भारत-विभाजन और मुसलिम समस्या पर आंबेडकर का अभिमत

भारत-विभाजन और मुसलिम समस्या पर आंबेडकर का अभिमत

देश के मुसलमानों और भारत-विभाजन को लेकर भीमराव आंबेडकर के विचारों पर अभी भी विवाद होता रहता है। भारत के विभाजन और मुसलमानों के लिए अलग देश के सपने तो १९३० से ही हवा में तैरने लगे थे, जब दिसंबर मास में डॉ. मोहम्मद इकबाल ने प्रयागराज में हुए मुसलिम लीग के अधिवेशन में पश्चिमोत्तर भारत में एक अलग मुसलिम राज्य की माँग हवा में उछाल दी थी। १९३३ में लंदन में बैठकर पंजाब के चौधरी रहमत अली ने एक पैंफलेट ‘Now or Never; Are We to Live or Perish Forever’ लिखा। जिसे बाद में ‘पाकिस्तान डिक्लेरेशन’ के नाम से भी जाना गया। लेकिन पाकिस्तान के लिए विधिवत् प्रस्ताव मुसलिम लीग ने मार्च १९४० में लाहौर में पारित किया। यह अलग बात है कि उस प्रस्ताव में कहीं भी पाकिस्तान का नाम नहीं था। उसके अगले महीने ही अप्रैल १९४० में कांग्रेस ने अपने रामगढ़ अधिवेशन में भारत विभाजन के विरोध में संकल्प पारित किया। उसके आठ महीने बाद ही दिसंबर १९४० में आंबेडकर ने ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ के नाम से एक किताब लिखी। उनके इस ग्रंथ ने यह प्रभाव दिया कि वे भारत-विभाजन के पक्ष में थे। लेकिन आंबेडकर का मानना था कि इस ग्रंथ में उन्होंने भारत-विभाजन को लेकर हिंदू और मुसलमान दोनों पक्षों के तर्कों की निष्पक्ष प्रस्तुति एवं मीमांसा की है। वह किताब देश में चर्चा का विषय बन गई। आंबेडकर के जीवनी लेखक धनंजय कीर इस किताब को उस समय का बिंबशैल, यानी बंब गिराना कहते हैं। (DhananjayKeer, Dr. BabasahebAmbedkar: life and mission, Page 333) आंबेडकर ने अपनी इस पुस्तक की भूमिका में कार्लाइल को उद्धृत किया—‘‘इंग्लैंड की मेधा, जो कभी तूफानों की छाती चीरकर आगे उड़ान भरते जानेवाले बाज के समान थी, जिसे अपने शौर्य पर गर्व था और जो विश्व को चुनौती देती थी, वह अब सूरज की ओर उड़ान नहीं भर रही है। इंग्लैंड की इस मेधा की सोच उस शुतुरमुर्ग की तरह लालची हो गई है, जो पास पड़े चमड़े तक को निगलने को आतुर रहता है। उसे चाहे जो भ्रांतियाँ हों, एक दिन तो उसे जागना ही पड़ेगा, भले ही वह कितनी देर तक अपना सिर धरती में गड़ाए रहे। उसे एक दिन जागना ही है। मनुष्य और देवता ने हमें जगाया है। हमारे पूर्वज भी हमें सतत जागरण का संदेश दे रहे हैं।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ xiv) लेकिन प्रश्न उठ सकता है कि कार्लाइल के इस उद्धरण से भारत का क्या ताल्लुक है और आंबेडकर ने इसे भारत-विभाजन की पुस्तक के आमुख में क्यों उद्धृत किया है? इसका उत्तर भी उन्होंने दिया, ‘‘मेरा विश्वास है कि वर्तमान परिस्थितियों में यह चेतावनी हम भारतीयों के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी कभी अंग्रेजों के लिए थी। यदि भारतीयों ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो वे अपने लिए संकट को ही आमंत्रित करेंगे।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ xiv) ऊपर के उद्धरण में इंग्लैंड की जगह भारत कर दिया जाए तो यह आंबेडकर का ही उद्धरण माना जाएगा। भारत-विभाजन पर विचार करने के लिए यह संशोधित उद्धरण आंबेडकर का स्व-स्वीकृत धरातल है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होते-होते भारत से अंग्रेजों के चले जाने और भारत का विभाजन किए जाने की चर्चा व बहस बहुत तेज हो चुकी थी। तब १९४५ में आंबेडकर ने ‘थॉटस ऑन पाकिस्तान’ का संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण ‘भारत विभाजन’ के नाम से प्रकाशित किया। वैसे भी १९४० से लेकर १९४५ तक सतलुज में बहुत पानी बह चुका था और भारत-विभाजन को लेकर सभी पक्ष सामने आ गए थे।

आंबेडकर ने पाकिस्तान पर तैयार की गई अपनी इस रपट का बहुत सा हिस्सा मुसलिम मानसिकता का विश्लेषण करने में खपाया है। उन्होंने इसके दो भाग किए हैं। पहले भाग में मोहम्मद बिन कासिम से लेकर मुगलकाल तक आक्रमणकारियों द्वारा हिंदुस्तान को डरा-धमकाकर मुसलिम देश बनाने का प्रयास करना और यहाँ के सांस्कृतिक प्रतीकों का विध्वंस करना तथा दूसरे खंड के चौथे अध्याय में मुसलिम आक्रांताओं द्वारा मंदिरों के विध्वंस और हिंदुओं पर अत्याचार व जबरन इसलाम में मतांतरण की लंबी फेहरिस्तें दी हैं। तैमूर के संस्मरणों को आंबेडकर ने उसी के शब्दों में उद्धृत किया—‘‘हिंदुस्तान पर हमले का मेरा मकसद काफिरों के खिलाफ अभियान चलाना और मोहम्मद के आदेशानुसार उन्हें सच्चे दीन में मतांतरित करना है। उस धरती को मिथ्या आस्था और बहुदेववाद से मुक्त करना है। हम गाजी और मुजाहिद होंगे। अल्लाह की नजर में सहयोगी और सैनिक सिद्ध होंगे।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर, संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ३८-३९) यह तर्क दिया जा सकता है कि मुसलमान हमलावरों के हमले मजहब के कारणों से नहीं थे, क्योंकि मुसलमान हमलावरों ने तो दिल्ली में पूर्वकाल में ही कब्जा जमाए बैठे अपने हममजहब मुसलमान शासकों पर ही हमले किए। आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘भारत पर मुसलमानों के हमले भारत के विरुद्ध हमले तो थे ही, साथ ही वे मुसलमानों के आपसी युद्ध भी थे। वे एक-दूसरे के जानी दुश्मन थे और उनके युद्धों का मकसद एक-दूसरे का सफाया करना भी था। मगर जिस बात को दिमाग में याद रखना महत्त्वपूर्ण है, वह यह कि अपने इन सभी विवादों और संघर्षों के बावजूद वे सभी एक सामूहिक उद्देश्य से प्रेरित थे और वह था हिंदू धर्म का विध्वंस करना।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ३९) दूसरे भाग में पूर्वोक्त पृष्ठभूमि में आंबेडकर ने मुसलिम मनोविज्ञान का अध्ययन किया। उनके अनुसार, ‘‘मुसलमानों के लिए हिंदू काफिर हैं और एक काफिर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जनमा होता है और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। जिस देश में काफिरों का राज्य हो, वह दारुल हर्ब है। ऐसी स्थिति में यह साबित करने के लिए सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिंदू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे। खिलाफत आंदोलन के दौरान जब मुसलमानों की मदद के लिए हिंदू काफी कुछ कर रहे थे, तब भी मुसलमान यह नहीं भूले थे कि उनकी तुलना में हिंदू निम्न और घटिया कौम है।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ३०४) इसलाम को माननेवाले विदेशी आक्रमणकारियों और विजेताओं ने भारतीयों पर जो अत्याचार किए, उसका लगभग ऐसा ही वर्णन १९०१ में दौलत राय ने अपनी पुस्तक ‘साहिबे कमाल गुरु गोविंद सिंह’ में किया है। (अमृतसर, गुरमीत साहित्य चैरिटेबल ट्रस्ट, १९९३, पृष्ठ ३३ से ४९ तक)

कहा जाता है कि आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘थाट्स ऑन पाकिस्तान’ में मुसलमानों के मनोविज्ञान और अन्य मजहबों को लोगों पर उनके दृष्टिकोण को लेकर कुछ ऐसी सख्त टिप्पणियाँ की थीं कि प्रकाशन से पूर्व अपने कुछ मित्रों के कहने पर उन्हें हटा दिया। कीर के अनुसार, यदि वे न हटाते तो शायद आंबेडकर को भी वही असुखद अनुभव होता, जो कभी एच.जी. वैल्ज को लंदन में मुसलमानों के हाथों हुआ था।’’ (DhananjayKeer, Dr. BabasahebAmbedkar: life and mission, page 334, अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक एच.जी. वैल्ज ने १९२२ में एक पुस्तक ‘History of the World’ लिखी थी, जिसमें एक अध्याय मुसलमानों व इसलाम पर भी था। मुसलमानों की दृष्टि में मुसलमानों व इसलाम का उनका यह विश्लेषण आपत्तिजनक था। लंदन व भारत के कुछ शहरों में भी मुसलमानों ने वैल्ज के खिलाफ प्रदर्शन किए, उनकी किताब जलाई और उनके साथ दुर्व्यवहार किया।)डॉ. आंबेडकर मानते थे कि मुसलमान मानसिक रूप से अपने आप को हिंदुस्थान का शासक मानते हैं। उनका मानना है कि हिंदुस्तान में उनका शासन अंग्रेजों ने छीना है। अब जब वे भारत से वापस जाने की सोच रहे हैं तो स्वाभाविक है कि मुसलमानों को ही हिंदुस्तान का राज वापस मिलना चाहिए। लेकिन मुसलमान जानते हैं कि वर्तमान हालात में यह संभव नहीं है। संभावना यही है कि ब्रिटिश सरकार की रुखसती के बाद भारत में शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली स्थापित हो जाएगी। उस हालत में मुसलमान पुनः हिंदुस्तान के शासक नहीं बन पाएँगे। तब इसका क्या समाधान हो सकता है? इसका एक ही समाधान है। या तो मुसलमानों के लिए देश के एक हिस्से को काटकर उनके लिए नया देश बना दिया जाए या फिर नए संविधान में मुसलमानों को हिंदुओं के बराबर प्रतिनिधित्व दिया जाए। मुसलमानों की जनसंख्या कुल जनसंख्या का केवल २३ प्रतिशत है, इसको मुसलमानों की भागीदारी का आधार न बनाया जाए। मुसलमानों द्वारा भारत को काटकर अपने लिए अलग देश बना लेने की मानसिकता को स्पष्ट करने के लिए लार्ड ऐक्टन की उक्ति है, ‘‘आत्मा एक ऐसे शरीर की खोज के लिए भटकती रहती है, जिसमें वह पुनः जीवन का संचार कर सके। परंतु उसे न पाने पर वह मर जाती है।’’ आंबेडकर कहते हैं, ‘‘एक राष्ट्र के रूप में रहने की इच्छा उन्होंने विकसित कर ली है। उनके लिए कुदरत ने एक ऐसा क्षेत्र तलाश लिया है, जिसे अधिगृहीत करके वे नवजात मुसलिम राष्ट्र सांस्कृतिक गृह और राज्य बना सकते हैं।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ २१) इस मानसिकता को गहराई से समझ लेने के बाद ही उन्होंने अपने निष्कर्ष निकाले हैं।

लेकिन कांग्रेस भारत विभाजन को रोकने के लिए किसी भी तरह मुसलमानों को साथ लेकर चलना चाहती है। इस हेतु आंबेडकर का सबसे बड़ा एतराज यह है कि कांग्रेस हर हालत में मुसलमानों के तुष्टीकरण में लगी हुई है। कांग्रेस मुसलमानों की नाजायज माँगों के आगे भी नतमस्तक हो जाती है, इसलिए उनकी माँगें बढ़ती जाती हैं। दरअसल १९१६ में कांग्रेस का मुसलिम लीग से लखनऊ में जो पैक्ट हुआ था, कांग्रेस ने एक प्रकार से उसी में मुसलिम सांप्रदायिकता के आगे समर्पण कर दिया था। कांग्रेस ने स्वीकार कर लिया कि मुसलमान सदस्यों की संख्या प्रांतीय विधानसभाओं में हर प्रांत में अलग-अलग तय की जाएगी। द्वितीय, केंद्रीय सरकार में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व एक तिहाई रहेगा। तृतीय, सभी समुदायों के लिए अलग निर्वाचन मंडल तैयार किए जाएँगे। यह व्यवस्था तब तक रहेगी, जब तक यह समुदाय संयुक्त निर्वाचन मंडल की माँग नहीं करेंगे। मुसलिम लीग इससे अपने समुदाय के लिए अलग निर्वाचन मंडल का अधिकार इसमें कांग्रेस से मनवा सकी। लेकिन कांग्रेस आखिर यह क्यों करती है? कांग्रेस की इच्छा है कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ी जा रही आजादी की लड़ाई में मुसलमान भी उसका साथ दें। लेकिन कांग्रेस यह साथ उनका तुष्टीकरण करके लेना चाहती है। कांग्रेस यह चाहती है कि उसे हिंदू और मुसलमान, दोनों की ही पार्टी माना जाए, इसलिए पार्टी मुसलमानों के आगे नतमस्तक होने के लिए भी तैयार है। इस काम के लिए कांग्रेस इस सीमा तक गई कि उसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत के मुसलमानों को लेकर ‘खिलाफत आंदोलन’ शुरू कर दिया। १९१९ में तुर्की के मुसलमान खलीफा के पद की केंचुली उतार रहे थे और उसके ओटोमन साम्राज्य का अंत हो रहा था। तुर्की में कमाल पाशा अतातुर्क का प्रगतिशील नेतृत्व उभर रहा था। भारत के मुसलमानों का इससे कोई संबंध नहीं था। तुर्की के मुसलमान तो अपने देश में खलीफा का पद रखने के खिलाफ थे, लेकिन भारत के मुसलमान चाहते थे कि तुर्की में खलीफा के पद को बनाए रखा जाए। इसके लिए वे भारत में खिलाफत आंदोलन चला रहे थे। कांग्रेस और महात्मा गांधी इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। डॉ. आंबेडकर को कांग्रेस की यह नीति समझ नहीं आ रही थी। कांग्रेस जितना इस जिद पर अड़ी थी कि उसे हिंदू-मुसलमान दोनों का प्रतिनिधि माना जाए, जिन्ना उतने ही ज्यादा हठी हो रहे थे कि मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था उनकी ‘मुसलिम लीग’ ही है। जिन्ना शायद कुछ सीमा तक ठीक थे, लेकिन कांग्रेस इसे मानने को तैयार नहीं थी और अपनी जिद को ठीक ठहराने के लिए मुसलमानों के आगे दंडवत् हो रही थी। आंबेडकर की नजर में कांग्रेस का यह तुष्टीकरण ही अनेक समस्याओं का कारण है। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कांग्रेस मुसलमानों की हर अन्यायपूर्ण माँग को स्वीकार करती है, लेकिन तथाकथित अछूत वर्ग को उनके न्यायपूर्ण अधिकार देने के लिए भी तैयार नहीं है। कम्युनल अवार्ड से मुसलमानों को उनकी संख्या से भी ज्यादा लाभ मिलें, इस पर कांग्रेस को कोई आपत्ति नहीं, लेकिन यदि सरकार अछूतों को कुछ देने की बात करती है तो कांग्रेस इसे पचा नहीं पाती।

मुसलमानों का भारत के भविष्य को लेकर क्या चिंतन है, इसको दिखाने के लिए आंबेडकर ने कांग्रेस के ही दो प्रमुख मुसलमान नेताओं को उद्धृत किया है। सबसे पहले सैफुद्दीन किचलू के अनुसार, ‘‘कांग्रेस उस समय तक निर्जीव थी, जब तक खिलाफत कमेटी ने इसमें जान नहीं फूँकी। जब खिलाफत कमेटी कांग्रेस में शामिल हुई तो इसने एक साल में वह काम कर दिखाया, जो हिंदू कांग्रेस चालीस साल में भी नहीं कर सकी थी। यदि हम ब्रिटिश शासन को इस देश से उखाड़ फेंकते हैं और स्वराज स्थापित कर लेते हैं और अफगान या दूसरे मुसलिम देश भारत पर आक्रमण करते हैं, तो इस देश को विदेशी आक्रमण से बचाने के लिए हम मुसलमान उनका मुकाबला करेंगे और अपने पुत्रों का बलिदान कर देंगे। परंतु एक बात मैं स्पष्ट करूँगा। सुनो! मेरे हिंदू भाइयो सुनो! यदि आप हमारे तंजीम के आंदोलन में बाधा डालेंगे और हमें हमारा अधिकार नहीं देंगे, तो हम अफगानिस्तान या अन्य मुसलिम शक्ति के साथ हाथ मिलाएँगे तथा इस देश में अपना शासन स्थापित करेंगे।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ २७०-७१, यह समाचार टाइम्स ऑफ इंडिया के १४ मार्च, १९२५ के अंक में प्रकाशित हुआ था) ध्यान रहे, इसलाम के लिए तंजीमी आंदोलन का मतलब मतांतरण के अधिकार से होता है।

इसी संदर्भ में आंबेडकर ने कांग्रेस के दूसरे वरिष्ठ नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद को उद्धृत किया—‘‘जनसंख्या के हिसाब से बंगाल और पंजाब में मुसलमानों का थोड़ा सा ही बहुमत है। पर दिल्ली प्रस्तावों से उन्हें पाँच प्रांत और मिल गए हैं, जिनमें तीन प्रांत सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत और बलोचिस्तान में मुसलमानों का भारी बहुमत है। यदि मुसलमान इस महत्त्वपूर्ण कदम को नहीं समझते तो वे जीवित रहने के लायक नहीं हैं। अब पाँच मुसलिम प्रांतों के मुकाबले नौ प्रांत हिंदू होंगे। इन नौ प्रांतों में मुसलमानों के साथ हिंदू जैसा व्यवहार करेंगे, उसी के अनुरूप मुसलमान मुसलिम प्रांतों में हिंदुओं के साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे। क्या यह बहुत बड़ा लाभ नहीं है? क्या मुसलिम अधिकारों को जताने का हमें नया अधिकार नहीं मिल गया?’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ९६)

भारत विभाजन पर लिखी अपनी ‘पुस्तक थॉटस ऑन पाकिस्तान’ में उन्होंने इसे व्यंग्य शैली में लिखा है, ‘‘क्या हिंदू शासक जाति ने, जो हिंदू राजनीति पर अपना नियंत्रण रखती है, अस्पृश्य और शूद्रों के हितों की अपेक्षा मुसलमानों के निहित स्वार्थों की सुरक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया है? श्री गांधी अस्पृश्यों को तो कोई भी राजनैतिक लाभ देने का विरोध करते हैं, लेकिन मुसलमानों के पक्ष में वे एक कोरे चैक पर हस्ताक्षर करने के लिए तत्पर नहीं हैं, क्यों? वास्तव में हिंदू शासक जाति अस्पृश्यों तथा शूद्रों के साथ शासन में भाग लेने की अपेक्षा मुसलमानों के साथ शासन में भाग लेने को अधिक तत्पर दिखाई देती है।’’ आंबेडकर सवर्ण जाति के लोगों को ही हिंदू शासक जाति कहते हैं। आंबेडकर का यह प्रश्न कांग्रेस की मुसलिम सांप्रदायिक नीति की पोल तो खोलता ही है, लेकिन उनकी मूल चिंता यह है कि आखिर कांग्रेस द्वारा इतना पालने-पोसने के बाद भी मुसलमान अलग देश की माँग क्यों कर रहे हैं? आंबेडकर का आगे का प्रश्न और भी उत्तेजना भरा है। कांग्रेस ने तो मुसलमानों को हिंदुओं के अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए पहले ही अधिक अधिकार दिए हुए हैं। उनका प्रश्न है, ‘‘क्या विधानसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक नहीं है? क्या जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने का भी मुसलमानों पर कोई प्रभाव पड़ा है? क्या इससे विधानसभा में हिंदुओं का बहुमत घटता नहीं है? इसमें कितनी कमी आई है? अपने आपको केवल ब्रिटिश भारत तक ही सीमित रखते हुए और केवल उसी प्रतिनिधित्व का लेखा-जोखा रखते हुए, जो निर्वाचन क्षेत्रों को प्रदान किया गया है, में स्थिति क्या है? भारत सरकार के अधिनियम १९३५ के अनुसार केंद्रीय विधानसभा के निचले सदन में कुल १८७ स्थानों से हिंदुओं की संख्या १०५ और मुसलमानों की ८२ है। (जो कि मुसलमानों के जनसंख्या अनुपात से कहीं ज्यादा है) उक्त आँकड़ों का अध्ययन करने के पश्चात् कोई भी पूछ सकता है कि हिंदू राज में भय कहाँ है?’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर, संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ३६४) लेकिन इसके साथ ही आंबेडकर का शाश्वत प्रश्न फिर वहीं का वहीं है, इतने तुष्टीकरण के बाद भी मुसलमान भारत में क्यों नहीं रहना चाहते, वे भारत का विभाजन क्यों चाहते हैं? इसका उत्तर उन्होंने बातचीत में कभी दत्तोपंत ठेंगड़ी को दिया था। उसका प्रसंग दूसरा था, लेकिन महत्त्व सार्वकालिक है। मुसलमानों का विषय आने पर बाबा साहब ने कहा, ‘‘मुझे अच्छी तरह पता है कि जूता कहाँ काट रहा है। आप लोगों को काटने का अनुभव होने पर भी उसकी परवाह नहीं है।’’ शायद इसीलिए आंबेडकर मुसलमानों के लिए अलग देश बना देना चाहते थे, क्योंकि उनको जूते के काटने का भी पता था और उन्हें उसकी परवाह भी थी। वे जानते थे कि जूता ज्यादा देर काटता रहा तो जहर सारे शरीर में फैल सकता है। लेकिन इससे भी एक बड़ा प्रश्न आंबेडकर के सामने था। आखिर जूता काटता ही क्यों है? इसका उत्तर भी बाबा साहेब को खुद ही देना था और उन्होंने दिया भी। वे जानते थे कि मतांतरण से देर-सवेर राष्ट्रांतरण भी हो जाता है। १९३५ में उन्होंने अपने बारे में कहा था कि मैं हिंदू विश्वासों को मरने से पहले तिलांजलि दे दूँगा। सब जगह चर्चा होने लगी कि वे मुसलमान या ईसाई हो जाएँगे। मतांतरण के इस काम में लगी संस्थाएँ उनसे संपर्क भी करने लगीं और उन्हें प्रलोभन भी देने लगीं। लेकिन भीमराव न तो मुसलमान हुए, न ही ईसाई। आंबेडकर बुद्ध की शरण में दीक्षित हो गए। अपने परम शिष्य शंकरानंद शास्त्री को उन्होंने इसका उत्तर दिया, ‘‘ईसाई या इसलाम मजहब ग्रहण करने पर मेरे लोग राष्ट्रीयता ही खो बैठेंगे।’’ आंबेडकर बुद्ध की शरण में चले गए। लेकिन सैकड़ों साल की मुसलिम गुलामी में जिन्होंने मजहब बदल लिया था, क्या अब तक उनका राष्ट्रांतरण हो चुका था? भारत से उनका भावात्मक नाता कट चुका था? जिन्ना यही मानते थे। इसी में से दो राष्ट्रों के सिद्धांत का जन्म हुआ था। आंबेडकर भी यही अनुभव कर रहे थे। जिन हिंदुओं का सैकड़ों साल पहले मुसलिम काल में मतांतरण हुआ था, अब वे ही काटने लगे थे। लेकिन इससे भी एक बड़ा प्रश्न अनुत्तरित था, जिसका जवाब आंबेडकर को देना था। क्या ये लोग फिर वापस नहीं आ सकते? यदि ऐसा हो जाए तो विभाजन का प्रश्न टल जाए? इसका उत्तर उन्होंने ठेंगड़ी को दिया, ‘‘हरिजन हिंदू समाज का ही अंग हैं। फिर भी हरिजनों को हिंदू समाज में आत्मसात् नहीं किया जा सका। सवर्ण हिंदू समाज की जीर्ण शक्ति के बारे में मेरा परिचय है। इसलिए मैं कहता हूँ कि विदेशी निष्ठावाले लोगों को राष्ट्र शरीर में रख लेने से उन्हें बाहर कर देना ही श्रेयस्कर है।’’ हिंदू समाज की पाचनशक्ति कमजोर हो गई है, यह बाबा साहेब जानते हैं। लेकिन समस्या का हल तो इस पाचन शक्ति को चुस्त-दुरुस्त करने से ही निकलेगा। हिंदुस्तान का विभाजन भी न हो और मुसलिम समस्या का समाधान भी हो जाए, क्या कोई ऐसा तरीका हो सकता है? इसको वे पाकिस्तान का हिंदू विकल्प कहते हैं। इसमें वे लाला हरदयाल द्वारा हिंदुस्तान की सुरक्षा हेतु सुझाए गए एक रोचक सुझाव का जिक्र करते हैं। लाला हरदयाल ने कभी कहा था कि भारत की सुरक्षा तभी हो सकती है, यदि अफगानिस्तान को फिर से हिंदू बना लिया जाए और पश्मिमोत्तर सीमा प्रांत के लोग पुनः अपनी पुरानी संस्कृति में लौट आएँ। उनका यह सुझाव १९२५ में लाहौर से प्रकाशित होनेवाले ‘दैनिक प्रताप’ में छपा था। हरदयाल के अनुसार, ‘‘मैं यह घोषणा करता हूँ कि हिंदू जाति, हिंदुस्तान और पंजाब का भविष्य इन चार स्तंभों पर आधारित है। (क) हिंदू संगठन (ख) हिंदू राज (ग) मुसलमानों की शुद्धि और (घ) अफगानिस्तान तथा सीमावर्ती क्षेत्रों पर विजय और उनका शुद्धीकरण। जब तक हिंदू जाति ये चारों बातें पूरी नहीं कर लेती, तब तक हमारी भावी संतानों की सुरक्षा पर हमेशा खतरा मँडराता रहेगा। अफगानिस्तान और हमारे सीमांत के पहाड़ी क्षेत्र पहले भारत के ही अंग थे। परंतु आजकल वहाँ इसलाम का प्रभुत्व है। जैसे नेपाल में हिंदू धर्म है, उसी तरह अफगानिस्तान और सीमांत क्षेत्रों में भी हिंदू संस्थाएँ होनी चाहिए, अन्यथा स्वराज पाना व्यर्थ होगा। चूँकि पहाड़ी कबाइली सदा युद्धप्रिय और भूखे होते हैं, इसलिए यदि वे हमारे शत्रु बन गए तो नादिरशाह और जमानशाह का जमाना फिर से वापस आ जाएगा। आजकल अंग्रेज अधिकारी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, परंतु ये हमेशा के लिए नहीं हो सकते। यदि हिंदू अपनी रक्षा करना चाहते हैं तो उन्हें अफगानिस्तान और सीमांत क्षेत्रों पर विजय पानी चाहिए और सभी पहाड़ी कबाइलियों का मजहब परिवर्तित करना चाहिए।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ११५-११६)

यदि यह मान लिया जाए कि केवल अलग मजहब, जिसका उत्पत्ति स्थल देश से बाहर है, के कारण ही मुसलमान भारत में एक अलग राष्ट्र हो जाते हैं तो तब हरदयाल ने या हिंदुओं ने इसका यह हल सुझाया है। इससे दो राष्ट्रों की समस्या का समाधान भी हो सकता है और भारत अखंड भी रह सकता है। आंबेडकर ने इसके पक्ष या विपक्ष में मत तो नहीं दिया है, लेकिन इस समाधान के रास्ते में आनेवाली दिक्कतों की चर्चा जरूर की है। पहली दिक्कत तो यही है कि क्या मजहब बदलना व्यावहारिक है? आंबेडकर का कहना है—‘‘हिंदू मिशनरी नहीं हैं और दूसरे, जब हिंदू किसी अपरिचित व्यक्ति को अपने मजहब में शामिल करता है तो इस प्रश्न का सामना अवश्य करना पड़ेगा कि मजहब बदलनेवाले व्यक्ति की जाति क्या होगी? हिंदू के अनुसार वह जिस जाति में पैदा हुआ है, वही उसकी जाति होगी। मजहब बदलनेवाला व्यक्ति तो हिंदू समाज की किसी जाति में पैदा नहीं हुआ। इसलिए वह किसी जाति का नहीं होगा। इसलिए ऐसे व्यक्ति का हिंदुओं में कोई समाज नहीं होगा। जब मजहब बदलनेवाले व्यक्ति के लिए कोई समाज ही नहीं होगा तो मजहब बदलना कैसे संभव होगा? जब तक हिंदू समाज स्वतंत्र स्वजातीय वर्गों में बँटा रहेगा, तब तक हिंदू मिशनरी नहीं हो सकता। इसलिए अफगानी और पहाड़ी कबाइलियों का मजहब परिवर्तन महज एक सपना ही रहेगा।’’ (बाबासाहब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ११७) आंबेडकर के अनुसार इस योजना में एक और गड़बड़ है, ‘‘इसके लिए बहुत धन की जरूरत रहेगी, वह कहाँ से आएगा? हिंदुओं ने बहुत लंबे अरसे से अन्य लोगों का मजहब परिवर्तित करके उन्हें अपने मजहब में लाना बंद कर दिया है। इसलिए उनमें मजहब परिवर्तन के लिए उत्साह भी नहीं है। इस उत्साह के अभाव में धन एकत्र करने पर भी प्रभाव पड़ेगा।’’ (बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ११७) आंबेडकर की तीसरी आशंका सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। क्या अफगानिस्तान वहाँ मजहब परिवर्तन के लिए प्रचार की आज्ञा देगा? सभी जानते हैं कि इसलामी देश इसकी अनुमति नहीं देते। इसलाम में जाना आसान है, लेकिन वहाँ से बाहर निकलना मुश्किल है। आंबेडकर इस समाधान को इसकी अव्यावहारिकता के कारण संभव नहीं मानते। लाला हरदयाल का समाधान तो दूर की कौड़ी लानेवाला है, परंतु गांधी तो वह उपाय अपना रहे थे, जो उनकी दृष्टि में व्यावहारिक थे, परंतु वे भी हिंदू-मुसलिम एकता में सफल क्यों नहीं हुए? इसीलिए आंबेडकर कहते हैं, ‘‘अब तो श्री गांधी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वे भी समझने लगे हैं कि यह एक असंभव कार्य हैं।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ १७८)

लेकिन क्या कोई ऐसा विकल्प भी है, जिससे हिंदुस्तान अखंड रहे और मुसलमान भी संतुष्ट हो जाएँ। आंबेडकर इसे पाकिस्तान का मुसलिम विकल्प कहते हैं। आंबेडकर के अनुसार मुसलमान ऐसे संविधान की शर्त पर हिंदुस्तान में रहने के लिए तैयार हो सकते हैं, जिसमें निम्न सभी उपबंधों का समावेश हो। (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ १८८)

१. केंद्रीय और प्रांतीय, दोनों विधानमंडलों में पृथक् निर्वाचन प्रणाली के आधार पर मुसलमानों का पचास प्रतिशत प्रतिनिधित्व होगा।

२. केंद्रीय और प्रांतीय कार्यपालिका में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व पचास प्रतिशत होगा।

३. सरकारी सिविल सेवाओं में पचास प्रतिशत पद मुसलमानों के लिए आरक्षित होंगे।

४. सशस्त्र सेना के अधिकारियों और सैनिकों में मुसलमानों का अनुपात आधा-आधा होगा।

५. सभी सार्वजनिक निकायों, उदाहरण के लिए विभिन्न आयोगों, परिषदों इत्यादि में मसलमानों का प्रतिनिधित्व पचास प्रतिशत होगा।

६. उन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों में, जिनमें भारत भाग लेगा, मुसलमानों का प्रतिनिधित्व पचास प्रतिशत होगा।

७. यदि प्रधानमंत्री हिंदू होगा तो उप-प्रधानमंत्री मुसलमान होगा।

८. यदि सेनाध्यक्ष हिंदू होगा तो उप सेनाध्यक्ष मुसलमान होगा।

९. विधानमंडल के ६६ प्रतिशत मुसलिम सदस्यों की सहमति के बिना प्रांत की सीमाओं में परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा।

१०. विधानमंडल के ६६ प्रतिशत मुसलिम सदस्यों की सहमति के बिना किसी मुसलिम देश के विरुद्ध कोई काररवाई या संधि वैध नहीं होगी।

११. विधानमंडल के ६६ प्रतिशत मुसलिम सदस्यों की सहमति के बिना मुसलमानों के मजहब या संस्कृति से संबंधित मजहबी रीति-रिवाजों को प्रभावित करनेवाला कोई कानून नहीं बनाया जाएगा।

१२. हिंदुस्तान की राष्ट्रीय भाषा उर्दू होगी।

१३. विधानमंडल के ६६ प्रतिशत मुसलिम सदस्यों की सहमति के बिना गो हत्या पर प्रतिबंध लगानेवाला कोई कानून वैध नहीं होगा और न ही इसलाम के प्रचार व मजहब परिवर्तन करनेवाला कानून वैध होगा।

१४. विधानमंडल के ६६ प्रतिशत मुसलिम सदस्यों की सहमति के बिना संविधान में कोई संशोधन या परिवर्तन मान्य नहीं होगा।

इसका अर्थ यह है कि मुसलमान हिंदुस्तान में रहने के लिए तभी तैयार होंगे, यदि उनको हर क्षेत्र में हिंदुओं के बराबर प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। उनकी यह माँग अनुचित ही नहीं, आँकड़ों पर भी आधारित नहीं है। १९४० में जिस समय मुसलमान इस प्रकार का सपना पाल रहे थे, उस समय उनकी जनसंख्या सारे देश की जनसंख्या में केवल २३ प्रतिशत थी। (स्रोत : बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ४२५, इसमें ब्रिटिश भारत, भारतीय रियासतों की जनसंख्या शामिल है। फ्रेंच इंडिया और पुर्तगाली इंडिया की जनसंख्या शामिल नहीं है।)

आंबेडकर का कहना है, ये सारे बिंदु उन्होंने मुस्लिम स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही तैयार किए हैं। उनके अनुसार, ‘‘मुसलिम विकल्प किस तरह का होने की संभावना है, इसका पता हैदराबाद के महामहिम निजाम के अपने राज्य के अंतर्गत तैयार किए जानेवाले सांवैधानिक सुधारों की प्रवृत्ति से पता चलता है।’ (आंबेडकर ने इसका विस्तृत विवरण अपनी पुस्तक भारत का विभाजन में दिया है। बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ १८९)

जाहिर है, हिंदुस्तान में मुसलमानों की इन माँगों को कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता था। इसे स्वीकार किए बिना विभाजन रुक नहीं सकता था, क्योंकि मुसलिम लीग अपनी माँग छोड़ने को तैयार नहीं थी। पाकिस्तान का हिंदू विकल्प संभव नहीं था और पाकिस्तान का मुसलिम विकल्प विभाजन से भी ज्यादा खतरनाक था। इसलिए आंबेडकर सुझाव देते हैं, ‘‘हिंदुओं को इस चेतावनी को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि यदि उन्होंने स्वतंत्रता से पूर्व भारत को दो खंडों में बाँटने से इनकार किया तो उन्हें भी वैसे ही भँवर में फँसना पड़ेगा, जिस तरह तुर्की, चेकोस्लोवाकिया और कई अन्य देश फँसते गए हैं। यदि वे अपने जहाज को सागर के बीच नष्ट होने से बचाना चाहते हैं तो उन्हें फालतू और अनावश्यक बोझ को उससे उतारकर फेंकना होगा और उसे गतिमान करने के लिए हलका करना होगा। वे अपनी यात्रा को बहुत हद तक आसान कर लेंगे, यदि वे प्रो. टोयनवी के शब्दों में यह मार्ग चुनें कि जहाज पर रखे ज्वलनशील और अवांछित सामान को फेंककर उसे हलका करने में ही संतोष अनुभव करें।’’ (बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ २१०)

‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में मुसलिम मनोविज्ञान को आंबेडकर के जीवनीकार धनंजय कीर सूत्रबद्ध करते हैं, ‘‘मुसलमानों की मानसिकता मूलतः लोकतांत्रिक नहीं है, न ही यह उनकी प्राथमिकता है। उनकी प्राथमिकता उनका मजहब है। उनकी राजनीति भी मजहब से प्रेरित होती है, जिसका संचालन मुल्ला-मौलवी करते हैं। सामाजिक सुधारों का मुसलमान विरोध करते हैं और विश्व भर में वे प्रतिगामी प्रकृति के हैं। मुसलमानों के लिए इसलाम एक वैश्विक मजहब है और उसकी आस्थाएँ सभी प्रकार की परिस्थितियों, युगों, दुनिया भर के लोगों पर लागू होती हैं। इसलाम का भ्रातृभाव वैश्विक नहीं है। वह केवल मुसलमानों के लिए मुसलमानों का भ्रातृभाव है। गैर मुसलमानों के लिए इसमें केवल घृणा और शत्रुता का भाव ही है। मुसलमानों की निष्ठा उसी देश के प्रति होती है, जिस पर उनका शासन होता है। जिस देश पर उनका शासन नहीं है, वह देश उनका शत्रु है। इसलिए इसलाम किसी सच्चे मुसलमान को भारत को अपनी मातृभूमि और हिंदुओं को अपना ही हिस्सा मानने की अनुमति नहीं देता। आक्रमण मुसलमान की स्वाभाविक प्रकृति है। वह हिंदुओं की कमजोरी का लाभ उठाता है और उनके खिलाफ गिरोहबंदी करता है।’’ (DhananjayKeer, Dr. BabasahebAmbedkar : life and mission, page 334)

अब इस भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अखंड भारत को क्यों विभाजित किया जाना चाहिए, आंबेडकर ने उसके व्यावहारिक कारणों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उनके सामने एक ही प्रश्न था कि क्या मुसलमानों की निष्ठा भारत के प्रति रह पाएगी? क्या मुसलमान अभी भी यही नहीं सोच रहे कि भारत में अंग्रेजों ने सत्ता मुसलमानों से छीनी थी, अतः जब वे यहाँ से जाएँ तो स्वाभाविक ही सत्ता वापस उनको मिलनी चाहिए? जिस वक्त कांग्रेस भारत में मुसलमानों के लिए खिलाफत आंदोलन चला रही थी, उस समय भी जब मुसलिम नेतृत्व के एक वर्ग को लगा कि इसलामी वर्चस्व को स्थापित करने के लिए बाहर के मुसलिम देशों से भी सहायता लेने में कोई हर्ज नहीं है तो उन्होंने अफगानिस्तान के बादशाह को भारत पर आक्रमण करने के लिए निमंत्रित करने में हिचक नहीं दिखाई। यही चिंता आंबेडकर को थी। ब्रिटिश सत्ता के समाप्त हो जाने के बाद मुसलिम समाज यदि अपने आप को इस देश की धरती से जोड़ न सका और हिंदुस्तान में मुसलिम साम्राज्य स्थापित करने के लिए विदेशी मुसलमान देशों की ओर सहायता के लिए देखने लगा तो इस देश की स्वतंत्रता पुनः खतरे में नहीं पड़ जाएगी?

इसी का उत्तर आंबेडकर तलाश रहे थे। वे लिखते हैं, ‘‘कोई इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि स्वतंत्रता पा लेना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना उसे बनाए रखने के लिए पक्के साधनों का पा लेना। स्वतंत्रता को मजबूत रखनेवाली तो अंततोगत्वा एक भरोसेमंद फौज ही है। ऐसी फौज, जिस पर हर समय और किसी भी परिस्थिति में, देश के लिए लड़ने हेतु विश्वास किया जा सके। भारत में तो सेना संयुक्त ही होगी, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों ही होंगे। मान लीजिए, किसी विदेशी शक्ति का भारत पर आक्रमण होता है तो क्या सेना के मुसलमानों पर भारत की रक्षा के लिए भरोसा किया जा सकता है? मान लीजिए, हमलावर मुसलमानों का हममजहब हो तो क्या वे भारत की रक्षा के लिए उनका मुकाबला करेंगे या फिर उनकी तरफ हो जाएँगे? यह सवाल बहुत ही महत्त्व का है। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि सेना में शामिल मुसलमानों को अलग राष्ट्र के सिद्धांत, जो पाकिस्तान की नींव में है, की छूत कहाँ तक लग गई है। यदि उन्हें यह छूत लग गई है तो मान लेना चाहिए कि भारत की सेना खतरनाक हो गई है। भारत की आजादी की संरक्षक होने की बजाय वह उसके लिए खतरा पैदा करनेवाली और धमकी देनेवाली बन जाएगी। यह मेरा दृढ विश्वास है।’’ (बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ ३७०) इसलामी राष्ट्र की छूत उत्पन्न हो जाने के बाद भारत की मुसलिम समस्या का यह नीर-क्षीर विवेचन आंबेडकर का है। अपनी इस स्थापना के बाद ही वे पाकिस्तान का समर्थन करते हैं।

आंबेडकर का प्रश्न है कि इस स्थिति में और विकल्प क्या है? उनका प्रश्न सामयिक था और सटीक भी। लेकिन कांग्रेस तो इस प्रश्न का सामना करने को ही तैयार नहीं थी। मुसलमानों के मनोविज्ञान को सामने दीवार पर लिखा देखकर भी वह पढ़ने को तैयार नहीं थी। नेहरू आकाश में रहकर भारत की खोज कर रहे थे। महात्मा गांधी जमीन पर रहते थे, लेकिन वे मुसलमानों को लेकर मृगतृष्णा के शिकार थे। आंबेडकर का मत है कि मुसलमानों की समस्या को हल किए बिना यदि भारत अखंड रहता है तो वह कमजोर और रुग्ण बना रहेगा। लेकिन क्या मुसलमानों की समस्या हल हो सकती है? आंबेडकर का मानना है कि हिंदू-मुसलिम एकता के लिए महात्मा गांधी से ज्यादा प्रयास तो और कोई नहीं कर सकता। उन्होंने हिंदुओं के हितों को ताक पर रखकर भी मुसलमानों को खुश करने की कोशिश की। मुसलमानों के तुष्टीकरण के मामले में वे उस सीमा तक गए, जहाँ तक कोई सनकी ही जा सकता है। केरल में मोपला विद्रोह के दिनों में मुसलमानों ने हिंदुओं पर जो अमानवीय अत्याचार किए, गांधी और कांग्रेस उसकी भी स्पष्ट शब्दों में निंदा नहीं कर सकी, इस डर से कि कहीं मुसलमान नाराज न हो जाएँ। लेकिन इस सबके बावजूद मुसलमान प्रसन्न नहीं हुए और महात्मा गांधी भी अंत में अपने प्रयासों में निराश हो गए (गांधीजी और कांग्रेस द्वारा मुसलमानों के तुष्टीकरण का उदाहरणों समेत आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘भारत का विभाजन’ के भाग दो के छठे अध्याय में विस्तृत वर्णन किया है।) आंबेडकर ने कहा, ‘‘विभाजित होने के बाद हिंदुस्तान और पाकिस्तान, दोनों ही सबल और सुसंगठित राज्य बन जाएँगे। भारत को एक सुदृढ केंद्रीय सरकार की आवश्यकता है, किंतु यहाँ तब तक ऐसी सरकार नहीं हो सकती, जब तक पाकिस्तान भारत का भाग बना रहेगा। भारत सरकार अधिनियम, १९३५ में प्रस्तावित संघीय सरकार को देखें तो हम पाएँगे कि केंद्रीय सरकार एक अशक्त, जर्जर और लगभग निष्प्राण है। जैसा कि पहले कहा गया है, केंद्रीय सरकार को कमजोर करना मुसलिम प्रांतों को संतुष्ट करने की इच्छा से ही प्रेरित है। वे केंद्रीय सरकार को उसके स्वरूप और गठन में हिंदू प्रभुत्ववाली ही मानते हैं। इसलिए उसके अधिकार व नियंत्रण से मुक्त होना चाहते हैं। जब पाकिस्तान बन जाएगा तो उक्त विचार में कोई दम नहीं रहेगा। तब हिंदुस्तान एक सुदृढ़ केंद्रीय सरकार के अंतर्गत होगा, जो राज्य की स्थिरता के लिए आवश्यक है। किंतु इसे तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता, जब तक पाकिस्तान हिंदुस्तान से अलग नहीं हो जाता।’’ (बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड १५, पृष्ठ २१३) लेकिन आंबेडकर को भारत को जानने के लिए न आकाश में उड़ने की जरूरत थी और न ही गांधी की तरह मृगतृष्णा का शिकार होने की। आंबेडकर उन गली-मोहल्लों में से गुजरकर बड़े हुए थे, जो असली भारत था।

 

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