मनु शर्मा नहीं रहे!

मनु शर्मा नहीं रहे!

आठखंडों में प्रकाशित प्रसिद्ध कथाकृति ‘कृष्ण की आत्मकथा’ के रचनाकार मनु शर्मा ने ८ नवंबर, २०१७ को इस नश्वर जगत् से विदा ली। जैसे ही यह खबर फैली, अपने प्रिय रचनाकार को भावभीनी अश्रुपूरित अंतिम विदाई देने के लिए काशी का जन सैलाब जैसे उमड़ पड़ा।

मनु शर्मा का पूरा नाम हनुमान प्रसाद शर्मा था। इनका जन्म फैजाबाद जनपद के अकबरपुर कस्बे में शरद पूर्णिमा के दिन २९ अक्तूबर, १९२८ को हुआ था। प्रसिद्ध समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया की भी यही जन्मभूमि थी। शर्माजी के पिता का नाम पं. रघुनाथ प्रसाद शर्मा था। कुछ वर्षों बाद संभवतः आर्थिक परेशानियों के कारण यह ब्राह्मण परिवार काशी स्थानांतरित हुआ। विश्वेश्वर गंज में रघुनाथ प्रसादजी ने छोटी सी गमछे की दुकान जमाई थी। बालक मनु शर्मा भी इस दुकान पर बैठा करते थे और कभी-कभी साइकिल से फेरी लगाकर भी थोड़ी-बहुत बिक्री कर लेते थे। उस समय मनु शर्मा की अवस्था कोई चौदह-पंद्रह बरस की रही होगी, जब दुर्भाग्यवश उनके पिता का एकाएक देहांत हो गया और मुसीबतों का पहाड़ इस परिवार पर टूट पड़ा। मनु शर्मा के तीन भाई और दो बहनें थीं। सभी इनसे छोटे थे। इनकी माताजी श्रीमानों के घरों की रसोई सँभालकर किसी प्रकार अपने परिवार का पालन करती थीं।

सरकारी मिडिल स्कूल से आठवाँ दर्जा पास किया। इसके उपरांत इनकी शिक्षा का क्रम नियमित नहीं रहा। परिवार के पालन-पोषण के लिए आय का साधन आवश्यक था। संयोग से जिस घर में यह परिवार रहता था, उसके मालिक बाबू शंभुनाथ वर्मा डी.ए.वी. कॉलेज के बडे़ बाबू थे। उन्होंने शर्माजी को छोटे-मोटे ऑफिस के काम करने के लिए लगा दिया। उन्हीं की कृपा से शर्माजी ने प्राइवेट छात्र के रूप में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। शर्माजी ने पढ़ाई-लिखाई का क्रम जारी रखा। उन्होंने बिना व्यवधान के इंटर, बी.ए. तथा एम.ए. की परीक्षाएँ प्राइवेट छात्र के रूप में उत्तीर्ण कर लीं। फिर इनकी डी.ए.वी. कॉलेज में ही अध्यापक पद पर नियुक्ति भी हो गई। उन दिनों डी.ए.वी. कॉलेज के प्राचार्य श्री कृष्णदेव प्रसाद गौड़ थे। वे हास्य-व्यंग्य के प्रसिद्ध कवि-लेखक थे। शर्माजी को उनका वरदहस्त तथा संरक्षण भी मिला। गौड़जी ही ‘बेढब बनारसी’ के रूप में विख्यात रचनाकार थे। आए दिन इनके यहाँ साहित्यकारों का जमावड़ा लगता था। बेढबजी का घर शर्माजी के पड़ोस के मोहल्ले में ही था। शर्माजी भी नियमित रूप से बेढबजी के यहाँ जाने लगे तथा कविता-कहानी भी लिखने लगे। शर्माजी प्रतिभा के धनी तो थे ही, शीघ्र ही गौड़जी के प्रधान शिष्यों में इनकी गिनती होने लगी। शर्माजी भी गौड़जी के साथ-साथ काव्य-गोष्ठियों, सम्मेलनों तथा अन्य आयोजनों में जाने लगे। शर्माजी का अपने गुरु की तरह रूप-रंग, कद-काठी तथा चाल-ढाल तो था ही, उनके लहजे तथा स्वभाव की झलक भी इनपर दिखने लगी। सदा प्रसन्न दिखना, मुसकराहट बिखेरना, अत्यंत आत्मीय ढंग से हाल-चाल पूछना, फिर किसी-न-किसी बात पर अगले की चुटकी लेना, यह सब गुरु का प्रभाव ही तो था। वे अपने गुरु की तरह हाजिरजवाब भी थे।

एक और महानुभाव थे, जिनका परम ऋणी शर्माजी अपने को मानते थे। वे थे हिंदी प्रचारक संस्थान के स्वामी श्रीकृष्ण चंद्र बेरीजी। जिन पुस्तकों के फलस्वरूप शर्माजी प्रकाश और चर्चा में आए, वे सभी आरंभ में हिंदी प्रचारक संस्थान से ही प्रकाशित हुई थीं। बेरीजी ओजस्वी वक्ता थे और उन्हें गोष्ठियाँ, सेमिनार, मेले आयोजित करने की धुन सवार रहती थी। बेरीजी ‘हिंदी प्रचारक’ नामक पत्रिका भी निकालते थे। इन सब कार्यों के प्रबंध के लिए उन्हें शर्माजी का सहयोग मिला। शर्माजी ने भी हिंदी प्रचारक संस्थान के तत्त्वावधान में होनेवाली गोष्ठियों और सभाओं के मंच-संचालन, अतिथियों के आगत-स्वागत, परिचय, धन्यवाद-प्रकाश आदि कार्यों का भार भी बखूबी सँभाला। परिणामतः शर्माजी प्रखर वक्ता के रूप में निखरे। मुझे स्मरण है कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा लोहिया सम्मान से विभूषित होने पर आभार व्यक्त करते समय मनु शर्मा ने जो और जैसी वक्तृता दी थी, उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई थी और हॉल तालियों से गूँज उठा था। उसी समारोह में ‘पत्रकारिता भूषण’ से नवाजे गए दैनिक हिंदी ‘गांडीव’ के संपादक डॉ. भगवानदास अरोड़ा की बगल में मैं भी बैठा था। डॉ. साहब ऊँचे स्वर में एकबारगी बोल उठे—‘क्या खूब बोले!’

बीसवीं शती के छठे दशक में मनु शर्मा ने ऐतिहासिक उपन्यासों द्वारा प्रकाशन-जगत् में दस्तक दी। इनमें ‘एकलिंग का दीवान’ और ‘राणा साँगा’ विशेष रूप से चर्चित रहे। इन ऐतिहासिक उपन्यासों द्वारा शर्माजी ने युवा वर्ग में स्वाभिमान तथा शौर्य की भावना बखूबी जगाई। इसके बाद शर्माजी महाभारतकालीन पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर तत्कालीन महानायकों की आत्मकथाएँ लिखने में प्रवृत्त हुए। इस क्रम में पहला पुष्प ‘द्रोण की आत्मकथा’ था। फिर क्रम से ‘कर्ण की आत्मकथा’, ‘द्रौपदी की आत्मकथा’, ‘कृष्ण की आत्मकथा’ तथा ‘गांधारी की आत्मकथा’ का प्रकाशन हुआ। इन आत्मकथाओं को आकार लेने में ३५-४० वर्ष का समय लगा। शर्माजी ने एक अवसर पर कहा था कि इस बीच मैंने अठारह बार महाभारत तथा कुछ अन्य पुराणों का अध्ययन किया है। उन कृतियों की मुख्य विशेषता रही कि सभी नायक पुराकालीन होते हुए भी वर्तमान समय और परिस्थितियों की दृष्टि से उपयोगी और दिशा-निर्देशक सिद्ध हों। यही कारण है कि ‘कृष्ण की आत्मकथा’ में कृष्ण से बार-बार कहलवाया है कि ‘मैं ईश्वर नहीं हूँ’, मुझ पर ईश्वरत्व लादा जाता है।’ निश्चय ही शर्माजी का कृष्ण अधिक-से-अधिक ‘मानव’, ‘श्रेष्ठ मानव’ या ‘महामानव’ ठहरता है। परंतु ऐसा नहीं है कि वे अपने वास्तविक जीवन में भगवतसत्ता को स्वीकार न करते हों। वे भगवतसत्ता को स्वीकार करते थे। इस नश्वर संसार से विदा लेते समय उनके मुख से अंतिम शब्द ‘राम’ ही निकला। कुछ समय पहले अपने दिए हुए साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘आज अट्ठासी वर्ष की वय में बार-बार सोचता हूँ तो यही पाता हूँ कि जीवन की डोर तो उसी के हाथ में है।’’ और साथ ही अपनी एक पुरानी कविता की निम्नलिखित दो पंक्तियाँ भी सुनाईं—

तुम हो या नहीं, इसे कोई नहीं जानता

बिना तुझे माने, दिल मानता भी नहीं।

शर्माजी का साहित्य-संसार और भी विस्तृत है। ‘अभिशप्त कथा’,  ‘मरीचिका’, ‘तीन प्रश्न’, ‘लक्ष्मण रेखा’, ‘के बोले माँ तुमि अबले’, ‘विवशिता’, ‘गांधी लौटे’ उनके अन्य उपन्यास हैं। ‘मुंशी नवनीत लाल’ और ‘पोस्टर उखड़ गया’ उनके दो कहानी-संग्रह हैं। उन्होंने छोटी-छोटी व्यंग्यपूर्ण कविताएँ भी लिखीं, जो काशी के एक दैनिक ‘जनवार्त्ता’ में नियमित रूप से दो-ढाई वर्षों तक छपती रहीं।

शिल्प और भाषा की दृष्टि से मनु शर्मा की कृतियाँ पाठकों को रिझाने और अभिभूत करने में भी सफल रहीं। लगता है कि हर वाक्य का एक-एक शब्द जैसे तौल-तौलकर रखा गया हो। मनु शर्मा कहा करते थे कि मैं वाक्य में एक-एक शब्द बुनता हूँ। पदे-पदे उपमाओं और व्यंग्योक्तियों की छटा तो देखने को मिलती ही है, मुहावरों की बहार भी है, जो कथन-शैली को अधिक प्रभावपूर्ण बनाती है।

पिशाचमोचन स्थित श्रीकृष्ण चंद्र बेरी के ‘हिंदी प्रचारक संस्थान’ में नित्य सायंकालीन गोष्ठी में काशी के कतिपय साहित्यकार सम्मिलित होते थे। मनु शर्मा, डॉ. रघुनाथ सिंह, डॉ. लक्ष्मी नारायण मिश्र, डॉ. गिरीश चंद्र शर्मा, डॉ. युगेश्वर और इन पंक्तियों का लेखक तो प्रायः उस गोष्ठी में नित्य सम्मिलित होते थे। सप्ताह में एक-आध बार या यदा-कदा आनेवालों में डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, डॉ. सर्वजीत राय, डॉ. इंदीवर, श्री जगदीश जगेश, डॉ. उदय प्रताप सिंह, डॉ. अशोक सिंह आदि थे। इस गोष्ठी में किसी-न-किसी साहित्यक, सामाजिक, राजनैतिक विषय या समस्या पर चर्चा होती थी। विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार सुनने को मिलते थे। गोष्ठी की चर्चा का उपसंहार मनु शर्मा ही करते थे। इन्हीं गोष्ठियों में उनके अगाध ज्ञान और अद्भुत स्मरण-शक्ति के भी दर्शन हुआ करते थे। सूर, तुलसी, कबीर, घनानंद, बिहारी, रहीम, रसखान, पद्माकर, रत्नाकर, निराला, दिनकर आदि महाकवियों की रचनाएँ सुनाते थे तो समय बँध जाता था।

मनु शर्मा सायंकाल गोष्ठी में सम्मिलित होने के लिए घर से निकलते थे तो प्रायः हमारी कुटिया ‘शब्द लोक’ में भी पधारते थे। डॉ. युगेश्वर तो ऐसे प्रेमी थे, जो कृपापूर्वक नित्य ‘शब्दलोक’ में पधारते थे। फिर हम दोनों हिंदी प्रचारक संस्थान साथ-साथ जाते थे। जब शर्माजी आते थे तो वे अपनी गाड़ी से आते थे और हम दोनों को गाड़ी में बैठाकर हिंदी प्रचारक संस्थान ले जाते थे। एक दिन मैं और शर्माजी डॉ. युगेश्वर की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी देर में डॉ. युगेश्वर आए। वे अपने साथ कोई पुस्तक लाए थे, जिसे उन्होंने मुझे पकड़ाया। मैंने पुस्तक मेज पर रखी और उनके साथ चलने को तैयार हो गया। डॉ. युगेश्वर ने मुझसे कहा, ‘‘पुस्तक ऐसे मत रखिए, सँभालकर रखिए।’’ उत्तर में मैंने कहा, ‘‘यहाँ कोई आता-जाता नहीं।’’ इस पर युगेश्वरजी ने कहा, ‘‘कभी-कभी गायब हो जाती है। युगेश्वरजी का इतना कहना था कि शर्माजी बोल उठे, कभी-कभी तो मैं भी आता हूँ।’’

एक दिन हिंदी प्रचारक संस्थान में बेरीजी के कार्यालय में बैठे हुए थे। बेरीजी का एक कर्मचारी कोई छोटी-मोटी शिकायत लेकर आया। बेरीजी ने उसकी समस्या का निदान तो नहीं किया, उलटे उस पर अकारण बरस पडे़ और कुछ बुरा-भला भी कहा। जब वह कर्मचारी वहाँ से चला गया तो मनु शर्मा बेरीजी के स्वभाव पर टिप्पणी करने से न चूके। उन्होंने बेरीजी को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘जब मच्छर मारना होता है तो आप बंदूक चलाते हैं और जब बंदूक चलाने का अवसर होता है आप फुलझड़ी छोड़ते हैं।’’

मनु शर्मा यशस्वी तथा सम्मानित साहित्यकार तो थे ही, आदर्श मानव भी थे। वे विनम्र तथा शांत स्वभाव के थे। वे कभी किसी की निंदा नहीं करते थे। कुशवाहा कांत, गोविंद सिंह आदि जिन लेखकों को तिरस्कारपूर्ण दृष्टि से देखा जाता था, मनु शर्मा उनमें भी अच्छाई ढूँढ़ निकालने से नहीं चूके। मनु शर्मा कहते थे कि कुशवाहा कांत ने कुछ अवसरों पर ऐसी चीजें दी हैं, जो मील के पत्थर हैं। अपने मित्रों का मानवर्धन तो करते ही थे, नए लेखकों की सामान्य समझी जानेवाली रचना में भी कोई-न-कोई विशेषता ढूँढ़ लेते थे। ऐसे लेखकों का उत्साहवर्धन करते थे और उन्हें परामर्श भी देते थे। प्रायः देखने-सुनने में आता था कि यदि कोई रचनाकार उनके पास सहायता-सहयोग के लिए आता था तो उसे भी निराश होकर या खाली हाथ नहीं जाना पड़ता था। संतोषी ऐसे थे कि कभी किसी प्रकाशक या संपादक को रॉयल्टी या पारिश्रमिक के लिए नहीं लिखा। किसी ने भेज दिया तो ठीक, नहीं भेजा तो न सही। संबंधों और दायित्वों को निभाने में भी वे सदा तत्पर दिखे। वैयक्तिक दृष्टि से पिछले पचास वर्षों से उन्हें अग्रज के रूप में मानता रहा हूँ और उन्होंने भी अग्रज की नाई अनेक अवसरों पर सत्परामर्श द्वारा मुझे धन्य किया है।

काशी के गौरव तथा हिंदी के यशस्वी कथाकार मनु शर्मा को मेरी सादर श्रद्धांजलि।

शब्दलोक

४७, लाजपत नगर

वाराणसी (उ.प्र.)

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