व्यर्थ के विवादी मुद्दे क्यों?

कुछ राज्य सरकारें और सत्ताधारी व्यक्ति न जाने क्यों ऐसे मुद्दे उठाते हैं अथवा कुछ ऐसे कार्य करते हैं, जिनसे व्यर्थ के विवाद पैदा हो जाते हैं। राजस्थान सरकार ने पहले एक बिल पर राज्यपाल से स्वीकृति प्राप्त कर ली कि जब तक जाँच न हो जाए तथा राज्य सरकार की मंजूरी न मिल जाए, तब तक किसी सरकारी अधिकारी, जज, मजिस्ट्रेट और सत्ताधारी राजनेताओं के विरुद्ध किसी प्रकार के आरोपों में कोई कानूनी काररवाई नहीं हो सकती एवं न आरोपों को मीडिया द्वारा प्रचारित और प्रकाशित किया जा सकता है। जाँच को मंजूरी देने की इस प्रक्रिया में छह महीने का समय लग सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि छह महीने के अंतराल में मामला ठंडा पड़ जाएगा और यदि संभव हुआ तो दबाया भी जा सकता है। कहावत है कि जनता की स्मरण-शक्ति लंबी नहीं होती। सरकार की ओर से तर्क यह दिया गया कि बहुत से झूठे या गलत आरोप लगाए जाते हैं, इससे अधिकारियों की अनावश्यक छीछालेदर व व्यक्तिगत बदनामी होती है, इससे वे हतोत्साहित हो जाते हैं और सरकारी काम को हानि पहुँचती है। उसी समय समाचार आया कि राजस्थान प्रशासनिक सेवा के एक अधिकारी और उसके नजदीकी नाते-रिश्तेदारों के पास से करीब १०० करोड़ की संपत्ति मिली है। बिल पास होने के बाद छह महीने तक तो ऐसे समाचार छप नहीं सकते थे। जब सरकार का अपना ही भ्रष्टाचार निरोधक विभाग यह ब्योरा बताता है तो छह महीने इंतजार करने की क्या आवश्यकता है? मंशा सचमुच यही है कि छह महीने तक गलत और अनुचित कार्यों पर परदा पड़ा रहे और समय गुजरने के साथ लोगों के ध्यान से ही वह बात उतर जाए। बिल के विरोध में एसेंबली और उसके बाहर काफी बावेला मचा। मीडिया को आलोचना का अच्छा मसाला मिल गया। टी.वी. पर चर्चा गरम रही, प्रमुख समाचार-पत्रों ने अपने संपादकीयों में सरकार की कड़ी आलोचना की। सिविल सोसाइटी संगठनों ने जनता में सरकार के विरुद्ध वातावरण पैदा कर दिया। सभी का कहना था कि यह अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन है, जनता का मुँह बंद करने की चाल है तथा भ्रष्टाचारियों व गलत आचरण करनेवालों के बचाव की कोशिश। समय भी सरकार ने गलत चुना, जबकि वहाँ दो लोकसभा क्षेत्र तथा एक विधानसभा के लिए उपचुनाव होने हैं। अन्य राज्यों के चुनावों पर भी इसका उलटा असर संभव है। या तो यह जन-विरोध का असर था अथवा दिल्ली के दबाव में सरकार की लाज बचाने के लिए यह निर्णय लिया कि बिल को अभी सलेक्ट कमेटी को सौंप दिया जाए। नाहक बदनामी हुई, विरोध का वातावरण बना, बिना समझे-बूझे बिल स्वीकृत कराया गया, फजीहत हुई, पर नतीजा कुछ न निकला। कानूनी रूप में बिल अभी भी लागू है, उसे वापस नहीं लिया गया। राज्य के एक काफी पुराने और प्रतिष्ठित समाचार-पत्र राजस्थान पत्रिका के संपादक ने सिद्धांत रूप में विरोध के कारण संपादकीय स्थान खाली छोड़ने का निश्चय किया। राजस्थान पत्रिका केराजस्थान में कई संस्करण प्रकाशित होते हैं। इसके अतिरिक्त राजस्थान केबाहर कई जगहों से यह प्रकाशित होता है। यह स्थिति सभी संस्करणों में रहेगी। ऐसा कुछ आपातकाल में विरोध स्वरूप कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने किया था, पर उनका प्रकाशन ही बंद हो गया। अब ऐसा संभव नहीं है। इस प्रकार का प्रतीकात्मक विरोध राज्य सरकार के लिए हानिकर होगा।

ताज्जुब इस बात का है कि सरकार के नुमाइंदों और उनको सलाह देनेवालों ने देश में इस प्रकार के जो दो कटु अनुभव हो चुके हैं, उससे कुछ सीख लेने की भी कोशिश नहीं की। पहला था, बिहार की कांग्रेस सरकार का बिल, जब डॉ. जगन्नाथ मिश्रा मुख्यमंत्री थे। बहुत विरोध हुआ, पर बिल पास करा लिया, किंतु अंत में उसपर अमल नहीं हो सका और वह अपने आप निरस्त हो गया। राजस्थान के बिल की आलोचना करते हुए डॉ. मिश्र, जो इस समय लालू प्रसाद की तरह चारा घोटाले में फँसे हुए हैं, ने प्रधानमंत्री को एक पत्र के माध्यम से कडे़ शब्दों में आलोचना की। अपने बिल के विषय में उन्होंने एक बयान में कहा कि एंटीडिफेमेशन बिल उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर लागू किया, क्योंकि एक रोज वे बड़ी चिंतित थीं। मेनका से संबंधों की बहुत चर्चा हो रही थी और उनकी तरह-तरह की आलोचना हो रही थी तो एक प्रोबिंग टैकट्विस, यानी क्या प्रतिक्रिया होती है, यह जानने के लिए यह बिल उन्होंने तैयार करवाया। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि स्वयं उनकी भी अनावश्यक आलोचना हो रही थी और उसकी रोकथाम भी वे चाहते थे। उस समय हमारा दायित्व गृहसचिव का था और विस्तार में जाए बिना कह सकते हैं कि इंदिरा गांधी को उन्होंने व्यर्थ घसीटने की कोशिश की है। यह पहल स्वयं उनकी अपनी थी, प्रतिदिन अखबारों में उनकी राज्य सरकार के विरुद्ध समाचार आ रहे थे, उससे बचाव की फिक्र उन्हें थी। बहुत दिनों तक बिल गृह मंत्रालय और विधि मंत्रालय में पड़ा रहा। मंत्रालय में हम सब इसको अनावश्यक और जनता की विरोधाग्नि पैदा करनेवाला मानते थे। हमने विधि मंत्रालय को बहुत बारीकी से प्रस्तावित बिल की समीक्षा करने को कहा था। सोचते थे कि शायद विरोध की स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा पुनर्विचार करें और बिल को वापस ले लें। तत्कालीन कैबिनेट सेक्रेटरी राओ साहब और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. अलेक्जेंडर भी इसके खिलाफ थे। आपसी बातचीत में मुख्यमंत्री डॉ. मिश्रा को यही राय दी गई थी कि डिफेमेशन बिल की जिद छोड़ दें, किंतु वे जिद पर अड़े रहे और उन्होंने प्र.म. इंदिराजी से एक प्रकार से शिकायत की कि उनके बिल में गृह मंत्रालय रोडे़ अटका रहा है। हाँ, यह जरूर है कि इंदिराजी का फोन आया और उन्होंने मुख्यमंत्री मिश्रा की इज्जत का वास्ता किया और जल्दी समीक्षा करवाने का आदेश दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी उस समय आंध्र प्रदेश में चुनाव के दौरे पर थीं, वहीं हैदराबाद से उनका फोन आया था। जैसी उन्होंने आज्ञा दी, उसके अनुसार तत्कालीन वित्तमंत्री श्री प्रणब मुखर्जी के संसद् ऑफिस में एक बैठक हुई, मंत्रालय के बिल के विरोध के कारणों को स्पष्ट कर दिया गया, पर उनके औचित्य की अवहेलना कर निर्णय हुआ कि गृह मंत्रालय अपनी स्वीकृति दे दे। आदेश का अनुपालन हुआ। अंततोगत्वा डॉ. मिश्रा की सब तिकड़म और कोशिश बेकार हो गई।

दूसरा उदाहरण राजीव गांधी के डिफेमेशन बिल का है। उस समय तक मीडिया काफी सशक्त हो चुकी थी। उस समय के प्रसिद्ध संपादकों और पत्रकारों द्वारा देशव्यापी विरोध हुआ। जुलूस निकाले गए। दूसरे देशों में भी आलोचना हुई कि भारत सरकार जनता और मीडिया का मुँह बंद करने की कोशिश कर रही है। सिविल सोसाइटी का विरोध भी काफी प्रखर था। बढ़ते हुए विरोध को देखते हुए राजीव गांधी की सरकार ने बिल को पास करने का इरादा छोड़ दिया। अतः विजय प्रेस की स्वतंत्रता की हुई। इन सब उदाहरणों को देखते हुए राजस्थान सरकार द्वारा उसी प्रकार का बिल लाने का औचित्य समझ के बाहर है।

पिछले दिनों और भी मामले सामने आए हैं, जिनके संबंध में सरकारें जो काररवाइयाँ कर रही हैं, वह भी अजीब लगता है। तमिलनाडु की सरकार ने एक कार्टूनिस्ट को गिरफ्तार कर लिया, क्योंकि वह कार्टून उसे वाहियात लगा। नतीजा यह हुआ कि कार्टून पूरे देश के सब समाचार-पत्रों और टी.वी. पर भी प्रसारित हुआ। यदि कार्टूनिस्ट गिरफ्तार न होता तो पूरे देश में कार्टून प्रसारित भी नहीं होता। राज्य सरकारों और सत्ताधारियों में एक सेंस ऑफ ह्यूमर होना चाहिए, अपने पर हँसने की भी क्षमता होनी चाहिए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भी सिडनी का लो के कार्टून ब्रिटिश सरकार और प्रधानमंत्री चर्चिल, कभी भारत सरकार और वायसराय का मजाक बनाते हुए ब्रिटेन में छपा करते थे। लो के का कार्टून ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में भी देखने को मिलते थे। सिडनी लो को ब्रिटिश सरकार ने ‘सर’ के खिताब से अलंकृत किया था। शंकर के कार्टून भी इसी प्रकार कभी-कभी सरकार की मजाक बनाते हुए छपते थे और लोग उनका आनंद लेते थे। प्रधानमंत्री नेहरू ने ‘शंकर’स वीकली’ के एक आयोजन में कहा कि ‘शंकर मुझे भी नहीं छोड़ना’ और अगले अंक में इस पर एक कार्टून आ गया, जो अभी भी नेहरू विषयक पुस्तकों में देखने को मिलता है। नेहरू ने उसे बहुत सराहा। हमें स्मरण है कि १९५० में मेटकाफ हाउस दिल्ली में जब आइ.एस. के प्रशिक्षु, प्रोबेशकर थे, अकसर मंत्री तथा उच्च अधिकारी संबोधित करने आते थे। एक बार श्री एन.वी. गाडगिल ने, जो केंद्र में मंत्री थे, संबोधित करते हुए कहा कि आप लोग प्रशासन की पालकी उठानेवाले हैं। अगले सप्ताह ‘शंकर’स वीकली’ में कार्टून था, जिसमें गाडगिल साहब दूल्हा बनकर पालकी पर बैठे थे और पाँच-छह युवा प्रशिक्षु पालकी को उठाकर ले जा रहे हैं। लक्ष्मण के कार्टून तो ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में उनके देहावसान के पहले तक आते रहे। उन्होंने एक करेक्टर ‘कॉमन मैन’ बनाया था, उसके माध्यम से राजनीति और शासन की समीक्षा होती थी। हर भारतीय नागरिक की भावनाएँ, कटु और सुखद, कॉमनमैन के द्वारा मुखरित होती थीं। वह नागरिकों का प्रतिनिधि ही बन गया था। लक्ष्मण को बड़ी लोकप्रियता मिली। कार्टून को बैन करना तो आपातकाल तक ही सीमित रहा था। वह पुनः शुरू हो गया।

अभी तेलंगाना केमुख्यमंत्री ने अपने खेती विभाग के १००० अधिकारियों को इजराइल दो-तीन महीने के दौरे पर भेजने का निर्णय लिया। जनता में रोष है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि संकट में है। यह विचित्र लगता है, इस पर बिना विचार किए अधिकारी मद में ऐसे फैसले लिये जाते हैं, जिनका जनता में बुरा असर होता है। एक और उदाहरण देखने में आया। हरियाणा के एक उच्च आई.ए.एस. अधिकारी का। हर रंग की सरकारों द्वारा चालीस से अधिक बार स्थानांतरण पिछले २० वर्षों की नौकरी में हो चुका है। वे दवाब में न आकर कानून और औचित्य केआधार पर कार्य करते हैं। हरियाणा सरकार के द्वारा भी उनपर कुछ आरोप लगाए गए, जो माननीय राष्ट्रपति ने बेबुनियाद मानते हुए निरस्त कर दिए। तीन महीने पहले वह एक विभाग में पिं्रसिपल सेक्रेटरी नियुक्त हुए थे। अब उनका स्थानांतरण दूसरे विभाग में कर दिया गया है। कारण पता चला कि उन्होंने अपने मंत्री को एक विभागीय गाड़ी को वापस करने का दुस्साहस किया, क्योंकि वह नियम विरुद्ध था। ऐसी जुर्रत एक अधिकारी की कि एक मंत्री से कहने की कैसे हुई, सराहना न कर उसका स्थानांतरण कर दिया। क्या यही सुशासन का मंत्र हो गया है?

कार्यपालिका की असावधानी के कारण न्यायपालिका का हस्तक्षेप

काफी समय से देखने में आ रहा है कि राज्य सरकारों की अक्षमता, लापरवाही के कारण उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा छोटे-छोटे मामले में, जिनको देखने का या निरीक्षण का दायित्व कार्यपालिका का है, आदेश देने पर मजबूर होना पड़ता है। इतने अनेक उदाहरण नित्य सामने आते हैं, किंतु यहाँ दो ही पर्याप्त होंगे। कंस्ट्रक्शन लेबर अथवा वह मजदूर, जो निर्माण कार्य में लगे हुए हैं, उनके लिए एक फंड होता है, उनको सुविधाएँ मुहैया कराने का। शीर्ष न्यायालय में पी.आई.एल. के जरिए मामला पहुँचा, जिससे पता चला कि इस फंड का पैसा फ्रिज, लैपटॉप खरीदने के लिए किया गया, मजदूरों को सुविधाएँ पहुँचाने की ओर किसी का ध्यान नहीं। बेचारों को बार-बार अपने रहने के स्थान को बदलना होता है। बच्चे इधर-से-उधर हो जाते हैं। उनके पढ़ने और स्वास्थ्य सुविधाओं की अवहेलना होती है। हम भूल जाते हैं कि इससे कंस्ट्रक्शन उद्योग को भी कितना नुकसान होता है, जहाँ मंदी के समय अधिक रोजगार की संभावना है। बेचारे बेबस मजदूर और उनके परिवार तो कठिनाइयाँ झेलते ही हैं। वे अपने ही अधिकारों और वैधानिक देय से वंचित रहते हैं। ऐसे में अंत्योदय की बात खोखली ही लगती है। दूसरा उदाहरण है उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विभाजन के उपरांत एक हरिद्वार के रिजोर्ट के बारे में। विवाद का मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गया। सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों यानी उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तराखंड का को फटकार लगाई और कहा कि क्या बच्चों की तरह आप लोग झगड़ रहे हैं! आदेश दिया कि दोनों राज्यों के मुख्य सचिव एक बैठक करें और पंद्रह दिन के उपरांत हमें सूचित करें। यह हास्यास्पद लगता है। इसी प्रकार कॉरपोरेशनों और म्यूनिसीपैलटियों की तथा सरकार के अन्य विभागों की साधारण विषयों के बारे में, जिनकी जिम्मेदारी है, संवैधानिक अदालतों को उन्हें आदेश देना पड़ता है। ऐसा इसी कारण है कि अकर्मण्यतावश या किसी दबाव में कर्मचारी और अधिकारी अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह नहीं करते हैं। अतएव इनमें संवैधानिक अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह कोई अच्छी बात नहीं है। इससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच जो संवैधानिक संतुलन है, वह बिगड़ता है, जिसको हमारे संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र प्रणाली के रूप में स्थापित किया था। यही नहीं इससे जनता की निगाहों में कार्यपालिका और कुछ परिस्थितियों में विधायिका की साख को क्षति पहुँचती है। कभी-कभी समाचार-पत्रों में जब इन अदालतों की काररवाई के बारे में पढ़ते हैं तो लगता है कि देश का शासन न्यायपालिका ही चला रही है। संविधान ने न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों पर निगरानी रखने का अधिकार दिया है, ताकि किसी प्रकार का अन्याय न हो। जब बहुत जरूरी हो, तो इस अधिकार का इस्तेमाल न्यायपालिका एंटीबायोटिक दवाइयों की तरह करें, यह संविधान निर्माताओं का इरादा था। इसे विटामिन की तरह प्रयोग में नहीं लाया जा सकता। अकसर विधायिका और कार्यपालिका न्यायपालिका के अनुचित हस्तक्षेप की बात करती हैं। उनको अपने गिरहबान में झाँकना चाहिए। हम समझते हैं कि न्यायपालिका को भी इस विषय में सावधानी बरतनी चाहिए, किंतु सर्वाधिक दायित्व कार्यपालिका का है कि वह प्रशासन व्यवस्था को इस प्रकार चुस्त बनाए और मंत्रिगण ध्यान रखें कि अपने दायित्व-क्षेत्र में निष्पक्षता और कानून के अनुसार निर्वाह करें। कठिनाई यह है कि हमारे विधायक और सांसद यह समझ नहीं पा रहे हैं कि ‘रूल ऑफ लॉ’ यानी कानून राज्य की अवधारणा के क्या माने हैं। उसकी क्या संभावनाएँ हैं और क्या सीमाएँ हैं, उनसे वे अवगत नहीं हैं। कुछ दिन हुए, समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ कि अलीगढ़ में एक डॉ. शर्मा और उनकी डॉक्टर पत्नी को गिरफ्तार करने राजस्थान की पुलिस आई, क्योंकि उनके विरुद्ध शिकायत थी कि वे अपने क्लीनिक में बताते थे कि गर्भ में लड़की है या लड़का। ऐसा करना अपराध है, भ्रूण हत्या का सख्त कानून है। हम ‘बच्ची पढ़ाओ, बच्ची बचाओ’ का नारा लगाते हैं, लेकन वहाँ के दो विधायकों के हस्तक्षेप और धमकियों के कारण डॉ. शर्मा गिरफ्तार न हो सके। एक विधायक ने कहा कि यह अलीगढ़ है, मानो वहाँ कानून का राज्य नहीं है, उन्हीं की मनमानी चलेगी। जिला प्रशासन ने भी हथियार डाल दिए, शायद अपने उच्चाधिकारियों को घटना से अवश्य अवगत करा दिया! क्या इस प्रकार की अराजकता बरदाश्त करने लायक है? दोनों विधायक स्वयं कानून का पालन करने में बाधा पहुँचाने के लिए अपराधी हैं। इस प्रकार के उच्छ्रंखल विधायकों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। यह पार्टी और सरकार के मुखिया का कर्तव्य बनता है। लोकतंत्र में हम विधायकों और सांसदों का उसी प्रकार का आदर जनता के बीच चाहते हैं, जैसा अनेक खामियों के होते हुए भी न्यायपालिका का आज है। राजधर्म सब स्वार्थों के ऊपर होना चाहिए।

प्रधानमंत्री के चुस्त प्रशासन हेतु प्रयास

प्रधानमंत्री प्रशासन में चुस्ती लाना चाहते हैं। बहुत से कदम उन्होंने उठाए हैं। कुछ अखिल भारतीय सेवाओं के सदस्यों को अक्षमता अथवा अन्य आरापों में ग्रस्त होने के कारण ५० साल की उम्र में नौकरी से अलग कर दिया गया है। अन्य केंद्रीय सेवाओं में भी ऐसा काफी बड़े स्तर पर हुआ है, जैसा समाचार-पत्रों से पता चलता है। उसका अच्छा प्रभाव होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक पहल यह की है कि मसूरी प्रशासनिक अकादमी के प्रशिक्षण के उपरांत पहले प्रशिक्षु केंद्रीय सचिवालय में कुछ समय रहेंगे और उसके बाद जिन राज्यों को वे आबंटित हुए हैं, वहाँ अपनी पोस्टिंग पर जाएँगे। उन्होंने मसूरी अकादमी में प्रशिक्षुओं को संबोधित भी किया। उन्होंने जिला अधिकारियों से मिलने की व्यवस्था की। केंद्रीय सचिवालय में वे अलग-अलग विभिन्न स्तरों पर मिले। उनकी कठिनाइयाँ जाननी चाहीं और उनको यह बताने की चेष्टा कि जनता की अपेक्षाएँ क्या हैं। उन्होंने उच्चाधिकारियों को कानून के अनुसार अपनी सही राय निडरता और निष्पक्षता से व्यक्त करने का आह्वान किया। आवश्यकता यह भी है कि मंत्रिगण भी इसको सहने की शक्ति विकसित करें, ताकि आपसी विश्वास का वातावरण निर्मित हो सके। प्रधानमंत्री शासन तंत्र को चुस्त करना चाहते हैं। इसमें भी केवल केंद्र के मंत्रियों का ही नहीं, राज्य के मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों के सहयोग और सहकार की जरूरत है। विभिन्न सेवादाताओं का मनोबल बढे़ और उनकी कार्यकुशलता तथा क्षमता का विकास हो, यह आवश्यक है। उन्होंने क्षमता बढ़ाने के लिए नई-नई तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया है। इसके लिए सेवाओं की सोच, यानी माइंडसेट में भी बदलाव होना चाहिए। नागरिक की कठिनाइयों का जो मानवीय पक्ष है, उस ओर ध्यान रखना जरूरी है। यदि इस प्रकार का कार्य करने का ढंग होगा तो ऐसी दुर्घटनाओं, जैसे आधार नंबर होने के कारण गरीबों को उनका निश्चित किया हुआ राशन न मिला और बच्चों व वृद्धों की मौत हो गई। ऐसी घटनाएँ चाहे दो-चार ही रही हों, नहीं होनी चाहिए। उनका बखान टी.वी. और अखबारों में बढ़ा-चढ़ाकर होता है, उससे देश की छवि बिगड़ती है। नियमों का अनुसरण मानवीय दृष्टिकोण से होना चाहिए, यह एक अच्छे प्रशासन की खूबी है। प्रशासन को चुस्त, क्रियाशील और जनोन्मुखी बनाए बगैर जनता का विश्वास प्राप्त करना कठिन ही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाएँ तभी सफल हो सकती हैं, जब सुशासन को सही रूप में समझा जाए।

महान् पुरुष पूरे देश की धरोहर

इस साल ३१ अक्तूबर को सरदार पटेल की जयंती के समय काफी विवाद रहा। कांग्रेस को शिकायत यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने उनके प्रथम पंक्ति के नेताओं को हथिया लिया है, अंग्रेजों में ‘मिस एप्रोप्रिएट’ कर लिया है। इन दिनों खास शिकायत है सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में। चूँकि दिसंबर में गुजरात में चुनाव है, कांग्रेस का सरदार पटेल की ओर विशेष ध्यान गया। इस वर्ष कांग्रेस ने सरदार पटेल के जन्म दिवस पर एक बड़ा आयोजन काफी जोर-शोर से किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सम्मिलित हुए और सरदार पटेल का गुणगान हुआ। सबका जोर इस बात पर था कि सरदार पटेल कांग्रेस के नेता थे, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गांधीजी की हत्या के बाद प्रतिबंध लगाया था, आदि-आदि। वे भूल गए कि कांग्रेस कभी एक आंदोलन था स्वराज प्राप्ति के लिए, वह केवल एक राजनीतिक दल नहीं था। गांधीजी ने इसीलिए अपना विचार प्रकट किया था कि १९४७ के बाद की कांग्रेस अब समाप्त होनी चाहिए। उसको समाजसेवी संगठन का रूप लेना चाहिए। अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार लोग अलग दल बना सकते हैं। खैर, इसको कांग्रेस कैसे मान सकती थी, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का श्रेय केवल वही लेना चाहती थी। वैसे सही बात यह है कि स्वतंत्रता-संग्राम की कई धाराएँ थीं। उनमें एक मुख्यधारा क्रांतिकारियों की भी थी। कांग्रेस इस बात को भी भूल गई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगवार स्वयं भी जब कलकत्ता में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे, एक क्रांतिकारी दल के सदस्य थे, और बाद को वे स्वयं कांग्रेस में रहे तथा विदर्भ में कांग्रेस के पदाधिकारी भी थे। गांधीजी के कांग्रेस के विघटन की राय तो कांग्रेस को इस कारण भी मान्य नहीं थी, क्योंकि १९४६ के बाद गांधीजी स्वयं हाशिए पर हो गए थे, उनकी बात कोई सुनता ही नहीं है, यह उन्होंने स्वयं सार्वजनिक रूप से भी कहा था। गांधीजी की शहादत के बाद सुकवि बच्चन ने ठीक ही कहा था, एक शंका प्रकट की थी—

गुण तो अवश्य संसार तुम्हारे गाएगा,

तुम सा सदियों के बाद कभी फिर पाएगा।

पर जिन आदर्शों को लेकर तुम जिए-मरे,

कितना उनको कल भारत अपनाएगा?

वास्तव में कांग्रेस गांधी और उनके सिद्धांतों को ही भूल गई, केवल २ अक्तूबर और ३० जनवरी को रस्मी तौर पर याद कर लिया जाता रहा है। पिछले चालीस-पैंतालीस वर्षों का इतिहास इस बात का गवाह है कि कांग्रेस ने चाहे सरदार पटेल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, कृपलानी, सुभाष बोस या डॉ. अंबेडकर अथवा अन्य कोई नेता, सभी की अवहेलना की है। तिलक, लाजपत राय या विपिन पाल हों, सभी भुला दिए गए। यहाँ तक कि शास्त्रीजी की भी अनदेखी की गई। केवल गांधी, नेहरू परिवार को ही हमेशा याद किया गया। जिस किसी बड़ी संस्था या कार्यक्रम का नामकरण हुआ तो अधिकतर नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के ही नाम दिए गए। स्वतंत्रता-संग्राम और उसके बाद परिवारवाद ही हावी रहा। उन्हीं के बलिदान का बखान, क्रांतिकारियों के बलिदान को भी नकारा ही गया। यह विचार इतिहासकारों के हैं, जैसे रामचंद्र गुहा के हैं, जो न नरेंद्र मोदी के और न रा.स्व. संघ के प्रशंसक हैं। यही बात गोपालकृष्ण गांधी ने भी कही है अपने एक लेख में। वह भी नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय प्रजातंत्रात्मक संगठन की नीतियों के कटु आलोचक हैं। उन्होंने पिछले दिनों विरोधी दलों के प्रत्याशी के रूप में उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था। नेहरू-गांधी परिवार के अतिरिक्त और कोई न देश का शासन चला सकता है और न किसी का उनकी तुलना में स्वराज-संग्राम में अवदान है। इस प्रकार की मानसिकता से कांग्रेस ग्रसित रही है। देश के महापुरुषों पर किसी एक दल का स्वामित्व हो, यह आवश्यक नहीं है। उनके हर विचार अथवा कृत्य से हम सहमत हों, यह भी जरूरी नहीं है, किंतु वे सब हमारे आदर के पात्र हैं। उनसे किसी-न-किसी रूप में हम प्रेरणा प्राप्त करते हैं। समय-समय पर उनको श्रद्धापूर्वक स्मरण करना हमारा कर्तव्य है। महापुरुष संपूर्ण देश की विभूति हैं, उनकी देन और विचारधारा किसी क्षेत्र, जाति या भाषाई परिधि में नहीं आँकी जा सकती है। यह केवल राजनीति के महापुरुषों के संबंध में ही नहीं, वरन् साहित्य, समाज-सुधार, विज्ञान, कला आदि सभी विधाओं के मनीषियों के विषय में भी यही दृष्टिकोण उचित है। अतएव सरदार पटेल अथवा अन्य महापुरुषों पर कोई राजनैतिक दल अपना एकल अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। वे देश के लिए जिए, संघर्ष किया और जीवन अर्पित कर दिया।

कुछ पुस्तकों की चर्चा

कृष्णबिहारी मिश्र के लेखों, रचनाओं और कुछ शीर्षस्थ साहित्यकारों के साक्षात्कार के दो संकलन पिछले दिनों देखने का अवसर मिला। मिश्रजी के नाम और उनकी विविध विधाओं की रचनाओं से साहित्य-जगत् परिचित है। उनके कई ललित निबंध-संग्रह एवं विचार-प्रधान निबंध-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी बड़ी गहरी और विस्तृत खोज विस्मयकारी है। पत्रकारिता के किसी पक्ष पर शोध करने के लिए उनके ग्रंथों का अवलोकन आवश्यक है। ‘नेह के नाते’ उनके संस्मरणों की एक पुस्तक है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन पर आधारित उनकी पुस्तक ‘कल्पतरु की उत्सव लीला’ पिछले वर्षों काफी चर्चा में रही है और पुरस्कृत भी हुई। उसका बँगला में अनुवाद होना उसकी प्रासंगिकता और लोकप्रियता का परिचायक है। जो भी वे लिखते हैं, उनकी विद्वत्ता और वैचारिक प्रतिभा से ओतप्रोत रहता है। वे वास्तव में एक चिंतक हैं। वे किसी साहित्यिक खेमे से जुड़े नहीं हैं। भारतीय संस्कृति के प्रेमी जो लिखते हैं, उनमें उनका पूरा व्यक्तित्व मुखरित होता है। उनकी एक नई प्रकाशित पुस्तक ‘मूल्य मीमांसा’ उनके पत्रकारिता एवं गद्य रचनाओं का संकलन है। हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कृष्ण बिहारी मिश्र के विषय में अपने एक लेख में लिखा है—‘वे तो स्रष्टा हैं, शोधकर्ता हैं।’ आज जब मूल्यों का क्षरण हर क्षेत्र में हो रहा है और नव पत्रकारिता देश में इतनी अधिक प्रभावशाली हो रही है, यह पक्ष विचारणीय है, इन लेखों में मूल्यों का विवेचन उपदेशात्मक रूप में न होकर घटनाओं, उदाहरणों और पत्रकारिता में विशेष योगदान देनेवाले साहित्यकारों एवं संपादकों के आचरण के माध्यम से स्वतः होता है। ‘मूल्य मीमांसा’ का प्रकाशन माधवराव सप्रे स्मृति समाचार-पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल द्वारा हुआ। सप्रे संग्रहालय के महत्त्वपूर्ण प्रकाशनों और शोधकार्य से पाठकगण परिचित हैं। दूसरी पुस्तक है ‘संबुद्धि,’ जिसमें चौदह विचार प्रधान निबंध हैं और चार रचनाकारों से बातचीत। प्रत्येक लेख अपने में विशेषता रखता है। मैथिलीशरण गुप्त और भारतीय अस्मिता की खोज, प्रसाद के आदर्श की प्रासंगिकता, बंगाल—हिंदी का तीर्थराज, पत्रकारिता—प्रासंगिक संदर्भ, आदि को हम केवल उदाहरण के लिए ही चिह्नित कर रहे हैं। कृष्णबिहारी मिश्र की लेखन-शैली बड़ी मोहक है, वे हर शब्द का प्रयोग बहुत सावधानी से और चुनकर करते हैं। प्रत्येक लेख ज्ञानवर्धक और पठनीय है। ‘संबुद्धि’ को प्रकाशित किया है, शैली पब्लिकेशंस, प्रथम तल १४ चाँदनी चौक स्ट्रीट, कोलकाता ने। दोनों प्रकाशन अत्यंत उपयोगी हैं—हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और साधारण संभ्रांत पाठक के लिए। ऐसे प्रकाशन न केवल कॉलेज और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में, बल्कि जन पुस्तकालयों में भी उपलब्ध होने चाहिए।

कुछ महीने हुए एक सुंदर चित्रमय ब्रोशर कथा-शिविर-२ मिला। उसके कुछ पन्ने उलट-पलटकर देखकर प्रसन्नता हुई कि तक्षशिला एजूकेशनल सोसाइटी का यह अच्छा कल्पनाशील कदम है। ब्रोशर से शिविर की गतिविधियों और उसकी सीधी सोच क्या है, इसकी जानकारी प्राप्त हुई। शिविर सिवान जिले के नरेंद्रपुर गाँव में आयोजित हुआ था। पहला शिविर २०१६ में संपन्न हुआ था। सोसाइटी के सचिव संजीव कुमार ने परिवर्तन परिसन स्थापित किया है। समेकित ग्रामीण विकास की उनकी एक सोची-समझी अवधारणा है। विकास या परिवर्तन एकांगी नहीं हो सकते। बहुमुखी विकास की बात काफी समय से होती आ रही है, पर ठोस काम जैसा होना चाहिए, वैसा हो नहीं रहा है, यही सोचकर शायद उन्होंने यह पहल की। आयोजित शिविर में भाग लेने प्रसिद्ध रचनाकार आए। गाँव के लोगों का सामना हुआ शहर के रचनाकारों से और उनको भी नजदीकी से गाँव की जमीन, वहाँ के हालात और जो वाचिक परंपरा है, उससे परिचय हुआ। इस पारस्परिक संवाद से स्वभावतः गाँव के निवासियों में भी उत्सुकता उत्पन्न होती और उन्हें कुछ नई बातें जानने का अवसर मिलता है। उसी से विचार-मंथन की प्रक्रिया भी एक हद शुरू होती है। यही परिवर्तन का सही और स्थायी आधार बन सकता है। उपर्युक्त ब्रोशर या मोनोग्राफ के उपरांत ‘नरेंद्रपुर-२ भारत की गँवई गंध’ नामक पुस्तक भी मिली, जिसमें शिविर में भाग लेनेवाले रचनाकारों की अनुभूतियाँ शामिल हैं। प्रकाशक हैं तक्षशिला पब्लिकेशन, सी-४०४ (बेवमेंट) डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली-११००२४। तक्षशिला एजूकेशनल सोसाइटी की यह पहल प्रशंसनीय है। काश, कुछ और भी प्रकाशन गृह इसका अनुकरण करें। यह समाज और स्वयं उनके लिए भी लाभकर होगा। शिविर संयोजक संजय कुमार सिंह ने अपने परिचयात्मक लेख में सही लिखा है—‘‘यह भी एक सुखद संयोग है कि गांधी ने देश के लिए जिस अंचल से सत्यग्राह की शुरुआत कर देश का इतिहास बदल डाला था, उसी अंचल में देश के नव निर्माण का सूत्र तैयार हो रहा है। यह भी अद्भुत बात है कि पड़ोस के जीरादेई में देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का पैतृक निवास जहाँ जड़ता का शिकार होता जा रहा है, वहीं उससे आज कुछ किलोमीटर दूर स्थिति परिवर्तन परिसर जीवंतता की मिसाल बनता जा रहा है। जड़ता टूट रही है, चेतना आकार ग्रहण करती जा रही है।’’ हमारी तो कामना यही है कि परिवर्तन की यह धारा संपूर्ण देश में, विशेषतया हिंदी भाषा-भाषी प्रदेशों में प्रवाहित हो।

स्मृतिशेष

श्री विष्णुकांत शास्त्री के नाम और उनके साहित्यिक अवदान से साहित्य-जगत् भलीभाँति परिचित है। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक अवसरों पर व्याख्यान, उद्बोधन दिए। कुछ भाषण अवसरोचित लिखित भी होते थे, पर अधिक अवसरों पर वे बिना लिखे ही बोलते थे। आयोजन के विषय और सार्थकता को दृष्टि में रखते हुए वे अपने विचार खुले दिल से प्रकट करते थे। ‘विष्णुकांत शास्त्री विचार-प्रवाह’ उनके कुछ व्याख्यानों का संकलन है, जो प्रकाशित नहीं हुए थे। व्याख्यानों के महत्त्व और उपयोगिता को देखते हुए राजभवन के कुछ संवेदनशील अधिकारियों ने उनके ऑडियो रिकार्डिंग का भी प्रबंध किया था। राकेश कुमार झा ने, जिन्हें शास्त्रीजी के साथ काम करने का मौका मिला था, इस अप्रकाशित सामग्री को एकत्र करने में प्रमुख भूमिका निभाई। शास्त्री के प्रति उनके भावोद्गार इस प्रकाश की पृष्ठभूमि पर भी काफी रोशनी डालते हैं। संकलन का संपादन डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी ने किया है, जो उनके प्रिय शिष्य रहे और शास्त्रीजी की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में सदैव कार्यशील हैं। अपने अत्यंत निकट और स्नेहित संबंधों के कारण वे शास्त्रीजी की विचार-सरणी और लिखने तथा बोलने की शैली से भलीभाँति परिचित हैं। अत्यंत सुविचारित विद्वत्तापूर्ण और विस्तृत भूमिका हिंदी के जानेमाने कवि और गजलकार डॉ. शिव ओम अंबर ने लिखी है, जिसका शीर्षक है ‘शब्दपुरुष के संबोधन’। शिवओम अंबर की भूमिका ने विष्णुकांत शास्त्री के संबोधन को सार्थकता और जीवंतता प्रदान की है। आशा करते हैं कि ‘शास्त्रीजी के विचार-प्रवाह’ को उत्तर प्रदेश सरकार का शिक्षा विभाग सब विद्यालयों तथा जन-पुस्तकालयों में उपलब्ध कराएगा। संकलन का प्रकाशन श्री बड़ाबाजार कुमार सभा पुस्तकालय के-सी, मदनमोहन स्ट्रीट कोलकाता-७००००७ ने किया है।

इ-मेल :kumarsabha1918@gmail.com है।

 

 

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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