बधाई का ढोल

बधाई का ढोल

एक अखबार में ‘क’ को सम्मानित किए जाने की खबर छपी। मैंने ‘क’ को बधाई दी। ‘ख’ के पेट में दर्द हुआ। तमककर बोला, ‘‘बधाई के ढोल पीटना बंद करो।’’ मैं हैरान था। वह बरसों से आए दिन कुंठा केनगाड़े बजा रहा है, तब तो हमने कुछ नहीं कहा। लेकिन ‘ख’ के साथ ‘ग’ भी आ गया। उसके पास अपनी तूती थी। उसे लगा कि नक्कारखाने में अब तक किसी ने उसकी प्रतिभा को नोटिस ही नहीं किया, इसलिए संभव है कि नगाड़ेवाले के साथ चलने से किसी बहाने उसपर भी कृपा चली आए। ‘ग’ के साथ ने ‘ख’ के उत्साह में बढ़ोतरी कर दी। वह अपने गालों को ही नगाड़ा समझकर बजाने लगा। मेरे संस्कार कहते थे कि अपनी प्रशंसा में आप गाल बजाना कोई अच्छी बात नहीं होती, इसलिए मैं खामोश हो गया। इतना तो मैं समझ ही गया था कि ‘ख’ को बधाई से परेशानी इसलिए हुई कि ट, ठ, ड से लेकर क्ष, त्र, ज्ञ तक सब कभी-न-कभी बधाई ले रहे थे और बधाइयों के मेले में वह था कि उपेक्षित सा एक कोने में खड़ा हुआ था। जब सबको ही बधाई मिल रही हो, और आपको कोई फूटी कौड़ी के भाव नहीं पूछे तो दूसरों को दी जानेवाली बधाइयाँ ढोल के शोर की तरह आपके रक्तचाप का संतुलन बिगाड़ेंगी ही साहब!

‘क’ ने कहा कि बधाइयों का ढोल बंद किया जाए। किसी ने ध्यान नहीं दिया तो उसने हवा में गालियों को फूँकना शुरू किया। दूसरों को गाली देनेवाला हमेशा आत्ममुग्ध रहता है। उसे अपनी गूँजती हुई गालियाँ किसी सुरीली शहनाई से कम प्रतीत नहीं होतीं। लेकिन महाशय ‘ख’ गाली फूँक नहीं रहे थे, गालियों का नगाड़ा कूट रहे थे। भीड़ में ऐसे लोग भी थे, जिन्हें ‘क’ को दी जानेवाली बधाइयों से आपत्ति थी, इसलिए उन्होंने आँखों-ही-आँखों में ‘ख’ को इशारा किया कि वह चालू रहे। ‘ख’ चालू रहा। उसकी हरकतों से कुछ दूसरे लोगों का यह कहना सही प्रमाणित हो गया कि ‘ख’ बहुत चालू है।

चूँकि ‘ख’ के तमाम विरोधों के बावजूद ‘क’ को बधाई दी जा चुकी थी और बधाई देनेवालों का ताँता लग गया था, इसलिए ‘क’ का रक्तचाप सचमुच असंतुलित हो गया। उसने अपनी अप्रसन्नता जताने के लिए पहले खाँसना शुरू किया, फिर खीझने, खिसियाने, खींसें निपोरने और खंभा नोचने से लेकर लोगों को नोचने-खसोटने तक वह जो कर सकता था, उसने किया। जो लोग उससे सहमत नहीं हुए, उनके खिलाफ मोरचा खोलते हुए उसने उन्हें खूँसट और खुद को सबसे बड़ा खिलाड़ी बताया। ‘ख’ को लगा कि वह यदि लोगों को अपने नुकीले दाँत दिखाकर गुर्राएगा तो लोग उससे डरेंगे, लेकिन लोगों ने एक कहावत में वर्णित उस जानवर को याद किया, जिसके बारे में कहा गया है कि जो भौंकते हैं, वह काटते नहीं। कुछ लोगों ने तो उसी जानवर को याद करते हुए यहाँ तक कहा कि यदि वह काटे तो पलटकर उसे नहीं काटा जाता। ‘ख’ बधाइयों का फूटा ढोल बजाता रहा। लोग ‘क’ को बधाई देते रहे।

अब ‘ख’ को लग रहा है कि ऐसे काम नहीं चलनेवाला। वह दुनिया को दिखा देना चाहता है कि बधाई लेना उसे भी आता है। इसलिए आजकल वह एक पद्म पुरस्कार प्राप्त प्रतिभा के गुण गाता है, एक संपादक की अर्दली में हमेशा खड़ा रहता है, एक मंत्रीजी को उसने जियाजी कहना शुरू कर दिया है और कुछ संयोजकों को शादी की सालगिरह से लेकर बच्चों के जन्मदिन तक की बधाइयों के संदेश देने शुरू कर दिए हैं। ‘ख’ अब केवल ‘ख’ होकर नहीं रहना चाहता। उसे भी कुछ सम्मानों की तलाश है। सम्मान की तलाश में वह सम्मानों को गाली देता है, क्योंकि उसे लगता है कि कुछ सम्मानित अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए उसे भी सम्मानितों की जमात में शामिल कर लेंगे। मुझे जानकारी मिली कि ‘ख’ अपने आपको एक लेखक के तौर पर सम्मानित करवा लेने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है। पता किया तो पता चला कि उसने कई नेताओं के लिए अभिनंदन-पत्र लिख दिए हैं, कई अधिकारियों के बेटों-पोतों के मुंडन के निमंत्रण-पत्र उसी के लिखे हुए हैं और पिछले दिनों तो उसने एक बड़े संयोजक के पिताजी के निधन के बाद तिये की बैठक के कार्ड का मैटर भी खुद ही लिखकर दे दिया था। अब कोई अपनी प्रतिभा साबित करने के लिए इतने प्रण-प्राण से जुटा हो तो उसे सम्मानित होने से कब तक रोका जा सकेगा।

मैं भी प्रतीक्षा में हूँ, बच्चू! जिस दिन तुम्हारे सम्मान की खबर पढ़ूँगा, सबसे पहले बधाई देने मैं ही आऊँगा और देखूँगा कि क्या उस दिन भी यही कहोगे कि सम्मान का ढोल बजाना बंद करो।

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