मेरे रमन भैया

मेरे रमन भैया

चैनल पर ‘द कपिल शर्मा कॉमेडी शो’ आ रहा था। यों तो मुझे ऐसे प्रोग्रामों में रुचि नहीं है। पर उस दिन परिवार के साथ बैठी थी, तभी बच्चों ने टी.वी. खोल दिया और यह प्रोग्राम आ रहा था। कपिल अपने बचपन की शरारतें सुना-सुनाकर दर्शकों का मनोरंजन कर रहे थे और बता रहे थे कि कभी-कभी खाली समय में कैसे ऊट-पटाँग हरकतें किया करते थे। सभी लोग बच्चे, बूढ़े और जवान उनकी बातों पर ठहाका मारकर हँस रहे थे। उन्होंने कहा, नाक में उँगली डालकर कहीं भी पोंछ देना, सोते हुए व्यक्ति के कान में तिनका घुसा देना, खर्राटे लेते हुए किसी के खुले मुँह में गुठली या छिलका डाल देना इत्यादि। ये देखकर मुझे अचानक अपने रमन भैया की याद आ गई। उन्हें याद करके मन भर आया, पर साथ ही बचपन की वे सब शरारतें भी याद आ गईं।

गरमी की दोपहर हम सब यही बातें किया करते थे। रमन भाई साहब हमारे लीडर होते थे। उनके आगे-पीछे घूमना हम सबकी मजबूरी थी, उनकी बात नहीं मानी तो हमें गेम से बाहर कर देंगे। हमारा घर पहली मंजिल पर था, बाहर के कमरों के आगे बड़ी सी खुली जगह थी। उसके कोने में एक दुछत्ती थी, जिसमें बेकार का सामान भरा रहता था। वहीं पर पीली बर्र ‘ततैया’ ने अपना छत्ता बना रखा था। एक दिन मैं चारपाई पर बैठी थी और फ्रॉक पहने हुए थी, न जाने कहाँ से एक ततैया फ्रॉक में घुस गया और मेरे पेट पर डंक मार दिया। मैंने दर्द के मारे रोना शुरू कर दिया और फ्रॉक को कसकर पकड़ लिया ततैया उसमें दबकर मर गया, शोर सुनकर मेरी माँ आ गईं। मेरा रो-रोकर बुरा हाल था, मुँह लाल और पसीने से तरबतर। माँ ने चारपाई पर लिटाकर देखा तो पेट सूजकर लाल हो गया था, मरा हुआ ततैया बाहर गिर पड़ा, माँ उसका डंक बाहर निकलना चाहती थीं, पर मैं दर्द के मारे उनको हाथ भी लगाने नहीं दे रही थी। मेरी उम्र उस समय ८-९ साल की रही होगी। पता नहीं, उस सूजन पर क्या-क्या लगाया गया, पर उसके काटने का निशान आज भी मेरे पेट पर है। रमन भाई साहब ने ऐलान किया कि इस दुछत्ती से ततैये के छत्ते को तोड़कर साफ कर दिया जाएगा। सब डर गए। एक ततैये का यह अंजाम है तो पूरे छत्ते में तो न मालूम कितने ततैये होंगे, पर भाईसाहब की कही बात को कौन टाल सकता था, सो तैयारियाँ शुरू हुईं, कैंची, धागा, माचिस, चादर, बोरी (थैला) सब इकट्ठा किया गया। भाई साहब ने एक बोरे से अपने को ढक लिया और दूसरे बोरे से छत्ते को ढक दिया। ३-४ ततैये उड़ गए, पर बाकी को बोरी में बाँध दिया, एक ततैये को माचिस की डिब्बी में बंद कर उसका डंक निकालकर धागे से बाँध दिया और माचिस की डिब्बी से बाहर निकाल दिया।

ततैया हवा में उड़ने लगा, पर धागे से पैर बँधे होने के कारण आजाद नहीं था। मैं तो सारा रोमांचक दृश्य देख नहीं सकती थी, इस लिए उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘यह देख इसका डंक मैंने निकाल दिया है, इसने तुझे डंक मारा था न। तू अब इससे जितना खेलना चाहे, खेल ले।’’ मैं तो डर के मारे रोने लगी। उन्होंने मुझे धागा पकड़ा दिया, कहने लगे, ‘‘तू अब इससे अपना बदला ले ले। इसने तुझे डंक मारा, अब तू इसे मार।’’ सब भाई उसे उड़ा-उड़ाकर खुश थे, पर मैं तो सकते में थी। मेरा दुश्मन मेरे हाथ में था। भाई साहब ने मुझे अपनी चप्पल दी और कहा, ‘‘मार-मार, इसकी जान निकाल दे।’’ पर मुझसे नहीं हो सका, धागा मेरे हाथ से छूट गया और आसमान में उड़ गया। यह घटना मेरी आँखों के सामने उभरकर आ गई और मैं बचपन में पहुँच गई। गरमी की छुट्टियों में हमारा, चाचाजी का परिवार कुल मिलाकर १०-१५ बच्चे इकट्ठे होते थे।

रमन भैया हमारे लीडर। हम सब छोटे-बड़े की उम्र में १-२ वर्ष का ही अंतर था। हमारे पिताजी की बुआजी भी आई हुई थीं। वे जब सोती थीं तो उनके मुँह से खर्राटे के साथ-साथ हवा भी निकलती थी, भाई साहब खुमानी और फालसे की गुठली इकट्ठी करवा के रख लेते। बुआजी स्नान-ध्यान करके और नाश्ता करने के बाद एक घंटा विश्राम करती थीं। खूब गोरी-चिट्टी, गोल-मटोल बुआजी के सोते ही खर्राटे से उनका मुँह खुला और गुठली उनके मुँह में, हम सब दरवाजे के पीछे छुपकर तमाशा देखते। वे अपने मुँह को घुमातीं और गुठली बाहर, वे सुपारी समझकर थूक देतीं और करवट दूसरी तरफ कर लेतीं। भाई साहब ताक में रहते और जैसे ही मौका मिलता, दूसरी गुठली मुँह में। अब बुआजी ने गुठली को निकालकर देखा और जोर से डाँटा, ‘‘कौन है, यह गुठली मेरे मुँह में कैसे आई?’’ पर कोई वहाँ हो तो बोले।

उस दिन तो बाल-बाल बच गए। नंगे बदन पर पजामा पहने घूमते रहते। माँ की बहुत डाँट खाते थे। हम सब उनके पीछे-पीछे घूमते। गंदगी भी बहुत करते थे। हमारे घर में अंजीर का पेड़ था। अंजीर के पत्ते पर नाक सिनक-सिनककर इकट्ठा करते, उसपर थूक इकट्ठा करके लपेटकर बीड़ा बनाकर सिरहाने रख देते। बुआजी को पान का बड़ा शौक था, सोते-सोते हाथ लग गया तो आँखें खोलकर देखा, सोचा कि पत्ते में पान होगा, खोलकर देखने पर वहीं से शोर मचातीं, ‘देखो बहू, यह किसका करा-धरा है, आज आने दो उमा को (पिताजी का नाम श्री उमाचरण था, घर के बड़े उन्हें उमा कहकर ही बुलाते थे), पता लग जाएगा कौन है, जो यह सब करता है? आज शाम तक की बात है। माँ उनके आगे हाथ जोड़तीं, पैर पड़तीं, देखिए बुआजी, आज तो मैं भी पकड़कर ही मानूँगी। जो कुछ हुआ है, उसके लिए मैं माफी माँगती हूँ। बस उनसे आते ही मत कह दीजिएगा, आप तो उनका गुस्सा जानती ही हैं। मैं अभी सबको पूछती हूँ। हालाँकि हमारी चाचीजी को सब मालूम होता था, रमन भाई साहब उनके लाड़ले थे तथा स्वभाव से बहुत ही नरम, आज्ञाकारी, कोई काम हो, तुरंत करने को तत्पर रहते। सुंदर इतने कि साड़ी पहना दो तो कोई समझ नहीं पाए कि लड़का है या लड़की, अभी मूँछें तो आई नहीं थीं। रंग एकदम गोरा, गुलाबी होंठ, बड़ी-बड़ी काली आँखें, अंडाकार चेहरा, इकहरी कद-काठी। कुल मिलाकर संपूर्ण आकर्षक व्यक्तित्व के धनी। अभी नवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। पढ़ने में ठीक-ठाक, सेकेंड क्लास आ जाती थी। उस समय नवीं कक्षा में ही सब्जेक्ट कॉम्बिनेशन हो जाता था। भाई साहब ने जियोग्राफी, हिस्टरी के साथ आर्ट्स भी लिया था। उनकी आर्ट बहुत ही अच्छी थी। बहुत सुंदर सीनरी व आकृति बना लिया करते थे। उन्हें नाटक खेलने का शौक था। कस्बे की नाटक सोसाइटी में कॉलेज स्टूडेंट्स भी खेलने के लिए बुलाए जाते थे। आर्ट्स टीचर हमारे मकान मालिक के बेटे थे। वे भी इसमें दिलचस्पी लेते थे। भाई साहब उनके फेवरेट स्टूडेंट थे। एक बार नाटक ‘कृष्णावतार’ खेला गया। हमारे पिताजी चीफ गेस्ट थे। वहाँ पर रमन भाई साहब द्रौपदी के रोल में जब स्टेज पर आए, तो पिताजी ने उन्हें पहचान लिया। गुस्से में भरे हुए वे वहाँ से उठकर चल पड़े। आयोजक-प्रबंधक उनके पीछे-पीछे, पर पिताजी लाख मनाने पर भी नहीं रुके। घर आकर माताजी पर बरस पड़े। तुमने बिगाड़ रखा है, वह वहाँ औरत बनकर मेरे ही सामने स्टेज पर नाटक कर रहा है, शर्म नहीं आती। आज आने दो, इसका सारा ड्रामा ही निकाल दूँगा। माताजी बेचारी घबरा गईं। उन्हें क्या मालूम था, क्या हुआ है, मुझे तो कहकर गया था कि बड़े लल्ला (आर्ट्स टीचर) के साथ जा रहा हूँ, देर से आऊँगा।

नाटक समाप्त होते ही रमन भैया को यह बात पता चल गई थी। आकर चुपचाप सो गए। सुबह पिताजी ने बुलाया और कुछ कहे बिना बोले, ‘‘मुरगा बन जाओ फौरन, आधा घंटे तक सीधे मत होना।’’ उनके पास एक बेंत थी, उसे लाकर अपने पास रख लिया। अब भाई साहब का बुरा हाल। मुँह लाल हो गया था। आँखों से आँसू बह रहे थे। मैं रोने लगी। मैंने कहा, ‘‘पिताजी, भाई साहब को बहुत दर्द हो रहा है। माफ कर दीजिए।’’ वे मुझे डाँटकर बोले, ‘‘यहाँ से जाओ, वरना तुम्हें भी...’’ मैं वहाँ से भाग खड़ी हुई। माँ को बताया। उन्होंने बड़े लल्ला (आर्ट्स टीचर) को बुला भेजा, वे तुरंत आ गए। माताजी ने उन्हें बताया कि पिताजी बहुत गुस्से में हैं। टीचरजी पिताजी के पास गए और उन्हें बहुत समझाया, स्वयं भी माफी माँगी, अब आइंदा ऐसा कभी नहीं होगा। पर पूरा आधा घंटा होने के बाद ही पिताजी ने उन्हें छोड़ा। ‘‘अब कभी ऐसी हरकत की तो खाल उधेड़ दूँगा, खेलने-कूदने को मनाही नहीं है, पर जनानियोंवाली बातें मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हैं। बड़े लल्ला (आर्ट्स टीचर), आप भी इस बात का ध्यान रखना।’’ खैर, जैसे-तैसे उस दिन पिटने से बच गए।

रमन भाई साहब ने अपना ग्रैजुएशन फाइन आर्ट्स में आगरा के बलवान सिंह डिग्री कॉलेज से पूरा किया। शीघ्र ही दिल्ली में सरकारी नौकरी लग गई। भाई साहब की शादी में अड़चन आ गई, वे तो किसी से दिल लगा बैठे थे। हम वैश्य और वह माथुर लड़की, माताजी तो किसी भी तरह तैयार नहीं थीं। माथुर साहब को जब पता चला तो वे भी बंदूक निकाल लाए। हमारे पड़ोस में ही घर था। भाई साहब उनके भाई-बहनों से मिलते रहते थे और वे सब भी भाई साहब के मुरीद थे। घुमाना-फिराना, मेले में ले जाना, धीरे-धीरे भाभीजी की मम्मी भी भाई साहब से प्रभावित हो गईं। कोई भी आवश्यकता पड़ने पर भाई साहब को ही बुलातीं। कॉन्फिडेंशियल काम भी भाई साहब से करवाती थीं। उन्हें लगा था कि बेटी किसी तरह मानेगी नहीं। यहाँ हमारे भाई साहब को जिद कि शादी तो मैं माथुर साहब के घर बरात ले जाकर ही करूँगा।

इसी बीच माथुर साहब श्रीनगर चले गए, वहाँ उन्हें कोई सीनियर जॉब ऑफर हुआ और परिवार भी शिफ्ट हो गया। पता नहीं, उनके घर में क्या चलता रहा होगा।

एक वर्ष के बाद भाई साहब को माथुर साहब का पत्र मिला, जिसमें जे. ऐंड के. मिनरल्स में पर्सनल ऑफिसर की नौकरी थी, उन्होंने भाई साहब को बुलाया था। भाई साहब तो सरकारी नौकरी छोड़कर तुरंत चले गए। वहाँ एक वर्ष काम करने के बाद माथुर साहब ने शादी का ऐलान किया।

हमारे यहाँ भी सबने माताजी को समझाया कि बेटे को अपने से दूर कर दोगी, वह तो वहीं शादी करके रहेगा। माताजी को एतराज था कि मीट-मच्छी खाते हैं, उनके बरतनों का बना मैं नहीं खाऊँगी, पर सबसे बड़े भाई साहब के कहने पर अपनी स्वीकृति दे दी। और माथुर परिवार की बेटी हमारी भाभी बनकर घर में आ गईं। सभी गृह-कार्यों में निपुण, मृदु स्वभाव की भाभी ने सबका मन जीत लिया। माताजी का खूब ध्यान रखती थीं। गाने में इतनी मधुर आवाज, हम भाभीजी से खूब गाने सुनते थे। परिवार तो पूर्व पड़ोसी होने के नाते परिचित था, भाभीजी माथुर परिवार की सबसे बड़ी बेटी थीं।

अपनी पसंद की प्रेमिका से शादी के बाद एक आदर्श रिश्ता था भाभीजी और भाईसाहब का दांपत्य जीवन। गरमी में श्रीनगर और सर्दी में जम्मू राजधानी बदलती रहती थी। भाईसाहब अपने स्वभाव के अनुसार कंपनी में सब कर्मचारियों के चहेते थे। कश्मीर में गरीबी भी थी। ऐसे में उनके परिवार का ध्यान रखना, जरूरत पड़ने पर मदद करना भाई साहब का स्वभाव था। उन्होंने कश्मीर में १९६५ तथा १९७१ युद्ध की छाया भी झेली थी। कर्फ्यू लग जाता था और दूध, राशन, सब्जी की दिक्कत हो जाती थी। घर में छोटे बच्चे थे, पर भाई साहब के घर दूध की बे नागा सप्लाई होती थी। सब मुसलमान थे, पर भाई साहब के खैरख्वाह। भाई साहब का प्रमोशन बतौर सीनियर पर्सनल ऑफिसर हो गया।

दो बेटी और एक बेटे के पिता भाई साहब का व्यवहार बच्चों के साथ दोस्तों जैसा था। प्रदेश सरकार द्वारा १९७२-७३ में ही जम्मू-कश्मीर से बाहर के एंपलॉइज की छँटनी की प्लानिंग होने लगी थी। अतः भाई साहब ने भी बाहर नौकरी तलाशनी शुरू कर दी। उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में चीफ पर्सनल ऑफिसर के लिए पोस्ट निकली। भाई साहब ने तुरंत अप्लाई किया और सलेक्शन भी हो गया। भाई साहब भाभी एवं बच्चों समेत श्रीनगर से लखनऊ आ गए।

जम्मू-कश्मीर के तनावपूर्ण माहौल से लखनऊ आ जाने पर बहुत सुकून मिला। हम मूलतः उत्तर प्रदेश के रहनेवाले हैं और लखनऊ में बड़े भाई साहब भी रहते थे, इसलिए वहीं आकर रुके। बाद में कृष्णा नगर इलेक्ट्रिसिटी कॉलोनी में भाई साहब को बँगला मिल गया। सोशल लाइफ बहुत अच्छी थी। बच्चों को खेलने के लिए संगी-साथी और पार्क, भाभीजी की क्लब में सक्रियता, अच्छा-खासा ४०-५० महिलाओं का ग्रुप, डांस, म्यूजिक, कुकिंग, पेंटिंग, नाटक आदि त्योहारों व विशेष अवसरों पर एक्टिविटीज चलती रहती थी। जब मैं जाती तो मुझे भी साथ ले जाती थीं। भाई साहब का चित्रकला और एक्टिंग का शौक खूब फल-फूल रहा था। कभी बचपन में माताजी की लाल सिल्क की साड़ी, जिसमें सफेद गोटे का बॉर्डर था, छुपाकर ले गए थे और मीरा बनकर साड़ी पहनकर हाथ में सितार लिये फैशन शो में स्टेज पर निकले थे और फर्स्ट प्राइज जीतकर लाए थे। आज लखनऊ के सोसाइटी क्लब में भी फैंसी ड्रेस कंपीटीशन में गले में जनेऊ, धोती, पैरों में खड़ाऊँ, माथे पर चंदन-रोली का मछली काँटे तिलक लगाए पंडितजी के रूप में फर्स्ट प्राइज ले रहे थे।

भाभीजी, जैसा कि मैंने पहले बताया, बहुत अच्छा गाती थीं। माथुर परिवार में उनकी मम्मी व पिताजी, जिन्हें हम चाची तथा दादाजी कहकर बुलाते थे, दोनों ही बहुत अच्छा गाते थे। चाची हारमोनियम के साथ गाती थीं। बिल्कुल शमशाद बेगम जैसी आवाज थी। दादाजी भी लिटिल थिएटर गु्रप के मेंबर थे, नाटक आदि में भाग लेते थे। हम भाभीजी से ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ, मोरी अँखियाँ प्यासी रे’ फरमाइश पर बहुत सुनते थे। अपनी मधुर सुरीली आवाज में जब वे गाती थीं तो बस सुनते रहने का मन करता था।

भाभीजी हमेशा पान खाती थीं। कितनी भी दिक्कत आए, पर उनके लिए महोवा का देसी पान का बंडल भाई साहब अपने साथ लेकर आते थे, उनका कितना ध्यान रखते हैं, यह कहकर सबको हँसी आ जाती थी। भाभीजी को कभी गुस्सा आ भी जाए तो भाईसाहब की मोहक मुसकान के आगे नरम पड़ जाती थीं। मैंने कभी भी दोनों पति-पत्नी के बीच झगड़ा होना तो दूर, जोर से बोलते हुए भी नहीं सुना। दोनों एक-दूसरे के लिए बने थे। घर में शादी-ब्याह या कोई फंक्शन हो तो भाई साहब खूब रौनक लगाते थे। जहाँ नाच-गाने का प्रोग्राम हो, वहीं पहुँच जाते, किसी का दुपट्टा लेकर ओढ़ लेते और बचपन के सुने गाने ‘मेरे अँगने में तुम्हारा क्या काम है’ अथवा ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरेवाली मुनिया’ या फिर ‘झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो’ इन्हीं गानों पर कमर मटकाकर, ठुमके लगाकर नाचना शुरू कर देते थे। और तो और, अगर हिजड़े आएँ तो उनके साथ भी ठुमका लगाना शुरू कर देते। घर की छोटी-बड़ी महिलाएँ, लड़कियाँ ठहाका लगाकर हँसना शुरू करतीं, तो कभी-कभी हँस-हँसकर पेट में बल पड़ जाते, ऐसे थे हमारे रमन भइया।

भाई साहब लखनऊ में भी अपने विभाग में बहुत पॉपुलर हो गए थे। समय से बच्चों की शादी हो गई। सब खुश थे, भाई साहब रिटायर होकर साहिबाबाद आ गए थे। उन्होंने अपने पोता होने की खुशी में बड़ी दावत दी, उस दिन भाई साहब कुछ खोए-खोए से थे। हमेशा घरवालों के साथ-साथ सभी आगंतुकों का दिल खोलकर स्वागत करनेवाले भाई साहब उखड़े-उखड़े से नजर आए। न पास आकर बैठे, न बातचीत की। हम चलने लगे तो नमस्ते हुई और दूसरी ओर चले गए। न जाने क्यों बड़ा अटपटा सा लगा। कुछ दिनों बाद मेरे भतीजे का फोन आया और बोला, ‘‘बुआजी, पापा पता नहीं क्यों बहकी-बहकी सी बातें करते हैं। बार-बार घर से जाने के लिए कहते हैं। आप तो जानती हैं, मैं और पत्नी तो सुबह नौकरी पर निकल जाते हैं। मम्मी का तो आपको मालूम ही है कि चल-फिर नहीं सकतीं और बेटा अभी छोटा है। घर में सुबह से शाम तक मेड तो रहती है, पर पीछे कभी दरवाजा खोलकर निकल पड़े तो कौन ढूँढ़ेगा उन्हें।’’ सुनकर बड़ी चिंता हो गई।

मैंने भाभीजी को फोन किया तो वे भी परेशान थीं। रोने लगीं और बोलीं, ‘‘जीजी, बहुत परेशान हैं। पता नहीं, क्या हो गया है, हर समय कहते रहते हैं—घर चलो, घर जाना है। मैं तो उनके पीछे भाग भी नहीं सकती, क्या करूँ अब दरवाजे पर अंदर से ताला डलवा देती हूँ। मेरे सामने प्रश्नसूचक से खड़े हो जाते हैं। तरस भी बहुत आता है और रोना भी।’’

मैंने कहा, ‘‘भाई साहब को फोन दीजिए।’’ उन्होंने दिया, मैं बोली, ‘‘भाई साहब नमस्ते, कैसे हैं?’’ बोले नहीं, भाभीजी को फोन देते हुए बोले, ‘‘लल्ली का फोन है।’’ मैंने कहा, ‘‘भाई साहब, मैं आपसे बात करना चाहती हूँ।’’ उधर से आवाज नहीं आई, भाभीजी बोलीं, ‘‘बहनजी यही हाल है, अखबार पूरा पढ़ते हैं जोर-जोर से, जो सब सुनें। बात बिल्कुल नहीं करते। बेटे ने ऑफिस से छुट्टी ले ली। पापा को सब रिश्तेदारों के यहाँ ले गया। क्या पता, किसके यहाँ जाकर नॉर्मल हो जाएँ। पर वे वहाँ पहुँचने के पाँच मिनट बाद ही घर जाने की बात करने लगते थे।

मेरे घर आए, बच्चों ने कहा, ‘‘मामाजी, यहीं रुक जाइए, ताश खेलेंगे (ताश के शौकीन थे)। बच्चों के साथ मिलकर चीटिंग भी करते थे, तब भाभीजी कहती थीं, ‘‘क्या करते हो, बच्चों के साथ पत्ते छुपा लेते हो।’’ और खूब हँसी-मजाक, शोर-शराबा होता था। पर अब बिल्कुल भावहीन चेहरा देखकर मुझे रोना आ गया। एक दिन बहू का फोन आया, ‘‘बुआजी, पापा को डॉक्टर को दिखाया है। उनका कहना है कि पापा को अल्जाइमर की बीमारी है। इससे व्यक्ति भूल जाता है। अब तो नहाने, खाने के लिए भी कई-कई बार कहना पड़ता है। चाय प्याले में रखे-रखे ठंडी हो जाती है, पीना ही भूल जाते हैं।

मैं और मेरा छोटा भाई उनसे मिलने गए। मैंने नमस्ते की तो थोड़ा मुसकराए और छोटा टावल तह करने लगे।

छोटे भाई ने पूछा, ‘‘भाई साहब, बताइए, मेरा नाम क्या है?’’ मुसकराने लगे, उसने फिर पूछा तो बोले, ‘‘हाँ, है तो।’’

छोटा भाई, ‘‘क्या है?’’

भाई साहब, ‘‘वही है।’’

छोटा भाई, ‘‘क्या है, मेरा नाम तो बताइए?’’

भाई साहब, ‘‘हाँ, है तो’’

पर नाम उच्चारित न कर सके। चाय पीने के लिए नाश्ता रखा था, उसमें से मिठाई उठाकर खाई। भाभीजी कहने लगीं, ‘‘बहनजी, मिठाई के शौकीन हो गए हैं। देखिए, अब फिर उठा रहे हैं।’’ भाई साहब भाभीजी की तरफ कनखियों से देखते हुए झिझके और झेंपते हुए फिर मुसकराते हुए धीरे से इमरती उठाई और खा ली। भाभीजी को भी हँसी आ गई, मैंने कहा, आपसे डरते हैं। भाभीजी थोड़े रोमांटिक अंदाज में बोलीं, ‘‘अरे, इसी मुसकराहट पर तो हम मर मिटे थे।’’ फिर चलते समय तौलिया अखबार में लपेटकर चप्पल पहनी और हमसे आगे चल पड़े। दरवाजे पर पहँुचकर बेटे ने कहा, ‘‘पापा, आप कहाँ जा रहे हैं? अंदर चलिए।’’ बोले, ‘‘हमें मदिर जाना है। वहाँ बाऊजी (हमारे पिताजी, जिनका स्वर्गवास हुए अरसा बीत चुका था) आए हुए हैं, उन्हें घर लेके आना है।’’ सबने समझाया। बड़ी मुश्किल से बेटा उन्हें हाथ पकड़कर अंदर ले गया। उस दिन मन बड़ा उदास हुआ, आज भाई साहब ने कोई बात नहीं की थी।

पंद्रह दिन बाद ही बेटे का फोन आया कि ‘‘बुआजी, पापा चार रात से घर पर नहीं हैं। कहीं आपके पास तो नहीं आ गए। यहाँ तो सारा मोहल्ला छान मारा। मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा, चर्च, पुलिस, थाना, हस्पताल, स्टेशन, बस स्टैंड, टैक्सी स्टैंड, सभी जगह पता किया। रिपोर्ट भी लिखवाई है। सबको फोन कर रहे हैं, कुछ पता ही नहीं चल रहा।’’ सुनकर सन्न रह गई। क्या हुआ, कहीं गए होंगे तो वे अपने बारे में ठीक से बता भी नहीं पाएँगे। बच्चों को पता चला, यहाँ भी भाग-दौड़ मच गई। पर कहीं कोई पता नहीं चला। वहाँ पहँुची तो दबे हुए कोहराम के बीच सन्नाटा छाया हुआ था। क्या करें, कहाँ जाएँ, कौन बताएगा? भाभीजी बेचारी व्हील चेयर पर बैठी रो-रोकर आधी हुई जा रही थीं। मुझसे लिपट गईं, ‘‘बहनजी, मैं तो चल-फिर भी नहीं सकती, नहीं तो दौड़कर ले आती, कोई तो उपाय करो, मेरे बिना कहाँ जाएँगे। उन्हें मेरे पास ले आओ।’’ समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें कैसे दिलासा दें।

समय कैसे बीत जाता है। सात वर्ष के बाद सरकारी कागजों में उनको मृत घोषित कर दिया गया।

भाभीजी रोज तैयार होकर बिंदी, लिपस्टिक लगा, माँग में सिंदूर भरकर दरवाजे के पास अपनी कुरसी पर बैठी रहती थीं। दरवाजे के पार टकटकी लगाए उनकी आँखें रस्ते में देखती रहती थीं। बेबस मन, बिलखते हृदय की चीत्कार को काश! भाई साहब सुन पाते, तो एक पल में दौड़े चले आते। पर वे तो न जाने कौन से अदृश्य रास्ते पर चले गए थे।

दरवाजे पर घंटी की आवाज ने मेरी तंद्रा को तोड़ा, मेरी हिचकी बँधी हुई थी। साड़ी के पल्ले से आँसू पोंछे। अपने को संयत करते हुए धीरे से उठी तो देखा, टी.वी. अभी चल रहा था। वर्तमान में किसी प्रोग्राम में पुरानी फिल्म का गाना आ रहा था—‘जाने चले जाते हैं कहाँ? दुनिया से जानेवाले, मिलते नहीं कदमों के निशाँ...।’

२१३ गोल्फ लिंक्स, नई दिल्ली-११०००३

दूरभाष : ९८११९१०५८८

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