजार ही सही, उसे कुछ करने का संतोष तो है।

प्रजातंत्र में सरकारी कार्यालयों के बोन्साईकरण का एक लाभ है। यों तो आम के बोन्साई में खाने लायक फल नहीं होते हैं, पर उनके दर्शनीय होने से कौन इनकार कर सकता है? अब शिकायतकर्ता यदि बड़े अधिकारी, विधायक या मंत्री तक पहुँच पाए तो उसे इन फलों का दर्शन सुख प्राप्त होता है। खानेवाले आम की संभावना तभी है, जब वह संबद्ध बाबू को कुछ खिलाए। इस प्रकार सरकार ने अपने समाजवादी तंत्र में यह व्यवस्था कर दी है कि अंतिम पंक्ति का आखिरी व्यक्ति भी दूसरों में खान-पान की वही सुविधा प्राप्त करे, जो सर्वोच्च अधिकारी को सहज में उपलब्ध है। उल्लेखनीय है कि मुफ्तखोरी ही भेंट-गिफ्ट हो या नकदी राशि का लेन-देन, इनकी संख्या या मात्रा में अंतर हो सकता है, पर चरित्र में फर्क नहीं है। सब कुरसी की देन है। सेवानिवृत्ति के बाद किसी को भी इनमें से कुछ भी हासिल है क्या? यही कारण है कि वह जन्म-जन्मांतर का कोटा नौकरी की अवधि में ही पूरा करने को कटिबद्ध है।

सबसे महत्त्वपूर्ण जो है, वह है संबंधों का बोन्साईकरण। संयुक्त परिवार आज समाजशास्त्र का ऐसा अध्याय है, जिसका न वर्तमान है न भविष्य, सिर्फ अतीत है। तब वरिष्ठता का सम्मान था। चाहे घर का बुजुर्ग केवल घर में बैठे बेकार, वेतन रहित, कतई ठनठनगोपाल; इसे आलोचक भले परिवार के वृक्ष पर निर्भर बेल कहें, पर रिश्ता तब सुविधा का न होकर स्नेह का था। इससे उलट संबंध अब केवल सुविधा है। जब तक आर्थिक निर्भरता है, संतानों के लिए माँ-बाप सम्मान योग्य हैं, वरना वे बोझ हैं। जैसे ही सबकुछ हथियाया, उनका उचित स्थान नौकर की कोठरी है। संबंध अब सिर्फ आर्थिक आयाम तक सिमट गए हैं। नीम के पेड़ की बोन्साई में दातौन की गुंजाइश हो तो कैसे हो? उसका नीम होना अब केवल कहने भर का है तथा जिससे छाया मिलती थी, जिसे छूकर हवा शीतल बयार बनती थी और जो अच्छी सेहत का जनक था, अब सिर्फ गमले में बसा एक अजूबा है।

जब कोई बुजुर्ग मिलने आता है तो इस बोन्साई के गमले को ड्राइंगरूम की शोभा बनाकर वहाँ ‘शिफ्ट’ कर दिया जाता है। गमले को बेटे-बहू का निर्देश है कि वह मुसकराएगा, सिर हिलाएगा, बस बोलेगा नहीं। क्या भरोसा, जिंदगी भर मुँहफट रहा है, कुछ अंट-शंट ही बकने लगे।

बेटा अभी भी कड़वाहट से याद करता है। एक बार उसके पिता के समकालीन सज्जन अपने वृद्ध मित्र से मिलने पधारे थे। अपनी पुरानी दोस्ती के कारण वह दोस्त के बेटे की फैक्टरी से सीमेंट भी खरीदते थे। उनके आगमन के पहले गमले को ड्राइंगरूम में प्रमुख स्थान पर स्थापित कर दिया गया। जब पिता के बुढ़ऊ मित्र आए तो उन्होंने सबसे पहले अंदर आते-आते यह प्रश्न दागा, ‘‘और तुम्हारे बाबूजी और हमारे दोस्त कैसे हैं?’’ वे अच्छे हैं का रूटीन उत्तर दोहरा ही रहा था कि गमला क्रुद्ध स्वर में चहक उठा, ‘‘क्या अच्छे हैं? जहाँ जिंदगी भर अपने नौकर को रखा, आज उसी कमरे में पुराने अनुपयोगी फर्नीचर की तरह पड़े हैं। हम तो अब यही मनाते हैं कि किसी दिन ऊपर से रद्दी खरीदवाला आए और हमें उठा ले जाए। अभी बैंक का एक खाता हमारे नाम का है, शायद उसी के कारण खाना-पानी मिल जाता है, वरना कभी के टें बोल चुके होते?’’

अपने मित्र की इस दुर्दशा से वृद्ध उल्टे पाँव लौट गए, कुछ निराश और क्रोधित होकर। वे इस ‘लायक’ औलाद के दुर्व्यवहार का एक ही दंड देने में सक्षम थे, उन्होंने वही किया। सीमेंट फैक्टरी के ऑर्डर बंद कर दिए। नई फैक्टरी की हालत डाँवाँडोल हो गई। दूसरे खरीदारों को लगा कि इनके परिचित ग्राहक ने हाथ खींचा है, फैक्टरी के माल में जरूर दाल में कुछ काला है। हो न हो, गुणवत्ता की गड़बड़ी है। तब बेटे-बहू ने हाथ-पैर जोड़कर गमले को मनाया था कि अपने मित्र से ऑर्डर का अनुरोध कर दें, वरना फैक्टरी बंद होने का खतरा है। संतान से स्नेह की कमजोरी की कीमत वह आज भी चुका रहा है। फैक्टरी फल-फूल रही है, सिर्फ उसकी हालत खस्ता है।

बोन्साईकरण के कुछ लाभ भी हैं। कुछ माँ-बाप लड़की के प्रेमी के संग भाग जाने से ऊपरवाले का शुक्र मनाते हैं कि दहेज और दूसरे अनिवार्य खर्चों से बचे। पहले लोग बदनामी और समाज की विपरीत प्रतिक्रया से खौफ खाते थे, अब यह एक आम वारदात है। खुद काँच के घर में रहनेवाले दूसरों पर पत्थर कैसे फेंकें? उच्च मध्यवर्ग और सिनेमाई प्रयोगशाला में ‘लिव इन’ का आयातित प्रयोग भी खासा लोकप्रिय है। जब तक मन किया, साथ रहे, नहीं तो सूटकेस उठाकर चल दिए। न ‘डायवोर्स’ का झमेला, न किसी आर्थिक भार का।

कुछ रूमानी किस्म के लोग हैं, जो जीवन में रोमांस के पलायन से दुःखी हैं। अब पारो-देवदास जैसे प्रेमियों का क्या होगा? कब्र में पैर लटकाए कुछ लोगों को दुःख है कि वे पहले क्यों पैदा हो गए? माँ-बाप की ऐसी आज्ञाकारी संतान रहे कि शादी भी उनकी मरजी से की। आज के युग के युवा होते तो छुट्टे साँड़ की तरह आजादी से कहीं भी मुँह मारते! आज दुनिया हैरत में है कि बोन्साईकरण में जैसी तरक्की भारत ने की है, शायद ही कोई देश कर पाता!

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

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