धुँधलका

धुँधलका

उसे लगता है, उसके पास सबकुछ है। वह संसद् की सदस्य है। इस नाते पूरी कोठी, टेलीफोन, रेल और हवाई यात्रा सहित उसके पास अनगिनत सुविधाएँ हैं। उसकी पार्टी आज सत्ता में नहीं है। पर इससे क्या होता है? वर्षों तक उसकी पार्टी सत्ता में रही है। अगले चुनाव के बाद वह फिर सत्ता में आ सकती है। उस समय उसका मंत्री बन जाना कोई रोक नहीं सकता। आज उसे पार्टी के अध्यक्ष के बहुत निकट समझा जाता है। वह दो राज्यों में पार्टी के सभी कार्यकलापों की इंचार्ज है। वहाँ उसकी मरजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।

पिछले दिनों इन दोनों राज्यों की विधानसभाओं के आम चुनाव हुए थे। उम्मीदवारों के चुनाव टिकटों के बँटवारे और चुनाव-प्रचार के लिए साधनों की सारी व्यवस्था उसकी आँखों के सामने से गुजरी थी। लाखों रुपए उसकी उँगलियों का स्पर्श लेते हुए निकल जाते थे। सभी उम्मीदवार चाहते थे कि पार्टी के अध्यक्ष एक बार उनके क्षेत्र का दौरा अवश्य करें। उनके नाम में ही ऐसा जादू था कि लोग उन्हें सुनने नहीं, मात्र उनका दर्शन करने के लिए उमड़ आते थे। सभी यह बात भी अच्छी तरह जानते थे कि यदि सविताजी चाहेंगी तो सुधाकर बाबू उनके क्षेत्र का दौरा करने का समय अवश्य निकाल लेंगे।

किंतु इन दोनों राज्यों में उनकी पार्टी की सरकार बनते-बनते रह गई। केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार नहीं थी, हालाँकि देश के कुछ राज्यों में उनकी सरकारें थीं। सविता को आशा थी कि दोनों में न सही, कम-से-कम एक राज्य में तो उनकी सरकार बन ही जाएगी। उन्होंने जोड़-तोड़ की सारी तैयारी कर रखी थी। टूटकर आनेवाले विधायकों को कितना धन दिया जाएगा, कौन सा मंत्रि पद उन्हें मिलेगा, किस कॉरपोरेशन का अध्यक्ष पद किसे दिया जा सकता है, उसने पूरी सूची तैयार कर ली थी, पर ऐन मौके पर पासा पलट गया। एक राज्य में तो विरोधी दलों के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल गया और दूसरे राज्य में विपक्ष के नेता ने अपना घोड़ा सीधी सड़क पर न दौड़ाकर उसे पहाडि़यों के शॉर्टकट से दौड़ाया और पूरे नतीजे आने से पहले ही जीत की ओर बढ़ते कदमों की आहट लेकर जर-जोरू-जमीन की सभी सुविधाओं के दरवाजों के द्वार उन संभावित विधायकों के लिए खोल दिए गए, जिन्हें मोहपाश में बाँधा जाना था।

वह पार्टी के अनेक साथियों की आँखें और होंठ परख रही थी। वह उस भाषा को अच्छी तरह पढ़ सकती थी जो उनकी आँखों और होंठों से बोली जा रही थी। पार्टी की हार का उन्हें मलाल था। लेकिन यह तो सविता की निजी हार मानी जा रही थी। बड़ी तेज फड़फड़ाने वाली कबूतरी के कुछ पंख जरूर टूट गए, यह बात कितने लोगों को सुख दे रही थी।

लेकिन सुधाकरजी ने उसे कलावे में लेते हुए कहा था—‘‘सविता, सभी राज्यों में राजनीति के घोड़े तो दौड़ते ही रहते हैं, कभी किसी का घोड़ा आगे, कभी किसी का। इधर-उधर की बातें करने वालों की तुम चिंता न करना। ईर्ष्या-द्वेष मनुष्य के स्वभाव का अंग हैं। इसे तो देवता भी नहीं छोड़ पाए। मैं जल्दी ही पार्टी की कार्यकारिणी की मीटिंग बुला रहा हूँ। उसमें हम चुनाव परिणामों पर खुलकर विचार करेंगे। उस मीटिंग में अगर तुम्हारी कुछ आलोचना भी हो तो उससे घबराना नहीं। मैं हूँ न तुम्हारे साथ।’’

यह कहते-कहते सुधाकरजी के कलावे की पकड़ में कसाव कुछ और बढ़ गया था।

शाम को अपनी कोठी के आगे के बड़े लॉन में वह अकेली चुपचाप बैठी हुई थी। आमतौर पर इस कोठी पर आने-जाने वालों की भीड़ लगी रहती थी। अपनी बैठक में वह एक-एक कर सबसे मिलती थी। फिर भी बहुत से लोग वहाँ घुस आते थे। सविता को बहुत झुँझलाहट होती थी। अपने बिलकुल पास बैठे हुए व्यक्ति से वह धीरे-धीरे बातें करती रहती थी। बिन बुलाए अंदर आनेवाले व्यक्ति अभिवादन करके सामने लगे सोफों पर बैठ जाते थे।

आज उसने गेट पर तैनात गार्ड से कह दिया था, आज मैं किसी से नहीं मिलूँगी। कोई भी आए, कह देना—मैं घर में नहीं हूँ। गेट के पास ही उनके निजी सचिव का छोटा सा कमरा था। उससे भी उसने कह दिया था—किसी का भी फोन आए, कह देना, मैं कहीं गई हूँ। मुझे डिस्टर्ब न करना। हाँ, अगर सुधाकरजी के पी.ए. का फोन आ जाए तो मेरी बात करा देना।

लॉन में थोड़ा-थोड़ा अँधेरा छाने लगा था। वहाँ उसने अधिक रोशनी करने से भी मना कर दिया था। अक्तूबर का महीना था। शाम को हल्की-हल्की ठंड महसूस होने लगी थी। नौकरानी से शॉल मँगवाकर उसने ओढ़ ली थी।

वह सोचने लगी, कभी-कभी ऐसी उदासी का दौर उस पर क्यों आ जाता है। ऐसी उदासी उसकी हड्डियों को मरोड़ने लगती है। सबकुछ बहुत व्यर्थ लगने लगता है, बिलकुल बेमतलब। उस समय न किसी से बात करने का मन करता है, न कुछ करने का। उसे पढ़ने का शौक है। कितनी ही किताबें वह खरीदती रहती है। उसकी बैठक की बीच की मेज नई-नई पत्रिकाओं से भरी रहती है। पिछले दिनों उसने रॉबर्ट पेन के अंग्रेजी उपन्यास का हिंदी अनुवाद खरीदा था—‘कत्लगाह’। यह उपन्यास सन् 1971 के भारत-पाक युद्ध और बँगलादेश के निर्माण पर था। उस समय पाकिस्तानी सैनिकों ने बंगालियों पर जो जुल्म किए थे, उसकी निर्मम गाथा इस उपन्यास में थी। यह उपन्यास वह लगभग आधा पढ़ चुकी थी। अत्याचारों, नरसंहारों, युद्धों की कथाएँ पढ़ने में उसका मन बहुत रमता था। चंगेज खाँ, हलाकू खाँ से लेकर हिटलर तक के नरसंहारों पर छपी हर पुस्तक उसके पास थी।

लेकिन आज उसका मन ‘कत्लगाह’ पढ़ने में नहीं लग रहा था। लॉन में बैठकर पढ़ने के लिए वह इसे बाहर ले आई थी। नौकर ने वहाँ रोशनी भी लगा दी थी। उसने दो-चार पृष्ठ पढ़े भी थे। फिर उसका मन उचट गया था। उसने पुस्तक बंद करके एक ओर रख दी थी और आँखें बंद कर ली थीं।

आज उसने अपने बेटे की तस्वीर किसी पत्रिका में देखी थी। उसके कॉलेज की क्रिकेट टीम ने किसी दूसरे कॉलेज की टीम को बुरी तरह हराया था। उसके बेटे ने सेंचुरी मारी थी। उसे मैन ऑफ द मैच घोषित किया गया था। वह अब यूनिवर्सिटी टीम का कैप्टन बन गया था।

वह उसके बारे में सोचने लगी।

राहुल से मिले, उसको देखे कई महीने गुजर गए। राज्यों में होने वाले चुनावों में वह इतनी व्यस्त रही थी कि सबकुछ भूल गई। पार्टी कार्यकर्ताओं से वह दिन-रात, घिरी रहती थी। उसकी व्यक्ति इकाई जैसे मिट गई थी। पार्टी, कार्यकर्ता, भीड़, नारे, दौरे, प्रचार ही उसमें रह गए थे। हर मिलने वाला चेहरा उसे भीड़ का एक चेहरा लगता था— सिर्फ एक चेहरे के बिना, सुधाकरजी का चेहरा। भीड़, चुनाव प्रचार, बड़ी सभाएँ, धुआँधार भाषण—इन सबके बीच, इन सबके ऊपर यही एक चेहरा उसके सम्मुख तिरता रहता था।

सुधाकर से उसकी मुलाकात पंद्रह वर्ष पहले हुई होगी। उस समय राहुल पाँच साल का होगा। जिस स्कूल में वह पढ़ाती थी, उसका वार्षिक दिवस समारोह था। सुधाकर उस समारोह का मुख्य अतिथि बनकर आया था। वह पार्टी के युवा मोर्चे का अध्यक्ष था। उसके बारे में यह कहा जाने लगा था कि वह पार्टी में बहुत आगे जाएगा, किसी दिन पार्टी का अध्यक्ष भी बन सकता है। पार्टी के अध्यक्ष पटवर्धनजी बूढ़े होते जा रहे थे। वे प्रायः कहा करते थे कि युवा पीढ़ी को आगे आकर नेतृत्व सँभालना चाहिए। जब वे ऐसा कहते थे, सबकी नजर अनायास सुधाकर की ओर उठ जाती थी।

छह फुट वाला सुधाकर सदा छोटी मोहरी का पाजामा और लंबा सफेद कुरता पहनता था। उसके पैरों में सदा पेशावरी सैंडल होते थे। सर्दियों के मौसम में वह कुरते के नीचे पूरी बाँह का सफेद स्वेटर पहनता था और शॉल उसके कंधों पर पड़ी होती थी।

स्कूल के समारोह का संचालन सविता कर रही थी। जब विद्यार्थियों के पुरस्कार वितरण का समय आया तो वह सुधाकर के बिलकुल साथ खड़ी थी। कोई अन्य अध्यापिका विद्यार्थी का नाम पुकारती थी और उसे दिया जाने वाला पुरस्कार सविता सुधाकर को पकड़ाती थी। विद्यार्थी आगे आकर पुरस्कार ग्रहण करता था। बीच-बीच में सविता उस विद्यार्थी के संबंध में बहुत धीरे-धीरे सुधाकर को कुछ बताती थी। वह बहुत मुसकराते हुए उसकी बात सुनता था। समारोह पूरा हुआ तो जलपान करते हुए सुधाकर ने कहा, ‘सविताजी, आप मंच संचालन बहुत अच्छा करती हैं। आप के शब्दों का चुनाव तो अद्भुत है और वाणी में कितनी मिठास है।’

सविता के चेहरे पर चमक आ गई थी। कृतज्ञता भरे स्वर में उसने कहा था, ‘‘यह मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे लोकप्रिय नेता के मुँह से मैं ऐसे शब्द सुन रही हूँ।’’

‘मैं अतिशयोक्ति नहीं कर रहा हूँ, सविताजी।’ सुधाकर की आँखों में सचमुच प्रशंसा का भाव था। ‘‘आप जैसी प्रतिभा को तो फलने-फूलने के लिए एक बड़ी दुनिया मिलनी चाहिए।’’

विदाई के समय स्कूल की प्रिंसिपल मिसेज मैथ्यू ने सुधाकर से हाथ मिलाया, फिर उसने सविता की तरफ हाथ बढ़ा दिया।

सुधाकर के हाथों का स्पर्श कई दिन तक उसके शरीर में झनझनाहट बनकर गूँजता रहा।

सुदर्शन की सरकारी अफसरी और सविता की स्कूल की टीचरी से जो मिलता था, उससे उनकी गिरहस्ती की गाड़ी दुपहिए स्कूटर की रफ्तार ठीक से पकड़ लेती थी। आमतौर पर सुदर्शन सविता को सुबह सात बजे स्कूल के दरवाजे पर उतार आता था। राहुल को लेकर उस समय तक कुछ परेशानी हुई जब तक वह तीन साल का नहीं हुआ। उसके बाद सविता उसे अपने साथ ही ले जाने लगी थी।

किसी स्थिर तालाब के किनारे बैठना कितना अच्छा लगता है। पानी में हल्की-हल्की लहरें आती रहती हैं। कभी-कभी कोई चिडि़या या कौवा आकर उसमें चोंच मारता है। पानी में हल्की सी हलचल होती है। किनारे बैठे लोग भी इतनी शांत स्थिरता देखकर कभी-कभी ऊबने लगते हैं। तब वे किनारे से छोटी सी कंकड़ी उठाकर उसमें फेंक देते हैं। पानी में छप सी होती है। लहरों में कुछ उछाल पैदा हो जाती है। किनारे बैठे व्यक्ति को अच्छा लगता है।

सविता की स्थिर जिंदगी के तालाब में सुधाकर एक कंकड़ी बनकर नहीं, पूरा बड़ा पत्थर बनकर गिरा था।

वह पहले पार्टी के युवा मोर्चे की मेंबर बनी। फिर अपने मंडल की सचिव चुन ली गई। फिर वह पूरे नगर की सचिव बन गई।

कुछ सीढि़यों की बनावट बहुत विचित्र होती है। उसमें ऊपर जाने वाली और नीचे उतरने वाली सीढि़याँ साथ-साथ काम करती हैं। जिन सीढि़यों से व्यक्ति ऊपर चढ़ रहा होता है, पास की ही दूसरी सीढि़यों से वह नीचे उतर रहा होता है। सविता के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह राजनीति की सीढि़याँ चढ़ रही थी। सुधाकर युवा मोर्चे से निकलकर पार्टी की मुख्यधारा में आ गया था। जब वह पार्टी का महासचिव बना तो सविता पार्टी में शामिल कर ली गई और उसे महिला मोर्चे की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

नीचे जाने वाली सीढि़यों में उतनी रोशनी नहीं होती जितनी ऊपर चढ़ने वाली सीढि़यों में होती है। ऊपर जाने वाली सीढि़यों पर व्यक्ति मुँह ऊँचा करके चढ़ता है। महत्त्वाकांक्षाओं का संसार उसे सामने झिलमिलाता दिखाई देता है। नीचे जाने वाली सीढि़याँ उतरते समय व्यक्ति नीचे की तरफ देखता है और हर कदम पर फिसल जाने, चूक जाने का डर बना रहता है।

एक दिन सुदर्शन ने उससे कहा था, ‘सविता, जिस रास्ते पर तुम चल पड़ी हो, वह कहीं थमने वाला रास्ता नहीं है। एक स्कूल टीचर ऊपर चढ़ता हुआ सीनियर टीचर बन जाता है। ज्यादा-से-ज्यादा प्रिंसिपल बनता है और रिटायर हो जाता है। मेरे जैसा सरकारी अफसर, जिसने जिंदगी एल.डी.सी. से शुरू की हो, कहाँ तक जाएगा...सेक्शन ऑफिसर तक, बहुत जोर मारेगा तो अंडर सेक्रेटरी तक। मैं तुमसे यह नहीं कह सकता कि तुम वापस आ जाओ। यह भी सच है कि तुम मुझे कितना भी खींचो, मैं तुम्हारा सहयात्री नहीं बन सकता...हमारे रास्ते भी अलग हो रहे हैं और दिशाएँ भी।’’

सविता गुमसुम सी उसकी बातें सुन रही थी। पिछले कुछ वर्षों में उसके पारिवारिक जीवन में बहुत अंतर आ गया था। राहुल अपनी बढ़ती उम्र के साथ स्कूली पढ़ाई के अंतिम पड़ाव पर आ गया था। पहले उसने स्कूल से तीन वर्ष की छुट्टी  ले ली थी। फिर सुधाकर ने उससे कहा था, ‘यह टीचरी-फीचरी छोड़ो और सारा समय पार्टी को दो। चिंता न करो, पार्टी तुम्हारी जरूरतों का ध्यान रखेगी।’

सुधाकर ने अपनी बात पूरी की। वह उस प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुन ली गई, जहाँ पार्टी के विधायकों की काफी गिनती थी।

जब लोधी एस्टेट में सविता को एक लंबी-चौड़ी कोठी एलॉट हो गई तो उसने सुदर्शन से कहा, ‘‘अब हम लोग उस कोठी में शिफ्ट कर सकते हैं। अपना यह फ्लैट किराए पर उठा देते हैं। कम-से-कम छह वर्ष तो हमें यहाँ से कोई नहीं हिलाएगा।’’

सुदर्शन के सामने एक दृश्य घूमने लगा, कोठी पर आने-जाने वालों का ताँता लगा हुआ है। वहाँ लगातार एक शब्द गूँजता रहता है सविताजी...सविताजी...। वहाँ उसका एकमात्र परिचय है—सुदर्शन मेहरा—सविताजी के पति।

उसे एक बात और साल रही थी। उस कोठी के हर कोने में एक छाया व्यापी हुई होगी, जिसका चेहरा-मोहरा सुधाकर से कितना मिलता-जुलता होगा।

उसने कहा, ‘‘सविता, मैं यह फ्लैट छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। तुम कहाँ रहना चाहती हो, यह फैसला तुम कर लो।’’

‘‘आप मेरी बात समझते क्यों नहीं?’’ सविता ने बड़े अधिकार भरे स्वर में कहा था, ‘‘मैं संसद् सदस्या हूँ। पार्टी की सीनियर लीडर हूँ। मुझसे मिलने के लिए सैकड़ों लोग रोज आते हैं। पत्रकारों की भीड़ लगी रहती है। इस फ्लैट में तो यह नहीं हो सकता।’’

जो हो सकता था, वही हुआ। सविता राहुल को अपने साथ रखना चाहती थी, किंतु सुदर्शन इसके लिए तैयार नहीं हुआ। राहुल भी अपने पिता के साथ रहना चाहता था। सविता अपनी पुरानी नौकरानी के साथ नई कोठी में आ गई।

वह पीछे कुछ छोड़ आई है, इसका कभी उसे एहसास नहीं हुआ। जिन ऊँचाइयों पर वह उड़ रही थी, वहाँ पीछे मुड़कर देखने का न ही समय था न कोई अकुलाहट, उड़ते-भागते क्षणों में जब कभी उसे लगता कि उसकी गाड़ी के चक्कों में कुछ चूँ-चूँ होने लगी है तो सुधाकर के कलावे को स्निग्धता उसमें तेल का काम कर देती थी।

लेकिन आज इस धुँधलाई शाम में अँधेरे में चुपचाप बैठी वह सोचने लगी, उसका एक अपना घर है, तीन कमरों वाला छोटा सा फ्लैट। उसका पति है, जो रोज उसे अपने स्कूटर पर बैठाकर स्कूल छोड़ने जाता था और मुड़ने से पहले मुसकराता था और उसका हाथ दबाता था। उसका एक बेटा है। वह कॉलेज में पहुँच गया है। क्रिकेट का अच्छा खिलाड़ी है। टीम का कप्तान बन गया है। उसे याद नहीं कि उसकी मसें कब फूटी थीं। पिछली बार जब उसने उसे देखा था, वह शेव किए हुए था।

एकाएक उसे कुछ चुभने लगा। उसके चारों ओर अँधेरा अधिक गहरा होने लगा। वह सोचने लगी, राहुल धीरे-धीरे कैसे बड़ा हुआ होगा, कब उसकी मसें फूटी होंगी, कब उसने पहली बार शेव किया होगा। उसके सामने सुदर्शन की तस्वीर भी घूमने लगी। उसके बालों में कितनी सफेदी आ गई है। पिछली बार जब वह उससे मिली थी, वह बता रहा था कि शायद वह प्रीमैच्योर रिटायरमेंट की स्कीम में रिटायरमेंट ले ले, पर वह सेवा मुक्त होने के बाद करेगा क्या?

वह अँधेरे में आँखें बंद किए बैठी थी। एकाएक उसे लगा, उसके पास कुछ भी नहीं है, वह बहुत अकेली है।

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