लगता कैसी भूल हुई

लगता कैसी भूल हुई

तन तो मस्ती में है झूमे, ढूँढ़ रहा मन मधुशाला,

घर की छत की दीवारों में, दीखे जाला-ही-जाला।

एक अकेला सूनापन ही

बैठा-बैठा झाँक रहा,

आखिर तो कोई अपनाए

इधर-उधर को ताक रहा।

वन-उपवन की घोर कालिमा, साथ लिये आई पाला,

तन तो मस्ती में है झूमे, ढूँढ़ रहा मन मधुशाला।

अपनी-अपनी लेकर डफली

बीच बजरिया बजा रहा,

सुर बे-सुरे निकाले सारे

अपनी धुन को सजा रहा।

बना हुआ मध्यस्थ अखाड़ा, नहीं किसी ने भी टाला,

तन तो मस्ती में है झूमे, ढूँढ़ रहा मन मधुशाला।

सबमें खोट दिखाई देती

खुद निर्दोषी कहलाता,

बिखर रही हाला-ही-हाला

स्वाद-स्वाद पीता जाता।

बिन परिचय केगाल बजाता, कंठ पड़ी कंठी माला,

तन तो मस्ती में है झूमे, ढूँढ़ रहा मन मधुशाला।

करे प्रतिज्ञा ही रोजाना

करना कुछ अथवा मरना,

जीवन एक खिलौना समझा

तोड़ दिया तो पछताना।

शेष ‘अचूक’ एक रह जाए, जिसने भी देखा-भाला,

तन तो मस्ती में है झूमे, ढूँढ़ रहा मन मधुशाला।

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अलख जगाता रहता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में,

गीत खुशी के गाता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में।

क्या होती है दुनियादारी

किससे क्या मुझको लेना,

मस्त-मस्त गूँजे अनहद जो

साथ उसे सारा देना।

नीति अजब अपनाता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में,

अलख जगाता रहता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में।

जाने-अनजाने लोगों ने

मन की बात कहाँ जानी,

जो भी अब तक आते-जाते

करते बातें बर्फानी।

खुद में खुद ही खोजता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में,

अलख जगाता रहता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में।

पीर पराई की भी भाषा

बदली तो ऐसी बदली,

कथनी-करनी एक हो गए

सूनी दिखती नहीं गली।

देख-देख शरमाता हूँ, मैं बैठा अपनी कुटिया में,

अलख जगाता रहता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में।

अपने ऊपर जब हँसता तो

लगता कैसी भूल हुई?

जिसे किया अनुकूल सोचता

वही आज प्रतिकूल हुई।

थाह ‘अचूक’ ढूँढ़ता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में,

अलख जगाता रहता हूँ मैं, बैठा अपनी कुटिया में।

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