किऊ गार्डन के पेड़

इंग्लैंड देखने का मन था। जिस व्यक्ति ने कोई परदेस-यात्रा न की हो, उसे तो और भी अधिक दिलचस्पी होती है। यह सब तो भाई साहब की कृपा है। अगर वे विलायत न आए होते तो मेरा शौक कहाँ पूरा होना था। भारत में एक टीचर की सामर्थ्य परिवार को पालने तक ही सीमित होती है। कल रात की बात है। भाई साहब और उनका दोस्त सुभाष पब लेकर गए। मैंने पहली बार पब देखा था। ऐसी जगह बीयर पीने का मजा अलग ही होता है। नशीला माहौल, गलीचे बिछे हुए, सुंदर और कीमती फर्नीचर, खूबसूरत और मुसकराहट बाँटती बार-मेड्ज! एक पतली सी, नीली आँखों, लंबे-काले बालोंवाली और उसके सुडौल अंग। मन हो रहा था कि बीयर पीता जाऊँ और उसे देखता रहूँ। शायद मैं उसे लगातार देखे जा रहा था, इसीलिए भाई साहब ने कहा, ‘‘ज्यादा नहीं देखते।’’ मुझे लग रहा था, जैसे मैं इंद्रपुरी में बैठा हूँ। मेरे मुँह से स्वाभाविक रूप से निकला था, ‘‘चलो भाई साहब, आखिर आपके बहाने हमने भी स्वर्ग देख ही लिया।’’

‘‘कोई बात नहीं, धीरे-धीरे स्वर्ग की परतें खुलेंगी तो सबकुछ पता चल जाएगा।’’ मुझे संबोधित करते हुए सुभाष ने कहा।

भाई साहब पहले हलका सा हँसे और फिर ऊपर छत की ओर देखकर कहने लगे, ‘‘हम पहले-पहल जब आए थे तो हमें भी यही भ्रम हुआ था।’’

‘‘पर इसमें भ्रम की कौन सी बात है? आप स्वयं कहते हैं कि यह तो यहाँ किसी भी साधारण काम करनेवाले का जीवन है। काम के बाद की ऊब को बहलाने का साधन। भारत में ऐसी जगह रोज जाना तो किसी जज के भी बूते से बाहर की बात है।’’ अपने ‘खुद’ को जानने के लिए बात की तह तक जाना चाहता था। सुभाष ने जग जितने बड़े गिलास को एक ही साँस में आधा करते हुए कहा, ‘‘तेरे घूमने का समय कम है और इन बातों को समझने के लिए यहाँ लंबे अरसे की जरूरत है। जैसे गाँव के किसान के लिए गन्ने का रस, दही-लस्सी, साग और मूलियाँ आदि साधारण चीजें हैं, पर महानगर का वासी इन्हीं चीजों को तरस जाता है। ऐसे ही ये बीयर और बार महानगरों की चमक है। मजदूर को कोल्हू का बैल बनाए रखने के लिए। इन सभी बातों के पीछे साम्राज्य केहितों का हाथ होता है।’’ सुभाष ने मुझे समझाने की कोशिश की, पर बात मुझे अभी तक स्पष्ट नहीं हुई थी।

भाई साहब ने सुभाष को संबोधित करते हुए कहना शुरू किया, ‘‘वास्तव में हमें परदेस में रहना ही नहीं आया। हमारी उदासी और अकेलेपन का यही एक कारण है।’’

तब मुझे ‘उदासी और अकेलापन’ जैसे शब्द बड़े बेकार और अजीब से लगे थे। मैंने मन-ही-मन सोचा कि यह तो खाते-पीते मौत को छडि़याँ मारनेवाली बात हुई। कैसा अकेलापन और कौन सी उदासी? ऐश कर रहे हैं। रंगीन टी.वी. और नई कारें, नवाबों सा ठाठ-बाट है।

हमने गिलास खाली किए और घर लौटने को बाहर निकले। वह सुंदर सी बार-मेड अभी भी मुसकराती और मटकती हुई गिलास भरे जा रही था।

रास्ते में सुभाष ने भाई साहब को कहना शुरू किया, ‘‘तुम्हें शायद याद हो या न हो। जब गुरबख्श सिंह इंग्लैंड आया था तो वह दो दिन हमारे घर रुका था, तब उसने भी यही कहा था कि सज्जनो, भविष्य में जीना छोड़ो! न तो परदेस आया कोई लौटा है और न ही अपने भारत जाकर रहना है। बेहतर होगा कि यहाँ के लोगों से साँझ पैदा करो। यहीं पर अपने परिवार बुलाकर रहो। इतिहास साक्षी है कि परदेस आए लोग अपने देश में कम ही जाते हैं। सिर्फ उनके टेलीग्राम जाते हैं। इसलिए ‘आज’ को जीना सीखो। जो ‘आज’ नहीं जी सकता, उसे ‘कल’ भी जीने का तरीका नहीं आएगा। कल सदा आज से बेहतर ही होता है।’’

‘‘हाँ-हाँ, मुझे अच्छी तरह याद है। जब मैंने उन्हें कहा था कि आप खुद तो परदेस से लौटकर अपने देश में रह रहे हो और हमारी हिम्मत तोड़ रहे हो।’’ तब हँसते हुए उन्होंने कहा था कि ‘‘यार, सभी थोड़े न गुरबख्श बन सकते हैं।’’

‘‘भाई, बात तो एकदम सच है, पर हर किसी ने गुरबख्श सिंह थोडे़ न बन जाना है।’’ हम सभी ने एक स्वर में कहा।

पहले दो सप्ताह तो मैं बोर सा हो गया। घर में अकेला बैठा-बैठा ऊब जाता। यह भी अच्छा ही हुआ कि समय बिताने के लिए भाई साहब मुझे रोज एक भारतीय फिल्म दे जाते, जिसे मैं वीडियो पर लगाकर देख लेता था। वे दोनों जने छह बजे घर लौटते थे। बच्चे चार बजे आते थे। वे आते ही फ्रिज में कुछ ढूँढ़ने के बाद या तो टी.वी. से चिपक जाते या अपने कमरों में चले जाते। मैं उनसे घुलने-मिलने की कोशिश करता, पर वे मुझमें कोई दिलचस्पी न दिखाते। इस कारण उनके घर में रहते हुए भी मैं अकेला ही महसूस करता।

वीक एंड का मैं हमेशा ही बेसब्री से इंतजार करता रहता था, क्योंकि उस दिन भाई साहब मुझे कहीं-न-कहीं घुमाने-फिराने ले जाते थे। कभी किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर या कभी कोई नई जगह दिखाने। एक बार इतवार का दिन था। हलका सा गरम और धूपवाला महीना, चाहे जून का था, पर धूप चैत मास जैसी थी। भैया-भाभी ने मुझे समुद्र दिखाने का कार्यक्रम बना लिया। मैं बड़ा खुश था। मैंने कभी समुद्र नहीं देखा था, अगर देखा भी था तो बस फिल्मों में। उसी केआधार पर मैंने अपनी किसी कहानी में समुद्र-तट के वातावरण को चित्रित किया था। लेकिन इस इतवार मैं वास्तविक समुद्र देखने जा रहा था। हमारे साथ सुभाष और उसका परिवार भी जा रहा था। भाई साहब और सुभाष की बड़ी पक्की दोस्ती थी। दोस्ती वहीं होती है, जहाँ समान विचार और मानवीयता के गुण साँझे होते हैं। कार के एक घंटे के सफर के बाद हम समुद्र-तट पर आ पहुँचे थे। नीले पानी की लहरें किनारों पर इस तरह बढ़ती आ रही थीं, जैसे हर आनेवाले को ‘जी आया नू’ कहकर स्वागत कर रही हों। दोनों परिवारों के बच्चे फन-फेयर के खेल-तमाशों की ओर भाग गए। भाभी और सुभाष की पत्नी दोनों उनके पीछे हो लीं। बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो माँएँ ऐसा ही करती हैं। बच्चों को किसी आदमी के साथ-साथ चलने की जरूरत नहीं रहती। हम तीनों लोग ‘बीच’ पर चलने लगे। वहाँ की रौनक देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वहाँ पर गोरों का कोई त्योहार हो। भाई साहब समुद्र के पानी के गुण बताते जा रहे हैं। इस पानी में अनेक प्रकार के मिनरल होने से इसमें नहाते समय हमारा शरीर रोम-छिद्रों द्वारा इनको जज्ब कर लेता है। ‘‘आप लोग तो महीने-दो महीने में एक बार यहाँ आते रहते होंगे?’’ मैंने पूछा।

‘‘कहाँ यार! जब से हम इंग्लैंड आए हैं, पता नहीं दूसरी या शायद तीसरी बार आए हैं। इतनी फुरसत कहाँ? और दूसरा, अपने शौक की भी बात होती है।’’ सुभाष ने उत्तर दिया।

‘‘जैसे हम लोग गोरों के बीच रहकर भी इनसे सामाजिक तौर पर घुल-मिल नहीं सके, वैसे समुद्र के पास रहते हुए भी हम इससे दूर ही रहते हैं।’’ भाई साहब समुद्र को दूर तक देखते हुए बोले, जैसे उन्होंने समुद्र के दूसरे छोर का अनुमान लगा लिया हो।

पानी लहरों के रूप में किनारे पर अपने पद-चिह्न बनाता हुआ आ रहा था। रेत पर बैठे लोग सरकते हुए किनारे पर आ रहे थे। कुछ गोरी युवतियाँ ब्रा उतारकर औंधी लेटी हुई थीं। जब पानी उनके नीचे आ गया तो सीने पर तौलिया रखे वे दूर किनारे पर फिर से लेट गईं, लेकिन शरारती पानी उनसे छेड़-छाड़ करने को उनके पीछे ही चला आ रहा था। एक भारतीय औरत साड़ी समेत ही नहा रही थी, तब भी ऐसा लगा कि वह साड़ी के होते हुए भी जैसे नग्न सी हो गई थी।

‘‘यार, हम भी नहाकर देखें।’’ लगता था, जैसे कुलबीर भाई साहब के मन में भी लहरों से खेलने की उमंग अँगड़ाई ले रही थी। ‘‘रहने दो, हम लोग कभी नहाए नहीं न, इसलिए शर्म सी आती है।’’ सुभाष ने दुविधावाली बात कह दी। इतने में एक तराशे हुए बदन जैसी मेम हमारे पास से निकलती हुई आगे पानी की ओर जाने लगी। धूप और मालिश के कारण उसका मोम सा शरीर ताँबई रंग का सा लग रहा था।

‘‘यार, इन औरतों को अपना जिस्म तराशकर रखने का कितना शौक है।’’ भाई साहब उसकी देह को देखते हुए बोले, ‘‘सच में, उसकी आवश्यकता से अधिक रत्तीभर भी चर्बी नहीं थी। उधर अपनी औरतों को देखो, गुँधे हुए आटे की परात जैसे पेट। ढले हुए पुट्ठे...।’’ सुभाष ने तुलना में कहा।

‘‘अपने यहाँ आदमियों के शरीर भी गोरों के मुकाबले में यही हाल है। हम भी इसमें शामिल हैं। कपड़े उतारने में यों ही शर्म नहीं आती।’’ भाई साहब बात करते-करते जरा रुक गए, हम फिर उधर पालथी मारकर बैठे एक गुजराती से दिखनेवाले बंदे की ओर इशारा करके बोले, ‘‘ये देख, कैसे मटके सा पेट निकाले बैठा है, जैसे किसी ने अपनी जाँघों पर बड़ा तरबूज रखा हो। महात्मा बुद्ध सा नहीं लग रहा?’’

‘‘फिर हम दोनों इतने खराब तो नहीं। चल उतार कमीज।’’

‘‘चल यार, तू कब-कब कहता है।’’

उन्होंने पानी में छलाँग लगाई। मन तो मेरा भी बहुत हुआ, पर मैंने लंबी सी नेकर पहनी हुई थी, इसलिए मैं शरमाता ही रह गया। उन्होंने मुझे सागर में कूदने के लिए कई इशारे किए, पर ठंड लगने का बहाना बनाकर मैं किनारे पर ही खड़ा रहा।

लगभग आधे घंटे बाद उन्हें कुछ सर्दी सी महसूस हुई और वे बाहर निकल आए।

‘‘यार, बड़ा मजा आ गया। हमने यों ही शरमाते रहना था।’’

‘‘घटियापन का ज्यादा एहसास भी बुरा होता है। हमारी तुलना में गोरों में कौन सी खास खूबी है, सिवाय सफेद चमड़ी के?’’

टाइम देखा तो शाम के चार बज चुके थे। सुभाष को प्यास लगी और उसने बीयर पीने की इच्छा जाहिर की। लेकिन भाई साहब ने सलाह दी कि घर पहुँचकर पार्कवाले पब में बैठकर पिएँगे।

कार में आते ही मुझे उनकी बातों से ऐसा लगा कि जैसे भाई साहब की शिकायत काफी हद तक दूर हो गई हो। उनके चेहरे पर न तो किसी उदासी की परछाईं थी और न ही मानसिक अकेलेपन की। उल्टा मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था कि वे अपने जीवन-वृक्ष की जडें़ इस विदेशी धरती के माहौल में जमती हुई महसूस करने लगे हैं। उनकी रूह उनके बच्चों जैसी लग रही थी।

घर से जाते हुए हम तीनों लोग पार्कवाले क्लब में पहुँच गए। हम लोग अपने गिलास भरवाकर अभी एक टेबल पर बैठे ही थे कि शरारती से गोरे लड़कों की टोली जान-बूझकर हमारे पास आ बैठी, किसी शरारत के इरादे से। यह उनकी हरकतों से साफ लग रहा था।

थोड़ी देर बाद उनमें से एक गोरे ने हमारी ओर चेहरा घुमाया, ‘‘गैट लाइटर?’’

‘‘सॉरी, वी डोंट स्मोक।’’ सुभाष ने छोटा सा जवाब दिया।

‘‘बट यू डू ड्रिंक...।’’

फिर वे सभी जोर-जोर से ऊँचा-ऊँचा हँसने लगे।

इतने में एक लाल टी-शर्टवाला बिल्डर किस्म का गोरा जोर से सुभाष से पूछने लगा, ‘‘वट इज योर नेशनेलिटी?’’

‘‘ब्रिटिश’’, सुभाष का उत्तर संक्षिप्त था।

इस बात पर वे फिर सभी हँसने लगे।

एक शरारती सी मुसकान के साथ उस गोरे ने फिर पूछा, ‘‘आई मीन, वट कंट्री यू कम फ्रॉम?’’

‘‘चल छोड़ यार! इन्हें क्या पता नहीं है? ऐसे ही साला छेड़ने की बात करता है। चल, आज घर बैठकर पीते हैं। और थके हुए भी हैं।’’ यह कहते हुए भाई साहब खड़े हो गए, साथ में हम भी।

काउंटर के एक ओर से बाहर निकलने लगे। काले बालोंवाली बार-मेड ने मुसकराते हुए हमें ‘बाय’ कहा। यह वही गोरी थी, जिसकी मुसकराहट ने पहले ही दिन मेरा दिल लूट लिया था। पर आज मुझसे ‘बाय’ का जवाब भी न दिया गया। उसकी मुसकान मुझे बड़ी फरेबी सी लगी। मुझे ऐसा लगा कि इन मुसकानों का कोई अर्थ नहीं होता, जैसे यह केवल कोई आदत होती हो।

घर आकर बैठते ही भाई साहब ने व्हिस्की के बड़े-बड़े पैग गिलासों में डाले और पबवाली बात भाभीजी को सुनाने लगे।

‘‘मैं तो हमेशा यही कहती हूँ कि अगर पीना बड़ा जरूरी है तो घर बैठकर पियो, इन पबों-क्लबों में क्या रखा है?’’ सुनते ही भाभीजी की यह प्रतिक्रिया थी।

‘‘पर डैडी, आप तीन लोग थे। तीनों ही जवान। आप उन्हें चार लगते।’’ पप्पू बोला।

‘‘कंजर, इतना क्या कम है कि हम खुद अपने घर आ गए हैं। तुम्हें उठाकर नहीं लाना पड़ा।’’

‘‘हमने सोचा, कल तेरे चाचा को किऊ गार्डन दिखाना है। कल तक तो साबुत बचे रहें।’’ सुभाष ने भी पप्पू से मसखरी की। चाहे पहले की तुलना में मैं इंग्लैंड के बारे में काफी कुछ जान चुका था, लेकिन फिर भी आए दिन मेरे लिए कुछ-न-कुछ नई बात होती। किऊ गार्डन किस बला का नाम है? मैं यह जानने के लिए उत्सुक था।

आखिर मैंने भाई साहब से पूछ ही लिया कि किऊ गार्डन क्या चीज है?

‘‘दूसरे देशों से लाए गए फूल, पौधे, पेड़ और दूसरी वनस्पतियाँ हैं, जो इंग्लैंड के मौसम में नहीं हो सकतीं।’’

‘‘फिर उन्हें यहाँ कैसे उगाया और लगाया गया है!’’ मैं बड़ा हैरान था।

‘‘इन्होंने बहुत खर्चा करके शीशे के बड़े-बड़े कमरे बनाए हुए हैं, जहाँ धूप भी पड़ती है और सूर्य की गरमी भी। लोहे के पाइपों द्वारा भाप को अंदर भेजकर भारत के सावन-भादों जैसा मौसम बनाया जाता है। ऐसे मौसम में गन्ना, कपास, मक्की, केला तथा अन्य सैकड़ों प्रकार के पौधों को मौसम के अनुकूल रखा गया है। पवन-पानी और ऋतुओं को पौधों के अनुकूल रखने का यत्न किया जाता है। आम और जामुन के भी बहुत से पेड़ों को उनके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए उन्हें इस वातावरण में जीने को विवश किया जाता है।’’

मैंने देखा, भाई साहब को नशा हो चुका था। गिलास की व्हिस्की खत्म करते हुए कहने लगे, ‘‘भाई! मेरे और सुभाष जैसे तुझे यहाँ पर और भी बहुत से लोग मिलेंगे। हम सभी किऊ गार्डन के पेड़ हैं। हमारी जड़ें ऊपरी हैं। इस धरती के वातावरण में हमने अपनी जड़ें जमाने की बहुत कोशिश की, पर साली जम ही न सकीं। या फिर हमें जमानी ही नहीं आईं। किऊ गार्डन में लगे आम के पेड़ों का यहाँ पर अस्तित्व तो अवश्य कायम है, पर उनपर कभी भी बौर नहीं लगता। बस यहाँ पर हमारी हालत भी ऐसी ही है।’’

 एफ-१०१, राजौरी गार्डन

नई दिल्ली-११००२७

दूरभाष : ९८९९१६६९२९

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