ढोंगी बाबाओं को कोई बढ़ावा न दे

इस समय देश के सामने अनेक समस्याएँ और कठिनाइयाँ हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक है। कुछ घटनाएँ हुई हैं, और जब कोई घटना होती है, तब खूब चर्चा भी होती है, कार्यक्रम बनते हैं, घोषणाएँ होती हैं, किंतु धीरे-धीरे हम भूलने लगते हैं, फिर जब वैसी घटना घटती है, तो उसी प्रकार हाय-तौबा मचती है। कहा जाता है, जो दोषी है, वह बचेगा नहीं। पर फिर वही मानसिक शिथिलता हावी हो जाती है, न किसी को दंड और न किसी प्रकार का सही माने में प्रयास कि जिससे आगे वह घटना दोहराई न जाए। सच्चा सौदा और गुरुमीत सिंह की बात को लें। कोई इतना बड़ा व्यक्तिगत साम्राज्य बना ले और अंदर क्या हो रहा है, इसका राज्य-प्रशासन को कुछ पता न लगे, यह समझ के बाहर है। अखबारों में जो कुछ उसकेविरुद्ध छपता है, उसको कुछ महत्त्व देने की जरूरत ही नहीं समझी जाती है। अगर कुछ अपराध पुलिस में दर्ज हो जाते हैं तो उनकी शीघ्रता तथा गंभीरता से न तफतीश, यानी जाँच, और फिर अदालत में भी मामला जल्दी लिया जाए, उसके लिए कोशिश नहीं हो पाती। यही नहीं, ऐसे लोग महिमामंडित किए जाते हैं, जबकि आशाराम जैसों का मामला सामने है। दूसरे गुरुमीत सिंह के तरह-तरह के नाटकीय व्यवहार-प्रदर्शन को शायद भगवान् की लीला माना जाता है, केवल भोली-भाली जनता ही नहीं, वरन् बडे़-बडे़ मंत्रियों का उनके आयोजनों में भाग लेना व इस तरह की गतिविधियों को आर्थिक सहायता पहुँचाना तथा उनके भक्तों में शुमार होना आम बात है। बड़ी-बड़ी रकम सरकारी खजाने से तथाकथित विवेक से खर्च करने के लिए जो मंत्रियों को मिलती है, जिसे डिस्क्रेशनरी ग्रांट कहा जाता है, न उसके वितरण में विवेक दिखता है और न लेशमात्र बुद्धि। अब सच्चा सौदा डेरा के और वहाँ होनेवाली गलत गतिविधियों के बारे में तरह-तरह की खबरें आ रही हैं, वह भी जब उच्च न्यायालय ने आदेश दिए हैं और एक सेवानिवृत्त जज को इसके लिए नियुक्त किया। हम नहीं कहते हैं कि इसके लिए वर्तमान हरियाणा सरकार ही जिम्मेदार है। दोषी पिछली सरकारें भी हैं, चाहे वे कांग्रेस की रही हों या अन्य दलों कीं। जो सरकार अब सत्ता में है, उसके ऊपर तो जनता उँगली उठाएगी ही, उससे वह बच नहीं सकती और यह स्पष्ट हो जाता है कि पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय की समय-समय पर की गई टिप्पणियों और आदेशों से। आखिर इंटेलीजेंस तंत्र, राज्य की खुफिया पुलिस क्या करती है? उसने डेरा में होनेवाली गतिविधियों के विषय में अपने कान, आँख और मुँह क्यों बंद कर रखे थे, जो वर्षों से चालू थीं। क्या कभी किसी पुलिस अधिकारी ने सरकार को उस संबंध में कोई शिकायत या सूचना भजी? और नहीं भेजी तो क्यों नहीं? यदि भेजी, तो सरकार ने उस पर क्या आदेश दिए, यह तो जनता जानना चाहेगी। रामपाल के डेरे के हादसे के बाद भी न पुलिस चौकन्नी हुई और न सरकार ही चेती। क्या कहा जाए—यह गफलत है या मिलीभगत? हम सुशासन और पारदर्शिता की डींग हाँकते हैं, पर कथनी और करनी में कितना फर्क, कितना फासला है। रामपाल की गिरफ्तारी के समय जो तथ्य और तसवीरें सामने आ रही थीं, उससे ऐसा लगता था कि मानो अंग्रेजों के जमाने के पहले के दो रजवाड़ों की मुठभेड़ का माहौल हो। एक और विचित्र बात कि हरियाणा पुलिस के जो सिपाही डेरा में गुरमीत की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए रखे गए, उनको दस-बारह साल तक वहीं रहने दिया गया, यह पुलिस प्रशासन का काम करने का कौन सा तरीका है। यही वजह है कि उनकी स्वामिभक्ति राज्य की ओर न रहकर गुरमीत तक ही सीमित हो गई। इसी कारण हनीप्रीत न केवल उपद्रव कराने में, जिसमें तीस से अधिक व्यक्ति हताहत हुए, बल्कि सजा के बाद गुरमीत को छुड़ाने के षड्यंत्र के लिए साहस कर सकी। उसकी गिरफ्तारी में भी इतना समय लग गया। बहुत से और मुद्दे हैं, जिनको सामने लाने की जरूरत है, पर यहाँ संभव नहीं है। जाटों के आंदोलन के बाद प्रकाश सिंह ने वहाँ की पुलिस और सिविल अधिकारियों की अक्षमता तथा गलतियों के विषय में जो रिपोर्ट दी थी, उसको ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, उसमें सुधार करने की कोशिश नहीं की गई। तथाकथित डेरों को वोटों की राजनीति में डालना खतरे से खाली नहीं है। मथुरा में जो हादसा अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार के समय में हुआ, उससे यह साफ है। वैसे तो आज जो कानून हैं, उनकी गिरफ्त ही काफी है, इन डेरों के तथाकथित गुरुओं, महात्माओं और संतों के लिए, पर यदि राज्य सरकारें समझती हैं कि उनको नियंत्रित करने के लिए और नए कानूनों की आवश्यकता है, तो वे बनाए जाएँ। सही बात तो यह है कि यह तो एक बहाना है। सरकारों को जब तक स्वयं कानून के राज्य अथवा जिसे रूल ऑफ लॉ कहा जाता है, में पक्का-अडिग विश्वास नहीं होता, तब तक हालात में स्थायी सुधार नहीं हो सकता है। जब गुरमीत के डेरे के मामले ने जोर पकड़ा था, तब यह समझ में नहीं आ रहा था कि वहाँ की अपनी कोई सरकार है या पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ही सरकार चला रहा है। राज्य सरकारों को इस प्रकार के संगठनों पर निगरानी तथा उनकी गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। किसी में संवैधानिक सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत नहीं होनी चाहिए, एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती हैं।

पिछले दिनों समाचार-पत्रों में कुछ हरयारम विषयक समाचार देखने को मिले, जो प्रशासन की सूझबूझ और क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, जहाँ तक मुख्यमंत्री की बैठकों का सवाल है, इसके लिए समय इस प्रकार निर्धारित होना चाहिए कि यदि डॉक्टरों की बैठक में मुख्यमंत्री आ रहे हैं, उनसे बात होती है, तो वह अच्छी तरह होनी चाहिए। उनके मन में यह न रहे कि मुख्यमंत्री ने बैठक बुलाई हमसे बातचीत करने के लिए, पर बीच में ही सबको बिना सुने चले गए। जनता-दरबार या जनदर्शन के अवसर पर तो और सावधानी बरतने की आवश्यकता है। वहाँ भी यदि लोग कहें, हम दूर-दूर से अपने अभाव, अभियोग मुख्यमंत्री के सामने रखने आए थे, पर वह बीच में ही उठकर चले गए तो ऐसी घटनाओं का प्रभाव अच्छा नहीं होता है। हरियाणा सरकार और उसके मुख्यमंत्री जो अच्छे कार्य कर रहे हैं, वह तो जनसाधारण भूल जाता है, वे गौण हो जाते हैं। प्रशासन के विरुद्ध उनकी संवेदनहीनता की शिकायत शुरू हो जाती है। ऐसे वातावरण में सरकार के अच्छे कामों का महत्त्व समाप्त हो जाता है। इसीलिए जनसंपर्क या पब्लिक रिलेशंस का कार्य रुटीन नहीं है, इसे बहुत ही सावधानी से करना होता है, क्योंकि उसके बहुत से मनोवैज्ञानिक पहलू भी हैं।

सच्चा सौदा जैसे डेरे और वहाँ के तथाकथित गुरु या संत क्यों ऐसे प्रभावशाली हो जाते हैं, क्यों जनता को वे आकर्षित कर लेते हैं? यह एक प्रश्न है, जिसका उत्तर समाज को ढूँढ़ना होगा। क्या कारण है कि लोगों को वे अपनी ओर खींचने में सफल होते हैं और लोग अंधविश्वास में अपना धन, मन, सब उनके हवाले कर० देते हैं। मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के वेत्ताओं की इस विषय में क्या राय है, उनके क्या निष्कर्ष हैं, वे विचारणीय हैं। आज समाज बिखर रहा है। गाँवों में भी पड़ोसियों में वह अपनापन नहीं रहा, जो पहले दिखाई देता था। संयुक्त परिवार का निरंतर विघटन हो रहा है। अब हर एक को केवल अपने बीवी-बच्चों की ही चिंता है। संयुक्त परिवार में जो सहिष्णुता, सहानुभूति और सहनशक्ति दिखती थी, एक-दूसरे के कष्ट में सहभागी होने की, जो भावना लोगों के दिलों में थी, वह अब लुप्त होती जा रही है। एक मनोवैज्ञानिक की पुस्तक का नाम है ‘लोनली क्राउड’ यानी अकेली भीड़। भीड़ में भी मनुष्य अपने को अकेला महसूस करता है। एक ‘एलिएवेशन’ (Alieation), अलग-थलग होने की भावना से मनुष्य अपने को दबा हुआ पाता है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसकी कोई-न-कोई समस्या न हो। वह उसे किसी से शेयर करना चाहता है, व्यक्तिगत रूप से बताना चाहता है, ताकि उसे कुछ राहत महसूस हो सके। हर कोई अपनी समस्याओं के लिए सहारा ढूँढ़ता है, पर उसे सहारा नहीं मिलता। वह स्वयं को एक प्रकार के खालीपन से ग्रस्त पाता है। बहुतों की आस्था अपने धर्म में है, उसके किसी-न-किसी निराकार अथवा साकार रूप में वे अपने को आश्वस्त महसूस करते हैं। पहले लोग चौपाल पर बैठकर भजन गाते, रामायण पढ़ते और अपनेपन का आभास पाते। जीवन के खालीपन को भरने के लिए लोग खोज में रहते हैं। सच्चा सौदा डेरा आदि के अनुयायियों को देखें तो उनमें निम्न-मध्यवर्गीय या निम्नवर्ग के लोग अधिक हैं। बहुत से पढे़-लिखे भी हैं, किंतु असुरक्षा की भावना अथवा मानसिक तनाव से वे अपने विवेक को गिरवी रख देते हैं। ऐसे लोग बहुत से अच्छे संस्थान, जैसे चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, रामतीर्थ से अपने को अलग महसूस करते हैं। गुरमीत, आशाराम जैसे ‘शोमैन’ को देखते हैं तो उनका मनोरंजन भी होता है, उनकी बातों और कार्यों में वे अपनापन महसूस करते हैं। उनके प्रति आकर्षित होते हैं और उनके नाटकीय कृत्यों, नाचने-गाने आदि प्रभावित करते हैं। धीरे-धीरे उनका ब्रेन वॉश हो जाता है, सोचने की शक्ति का हृस होता जाता है और वे अंधभक्त होकर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। ऐसे बहुरुपियों में वे भगवान् को देखने लगते हैं और उनकी सोच बन जाती है, जो वह कहें, वही करो, वही अटल सत्य है। ऐसे लोग अंधभक्त बन जाते हैं। वे सोचते हैं कि जो अच्छे संस्थान हैं, वे ‘इलाइटिस्ट’ हैं, संभ्रांत-आभिजात्य वर्ग के लिए हैं, साधारण लोगों के लिए नहीं। इस दिशा में आवश्यक प्रयास होने चाहिए, जैसे भक्तिकाल में हुए थे। सनातन सभा, आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन आदि-आदि के प्रचारक गाँवों और छोटे कस्बों में पहुँचें तथा सब वर्गों से संपर्क स्थापित करें। किसी समय प्रचार में आर्यसमाज के प्रचारक और भजनीक बहुत सक्रिय थे। शंकराचार्यजी के द्वारा स्थापित पीठों के अलावा भी देश में अनेक शंकराचार्य हो गए हैं। उनके पास हर प्रकार के साधन हैं, ऐसे लोगों को जनता-जनार्दन के बीच आना चाहिए, ताकि सुविचार और सद्व्यवहार को बल मिले। श्री श्री रविशंकर को, जिनके पास न धन की कमी है और न अनुयायियों की, उन्हें आगे आना चाहिए इन वर्गों से संपर्क कर इनका मार्गदर्शन करने के लिए। वैश्विक सांस्कृतिक कार्यक्रम व्यर्थ हैं, वह कुछ क्षणों का दिखावा भर है, उनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं होता। जनमानस को सही राह दिखाकर ही वे अपने संस्थान की सार्थकता सिद्ध कर सकते हैं। अब समय आ गया है कि हमारे भक्तिकाल के संतों-महात्माओं की तरह गाँव-गाँव में ज्ञान की अलख लगाई जाए, ताकि सामाजिक सौष्ठव स्थापित हो सके, अन्य अविश्वास दूर हो, और सब वर्गों में अपनत्व की भावना पनप सके एवं उनको सही आचरण के लिए उचित व कल्याणकारी मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। इससे पूजा, अर्चना आदि की सही व्यवस्था की जानकारी भी जनता को प्राप्त होगी तथा अंधविश्वासों, गलत रीति-रिवाजों से भी बचाव हो सकेगा। आज आलोचना-प्रत्यालोचना का समय नहीं है, बल्कि सकारात्मक विचारों और आदर्शों को अपनाने की आवश्यकता है, ताकि भोली-भाली जनता इन भेडि़यों केरूप में छुपे अपराधी तत्त्वों के पंजों से बची रहे। एक नई सामाजिक क्रांति या सामाजिक नवजागरण की अनिवार्यता है।

महिला व बालकों में कुपोषण

महिलाओं और बालक-बालिकाओं के देश में कुपोषण के बारे में समय-समय पर हम लिखते रहे हैं। कैरो में जो मिलेनियम लक्ष्य निर्धारित हुए थे, जिसमें भारत की भागेदारी भी हम प्राप्त नहीं कर सके। एक और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में नए लक्ष्य निर्धारित हुए थे, उनकी प्राप्ति के लिए हमें विशेष प्रयत्न करने होंगे। इसमें राज्यों की जिम्मेदारी बहुत अधिक है। देश में भुखमरी की समस्या बहुत व्यापक और कठिन है। यदि हम महिलाओं और बालक-बालिकाओं के कुपोषण को दूर कर सकते हैं, तो वास्तव में हम देश का निर्माण कर सकते हैं। महिलाओं के कुपोषण के कारण पैदा होनेवाली संतान को भी आवश्यक पौष्टिक तत्त्व नहीं मिलते हैं। संतानें कमजोर पैदा होती हैं, बीमारियों से लड़ने की क्षमता नहीं रहती है। अभी भी बच्चों और महिलाओं की मृत्यु-दर भी खेदजनक है। अनुसूचित जनजातियों में यह समस्या काफी भयंकर है। प्रधानमंत्री के विकास का यह कार्यक्रम बहुत महत्त्वपूर्ण भाग है। देश में २१६ से २५० जिलों में अनावृष्टि अथवा कम और असामयिक वर्षा के कारण दुर्भिक्ष की आशंका है। यह देखकर संतोष हुआ कि उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने जिला अधिकारियों को आदेश दिए हैं कि संभावित अकाल या कमी की स्थिति का मुकाबला करने केलिए अभी से पूरी तैयारी करें। दुर्भिक्षों का इतिहास बताता है कि सबसे अधिक अकाल के शिकार महिलाएँ और बच्चे होते हैं। विश्वपटल पर हम एक शक्तिशाली आर्थिक दंश के रूप में जब उभर रहे हैं, यह हमारे लिए एक कलंक की बात है कि कोई भी वर्ग भुखमरी का शिकार है। विशेष चिंता का कारण यह भी है कि अभी जो नई वैश्विक हंगर रिपोर्ट विश्व में भुखमरी के संबंध में आई है, उसकी सूचिका के अनुसार २०१४ में भारत ५५वें नंबर पर था, किंतु २०१७ में वह गिरकर सौवें स्थान पर पहुँच गया है, यानी भूख निवारण की जगह स्थिति और खराब हो गई है।

इसी से मिला-जुला प्रश्न है महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति। उत्तर प्रदेश में बच्चों की मौत की खबरें मीडिया में पिछले दिनों बड़ी सुर्खी में रहीं। यह समस्या दूसरे अन्य राज्यों की भी है, और लंबे अरसे से चली आ रही है। हादसा होता है, हो-हल्ला मचता है, टेलीविजन पर बहसें होती हैं और फिर हम भूल जाते हैं। लंबे अरसे की योजना की बात वर्षों से होती रही है, पर स्थिति वहीं की वहीं। यही नहीं, उड़ीसा, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के समाचार टी.वी. पर दिखाए जा रहे हैं कि मृतकों के पास अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था नहीं है। बिना साधन के घरवाले मृतकों को अस्पताल से घसीटकर ले जाते टी.वी. पर दिखाई देते हैं। यह बहुत शर्मनाक है। केवल आश्वासन जाँच का होता है कि कौन दोषी है, पर स्थिति में सुधार नहीं होता है। कागज के ऊपर सब व्यवस्था ठीक है। इसका कारण यही है कि निगरानी नहीं होती है, प्रशासन में शिथिलता है। यही नहीं, हम जनता की भागीदारी की बात करते हैं, पर उनको विश्वास में नहीं लेते हैं। आँकडे़ देकर हम विस्तार में नहीं जाना चाहते हैं, क्योंकि समस्या सामने खड़ी है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

स्वच्छ भारत मिशन

स्वच्छ भारत का एक महत् कार्यक्रम प्रधानमंत्री ने प्रारंभ किया है। पूरा विश्व प्रशंसा कर रहा है। नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा कि चाहे हजारों गांधी आएँ और लाखों मोदी, पर यह अभियान तभी पूरा होगा जब इसको प्रत्येक नागरिक दिल से अपनाए। म्यूनिसपैलिटी और कॉरपोरेशनों की इसमें अहम भूमिका है। गांधी जयंती के शोर-शराबे और जलसों के बाद आप दिल्ली को देखें, नेशनल कैपिटल रीजन (एनसी आर) को  देखें, जगह-जगह कूडे़ और गंदगी के अंबार लगे हैं। अन्य शहरों का भी यही हाल है। दिल्ली चार कॉरपोरेशनों में बँटी है, पर कहीं सक्रियता दिखाई नहीं देती है स्वच्छता अभियान में। सड़कों के गड्ढों का भी यही हाल है। सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण हो रहा है, न दिल्ली सरकार और न कॉरपोरेशन कोई काररवाई कर रहे हैं। बाद को माँग होती है कि अनधिकृत कॉलोनियों को रेगुलराइज किया जाए, नियमित माना जाए। हाथ से गंदगी को साफ करना कानून मना है, पर ऐसा अभी भी चलता आ रहा है। दिल्ली में दस सफाई कर्मचारियों की मौत हो जाने के बाद सरकार के कान पर जूँ रेंगी है। ये हालात तथाकथित स्थानों, स्वायत्त संस्थाओं के हैं। भ्रष्टाचार का बोलबाला है। न किसी प्रकार की निगरानी और न किसी का दायित्व-बोध। मुंबई का कॉरपोरेशन देश की शान रहा है। सर फीरोजशाह मेहता तथा अन्य कई कॉरपोरेशन अध्यक्ष ब्रिटिश नौकरशाही से टक्कर लेने में नहीं हिचकिचाते थे, जहाँ जनहित का प्रश्न होता था। पिछले दिनों में मुंबई में बरसात में गड्ढों के कारण बहुत से लोग सड़क चलते दुर्घटनाओं में फँस गए। पार होल्स के कारण कई लोगों की मृत्यु हो गई। मुंबई की प्रबुद्ध जनता ने तरह-तरह केगीत बनाए, ताकि कॉरपोरेशन को कुछ शर्म आए, पर वहाँ शर्म-हया का सवाल ही नहीं। फिर वही—न कुछ दायित्व-बोध, न खेद प्रकाश।

किसानों की समस्याएँ

खेती के संकट के विषय में हम समय समय पर चर्चा करते रहे हैं। किसानों की आत्महत्याएँ काफी समय से हो रही हैं। इसकी रोकथाम की कोई योजना जाँच-पड़ताल के बाद अभी तक नहीं बन सकी है। जैसा हम कह चुके हैं, करीब २१६-२५० जिले देश में अकाल की चपेट में आ सकते हैं। संकट और गंभीर हो सकता है। गाँवों की ओर दीर्घगामी दृष्टि से जाना होगा। प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री परामर्शदात्री परिषद् की पुनः स्थापना की है, जो अन्य आर्थिक समस्याओं के साथ खेती के संकट पर भी अपनी राय देगी। नीति आयोग को भी इस पर विचार करना है। किसान कर्जों की माफी चाहता है, पर वह स्थायी हल नहीं है। उससे बैंकिंग व्यवस्था के कमजोर होने का डर है, और इससे उन्हें आदत पड़ सकती है कि सरकारी कर्जा तो कभी न कभी माफ हो ही जाएगा। लेकिन जरूरी है कि जिन राज्यों ने कर्जों की माफी केआश्वसन दिए हैं, उनको उचित ढंग से वादे को पूरा करना चाहिए। मुख्य प्रश्न यह है कि कृषि को कैसे नया रूप दिया जा सके, ताकि वह किसान के लिए लाभकारी हो। उसे अपनी मेहनत और खर्चे का उचित मूल्य प्राप्त हो सके। यदि गाँवों में सुविधाएँ बढ़ाने के साथ-साथ यह हो सके तो कृषि उद्योग का आकर्षण बना रह सकता है। समाचार है कि २० राज्यों के करीब १८० किसान संगठन २० नवंबर को दिल्ली में प्रदर्शन के लिए और अपनी माँगें रखने के लिए आ रहे हैं। कानून व्यवस्था की समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं। राजनैतिक फायदा उठाने की कोशिश उभय पक्ष करेंगे ही। सरकार को अपनी स्टे्रटेजी बनानी होगी, ताकि कृषि संकट की समस्या के समाधान की दिशा में प्रगति होती दिखाई दे।

विश्वविद्यालय आंदोलन

पिछले दिनों बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक महिला विद्यार्थी के साथ विद्यालय के प्रांगण में छेड़छाड़, सुरक्षाकर्मियों की निष्क्रियता और उच्च अधिकारियों की संवेदनशीलता तथा कल्पनाशीलता का अभाव देखने को मिला। यह उससे पूछना कि आप रात को क्या कर रही थीं, एक अनुचित प्रश्न था। यह अभी भी पुरुष के स्वामित्व की प्रवृत्ति का परिचायक है। कुलपति महोदय अब लंबी छुट्टी पर चले गए हैं, और उनका कार्यकाल भी नवंबर के अंत में समाप्त हो रहा है। उन्होंने भी विद्यार्थियों से बातचीत में सूझबूझ और समस्या के मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कोई सहानुभूति नही प्रदर्शित की। उनके व्यवहार और बातचीत से एक बात साफ होती है कि विश्वविद्यालयों के कुलपति नियुक्त करते समय उनकी क्षमता की ओर विशेष ध्यान देना पड़ेगा। महिलाओं के विरोध प्रदर्शन पर लाठीचार्ज अनावश्यक था। उपकुलपति और विश्वविद्यालय के अधिकारी विद्यार्थियों के रोष को तुरंत शांत कर सकते थे। सहानुभूति से कार्य करने से विद्यार्थियों में अपना बुरा-भला समझने की शक्ति है। महिला विद्यार्थियों की शिकायतों और माँगों को आज केसमय हलके में नहीं लिया जा सकता है। उनका अपना व्यक्तित्व है और आज की दुनिया में उनका अपना सोचने का ढंग है। नियम लचीले और आज की परिस्थितियों व वैचारिक क्षितिज को ध्यान में रखते हुए होने चाहिए। कुलपति का कहना कि आंदोलन में बाहरी असामाजिक तत्त्वों का हाथ था, पूरी तरह सही नहीं है। कोई भी आंदोलन हो, असामाजिक तत्त्व तो फायदा उठाने की कोशिश करते ही हैं, यह उन्हें समझना चाहिए। विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था विश्वविद्यालय परिसर में होनी चाहिए और विद्यार्थियों से, विशेषतया महिला विद्यार्थियों से  मंत्रणा कर, बातचीत कर पूरी व्यवस्था को अंजाम देना चाहिए। आशा है कि नई प्राक्टर, जो महिला प्रोफेसर हैं, विश्वविद्यालय में उचित वातावरण के निर्माण में सफल होंगी। जिला प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों को उनका पूरा सहयोग देना चाहिए। हर क्षेत्र में महिलाओं की प्रशंसनीय उपलब्धियाँ हैं। आज हमारी रक्षामंत्री एक महिला हैं। विदेश मंत्री भी एक महिला हैं। दोनों पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि महिलाएँ अब हर मायने में बराबरी का दर्जा चाहती हैं, जिसके वे योग्य हैं, और जिसका संविधान के अंतर्गत उन्हें अधिकार प्राप्त है।

नेताओं का बड़बोलापन

एक और समस्या देश को बहुत नुकसान पहुँचा रही है, और वह है हमारे कुछ राजनेताओं का बड़बोलापन तथा व्यर्थ में विवाद खड़े करना। यह हमारे तथाकथित गौरक्षकों के विषय में देखा गया है। प्रधानमंत्री ने कई बार इस मामले में आगाह किया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रतारणा की है। यदि किसी को शक है कि गौरक्षा का वहाँ जो कानून है, उसका उल्लंघन हो रहा है तो वे पुलिस से शिकायत करें, न कि स्वयं मारपीट करने लगें। कोई भी नागरिक कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता है। किंतु अभी ये घटनाएँ बंद नहीं हुई हैं। गौरक्षा के नाम के व्यर्थ मारपीट के समाचार आ रहे हैं। इसी प्रकार दलित समुदाय के लोगों पर भी उत्पीड़न की घटनाएँ सामने आ रही हैं। राजनेताओं और पूरे प्रशासन को सख्ती के साथ इन घटनाओं को रोकना होगा, किसी प्रकार की कोताही समाज के लिए घातक है। प्रधानमंत्री की चेतावनी और कानून तथा संविधान की हम अवहेलना नहीं कर सकते, और न किसी और को भी करने देनी चाहिए। राज्य सरकार को सतर्कता एवं इच्छाशक्ति दिखलानी चाहिए। अब एक उत्तर प्रदेश के एक विधायक ने टीवी पर ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर एक धब्बा और कलंक कहा है। इस छपास और दिखास की प्रवृत्ति पर लगाम अत्यंत आवश्यक है। उ.प्र. सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह एक दर्शनीय स्थल है और उसके रखरखाव और आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने करोड़ों का प्रावधान किया है। विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में उसको देखने आते हैं। आगरा की आर्थिक विकास में ताज का बड़ा सहयोग है। भारतीय संस्कृति का आधार समन्वय है। केंद्रीय संस्कृति राज्य मंत्री महेश शर्मा को कहना पड़ा कि ताज दुनिया के सात अजूबों में है। दुनिया के हर भाग से सैलानी उसे देखने आते हैं और देश के पर्यटन को उससे बढ़ावा मिलता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने भी दोहराया कि ताज हमारी पुरानी धरोहर का एक अंग है। फिर भी आजम खाँ को कहने का मौका मिल गया कि राष्ट्रपति निवास भी कलंक है। उन जैसे लोग तो ताक में रहते हैं कि किस प्रकार भ्रम फैलाया जाए और देश में विवाद बढे़। इसलिए सावधानी से कुछ कहना जरूरी है।

दीपावली में हम समृद्धि और शांति के लिए प्रार्थना करते हैं और आशावान रहते हैं। हम आशावादी हैं और विश्वास है कि देश की सरकार और जनता उन समस्याओं तथा अन्य कठिनाइयों के निराकरण के लिए सक्षम है। हमारी चर्चा में वैराग्य नहीं है, हताशा नहीं है, न कुछ नकारात्मक है। समय-समय पर कुछ बातों की ओर एक बार ध्यान दिलाना आवश्यक हो जाता है, ताकि गफलत का वातावरण न बने। हनुमानजी को जामवंत ने उनकी शक्ति को स्मरण कराया। जामवंत का वह छोटा सा कार्य कितना फलवती हुआ। निष्क्रियता और अकर्मण्यता का प्रशासन और राजनीति में कोई स्थान नहीं है। देश की इन समस्याओं के निराकरण में राज्य सरकारों की प्रमुख भूमिका है, उनका दायित्व है। कॉआपरेटिव फ्रेडरलॉजी की अवधारणा तभी साकार और सार्थक होगी। ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र भारत जैसे बहुलतावादी और समन्वयवादी देश के लिए रामबाण है। चरैवेति-चरैवेति आज हमारा पथ है, पाथेय भी है, लक्ष्य भी है और आदर्श भी है, यह हमें सदैव स्मरण रखना है।

‘साहित्य अमृत’ के संपादक के दायित्व की दृष्टि से नवंबर अंक के साथ मेरे दस वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। सुधी पाठकों और विद्वान् लेखकों का सहयोग और समर्थन ही हमारा संबल रहा है। अनेकानेक धन्यवाद!

(त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी)

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