मैं चुनौती हूँ, पनौती नहीं

मैं चुनौती हूँ, पनौती नहीं

मैं चाय पी रही थी कि ईशा ऑफिस से लौटी। ‘‘मैं जल्दी आ गई हूँ या तुम लेट चाय पी रही हो?’’ उसने पूछा।

‘‘तुम तो समय से ही आई हो, यह मेरी तीसरी चाय है।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘ऐसे ही। थकान सी लग रही थी। चलो, तुम फ्रेश हो लो। तब तक तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ।’’

‘‘मैं बना लूँगी। तुम बैठी रहो।’’

‘‘अब बना ही रही हो तो पापा की भी बना लेना।’’ मैंने उसके लिए प्लेट लगाते हुए कहा। दीदी ने साथ में ढेर सी मिठाई बाँध दी थी।

‘‘शादी कैसी रही?’’ चाय छानते हुए उसने पूछा, ‘‘सुबह आप लोग आए, तब मैं जाने की जल्दी में थी। पूछ नहीं पाई।’’

‘‘शादी अच्छी ही रही। रॉयल शादी थी। दोनों भाइयों ने मिलकर पानी की तरह पैसा बहाया था, तो शादी अच्छी ही होनी थी।’’

‘‘सोनाली कैसी लग रही थी?’’

‘‘दस हजार के ब्राइडल और चालीस हजार के लहँगे के साथ कोई भी लड़की सुंदर ही लगेगी।’’

‘‘दूल्हा कैसा है?’’

‘‘मुझे सोनाली से तो इक्कीस ही लगा। देखने में भी और क्वालिफिकेशन में भी। जीजाजी ने जमकर दहेज दिया है, तभी तो ऐसा हीरे जैसा दामाद जुटा पाए हैं।’’

‘‘आजकल तो शादियों में कुछ करने को होता नहीं है, सारा काम कैटरर्स करते हैं। फिर तुम इतनी थकी सी क्यों लग रही हो?’’

‘‘वहाँ तो इससे भी एक कदम आगेवाली बात थी। एक तो इतना महँगा रिसॉर्ट, फिर सब काम इवेंट मैनेजमेंट के जिम्मे था। सिर्फ दूल्हा-दुलहन और गहने-कपडे़ हमारे थे। बाकी सारी व्यवस्था उनकी थी। मैंने तो पहली बार ऐसी शादी देखी। फूलमालाएँ, बैंडबाजे, पालकी, कहार, घोड़ा, शहनाई, फोटोग्राफर, स्टेज, आतिशबाजी, सब व्यवस्था इवेंटवालों की थी। खाना भी बहुत अच्छा था। नाश्ता भी हर बार नया था। अलग-अलग प्रांतों का था। आखिरी शादी थी न, जीजाजी ने दिल खोलकर पैसा खर्च किया था।’’

‘‘जिनके पास है, उन्हें खर्च करना ही चाहिए। इसी बहाने लोगों को रोजगार मिलता है। इतनी सुंदर शादी हुई है और तुम क्यों इतनी थकी-थकी सी लग रही हो?’’

‘‘सच कहूँ, आजकल शादी ही क्यों, कहीं भी जाने का मन नहीं होता।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अरे, हर जगह गहनों-कपड़ों की नुमाइश होती है। ऐसे मैं अपने अभाव और उभरकर सामने आते हैं।’’

‘‘माँ, तुम्हीं तो हम लोगों को बचपन से सिखाती रही हो कि अपने पास जो भी है, उसपर गर्व करना चाहिए। कभी मन में कॉम्प्लेक्स लाना नहीं चाहिए और अब तुम खुद...’’

‘‘कहने के लिए ये बातें ठीक लगती हैं, पर व्यवहार में लाना बहुत कठिन है। खासकर जब कोई सामने से टोक दे। इस बार तो तुम्हारी दोनों छोटी मौसियाँ हाथ धोकर पीछे पड़ गईं, ‘दीदी, यह क्या बाबा आदम के जमाने की बनारसी साड़ी पहन लेती हो। आजकल कोई पहनता भी है। अब तो बस डिजाइनर साडि़यों का चलन है।’ दोनों कहकर ही चुप नहीं हुईं। कसमें दे-देकर पूनम ने रिसेप्शन में अपनी साड़ी पहनाई और नीलम ने अपना सेट दिया। सच, इतना बुरा लगा और शर्म भी आई।’’

वह प्रसंग याद करके ही मेरा गला भर आया, मैं चुप हो गई। थोड़ी देर बाद उसाँस भरकर मैंने कहा, ‘‘सिर्फ गहनों, कपड़ों की बात नहीं है रे! घर में शादी लायक बच्चे होते हैं तो लोग उसके बारे में भी पूछते हैं। अब शुभम की शादी को ही ले लो। मुझे ऐसी डाँट पड़ी है कि क्या बताऊँ! बडे़ भैया और दीदी ने खूब लताड़ा है मुझको।’’

‘‘उन लोगों को बुला लेना था।’’

‘‘सिर्फ तुम्हारे मामा-मौसी ही तो नहीं हैं—रिश्तेदार और भी हैं। तुम्हारी बुआ हैं, दूर के सही, चाचा हैं, सबको बुलाना पड़ता। फिर सबको कहाँ सुलाती, कहाँ बिठाती, क्या खिलाती, बताओ। सबसे बड़ी बात, जाते समय नेग-स्वरूप हाथ में क्या रखती?’’

ईशा कुछ कहने को हुई कि बाहर का दरवाजा खुला और ये भीतर आए। हम दोनों चुप को गईं। ये कुछ देर तक हमें घूरते रहे, फिर बोले, ‘‘क्या हो गया? कौन मर गया?’’

‘‘कभी तो अच्छी बात किया कीजिए।’’ मैंने गुस्से में कहा।

‘‘तुम दोनों ऐसी शोकमग्न मुद्रा में बैठी थीं कि मुझे लगा...’’

ईशा एकदम बोल उठी, ‘‘मम्मी को दुःख हो रहा है कि शुभम् की शादी में किसी को बुला नहीं सके। वहाँ नासिक में सबने माँ को खूट डाँट लगाई है।’’

‘‘तो बुला लेती न। मना किसने किया था?’’

‘‘बुलाकर क्या अपनी हँसी करवातीं?शादियाँ कैसी होती हैं, देखकर आ रहे हैं न?’’

‘‘हमने तो कहा था शहजादे से कि थोड़ा रुक जाओ। हालात जरा सँभलने दो, पर उन्हें तो जल्दी पड़ी थी। बहन तक के लिए रुकने के तैयार नहीं थे।’’

‘‘कब तक रुकता, किस आशा पर रुकता?उसने कोई बाल विवाह तो नहीं किया है। अट्ठाईस साल की उम्र में शादी की है। और वह बेचारा तो रुक भी जाता, पर लड़कीवाले कब तक सब्र करते। वे तो बराबर दबाव बना रहे थे। लड़कीवालों को फिक्र होती ही है। सब लोग हमारी तरह थोड़े ही होते हैं कि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें।’’

‘‘तो अब तीस साल की लड़की के लिए मैं लड़का ढूँढ़ने जाऊँगा?’’

‘‘तीस साल की एकदम तो नहीं हो गई!’’

‘‘प्लीज-प्लीज!’’ ईशा ने दोनों हाथ जोड़कर कहा, ‘‘आप लोग मेरी शादी को लेकर लड़ाई मत कीजिए। मेरी शादी का खयाल मन से निकाल दीजिए। क्योंकि मैंने वह अध्याय ही बंद कर दिया है।’’ कहते हुए वह अपने कमरे में चली गई और उसने दरवाजा बंद कर लिया।

‘‘वाह, कितनी खुशी की बात है, आपके पैसे बच गए! चलिए, रिलेक्स हो जाइए।’’

‘‘पैसे पास में होंगे तो बचेंगे न। तुम तो ऐसी पनौती बनकर आई हो कि एकदम ठनठन गोपाल हो गया हूँ।’’

‘‘क्या कहा आपने?’’

‘‘वही जो अम्माँ, ताई, चाची, बुआ वगैरह कहती रही हैं।’’

‘‘क्या कहती रही हैं?’’

‘‘यही कि अनुपम की बहू दरिदर साथ लेकर आई है। ऐसे पैर पडे़ हैं कि लक्ष्मीजी इस घर से रूठ गई हैं।’’

‘‘उन्होंने कहा और आपने सुन लिया?’’

‘‘तो क्या करता?झूठ थोडे़ ही था वह।’’ और वे कमरे में चले गए।

मैं दोनों हाथों में सिर दिए देर तक वहीं बैठी रही।

शाम को बेमन से ही सही, खाना बनाना पड़ा और खाना भी पड़ा। ईशा तो मुँह जुठारकर उठ गई थी, पर एक रोटी लिये मैं बैठी रही। पहले उठ जाने से ये अपने को बहुत अपमानित महसूस करते हैं, इसलिए बैठना पड़ता है। ये अपना पूरा कोटा खत्म करके ही उठे।

इनके उठ जाने के बाद मैंने रसोई समेटी, थोड़ा सुबह के खाने की तैयारी कर ली और फिर टेबल पर आकर बैठ गई। कमरे में जाने का मन ही नहीं हो रहा था। जानती थी, इन्हें आप मेरी प्रतीक्षा होगी। चार-पाँच दिन प्रवास में जो निकल गए थे। पत्नी की इच्छा-अनिच्छा की इन्होंने कभी परवाह नहीं की थी।

वे दो बार चक्कर लगा गए। फिर सामने आकर खडे़ हो गए, ‘‘आज सोने का इरादा नहीं है क्या?’’

‘‘नींद नहीं आ रही है।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बिटिया की बात याद करके छाती फटी जा रही है। कितनी हताशा में उसने यह बात कही होगी कि मैंने शादी का अध्याय बंद कर दिया है। इकलौते भाई की शादी देख ली होगी न। कैसी भिखमंगों की सी शादी हुई है। वह तो भला हो शुभम् के ससुरालवालों का, जो एक रिसेप्शन दे दिया। कम-से-कम अपने चार लोगों को बुलाकर वहाँ खिला तो सके। नहीं तो अपनी तो कोई औकात ही नहीं थी।’’

‘‘अब जो भी राग आलापना है, कमरे में चलकर आलापो। लड़की सुन लेगी। घर है कि कबूतरखाना। एक कमरे में साँस लो तो दूसरे में सुनाई देती है।’’

मजबूरन उठना ही पड़ा। बिटिया की बात से भी ज्यादा दुःखी थी मैं उसके पापा की बातों से। वह ‘पनौती’ शब्द कानों में हथौडे़ की तरह बज रहा था। ऐसा भी नहीं है कि यह शब्द मैंने पहली बार सुना हो। परिवार का महिला मेडल पीस पीछे ही सही, कई बार मुझे इस विशेषण से नवाज चुका है। पर इन्होंने आज तक कभी मुझे इस तरह कोसा नहीं था। पर जिस आंतकरिता के साथ उन्होंने यह बात कही, उससे लगा कि यह बात उनके मन में अरसे से घुमड़ रही थी। आज बाहर आई है।

क्या उन्हें यह याद नहीं रहा कि पिछले छह-सात वर्षों से मैं और ईशा इस घर को ओट रहे हैं। नहीं तो कब का ढह गया होता। कभी पता ही नहीं चला कि ये किस तरह का बिजनेस कर रहे हैं और उसमें कैसा घाटा हो रहा है? मन-ही-मन मैं बाबूजी को बराबर धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने मुझे नौकरी करने के लिए उकसाया। कहते, ‘तुम चाहे लखपति हो या करोड़पति, तुम्हें नौकरी करनी है, नहीं तो तुम्हारी विद्या में जंग लग जाएगी। तुम्हारा आत्मविश्वास टूट जाएगा। तुम किटी पार्टीज के लिए नहीं बनी हो।’

नौकरी मैंने देर से शुरू की, दोनों बच्चों के जन्म के बाद। सौभाग्य से एक स्थानीय कॉलेज में जॉब मिल गया। सरकारी नौकरी में ट्रांसफर का चक्कर रहता है। यहाँ कोई खतरा नहीं है। वेतन जरूर कम है, पर इस समय वही बड़ा सहारा है। दोनों बच्चों को मैंने अपने बलबूते पर पढ़ाया। बाहर जाने के लिए शुभम को स्कॉलरशिप मिली थी, पर उससे पूरा थोडे़ हो पड़ता है। मुझे लोन लेना पड़ा। अब वह धीरे-धीरे चुका रहा है। मैंने उसकी शादी के बाद उससे कह दिया कि अब इधर की चिंता मत करो। लोन चुकाओ और घर-बार देखो।

ईशा को शायद इसी बात का टेंशन रहा होगा। शादी के बाद शुभम का हाथ रुक गया है। कल को उसकी भी शादी हो गई तो इस घर का क्या होगा?

अपनी ही सोच में डूबी मैं पता नहीं कितनी देर बुत बनी बैठी हुई थी कि सन्नाटे को भेदता इनका स्वर उभरा, ‘‘अच्छा होता अगर तुम उस कँगले से साथ चली जातीं।’’

‘‘कौन कँगला?’’

‘‘वही जो अभी शादी में मिला था। बृजमोहन या मनमोहन क्या नाम है उसका।’’

‘‘वह आदमी आपको कँगला नजर आता है?जानते हैं, उसका मुंबई में पाँच बेडरूम का फ्लैट है, पूना में बँगला है, नासिक के पास फार्म हाऊस है और जिस रिसोर्ट में सोनाली की शादी हुई है, वह उसी की मेहरबानी से मिला है। वह लाइफ मेंबर हैं वहाँ का।’’

‘‘होगा, आज वह धन्ना सेठ होगा। पर जिस समय तुम्हरा हाथ माँगने आया था, तब तो कँगला ही था न।’’

‘‘यह आपको किसने बताया?’’

‘‘तुम्हारे जीजाजी ने?’’

‘‘तो सुनिए, वह हमारे यहाँ कभी नहीं आया था। जीजाजी का फुफेरा भाई है। इसलिए वह प्रस्ताव लेकर आए थे। पर उस समय उन लोगों की हालत बहुत खस्ता थी। दो भाई पढ़नेवाले थे। एक बहन ब्याहने को थी। पिता थे नहीं। इसलिए बाबूजी ने इनकार कर दिया।’’

‘‘हाँ, तुम्हारे बाबूजी ने कहा था कि ऐसे फटीचर लोगों की बरात मेरे दरवाजे नहीं आएगी।’’

‘‘तो जीजाजी ने आपको यह भी बता दिया?’’

‘‘समझ गई, जीजाजी बाबूजी की बात को मन में लेकर बैठ गए होंगे। आज इतने सालों बाद जब स्थितियाँ पलट गई हैं तो उन्हें अपनी खुन्नस निकालने का अच्छा मौका मिल गया। उनकी बात से इन्हें मुझे कोसने का अच्छा अवसर मिल गया अब ये अपनी सारी हताशा मुझ पर उँडे़ल रह थे।’’

‘‘बाबूजी ने सचमुच मेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया। उसके घर ब्याही जाती तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कड़का था, थोड़ा और कड़का हो जाता बस। पर यहाँ तो मैं पूरी तरह बरबाद ही हो गया न। वह आदमी मिट्टी से सोना निकाल रहा है और यहाँ सोना भी मिट्टी हुआ जा रहा है। उसका हर बिजनेस फल-फूल रहा है और यहाँ घाटे का रिकॉर्ड बन रहा है। वह हर शहर में बँगले बना रहा है, फार्म हाऊस खरीद रहा है और यहाँ जमीन बिक गई। तुम्हारी कृपा से बँगला भी गिरवी पड़ा हुआ है। इस दड़बे में गुजारा कर रहा हूँ। किसी को घर बुलाते भी शर्म आती है। पता नहीं क्यों तुम्हारे बाबूजी ने मेरे साथ ये नाइनसाफी की। मुझे कहीं का नहीं छोड़ा।’’

वे अनवरत बोले जा रहे थे। उनका प्रलाप सुनकर मुझे तो डर लगा कि कहीं इन्हें दौरा तो नहीं पड़ा है। मैं सुन रही थी और रो रही थी। इनके जाने के बाद भी मेरे आँसू जारी थे। मैंने उन्हें रोकने की भी कोशिश नहीं की। मैं अब मन-ही-मन जीजाजी को कोस रही थी कि उन्होंने पता नहीं मुझसे किस जन्म की दुश्मनी निकाली थी। पता नहीं, पति नाम के इस शख्स को क्या-क्या बताया है कि वह अब ईर्ष्या में जल-भुनकर खाक हो रहा है।

सुबह नींद जरा देर से ही खुली। किचन में जाकर देखा, केतली में चाय बनी रखी थी और सिंक में दो कप थे। मतलब ईशा चाय पीकर नहाने चली गई है और उसके पापा रोज की तरह मॉर्निंग वॉक पर निकल गए हैं। चाय पीकर मैंने नाश्ता बनाया, अपना और ईशा का टिफिन तैयार किया और इनके लिए सब्जी छोंक दी। गायत्री दोपहर में गरम रोटी उतार देती है।

ईशा तैयार होकर बाहर आई। बोली, ‘‘तुम्हारी आँखें क्यों सूजी हुई हैं। रोई थीं या सोई नहीं?’’

‘‘दोनों ही समझ लो।’’

‘‘क्यों, अब क्या हो गया?’’

‘‘तुम्हारे पापा ने रात भर मुझे सोने नहीं दिया। पूरे समय मुझे कोसते रहे कि मैंने उन्हें बरबाद कर दिया, तबाह कर दिया, मैं उनके जीवन में पनौती बनकर आई हूँ। मेरे पैर घर में पड़ते ही लक्ष्मी रूठकर चली गई। और भी न जाने क्या-क्या?’’

‘‘वे कहते रहे और तुम सुनती रहीं?’’

‘‘तो और क्या करती?जो सच है, उसे तो स्वीकार ही करना पड़ता है न।’’

‘‘यह कौन सा सच है?और तुम ऐसी बातों पर विश्वास करती हो?’’

‘‘विश्वास करना पड़ता है, बेटा! प्रत्यक्ष प्रमाण सामने जो है। जब मेरी शादी हुई थी तो इन लोगों की गणना रईसों में होती थी। चारों बहनों में सबसे ऊँचा घर मेरा था। बहनें रश्क करती थीं और अब देख लो।’’

‘‘पर इसमें तुम्हारा क्या दोष है?दादाजी ने जो साम्राज्य खड़ा किया था, उसे उनके सुपुत्र सँभाल नहीं पाए, यह तुम्हारी गलती थोडे़ ही है। यह इक्कीसवीं सदी है ममा, ऐसे दकियानूसी ढंग से मत सोचो। तुम चुपचाप सुन लेती हो, इसीलिए सामनेवाले का हौसला बढ़ जाता है। अपनी नाकामयाबियों के लिए वे तुम्हें जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इस इल्जाम का जवाब दो। जवाब दो और जवाब माँगो।’’

ईशा नाश्ता समाप्त कर उठ ही रही थी कि उसके पिताश्री आ गए। मैंने उनका भी नाश्ता लगा दिया। उनके टेबल पर आते ही ईशा बोली, ‘‘पापा, आपने मम्मी की आँखें देखीं?’’

‘‘रोज देखता हूँ।’’

‘‘नहीं, आज देखिए, गौर से देखिए। वे सूजी हुई हैं। मम्मी रात भर रोती रही हैं।’’

‘‘तो?’’

‘‘तो क्या! आपने उन्हें रुलाया है। पापा, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? अपना फ्रस्टे्रशन मम्मी पर क्यों उतार रहे हैं। अपनी असफलताओं के लिए उन्हें क्यों दोष दे रहे हैं?’’

इनका चेहरा एकदम लाल हो गया। ‘‘बाप से बात करने का यह तरीका होता है?’’

‘‘बाप से कैसे बात की जाती है, यह जानने का कभी मौका ही नहीं मिला न। आपसे तो कभी संवाद ही नहीं था। जब से होश सँभाला, सामने मम्मी को ही देखा है। हम बीमार होते थे तो वही डॉक्टर के पास दौड़ी जाती थीं। हमारी एडमिशंस के लिए वे ही स्कूल-स्कूल भटकती हैं। हमारी ट्यूशन के लिए उन्होंने ही कोचिंग के दरवाजे खटखटाए। हमारी प्रोग्रेस बुक्स वे ही साइन करती थीं। पैरेंट्स टीचर मीट वे ही अटैंड करती थीं। यहाँ तक कि शुभम को कॉलेज हॉस्टल छोड़ने मम्मीजी जबलपुर गई थीं, आप तो पिक्चर में कहीं नहीं थे।’’

मैं तो डर गई। यह लड़की क्या कर रही है। क्यों उनसे पंगा ले रही है। भड़क गए तो खैर नहीं है।

आश्चर्य! वे भड़के नहीं। बड़ी विद्रूप सी हँसी हँसे और कसैले स्वर में बोले, ‘‘अच्छा, इतनी स्मार्ट है तुम्हारी मम्मी तो तुम्हारी शादी क्यों नहीं हुई अब तक। तीस साल की उम्र तक अनब्याही क्यों बैठी रहीं?’’

मैं तिलमिला उठी। यह शादी बीच में कहाँ से आ गई। जले पर नमक छिड़कना अच्छी बात है। पर ईशा ने बिल्कुल भी बुरा नहीं माना। एक-एक शब्द पर जोर देते हुए शांत स्वर में बोली, ‘‘वह इसलिए पापा, कि हिंदुस्तान में लड़केवाले चाहते हैं कि लड़की का बाप अगर जिंदा है तो वही आकर बात करे।’’

‘‘बदतमीज लड़की?’’ वे एकदम भड़क उठे।

नाश्ते की प्लेट परे फेंककर वे एकदम खडे़ हो गए। वे ईशा की ओर झपटे ही थे कि मैंने उनका हाथ थाम लिया। ‘‘क्या कर रहे हैं, जवान लड़की पर हाथ उठा रहे हैं?’’

‘‘करने दो मम्मी! बाप होने का कुछ तो फर्ज अदा करने दो।’’

‘‘निकल जा मेरे घर से, अभी, इसी वक्त! दफा हो जा।’’ वे जोर से चीखे। मैंने हाथ पकड़ रखा था, इसलिए चीखने के सिवा और कुछ कर नहीं पाए।

ईशा ने शांत भाव से कुरसी की पीठ पर रखा अपना पर्स उठाया और बाय मम्मी कहते हुए चल पड़ी। मैं जैसे तंद्रा से जागी, ‘‘बेटा।’’ टिफिन लेकर उसके पीछे-पीछे गई, तब तक अपनी एक्टिवा पर बैठकर फुर्र हो चुकी थी।

मैं पत्थर बनी दरवाजे पर कुछ देर खड़ी रही। फिर कुरसी पर आकर बैठ गई। रात के रुके हुए आँसू फिर एक बार बहने लगे। कुछ देर बाद ये सामने आकर खडे़ हो गए—‘‘इतना मातम करने की जरूरत नहीं है। कमाऊ लड़की है, कैंटीन में खा लेगी।’’

इतना गुस्सा आया मुझे। यह आदमी है कि पत्थर! कोई भी व्यक्ति इतना संवेदनशून्य कैसे हो सकता है। उस व्यक्ति के प्रति एकदम इतना तिरस्कार जागा मन में कि बात करने की इच्छा नहीं हुई। तैयार होकर जब निकली तो रोज की तरह उनसे यह भी नहीं कहा कि निकल रही हूँ। आप खाना खा लेना।

आधे रास्ते में याद आया कि टिफिन भूल आई हूँ। कॉलेज पहुँचकर गायत्री को फोन कर दिया कि दोनों टिफिन खाली करके खाना फ्रिज में रख देना। अच्छा था कि शनिवार था। बच्चों की छुट्टी  थी तो पढ़ाने का टेंशन नहीं था। पर शनिवार को प्रिंसीपल मैडम इतने सारे फालतू काम निकाल देती हैं कि तबीयत पस्त हो जाती है। स्टाफ को मुफ्त में वेतन देना मैनेजमेंट को रास नहीं आता शायद।

घर लौटी तो शरीर और मन दोनों से निढाल हो चुकी थी। खाने का प्लानिंग कर रही थी कि याद आया, सुबह के सब्जी-पराँठे रखे तो हैं। दाल-चावल गरम बना लूँगी। फिर मैंने दो कप अच्छी चाय पी और थोड़ी देर जाकर लेट गई। मुझे आराम की सख्त जरूरत थी।

शाम को किचन में गई, तभी ईशा काम से लौटी। बोली, ‘‘मम्मा, मेरा खाना मत बनाना, मुझे भूख नहीं है।’’

समझ गई कि सुबह की बात पर नाराज है। सोच लिया कि अभी कुछ नहीं कहूँगी, बाद में चुपचाप कमरे में खाना दे आऊँगी। कहूँगी कि ‘अन्न पर गुस्सा नहीं निकालते। पाप लगता है।’

हम लोग खाने बैठे तो इन्होंने कहा, ‘‘तुम्हारी लाड़ली अभी तक लौटी नहीं क्या?’’

‘‘उसे भूख नहीं है?’’

उन्होंने थाली की ओर देखा और बोले—

‘‘आज बासी ईद है कि बासी दशहरा।’’

‘‘सुबह की ही तो सब्जी है। इसे बासी नहीं कहते।’’

‘‘हमारे यहाँ तो कहते हैं। मैं समझ गया, तुम्हारी लाड़ली को भूख क्यों नहीं है। खाना देखकर ही भाग गई होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बिटिया को भूख नहीं है, इसलिए तुमने कुछ बनाने की जहमत नहीं उठाई।’’

‘‘गरम दाल-चावल बनाए तो हैं।’’

‘‘तो मुझे बस वही देना।’’

मैंने निर्विकार भाव से उन्हें दाल-चावल परोस दिए। यह नहीं कहा कि रुकिए, अभी गरम फुलके उतार देती हूँ। अपने व्यवहार पर मुझे खुद आश्चर्य हो रहा था। हमने बस शुरू ही किया था कि दरवाजे की घंटी बजी। मैं उठने को थी कि ईशा कमरे से निकली, ‘‘मम्मी, तुम रुको, मैं देखती हूँ।’’

वह भीतर आई तो उसके हाथ में कागज का बड़ा सा डिब्बा था। समझ गई, पिज्जा मँगवाया होगा। मन-ही-मन खुशी भी हुई, लड़की भूखी नहीं रहेगी। लेकिन ये तुनक गए। ‘‘दाल-रोटी की भूख नहीं है रानीजी को,
पिज्जा खाएँगी।’’

मुझे ताव आ गया, ‘‘यह सब आपकी ही मेहरबानी है। सुबह वह टिफिन छोड़कर चली गई थी। अब बाजार से मँगवाकर खा रही है। इसका कारण जानते हैं न। सुबह आपने उसे घर से निकल जाने के लिए कहा था। कौन खुद्दार लड़की इसके बाद घर पर खाना खाएगी?’’

‘‘इतनी नाकवाली है तो चली जाए न और कहीं। यहाँ क्यों डटी हुई है?’’

उसी समय ईशा शायद पानी लेने के लिए बाहर आई। मुझे डर हुआ, कहीं उसने पापा की बात सुन तो नहीं ली। मेरा डर सच निकला। फ्रिज में से बोतल निकालकर वह टेबल के सामने आ खड़ी हुई और बोली, ‘‘चिंता मत कीजिए पापा। जल्दी ही चली जाऊँगी, पर वो क्या है न कि मकान हाट-बाजार में नहीं मिलते। ढूँढ़ने पड़ते हैं। ढंग का मकान मिलते ही आपका घर खाली कर दूँगी। इतमीनान रखिए।’’ तभी वह कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।

‘‘ये संस्कार दिए हैं तुमने,’’ ये दाँत पीसकर बोले, ‘‘लड़की हर बात की तुर्की-बतुर्की जवाब दे रही है।’’

‘‘जवान लड़की को घर से निकालना कौन से संस्कारों में आता है?’’

‘‘अब तुम मुझे संस्कार सिखाओगी?’’ ये थाली सरकारकर उठ खडे़ हुए और सीधे अपने कमरे में चले गए।

और कोई दिन होता तो मैं भी रोते-कलपते उठ जाती, उन्हें मनाकर थाली पर ले आती। मनुहार करके खिलाती, पर मैंने आज ऐसा कुछ नहीं किया। मैं मजे से बैठकर खाना खाती रही। मुझे सचमुच जोरों की भूख लग आई थी। कल रात कलह-क्लेश के मारे ठीक से खाया नहीं गया था। आज तो दिन भर उपवास ही हो गया था।

मुझे इतना गुस्सा आ रहा था। एक तो सुबह से शाम तक घर में, कॉलेज में खडे़ रहो, फिर ऐन खाने के समय यह नौटंकी। चिढ़ आ रही थी मुझे। मैंने आराम से खाना खाया, इतमीनान से रसोई समेटी, एक बार बिटिया के कमरे में झाँक लिया, बीस मिनट टी.वी. देखा, फिर कमरे में प्रवेश किया। अपनी तरफ का बेडकवर हटाकर ये लेट गए थे। पूरा लबादा मेरी तरफवाले हिस्से पर पड़ा था। उसे तहाते हुए मैंने कहा, ‘‘बेड कवर हटाने में कितनी देर लगती है। पर लोगों से वह भी नहीं होता।’’

‘‘अब मैं तुम्हारा बिस्तर लगाऊँगा?’’ ये तुनके।

‘‘नहीं-नहीं, आप यह छोटा काम क्यों करेंगे?आप तो राजकुमार हैं। वह क्या कहते हैं, बिगडे़ कि बिदके दिल शहजादे।’’

‘‘क्या कहा?’’

‘‘कुछ नहीं। आप सो जाइए। मुझे नींद नहीं आ रही है। बाबूजी की याद आ रही है। बल्कि उनपर गुस्सा आ रहा है। कल आप उन्हें कोस रहे थे। आज मैं कोस रही हूँ। ब्रजमोहन का रिश्ता क्यों लौटा दिया उन्होंने। आज वहाँ होती तो राज करती, सच।

‘‘आपने उसकी बीवी को देखा था। उफ क्या ठाठ थे, क्या जलवा था। हर फंक्शन पर साडि़याँ तो खैर सभी बदल रही थीं, पर ये मेमसाब हर साड़ी के साथ मैचिंग ज्वैलरी, पर्स और सैंडल्स भी बदल रही थीं। एक आया हमेशा साथ रहती थी। टे्र में उसके कपडे़-सैट वगैरह रखकर लाई थी। बालों में फूल टाँकती थी। सैंडल के स्टे्रप्स तक बाँधती थी। बिल्कुल रानी-महारानियों के से ठाठ थे उसके। और एक हम हैं, जो सुबह से शाम तक खट रहे हैं, थैंकनेस जॉब।’’

‘‘वह महिला रानी-महारानियों का सा भाग्य लेकर आई है, तभी तो उसे भी राजा बना दिया। तुम उस घर में जाती तो रानी क्या, नौकरानियों से भी बदतर हालत में होती। वह बेचारा कड़का तो था ही, तुम्हारी कृपा से और कड़का हो जाता।’’

‘‘पर कम-से-कम अपनी अकर्मण्यता का ठीकरा मेरे सिर तो न फोड़ता।’’

वे एकदम उठकर बैठ गए, ‘‘क्या कहा तुमने?’’

‘‘वही जो कल ईशा ने सौम्य शब्दों में कहा था।’’

‘‘तुम्हें जरा भी शर्म नहीं आती?’’

‘‘शर्म, संकोच, लिहाज ये शब्द तो इस घर से विदा हो ही चुके हैं। न आपको पत्नी को कोसते शर्म आती है, न बेटी को घर से निकालते संकोच होता है। न बेटी बाप का लिहाज कर रही है। तो मैं अकेली ही सभ्यता का मुखौटा क्यों लगाए रखूँ? मुझे भी अपनी बात कहने का हक होना चाहिए। और अपनी बात मैं कहकर रहूँगी।’’

‘‘कौन सी बात?’’ उन्होंने गुर्राकर पूछना चाहा, पर आवाज में वह दमखम नहीं था। मेरे इस अप्रत्याशित व्यवहार से वे चकित थे, विस्मिय थे, किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे।

ईशा ने ठीक ही कहा था। ‘‘चुपचाप सब सुन लेती हो, इसीलिए सामनेवाले का हौसला बढ़ता है। जवाब देना सीखो। जवाब दो और जवाब माँगो।’’ उसकी बात मैं सचमुच दम था।

‘‘तो अब सुनिए।’’ मैंने शुरू किया, ‘‘आपकी माताजी का कहना था कि मैं अपने साथ दलिद्दर लेकर आई हूँ। शायद आप भी उस राय से इत्तेफाक रखते हैं। तो आपको बता हूँ, मैं दलिद्दर नहीं, पंद्रह तोला सोना और बत्तीस साल पहलेवाले पचास हजार लेकर आई थी। आज उसका हिसाब माँगूँ तो क्या दे सकेंगे? वह मेरा स्त्री धन था। कानूनन उसपर मेरा हक था। पर उन पचास हजार में से पचास रुपए भी किसी ने मेरे हाथ पर नहीं रखे और पंद्रह तोला सोना कहाँ ठिकाने लग गया, पता ही नहीं चला।

‘‘अभी शुभम की शादी में बहू के लिए मुझे मंगलसूत्र खरीदना पड़ा। मेरी उतनी सामर्थ्य नहीं थी तो ईशा ने मेरी मदद की। आप तो विरोध की मुद्रा में तने बैठे रहे, ताकि कुछ देना न पडे़। वैसे आपसे किसी ने कुछ अपेक्षा भी नहीं की थी। आप शादी में न भी आते तो किसी को आश्चर्य नहीं होता। शायद अफसोस भी नहीं होता। पर आप आए, अच्छा लगा। लड़कीवालों के सामने हमारी इज्जत रह गई।

‘‘मेरे दहेजवाली बात तो खैर इतिहास हो गई है। हम वर्तमान की बात करें, मैं इतने सालों से नौकरी कर रही हूँ। सारी कमाई घर में या बच्चों पर ही खर्च होती रही है। अपने लिए कभी ढंग की एक साड़ी भी खरीद नहीं पाई। मैं शिकायत नहीं कर रही, हकीकत बयान कर रही हूँ। शिकायत करने की मुझे आदत नहीं है। मैं भी संपन्न घर से आई थी। अभावों की मुझे भी आशा नहीं थी। पर मैंने परिस्थिति से समझौता कर लिया। चेहरे पर शिकन नहीं आने दी। अपने घर और बच्चों के लिए जो कुछ बन पड़ा, किया, कर रही हूँ। मैंने कभी नहीं चाहा कि इसके लिए कोई कृतज्ञता ज्ञापन करे या धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो। पर कम-से-कम मुझे पनौती जैसे विशेषणों से तो न नवाजा जाए।

‘‘इज इट टू मच टू आस्क?’’

ये मुँह बाये मुझे देखते ही रह गए। ऐसे धाराप्रवाह भाषण की उन्होंने मुझसे अपेक्षा नहीं की होगी। उन्हें क्या, खुद मुझे अपने पर आश्चर्य हो रहा था। एक साथ इतना बोलने के कारण थकान तो हो आई थी, पर बहुत हलका लग रहा था। पता नहीं, कितने दिनों से कितनी बातें मन पर बोझ बनी हुई थीं। एक साथ बाहर निकल गईं, अच्छा लगा।

सुबह रोज की तरह आँख खुल गई। मुँह-हाथ धोकर आई तो याद आया, आज तो रविवार है। फिर लेट गई। बगल से आवाज आई, ‘‘आज चाय-वाय नहीं मिलेगी क्या?’’

मॉर्निंग वॉक पर जाने से पहले इन्हें चाय जरूर चाहिए।

‘‘अभी थोड़ी देर में बनाती हूँ।’’ मैंने कहा और चादर सिर तक ओढ़ ली। दुबारा सोने का कोई इरादा नहीं था, पर नींद लग गई। पता नहीं, कितनी देर सोती रही। दरवाजा खटखटाने की आवाज से नींद टूटी। उठकर देखा, बाहर का नहीं, कोई बेडरूम का दरवाजा खटखटा रहा है।

‘‘कौन है?’’

‘‘मैं हूँ ईशा।’’

‘‘तो दरवाजा क्यों तोड़ रही हो। भीतर आ जाओ।’’ उसने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर आ गई।

इधर-उधर देखते हुए उसने पूछा, ‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

‘‘क्यों, मेरी तबीयत को क्या हुआ!’’

‘‘इतनी देर तक कभी सोती नहीं हो, इसलिए पूछा।’’

‘‘संडे मना रही थी।’’ फिर उसपर एक नजर डालते हुए पूछा, ‘‘और तुम सुबह-सुबह तैयार होकर कहाँ जा रही हो?’’

‘‘सुबह नहीं है, मम्मीजी, दस बज रहे हैं।’’ और फिर वह एक स्टूल खींचकर मेरे सामने बैठ गई।

‘‘दरअसल मैं रत्ना के यहाँ शिफ्ट हो रही हूँ। अभी तो सिर्फ कपडे़ लेकर जा रही हूँ। घर मिल जाएगा, तब बाकी सामान ले जाऊँगी। तुम मेरे लिए किचन का एक सेट तैयार कर देना।’’

ये एकदम उठ बैठे, ‘‘इतनी खुदमुख्तार हो गई हो तुम। किसी से पूछने की भी जरूरत नहीं समझी?’’

‘‘पूछने की जरूरत क्या है, पापा। आप ही ने तो कल घर से निकल जाने का हुक्म दिया था।’’

पापा उसे सिर्फ घूरते रह गए। क्या बोलते।

‘‘कैसे जा रही हो?’’ मैंने पूछा

‘‘टैक्सी से। तुम लोगों के उठने की राह देख रही थी। अब बुक कर देती हूँ।’’ उसने जैसी ही मोबाइल निकाला, मैंने उसके हाथों से छीन लिया—‘‘यह क्या कर रही हो?’’

‘‘तुम कहीं नहीं जाओगी।’’

‘‘मम्मी, रत्ना मेरा वेट कर रही होगी।’’

‘‘उससे मैं निपट लूँगी।’’

‘‘मम्मी, हमारे पास सिर्फ एक ही दिन होता है संडे का।’’

‘‘आज हम हाउस हंटिग करनेवाले हैं।’’

‘‘कहा न, तुम कहीं नहीं जाओगी।’’

‘‘ये क्या बचपना है, मम्मी।’’

‘‘बचपना मैं नहीं, तुम कर रही हो, तुम्हारे पिता कर रहे हैं। अब मेरी बात ध्यान से सुनो। यह घर मेरा है। छोटा सही, किराए का सही, पर मेरा है। इस घर से किसी को निकालने का हक सिर्फ मेरा है। और मैंने तो तुम्हें जाने के लिए नहीं कहा। जिस दिन कहूँगी, जिस दिन घर से निकालूँगी, विधि-विधान के साथ विदा करूँगी।’’

वह मुँह फुलाए बैठी रही।

‘‘अब जाओ और हम लोगों के लिए चाय बनाकर ले आओ। कभी माँ की सेवा कर दिया करो। पुण्य लगेगा।’’

वह पैर पटकते हुए चली गई। उसके जाते ही ये बोले, ‘‘मकान मालकिन होने की धौंस दिखा रही हो।’’

‘‘तो क्या करूँ?लड़की को घर छोड़कर जाने दूँ? ताकि शादी की सारी संभावनाएँ ही खत्म हो जाएँ और धौंस जमाने की क्या जरूरत है, मकान मालकिन तो मैं हूँ ही। आप बार-बार सुनाते हैं कि मेरी वजह से इस दड़बे, इस कबूतरखाने में गुजारा करना पड़ रहा है। तो इसे इस तरह सोचिए कि मेरी बदौलत छोटी ही सही, सिर पर छत तो है।’’

ईशा चाय देकर जाने लगी तो मैंने कहा, ‘‘रुको, अभी और भी बात करनी है।’’ वह मुँह फुलाकर स्टूल पर बैठ गई। चाय पीकर कप रखते हुए मैंने कहा, ‘‘अब मेरी बात शांति से सुनो, वह जो कोई भी है, उससे कहना कि बिजनेस में लगातार घाटा होने की वजह से पिताजी की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है। माँ बात करेंगी तो चलेगा।’’

‘‘मुझे पागल करार दे रही हो?’’ ये गुर्राए।

‘‘कुछ तो कारण बताना पडे़गा न। नहीं तो लड़की अनब्याही रह जाएगी। हाँ तो बेटा, मेरी बात समझ रही हो न।’’

‘‘नहीं मम्मी, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा। पता नहीं, किसके बारे मे क्या कह रही हो?’’

‘‘बेटा, माँ हूँ मैं तुम्हारी। तुम्हें आईने की तरह साफ पढ़ सकती हूँ। उस दिन तुमने पापा के सामने कहा था कि लड़़केवाले चाहते हैं कि लड़की का बाप आकर बात करे। जिस तड़प के साथ तुमने यह बात कही थी, मैं तभी समझ गई थी कि कहीं कोई है। तो बेटा, अब उस शख्स को जल्दी से घर बुला लो।

‘‘घर न बुलाना चाहो तो हम रत्ना के यहाँ मिल लेंगे। नहीं तो किसी होटल में मीटिंग रख लेते हैं।’’

‘‘मम्मी, मैंने कहा था न कि वह अध्याय बंद कर दिया है।’’

‘‘हाँ, कहा था, पर यह तुम नहीं, तुम्हारी हताशा बोल रही थी। छोटे भाई की शादी पहले हो जाने से शायद तुम डिप्रेशन में आ गई थी। पर इतना हताश होने की जरूरत नहीं है। तीस की उम्र कोई बहुत ज्यादा नहीं होती, आजकल आम शादियाँ इस उम्र में होती हैं। हमारा अठारह-बीस सालवाला जमाना गया। हाँ, पर अब इससे ज्यादा देर नहीं होनी चाहिए। तुम्हारे पापा ने चैलेंज दिया था न कि मम्मी अगर इतनी स्मार्ट है तो तुम्हारी शादी क्यों नहीं हो सकी। तो हम अब उस चैलेंज को स्वीकार करते हैं और जल्दी-से-जल्दी तुम्हारे हाथ पीले करते हैं। अब जाओ और सामान वापस कमरे में रखो। मैं अभी नाश्ता बनाती हूँ। फिर चाहे तो संडे मनाने के लिए रत्ना के यहाँ चली जाना। हाँ, और यह लो अपना फोन रखो।’’

‘‘मुझे तो एकदम हाशिये पर डाल दिया तुमने शायद पागल साबित करके ही दम लोगी।’’

‘‘वह काम तो आप खुद ही कर रहे हैं।’’

‘‘मतलब?’’

‘‘पता नहीं, कब कितने साल पहले जीजाजी मेरे लिए एक प्रस्ताव लाए थे, जिसे बाबूजी ने नकार दिया था। जीजाजी उस बात को मन में लेकर बैठ गए थे। अब इतने सालों बाद उन्हें मौका मिला तो उन्होंने अपनी सारी खुन्नस निकाल ली। अपना अपमान भुना लिया। आप जैसा सॉफ्ट टारगेट जो उन्हें मिल गया था। और उस बहाने आपको भी सारी हताशा मुझपर उँड़ेलने का बहाना मिल गया। पिछले तीन दिनों से आप यही तो कर रहे हैं। यह पागलपन नहीं तो और क्या है।

‘‘श्रीमानजी जो दुर्बल और कमजोर होते हैं न, वे ही अपने को ढाँपने के लिए ऐसे बहाने ढूँढ़ा करते हैं। जिनके पास पुरुषार्थ होता है, वे भाग्य को कोसते नहीं हैं। भाग्य से दो-दो हाथ करते हैं। अपने दमखम से पहाड़ काटकर रास्ता बना लेते हैं।’’

एकाएक कमरे में मेरा दम सा घुटने लगा। मैं बाहर निकल आई। ईशा कुरसी पर बैठी पेपर पढ़ रही थी।

‘‘क्या लैक्चर दे रही थीं?’’ उसने पूछा।

‘‘दबी हुई राख को कुरद रही थी। शायद कोई चिनगारी मिल जाए, जो आग पकड़ ले।’’

वह हँस दी, ‘‘बुझे हुए शोलों को हवा देने की कोशिश मत करो। जाओ, चलकर नहा लो। मैंने नाश्ता ऑर्डर किया है।’’

मैंने उसे गौर से देखा। एक अरसे बाद उसका चेहरा तनाव रहित नजर आया। तनाव रहित और खिला-खिला सा।

मैंने तो अँधेरे में तीर चलाया था, पर सचमुच कहीं कोई था।

 

११९/१२० मदनलाल ब्लॉक

एशियाड विलेज, हौज खास

नई दिल्ली-११००४९

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