चलिए देवभूमि, उत्तर-पश्चिमी छोर के दर्शन करें

चलिए देवभूमि, उत्तर-पश्चिमी छोर के दर्शन करें

शिमला के एक वर्षीय प्रवास ने शिमला और उसके आस-पास के क्षेत्रों, जैसे संजोली, छोटा शिमला व कुफरी आदि का अच्छा परिचय करा दिया था। एक दिन अचानक चंबा व डलहौजी का नाम मस्तिष्क में कौंधा, चंबा में बादल फट गया है, डलहौजी में किसी सहकर्मी का स्थानांतरण। बस मन मचल उठा उक्त स्थानों को देखने के लिए। सौभाग्य से शीघ्र ही कार्यक्रम बन गया।

बात २०१० की है। जून की तपती गरमी, जब व्यक्ति पहाड़ों की ओर रुख करना चाहता है। सोचा, कहीं चला जाए। हमने डलहौजी चुना। अंबाला से चक्की बैंक तक आरक्षण हो गया। निर्धारित तिथि पर हम दोनों चल पडे़। चक्की बैंक पहुँचकर ऑटो द्वारा पठानकोट बस स्टैंड गए। वहाँ से ‘डलहौजी’ की बस मिल गई। रास्ते में ‘दुनेरा’ एक बड़ा सा कस्बा आया, बस इसके बाजार से होती हुई आगे बढ़ रही थी कि चालक ने २५ मिनट के ठहराव की घोषणा कर दी। सभी यात्री प्रसन्न हो गए, क्योंकि हर किसी को बाजार में खाने-पीने की वस्तुएँ देखकर खरीदने व खाने की चाह पूरी करने का अवसर मिल गया। हमने भी फलों का राजा आम खरीद लिया।

ऐसा लगा कि २५ मिनट झटपट बीत गए। बस अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगी। ढडियाल, नैनीखड, बनीखेत व कैंट होते हुए पहुँच गई अपने गंतव्य पर। बस से उतरकर चारों ओर देखा तो लगा कि ‘डलहौजी’ का यह बस-ठहराव एक बडे़ कटोरे के आकार का है, जिसे प्रकृति ने स्वयं रचा है। चारों ओर ऊँची-ऊँची पहाडि़याँ, बीच तले में बसें व हम खडे़ हैं, पर अभी तक तपन और गरमी से छुटकारा न हुआ था। बस की यात्रा के कारण पटियाला जैसी गरमी की अनुभूति हो रही थी। सायंकाल भी हो रहा था, इसलिए सर्वप्रथम हमें विश्राम हेतु कक्ष की जरूरत थी। तुरंत ही एक गाइड के निर्देशन में हम होटल क्रैग पहुँच गए। शिखर पर (तीसरे तल) हमें कक्ष मिला, बड़ा अच्छा लगा, क्योंकि उस तल का यह एकमात्र कक्ष था, चारों ओर हरियाली व खुला आकाश। क्रैग का अर्थ है—खड़ी, ऊँची चट्टान।

यहाँ से शहर को आसानी से देखा जा सकता था, चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि एक ओर शहर बसा है तो दूसरी ओर हरीतिमा-ही-हरीतिमा। रात्रि होने लगी थी, इसलिए भोजन और विश्राम के अतिरिक्त अब दूसरा काम नहीं।

प्रातः ऊषाकाल में ही उठ गए। रात्रि कब बीत गई, पता ही नहीं चला। कमरे से बाहर आकर देखा, एक ओर छोटी-छोटी पहाडि़याँ, जो घने पेड़ों से ढकी हैं, दूसरीओर छितराए वृक्षोंवाली पहाडि़याँ, जिनके बीच से आती प्रकाश की किरणें बड़ी भली प्रतीत हो रही थीं। मंद-मंद पवन बह रही है। बीच-बीच में एक पक्षी के बोलने की आवाज आ रही है। लगता है, यह पक्षी रात भर बोलता रहा, जो अब थक चुका है, लेकिन विरह से व्यथित है। इसलिए अभी भी अपने प्रिय को बुला रहा है। या तो उसका साथी रूठकर कहीं चला गया है या फिर शापवश रात्रि में अलग हो जाना पड़ता है या फिर अकेला ही किसी उड़ान पर चला गया है।

प्रातः काल का यह समय अति सुखद है, कल की गरमी तो छूमंतर होने से याद भी नहीं रही। हाँ, पक्षी की आवाज अवश्य बार-बार मेरा ध्यान भंग कर रही है। आज ही हमें ‘चंबा’ जाना है, उसकी बस की जानकारी भी प्राप्त करनी है। इसलिए नित्य क्रियाओं से निवृत्त हो हम नीचे आए और क्रैग के मुख्य द्वार से बाहर निकल गए। गांधी चौक की एक परिक्रमा पूर्ण कर हमने प्रातः कालीन सैर की रस्म को भी पूरा किया, साथ ही बस की जानकारी भी प्राप्त की। ज्ञात हुआ कि दस बजे बस मिलेगी। हम तुरंत अपने कक्ष में वापस आए और स्नान-ध्यानादि से निवृत्त हो चल पडे़। जलपान किया। करने लगे बस की प्रतीक्षा। काफी देर तक ‘बस’ के न आने से बस ठहराव की ओर कूच किया, किंतु वहाँ भी चंबा जानेवाली कोई बस न थी, तो फिर गांधी चौक पर कहाँ से आती। पूछताछ कार्यालय से ज्ञात हुआ कि किन्हीं कारणों से प्रातः वाली बस नहीं आई, अतः आप बनीखेत चले जाएँ, वहाँ से अवश्य उपलब्ध हो जाएगी। उस सुझाव को मानते हुए हमने तुरंत टैक्सी ली और पहुँच गए ‘बनीखेत’। वहाँ से चंबा की बस मिल गई। मार्ग में चीहमा, चनेड, परेल आदि को पार करते हुए हम पहुँच गए चंबा। ‘परेल’ के पुल के साथ ‘बालू पुल’ भी पार किया।

चंबा ऐतिहासिक, राजनीतिक, भौतिक व धार्मिक सभी दृष्टियों से हिमाचल का एक विख्यात नगर है। ‘रावी’ के तट पर बसा चंबा मंदिरों की विपुल संपदा से संपन्न है। यदि यह कहूँ कि यह मंदिरों का शहर है तो अत्युक्ति न होगी। यों भी कह सकती हूँ कि देवभूमि है तो देवालयों की बहुतायत तो होगी ही। यहाँ ‘सीता-राम’, ‘देवी’, ‘श्री वंशी गोपाल’ व ‘श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर’ विशेष रूप से दर्शनीय हैं। ये सभी मंदिर १०वीं व ११वीं सदी के हैं। हाँ, रखरखाव की दृष्टि से मंदिर के कुछ भागों का पुनरुद्धार १७वीं व १८वीं सदी में किया गया है।

श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर अकेला १३ मंदिरों का समूह है। एक ही परिसर में विभिन्न देवी-देवताओं को स्थापित किया गया है। सभी के पृथक्-पृथक् आलय बने हैं। संपूर्ण मंदिर मोटे लाल पत्थर से निर्मित है। पत्थरों पर सुंदर नक्काशी की गई है। शैली की दृष्टि से उत्तर में कश्मीरी से लेकर दक्षिण तक की शैली यहाँ देखी जा सकती है। मंदिर का भव्य भवन देखते ही बनता है। इससे थोड़ी ही दूरी पर श्री वंशीगोपाल का मंदिर है। वंशीगोपाल अर्थात् कृष्ण का मंदिर, इसके निकट ही राजमहल है, जिसे अब पी.जी. कॉलेज में परिवर्तित कर दिया गया है। मार्ग में अन्य देवालयों में दर्शन करते हुए, डोगरा बाजार व सब्जी मंडी को पार करते हुए पहुँचे ‘भूरी सिंह संग्रहालय’। इस संग्रहालय में वहाँ के राजाओं के अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र व उनके उपयोग की अन्य वस्तुएँ व बरतनादि दरशाए गए हैं। दीवारों पर पेंटिंग्स बनाई गई हैं, जिनमें काँगड़ा शैली में राम व कृष्ण के जीवन-चरित्र को जीवंत किया गया है।

कुछ पौराणिक संदर्भों को इन चित्रों में इतने सजीव ढंग से चित्रित किया गया है कि इन भित्ति-चित्रों से दृष्टि हटाने का मन नहीं होता है। लगता है कि एकटक दृष्टि से इन्हें देखते हुए इनमें ही समा जाएँ। चित्रकार ने अपनी संपूर्ण जीवनी-शक्ति को इनमें पूरी तरह उडे़ल दिया। श्रीमद्भागवत् के एक प्रसंग, जब ब्रह्माजी को कृष्ण के रूप में पारब्रह्म के अवतरित होने का विश्वास नहीं हो रहा था, तो वे कृष्ण की शक्ति परीक्षा लेने पहुँच जाते हैं तथा उनकी सभी गायों, बछड़ों आदि को एक गुफा में बंद कर उसके द्वार को भारी शिलाखंड से बंद कर आते हैं, को इतनी खूबी से उकेरा गया है कि दर्शक उसे देखकर भाव-विभोर हुए बिना नहीं रह सकता।

संग्रहालय के बाहर एक बड़ा सा पार्क है। ऐसे बडे़-बडे़ पार्क थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हैं। पार्कों के आस-पास अनेक रेहड़ीवाले, विशेष रूप से फलों व गोलगप्पे वाले उसी प्रकार दिखाई दे रहे थे, जैसे मैदानी भागों के नगरों में। फलों में ‘खुमानी’ यहाँ विशेष रूप से मिलता है। यह फल मीठा, स्वादिष्ट व शीतलताप्रद है, साथ ही न छीलने का झंझट और न काटने का। इसलिए इस फल को खरीदे बिना मैं न रह सकी। धोया और खाना प्रारंभ। धीरे-धीरे संध्या घिरने लगी, अपने विश्रामस्थल क्रैग पहुँचने के लिए बस ठहराव की ओर बढ़ चले। काफी दूरी तक रावी ने बस का साथ दिया और हम यात्रियों को दर्शन। डलहौजी पहुँच, बस से उतरकर चहलकदमी करते हुए अपने डेरे पर पहुँच रात्रि-भोजन और विश्राम किया।

मौसम सुहावना व सुखद, लगता ही नहीं था कि कहीं गरमी भी होगी। अब तो वर्षा भी प्रारंभ हो गई। देर रात तक वर्षा के साथ छोटे-छोटे श्वेत बर्फ खंडों के रूप में ओले भी गिरे। प्रातः उठे तो अभी भी हलकी-हलकी फुहारें पड़ रही थीं, जो शीघ्र ही शांत हो गईं। इस प्रातः की रमणीयता का क्या कहना? शायद इस आनंद को शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। कक्ष से बाहर निकल देखा तो सद्यःस्नाता नायिका सी हरीतिमा, तिसपर बहती मंद पवन। धुले-धुले पत्ते, नहाए हुए वृक्ष, बादलों से भरा आकाश, चट्टानें भी स्वच्छ-निर्मल हँसी से युक्त, नीचे मार्ग भी धुले-पुछे से, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्रों में जल शीघ्र ही ढलानों की ओर बह जाता है।

आज हमें ‘खज्जियार’ जाना है। अतः प्रकृति के उस आनंद को लेते हुए प्रातःकालीन नित्य क्रियाओं से निवृत्ति ली। स्नान-ध्यान, जल-पान भी किया और चल पडे़ मंजिल की ओर। डलहौजी से खज्जियार की दूरी मात्र २२ किमी. है, किंतु मार्ग सँकरा है, एक समय में एक ही ओर बस निकल सकती है, इसलिए यह छोटी सी दूरी डेढ़ घंटे में तय हुई। मार्ग में कई विद्यालय दिखाई दिए, जिनमें डी.पी.एस. प्रमुख था। यह बोर्डिंग स्कूल है। मार्ग के दोनों ओर रंग-बिरंगे गमले रखे गए हैं, जो विद्यालय के स्वच्छता व सौंदर्य-बोध को दरशाता है, थोड़ा आगे बढ़ने पर विद्यालय के स्वच्छता भवन, बच्चों का आवासीय भवन, तिरंगे के प्रतीक तीन रंगों से सजा यह भवन दूर से ही अपने अस्तित्व का भान करा रहा है तथा दूर से ही अपने छात्रों को आमंत्रण देता सा प्रतीत हो रहा है। विद्यालय के इस बाह्य रख-रखाव ने मन मोह लिया, निश्चित रूप से यहाँ पढ़नेवाले छात्र भी संस्कारवान् होते होंगे, ऐसा विश्वास है। लक्कड़मंडी व आल्हा गाँव पार कर हम ‘खज्जियार’ पहुँच गए।

खज्जियार एक विस्तृत मैदान; जिसके मध्य में बड़ी सी झील, झील के बीच में यात्रियों व दर्शकों के बैठने हेतु काष्ठघर, काष्ठघरों तक पहुँचने के लिए काष्ठ के ही पुल बनाए गए हैं। काष्ठघरों की बैंचों पर बैठकर चारों ओर के नजारे का आनंद उठाते हुए कुछ हलका-फुलका खाते हुए पिकनिक का सा आनंद लिया जा सकता है। हमने भी वहाँ बैठकर चिप्स व नमकीन खाया। यहाँ बैठकर जब हम चारों ओर देखते हैं तो एक ओर पहाडि़याँ, उनपर उगे हुए ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, जो झूम-झूमकर आनेवाले सैलानियों का स्वागत करते से जान पड़ते हैं। इसके बाईं ओर पैराग्लाइडिंग, घुड़सवारी व बडे़-बडे़ गुब्बारों में बैठाकर सैर कराई जा रही है। दूसरी ओर अनेक शाकाहारी भोजनालय, जो अपने मसालों की खुशबू से यात्रियों की भूख बढ़ा रहे हैं। एक ओर झूले भी पडे़ हैं। वहीं भोजनालयों के पास ही है एक खज्जिनाग देवता का मंदिर, जिसके नाम पर इस स्थल का नाम पड़ा ‘खज्जियार’।

यह मंदिर एक प्राचीन काष्ठ मंदिर है। इसकी काष्ठ-भित्तियों पर पांडवों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। मंदिर में नाग देवता की विशाल प्रस्तर प्रतिमा है। मंदिर के चारों ओर के स्तंभों पर स्त्री व पुरुष के लेटे हुए चित्र बने हैं, जिन्हें देखकर खुजराहो के मंदिरों का स्मरण हो जाता है। यहीं सामने हिडिंबा मंदिर है, उसकी भी एक परिक्रमा कर बाहर आते हैं। ‘बस’ का भी समय हो रहा है, किंतु बाहर तरह-तरह की वस्तुओं के विक्रेता भी अपनी-अपनी वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाए हैं और वे वस्तुएँ भी यात्रियों के साथ आने को मचल रही हैं। हमने भी ताम्रपत्र के सूर्य-चंद्र आदि की ३-८ लटकनें (दरवाजों पर लटकानेवाली) को अपने साथ ले ही लिया और शीघ्रता से बस की ओर कदम बढ़ा दिए। बस ने हमें हमारे ठहराव ‘डलहौजी’ पहुँचा दिया। हम जब भी कहीं जाते हैं तो उस गंतव्य के साथ-साथ उसके आस-पास के क्षेत्रों से भी परिचित हो जाना चाहते हैं। यही इस समय भी हुआ कि चंबा को देखने के बाद ‘काँगड़ा’ घूमने का मन हो आया। अगली प्रातः, अर्थात् अर्थात् २२ जून को हमने काँगड़ा उपमंडल के खूबसूरत हिल स्टेशन धर्मशाला का रुख कर लिया। धौलाधार पर्वत श्रेणियों के बीच बसा धर्मशाला, धर्मदास द्वारा बनवाई धर्मशाला (यात्रियों का विश्राम स्थल), जो आज हिमाचल के प्रसिद्ध शहर के रूप में परिवर्तित, प्रसिद्ध अदाकारा देवानंद की यादों से जुड़ा धर्मशाला!

‘लाहडू’ होते हुए ‘नूरपुर’, काँगड़ा जिले का ही एक प्यारा सा नगर, नामानुकूल बाजार भी आकर्षक व दैनिक उपयोग की वस्तुओं से संपन्न। यहाँ बस का कोई ठहराव नहीं। हाँ, गति अवश्य धीमी रही, जिससे बस-भ्रमण का सा आभास। यहीं से ‘कोटला’ नदी का भी साथ मिला। ‘कोटला’ के मैदानी भाग पर दौड़ती बस से बीच-बीच में कहीं-कहीं दूर पहाडि़यों की झलक, किंतु विरल हरीतिमा गरमी का प्रकोप कुछ अधिक ही दिखाई दे रहा है। मानव को संजीवनी देनेवाली प्राकृतिक हरियाली स्वयं गरमी की मार से झुलस गई है।

हमारी बस अपनी चाल से चल रही है। धर्मशाला से लगभग १२ किमी. पहले ‘गगल’ पहुँच गए, इस कस्बे का बाजार भी नूरपुर जैसा प्रतीत हो रहा है।

‘धर्मशाला’ पहुँचते-पहुँचते आकाश मेघों से घिर गया है। हलकी-हलकी फुहारों की बौछार होने लगी, जिससे ग्रीष्म की तपन कम होने लगी। बस ‘धर्मशाला’ आ पहुँची, हमें तलाश थी अब अपने रैन बसेरे की, जो ‘सीता’ होटल के कक्ष में संपन्न हो गई, साथ ही वर्षा की गति बढ़ गई, बस मजा ही आ गया! डलहौजी से धर्मशाला के बीच आई भीषण गरमी से तुरंत राहत मिल गई। साथ ही पेट में पहुँचा गरमागरम भोजन व चाय की चुसकियाँ। अब तक मौसम सुहावना हो चुका है, वर्षा रुक गई है, हम भी ऊर्जा से युक्त हो चुके हैं। इसलिए ‘धर्मशाला’ से दस किमी. दूर बसे ‘मिनी ल्हासा’ यानी कि मैकलोडगंज चले, यानी तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा का स्थायी आवास। दलाई लामा मंगोल भाषा का एक शब्द है, जिसका सामान्य अर्थ होता है, ‘ज्ञान का महासागर’, इसलिए यह कोई नाम नहीं, अपितु किसी ज्ञानी संत की पहचान है।

चीन की विस्तारवादी नीति के कारण तिब्बत के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी व दलाईलामा को प्रभावित करनेवाले प्रयासों के कारण दलाईलामा ने भारत में शरण ली और मैकलोडगंज को अपना आश्रय-स्थल। शीघ्र ही हम भी वहाँ पहुँच गए। यह मंदिर तिब्बती संस्कृति का जीता-जागता उदाहरण है। मंदिर में तिब्बती देवी की सुंदर सी प्रतिमा स्थापित है। महात्मा बुद्ध की भी भव्य व विशाल प्रतिमा है। अन्य भी कुछ प्रतिमाएँ हैं, सभी प्रथम तल पर हैं। चारों ओर चक्रों पर ‘ॐ पूर्णे हुम्’ बीजमंत्र अंकित है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि बीजमंत्र का उच्चारण करते हुए जब चक्रों को घुमाया जाता है, तो घुमानेवाले के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। ६ जुलाई, १९३५ को जनमे १४वें दलाईलामा का आवास भी यहीं है। मंदिर एक विस्तृत परिसर में होते हुए स्वच्छता, पावनता व शीतलता का परिचायक है। यहाँ की एक और बात, जिसने मेरे मन को छुआ, मुझे प्रभावित किया, वह यह कि मंदिर के निर्माण के समय पर्यावरण का ध्यान रखा गया है, जो वृक्ष थे, उन्हें काटा नहीं गया, अपितु छत में तनों के आकार के बडे़-बडे़ सुराख (घेरे) छोड़कर वृक्षों को ऊपर की ओर बढ़ने का अवसर दिया गया है। तीसरे तल तक यही प्रक्रिया अपनाई गई है।

चौक से मंदिर तक तिब्बती संस्कृति व शैली से जुड़ी वस्तुओं के अनेक विक्रेता अपनी दुकानें सजाए हैं, जहाँ से आप अपनी पसंद की वस्तु खरीद सकते हैं। वहाँ का साहित्य भी उपलब्ध है, लेकिन भाषा की बाधा, क्योंकि हिंदी में कुछ उपलब्ध न था। खाने-पीने के सामान की भी अनेक रेहडि़याँ मार्ग के दोनों ओर खड़ी हैं। गोल-गप्पों की विशेष रूप से। हम भी गोल-गप्पो को गोल करने का मोह नहीं छोड़ पाए। और अब चले यहाँ के प्रसिद्ध ८५० वर्षीय पुराने भागसू नाग मंदिर। इस मंदिर के नामकरण के संदर्भ में कहते हैं कि भागसू दैत्यों का राजा था, एक बार उसके राज्य में सूखा पड़ा। पानी न होने के कारण प्रजा में हाहाकार मच गया। उन्होंने अपनी राजा से कहा कि या तो हमारे लिए जल का प्रबंध करो या फिर हम आपका राज्य छोड़कर कहीं दूसरी जगह चले जाएँगे। दैत्य राजा अपनी प्रजा को खोना नहीं चाहता था, अतः वह जल की खोज में चल पड़ा। यहाँ पहाड़ी पर उसे पानी की एक बड़ी झील दिखाई दी। मायावी राजा ने झील का सारा जल अपने कमंडल में भर लिया और विश्राम करने लगा। जब रात को नाग वहाँ आया, अपनी झील को सूखा पाया तो जलचोर की तलाश की। यहाँ भागसू और नाग में युद्ध हुआ। कमंडल से थोड़ा सा जल यहाँ गिर पड़ा, जिससे यहाँ बड़ा सा जलाशय बन गया। भागसू हार गया और मरने लगा। मरते-मरते नाग की स्तुति की और अपनी प्रजा के लिए जल की विनती भी। नाग देवता प्रसन्न हुए और भागसू को यह वरदान भी दिया कि यहाँ जो मंदिर बनेगा, उसमें तुम्हारा नाम मेरे से पहले आएगा, इसीलिए इस मंदिर को ‘भागसू नाग मंदिर’ कहा जाता है।

मंदिर एक विस्तृत परिसर को घेरे है। विभिन्न देवी-देवताओं, जैसे राम, कृष्ण, शिव आदि की भव्य प्रस्तर प्रतिमाएँ स्थापित हैं। प्रांगण में जलाशय है, जिसमें अनेक श्रद्धालु भक्त स्नान करते हैं। मंदिर का नियंत्रण सरकार के अधीन है। यहीं से जल-प्रपात की धार भी सिमटी सी है। मंदिर में अनेक श्रद्धालुओं का जमावड़ा होने पर भी शांति व शीतलता की अनुभूति हो रही है। फिर भी हम यहाँ से चलने को विवश हैं। सायंकाल हो रहा है, वर्षा की रिमझिम हो रही है। फलतः हम अपनी मंजिल की ओर बढ़ने के लिए बस का आश्रय लेते हैं और पहुँच जाते हैं, होटल गीता के कक्ष में।

अगले दिन के कार्यक्रम में हमने काँगड़ा के ब्रजेश्वरी मंदिर को देखा, जो बस-पड़ाव से अधिक दूर न था। जैसे ही मंदिर का सँकरा मार्ग प्रारंभ हुआ तो वहीं मंदिर का बाजार भी। मंदिर के लिए प्रसाद की दुकानें, माला बिंदी, चूड़ी व खिलौने की दुकानें। बाजारनुमा इस मार्ग को पार कर मंदिर परिसर में हम प्रवेश करते हैं तो देखते हैं कि भक्तों की अपार भीड़ जुटी है। हम भी उस भीड़ का हिस्सा बन गए। मुख्य द्वारा पर ही माता के वाहन सिंह स्थापित किया गया है। अंदर के परिसर में गर्भगृह के द्वार पर भी। गर्भगृह में देवी की भव्य-दिव्य प्रतिमा। इन प्रतिमाओं को देखकर उन शिल्पकारों की शिल्पकला को नमन करती हूँ, जो एक पाषाण खंड को अपने छैनी-हथौड़े से काट-छाँटकर, तराशकर इतनी जीवंत प्रतिमा के रूप बदल देते हैं, जिसे असंख्य श्रद्धालु भक्त न केवल भाव-प्रसून अर्पित करते हैं, अपितु दान-दक्षिणा के रूप में, चढ़ावे के रूप में सोना, चाँदी व धन भी देते हैं। कुछ हम जैसे भी, जो श्रद्धा भाव ही प्रदर्शित करते हैं, फिर भी कुछ-न-कुछ चढ़ावा भी। मंदिर की एक परिक्रमा की। परिक्रमा में ही गोरखपुर प्रेस की पुस्तकों का एक विक्रय केंद्र है, जहाँ से हमने भी बच्चों के लिए कुछ पुस्तकें खरीदीं। हमारा अगला पड़ाव था ‘काँगड़ा का किला’, जो माता के मंदिर से ढाई किमी. दूर है, जिसे रिक्शा से आसानी से पार कर लिया जाता है।

‘किला’ पुराने काँगड़ा में स्थित है। हजारों वर्ष पुराना हिमाचल का यह एक मात्र किला आज भी इस बात का साक्षी है कि कभी यहाँ कटोच वंश का शासन था। कटोच वंश के बाद ब्रिटिश काल में भी इसका विकास व उत्थान हुआ, लेकिन ४ अप्रैल, १९०५ में आए तीव्र भूकंप ने इसे बड़ी हानि पहुँचाई। काँगड़ा घाटी भी काफी क्षत-विक्षत हुई। अब यह किला पुरातत्त्व विभाग के अधीन है। किले के मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर परिचय पट, सामने लॉन (बड़ा सा घास का मैदान)। आगे बढ़ते हुए लगभग १५० मीटर चलने पर किले का द्वार आता है। भूकंप से क्षतिग्रस्त होने के कारण द्वार के दरवाजों का पुनरुद्धार किया जा चुका है। द्वार से अंदर थोड़ी सी चढ़ाई, फिर चौड़ी-चौड़ी जीने की नौ पैडि़याँ, फिर एक कपाट रहित दरवाजा, जिसके दोनों ओर छायादार स्थान बनाए गए हैं, संभवतः दर्शकों के विश्राम हेतु। यहाँ से पुनः ५७ सीढि़याँ, फिर थोड़ी ढालू चढ़ाई, पुनः ग्यारह पैडि़याँ, फिर थोड़ा सा रास्ता, उसके बाद थोडे़ से रास्तें में लकडि़यों के तख्ते लगाए गए हैं, यह भी किले के क्षतिग्रस्त मार्ग का सुधार रूप है। इसके बाद पुनः ७१ पैडि़याँ चढ़ने पर पुनः पथ, यहाँ एक देवी ब्रजेश्वरी मंदिर, एक जैन मंदिर स्थापित है। दूसरी ओर कुछ अन्य मंदिरों व देव प्रतिमाओं के अवशेष पडे़ हैं, जिनमें गणेश की प्रतिमा सबसे ऊपर होने से स्पष्ट दीख रही है।

ऐसा प्रतीत होता है कि किले के निर्माण के समय यहाँ सभी देवों, देवियों के मंदिर बनाए गए होंगे, जिससे शाही परिवार व अन्य परिजन (सेवक-सेविकाएँ) भी अपनी-अपनी आस्था व श्रद्धा के अनुकूल पूजा-अर्चना कर सकें। जो समय की गति व भूकंप के कारण क्षतिग्रस्त हो गए। इस समय इसी परिसर में २५ आवासीय कक्ष बने हैं, जिनमें किले के कर्मचारी रहते हैं। यहाँ से पुनः ५० सीढि़याँ चढ़कर हम किले के शीर्ष पर पहुँच जाते हैं। यहाँ भी किले की कुछ दीवारें क्षतिग्रस्त स्थिति में ही हैं। कुछ स्थलों का नवीनीकरण हो चुका है। वृक्ष ऊपर तक पहुँच गए हैं। बैठने के लिए बेंच भी हैं, जिन कर बैठकर यात्री या कर्मचारी कुछ पल आराम कर सकें, चारों ओर का नजारा भी निहार सकें। हम भी थोड़ी देर किले के शीर्ष पर रुककर नीचे की ओर चल पड़ते हैं। किले से लगभग सौ मीटर की दूरी पर एक जैन मंदिर है। अब हम उसका भी भ्रमण करना चाहते हैं, इसलिए चल पड़ते हैं उसे देखने। जैन मंदिर में जैन तीर्थकरों की श्वेत संगमरमर की जैसे आदिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर स्वामी आदि की विभिन्न प्रतिमाएँ हैं। यहाँ कुछ कार्यक्रमों विशेष रूप से वार्षिक-यात्रा समारोह के कोलाज (अर्थात्) किसी बडे़ चार्ट पर विभिन्न चित्रों का संयोजन भी मंदिर की दीवारों पर प्रदर्शित किए गए हैं। यह मंदिर भी मध्यम परिसर के साथ साफ-सुथरा है। इसकी भी हमने एक परिक्रमा की।

आज ही ‘चामुंडा’ देवी के मंदिर को देखने का लक्ष्य है। चामुंडा जाने के लिए हमने पुनः डेढ़ घंटे की बस यात्रा की। इस मंदिर का परिसर काँगड़ा के ब्रजेश्वरी देवी मंदिर से भी कहीं अधिक बड़ा, विशाल व विस्तृत है। भक्तों की भीड़ भी वहाँ से कहीं अधिक। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए भक्तों के समूह में सम्मिलित हो गए, धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए माँ के दर्शन किए। गर्भगृह के बाहर सिंह की प्रतिमा, चामुंडा माँ के दर्शनों के बाद जिस दूसरे रास्ते से बाहर निकले, वहाँ शिव का मंदिर। इन सबसे भी अद्भुत एक विशाल सरोवर, जिसमें भोलेनाथ, सरस्वती, हनुमानजी की विशाल व भव्य प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। सरोवर के चारों ओर की दीवारों को रंग-बिरंगी पेंटिंग्स से सजाया गया है। सरोवर के दूसरी ओर एक पूरा सिंह परिवार उपस्थित है मानो सरोवर की सुरक्षा में सन्नद्ध खडे़ हों। दूसरी ओर बाणगंगा भी आ रही है, जिस पर अर्द्धवृत्ताकार पुल निर्मित है। सरोवर व बाणगंगा में अनेक श्रद्धालु भक्त स्नान कर रहे हैं। कुल मिलाकर सरोवर, प्रतिमाएँ, गंगा व पेंटिंग्स ने इस मंदिर के सौंदर्य को चार चाँद लगा दिए हैं। यहीं एक धूप के चश्मों की दुकान भी थी, जहाँ से मैंने भी अपने लिए एक सनग्लास खरीदा। मंदिर के बाहर के मार्ग के दोनों ओर खाने-पीने के सामान की दुकानें व शुद्ध शाकाहारी भोजनालय स्थित है। हमने भी वहाँ भोजन किया और चामुंडा के परिसर के सौंदर्य को साथ लिये पुनः धर्मशाला के सीता होटल के कक्ष में पहुँच गए। रात्रि शयन और विश्राम की अब सख्त आवश्यकता थी, जिसे हमने पूर्ण किया।

आज हमारा लक्ष्य धर्मशाला के स्थानीय स्थलों की सैर करना था, इसलिए अपनी प्रातःकालीन दिनचर्या को संपन्न कर ‘कुणाल पत्थरी मंदिर’ देखने चल पडे़। यह हमारे पड़ाव से ढाई-तीन किमी. की दूरी पर होगा। वास्तव में तो यह ‘कपालेश्वरी मंदिर’ है, क्योंकि यहाँ माता ‘सती’ का कपाल गिरा था, जिसे लेकर शिव ने यहाँ काफी समय विश्राम किया। (माता सती को जब यह ज्ञात हुआ कि उसके पिता ‘दक्ष’ एक यज्ञ-अनुष्ठान करा रहे हैं, उसमें शिव को छोड़कर सभी देवता आमंत्रित हैं तो पुत्री सती को यह बात अच्छी नहीं लगी, फिर भी उसने पिता गृह जाने की जिद की। शिव ने अनुमति दे दी। माता सती ने वहाँ पहुँचकर देखा कि उसके पति का कोई भाग नहीं निकाला गया, अपितु पुत्री के बिन बुलाए पहुँचने पर उसका अपमान ही किया गया, तो उसने उस यज्ञाग्नि में अपनी आहुति दे दी। जब भगवान् शिव को यह समाचार मिला तो उन्होंने वहाँ पहुँचकर सती के दग्ध शव को लेकर तांडव किया, जिससे उनके शरीर के अंग अलग-अलग स्थलों पर गिर पडे़, इसी पौराणिक संदर्भ का संकेत है यहाँ।)

‘कपालेश्वरी’ से कुणाल-पत्थरी-मंदिर के रूप में विख्यात होने की भी एक रोचक कथा है। माता सती के कपाल के ऊपर एक प्राकृतिक पत्थर का कुंड है, जिसका आकार परात के समान है, काँगड़ी भाषा में परात को कुणाल कहते हैं, इसलिए यह मंदिर ‘कुणाल-पत्थरी-मंदिर’ के रूप में अधिक जाना जाता है। इस कुंड की विशेषता यह है कि उसमें जल भी प्राकृतिक रूप से इकट्ठा होता है, जो कभी न कम होता, न खराब होता है, इसी जल को प्रतिदिन चरणामृत के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह गंगाजल के समान शुद्ध व पावन है। मंदिर के निकट का लगभग १ किमी. का मार्ग चाय बागान के मध्य से होकर जाता है। इस मंदिर का निर्माण १९६९ ई. में किया गया। यहीं एक चट्टान को काटकर लगभग १५ फुट लंबी सुरंग (गुफा) बनाई गई है, जिसमें शिव लिंग व प्रतिमा दोनों रूपों में विराजमान हैं। इसलिए यह मंदिर गुप्तेश्वर महादेव के रूप में विख्यात है। दोनों का परिसर एक है, मंदिर के आस-पास कुछ आवास भी हैं। मंदिर के दर्शन कर प्रातःकालीन भ्रमण को संपन्न करते हुए हम गांधी वाटिका में पहुँचे। यह बस-ठहराव व कोतवाली बाजार के चौक पर स्थित है। इस वाटिका का उद्घाटन २४ अप्रैल, १९९४ को तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कर-कमलों से हुआ। वाटिका १५-१६ सीढि़यों की ऊँचाई पर स्थित प्रकृति के साथ साम्य कर रही है।

अपने इस प्रातःकालीन भ्रमण व दर्शन कार्य को संपन्न कर हम अपने विश्राम कक्ष में पहुँच गए, जहाँ प्रातः का अल्पाहार लेकर कुछ विश्राम किया। विश्रामोपरांत पुनः निकल पडे़। थोड़ी ही दूरी पर एजुकेशन बोर्ड के समीप स्थित ‘शहीद स्मारक’ देखा, जिसमें १९४७-४८, १९६२ व १९७१ के युद्धों में वीरगति को प्राप्त हुए शहीदों की स्मृति में (जल, थल, वायु) तीनों सेनाओं के सैनिकों के प्रतीक यहाँ स्थापित हैं। स्मारक में श्यामवर्णी चमकदार पत्थर की चादरों से तीन दीवारें इस प्रकार खड़ी की गई हैं कि उन्हें किसी भी कोण से देखने पर समान (एक सी) दीखती हैं। तीनों प्रस्तर-दीवारों पर शहीदों के नाम अंकित हैं, जिन्हें नम आँखों से नमन कर हम चारों ओर के उद्यान को निहारते हैं। उपवन का रख-रखाव पूरी निष्ठा व श्रद्धा से किया जा रहा है। बच्चों के मनोरंजन हेतु झूले आदि भी हैं। इस स्मारक के साथ ही स्वामी विवेकानंद पार्क है, जिसमें बच्चों के लिए टे्रन है। कुल मिलाकर शहीद स्मारक श्रद्धा व आस्था का प्रतीक होने के साथ-साथ प्राकृतिक संपदा से संपन्न है, बीच-बीच में मखमली घास के मैदान दर्शनीय हैं। शहीदों के बलिदान का प्रतीक यह स्मारक हम सबको भी अपने कर्तव्य की याद दिलाता है। जिन सुरक्षाकर्मियों के कारण हम सभी चैन की बंसी बजाते हैं, उनके शहीद होने पर उनके आश्रितों के पालन-पोषण में यथासंभव सहयोग करें।

एजुकेशन बोर्ड के दूसरी ओर की सड़क के किनारे एक स्टेडियम बनाया गया है। यह क्रिकेट एसोसिएशन का अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम हिमाचल की शान है। जब भी यहाँ डे-नाइट मैच होता है तो रोशनी में नहाया यह स्टेडियम व संपूर्ण शहर काँगड़ा के किले से भी देखा जा सकता है। इस समय कोई मैच नहीं हो रहा है, फलतः दर्शक दीर्घाएँ खाली होने से हमें इसे देखने, परखने के अनुमति आसानी से मिल गई। न केवल स्टेडियम की दर्शक दीर्घाओं में घूमे-फिरे, अपितु उसके संपूर्ण परिसर की परिक्रमा भी की। इसी स्टेडियम के पास एक दूसरा स्टेडियम क्षेत्रीय व स्थानीय खिलाडि़यों के लिए निर्मित किया जा रहा है, जो अब तक बन चुका होगा। मशहूर अदाकार देवानंद से जुड़ा यह शहर सचमुच आनंद का सागर भी है और उसका स्रोत भी। इसी आनंद रस से युक्त हो हम चल पडे़ वापसी की ओर।

२८-बी, प्रेम नगर, पटियाला

दूरभाष : ०९४१७०८८४६६

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