हजार हाथोंवाला

हजार हाथोंवाला

इस बार मैंने सोच रखा था कि पूरी छुट्टी नानी के घर मौज-मस्ती में बिताऊँगा, पर किसमत की ऐसी मार कि वहाँ जाते ही बीमार पड़ गया। बीमार भी ऐसा कि पूरा महीना बिस्तर पर गुजरा। हकीम साहब ने बताया कि मियादी बुखार है। हकीम साहब, यानी हमारे नाना। हालाँकि उनका नाम मौलवी हबीबुर्रहमान था, पर गाँव-जवार के लोग उन्हें हकीम साहब ही कहा करते थे। और यह नाम ऐसा चल पड़ा था कि वे हम लोगों के लिए भी हकीम साहब ही हो गए थे।

हकीमी उनका पेशा नहीं था, यह काम वे शौकिया ही करते थे। शौक भी ऐसा कि किसी की बीमारी सुन लें तो फिर रात-दिन की परवाह नहीं करते थे। जड़ी-बूटियाँ तलाशने, उनकी कुटाई-पिसाई करने और दवाएँ बनाने में दिन के दिन लग जाते, रुपए खर्च होते; पर मजाल कि किसी से एक पैसा भी ले लें। हालाँकि लोग ठीक हो जाते तो बड़ी-बड़ी सौगातें लेकर आते, पर नाना मोहब्बत के साथ उन्हें मना कर देते।

नाना ने मेरी नब्ज टटोलकर स्पष्ट कर दिया कि मियादी बुखार है, पंद्रह-बीस दिनों से पहले नहीं जाएगा। मेरी सेहत तो वैसे भी माशाअल्लाह थी, बुखार ने चढ़ाई की तो सीधे बिस्तर पर आ गया।

मेरी चारपाई अम्मी के पास जनानखाने में लगा दी गई। मैं दिन भर वहीं पड़ा रहता। मामियाँ अफसोस जताते हुए कहतीं, ‘‘कैसा जुल्म हुआ है मासूम पर। कहाँ तो एक पल घर को कदम न टिकते थे और कहाँ बेचारा बेबस पड़ा हुआ है।’’

बात सही थी। मेरा पूरा दिन भाग-दौड़ और शैतानियों में बीतता था। इधर से उधर, उधर से इधर। बेमकसद की उछल-कूद और ऊधमबाजी। डाँट पड़ी तो मासूम बन गए और नजरें ओट हुईं तो फिर वही धमाचौकड़ी शुरू।

अब तो दिन भर बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं ऊब जाता। लगता, दुनिया से कटा हुआ हूँ। जनानखाने में घर के मर्द बेमौके कम ही आया करते थे। आते भी तो खाँस-खँखारकर। नाना तो अंदर बहुत कम ही आते थे। जरूरत हुई तो आए और फौरन वापस हो लिये, पर जब नाना अंदर आते तो हलचल मच जाती। अलगनियों से कपड़े हटा लिये जाते। कूड़े की टोकरी पेड़ की ओट कर दी जाती। जहाँ कहीं भी फूल-पत्तियाँ बिखरी होतीं, फटाफट उनपर झाड़ू चलने लगती। सबके सिर पर दुपट्टे खिंच जाते। पूरा वातावरण एक अनोखे अनुशासन में बँध जाता।

बहुएँ ओट लेकर नानी से सलाम पहुँचाने का इशारा करतीं। नानी हँसकर कहतीं, ‘‘हकीम साहब, इन लोगों की भी सुन लीजिए। बड़ी, मँझली, छोटी सब आपको सलाम कह रही हैं।’’

‘‘खुश रहें, जीती रहें, सलामत रहें...’’ और नाना की आँखें भीग जातीं। वे थोड़ी देर बैठते, सबका हाल-चाल पूछते और नानी के हाथ से एक गिलास पानी पीकर वापस चले जाते।

अंदर जनानखाने में पड़ा-पड़ा मैं ऊबता रहता। यह तो भला हो शद्दू का कि वह शाम को पास बैठकर दिन भर की कहानी सुना जाता। शद्दू मेरा ममेरा भाई था। हालाँकि महमूद, सिराज और अच्छन से भी मेरी खूब पटती थी, पर अब वे बड़े हो गए थे और इधर कम आते थे। शद्दू छोटा था, इसलिए दिन भर इधर-से-उधर करता रहता। नानी का तो वह सबसे दुलारा था।

एक दिन ढलती दोपहर में वह मेरे पास आया। गरमी से तपकर उसका चेहरा सुर्ख हो रहा था। होंठों के ऊपर पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें जमी हुई थीं और कुरता गीला होकर बदन से चिपक गया था।

वह बेवक्त मिलने कभी नहीं आता था। मुझे बड़ी हैरानी हुई। गरमी की ऊँघ भरी दोपहरी में उसका आना थोड़ा बुरा भी लगा। मैंने पूछा, ‘‘शद्दू, इस वक्त कैसे?’’

शद्दू पायताने बैठ गया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, पर जाने किस नाराजगी में और किसको कहा, ‘‘कमबख्त...!’’

‘‘क्या हुआ? किस पर गरमी उतार रहे हो?’’ मैंने पूछा।

‘‘अरे वही, जाने जिन्न है कि भूत। पतले से पतले पेड़ पर ऐसे सरसराते हुए चढ़ता है कि बंदर क्या चढ़ेगा। तुम्हें तो पता है कि तोतापरी कितना सीधा और लंबा है?’’

‘‘हाँ, मगर कौन?’’

‘‘अरे, वही बदमाश...’’

‘‘शद्दू...!’’ तभी दूसरे कमरे से बड़ी मामी की आवाज गूँजी, ‘‘ऐसी बातें गंदे बच्चे करते हैं। बाहर धूप है। चलो, लेटकर आराम करो।’’

जनानखाने में बड़ी मामी का बहुत रोब चलता था। शद्दू डर के मारे कमरे से निकल भागा। मुझे कोई रास्ता न सूझा तो हड़बड़ाहट में आँखें बंद कर लीं और सोने का नाटक करने लगा।

शद्दू मेरे सामने एक पहेली छोड़ गया था। उन दिनों मैं बिस्तर पर पड़े-पड़े हलचल-विहीन दिन बिता रहा था, इसलिए यह छोटी सी बात भी मेरे लिए कौतूहल का विषय बन गई।

उस शाम शद्दू मेरे पास नहीं आया। हालाँकि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वह चाहे एक मिनट के लिए आए, पर आएगा जरूर। लेकिन उसने झलक तक नहीं दिखाई।

सुबह के वक्त मेरी चारपाई दालान में कर दी जाती थी। मैं दीवार की टेक लगाए आड़ू के पेड़ पर बुलबुल की उछल-कूद देख रहा था। तभी मुझे शद्दू दिखाई पड़ा। वह तेजी से बाहर की ओर भागा जा रहा था। मैंने पुकारा, ‘‘शद्दू...!’’

शद्दू लपककर आया और हाँफता हुआ बोला, ‘‘जा रहा हूँ। आज गुल्ली-डंडा का मैदान बदा है। देखना, आज उसे हराकर आऊँगा।’’

इससे पहले कि मैं कोई और सवाल करता, वह कमान से छूटा हुआ तीर हो चुका था।

शद्दू दोपहर बाद वापस आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। निगाहें झुकी हुई थीं।

मैंने पूछा, ‘‘क्या हुआ, कौन जीता?’’

‘‘वही, और कौन जीतेगा। मुझे उससे नफरत हो गई है।’’ शद्दू का चेहरा विकृत हो रहा था।

‘‘वह कौन?’’ मैं झल्लाया।

‘‘रऊफ, जब्बार तेली का लड़का। जाने उसके पास कौन सा मंतर है कि कभी हारता ही नहीं।’’

‘‘अच्छन भाई को साथ लिये गए होते।’’

‘‘वे भी गए थे और महमूद भाईजान भी, पर उसने सबको हरा दिया।’’

‘‘अच्छा...!’’ मेरा मुँह हैरत से खुल गया, ‘‘वह इतना अच्छा खिलाड़ी है?’’

शद्दू ने जैसे मेरी बात नहीं सुनी। वह इधर-उधर देख रहा था। उसकी निगाहों में इस वक्त कैसा भाव था, बता नहीं सकता। आस-पास सन्नाटा देखकर उसने कमर से चाकू निकाला और फुसफुसाता हुआ बोला, ‘‘मैं उसे मार दूँगा।’’

उसके हाथ में अमिया काटनेवाला चाकू देखकर मुझे हँसी आ गई।

‘‘यह तुम्हें कहाँ से मिला?’’ मैंने उसे डाँटने के अंदाज में पूछा।

‘‘गाँव के लुहार से ढाई रुपए का लेकर आया हूँ।’’

‘‘बेवकूफ, यह भी कोई तरीका हुआ?’’ मैंने कहा, ‘‘यह तो कमजोर और बेईमान लोगों का ढंग है। तुम्हें अगर जीत हासिल करनी है तो उसे हराना सीखो। गुल्ली-डंडा न सही, दौड़ लगा लो। तुम तो बहुत तेज दौड़ते हो।’’

‘‘वह दौड़ में भी हरा चुका है।’’

‘‘तो...’’ मैंने सोचते हुए कहा, ‘‘लंबी कूद या तैराकी?’’

‘‘उसे सबकुछ आता है।’’

‘‘बाप रे!’’ मेरे मुँह से एकाएक निकला। मैं सोचने लगा कि उसके अंदर ऐसी कौन सी खासियत छिपी है, जो वह किसी खेल में हारता ही नहीं। अच्छन भाई तो खासे मजबूत हैं, उन्हें वह भला कैसे हरा देता है। इसका मतलब वह काफी ताकतवर और लंबा-चौड़ा है।

इस बीच शद्दू अपना चाकू पलंग पर छोड़कर कब चला गया, पता ही न चला। मैं दिन भर उसी लड़के के बारे में सोचता रहा।

अगली सुबह सिराज भाई हाल पूछने आए तो मैंने उस लड़के के बारे में पूछा।

‘‘वह तो जादूगर है!’’ उनकी आवाज में प्रशंसा का भाव था, ‘‘तुम ठीक हो जाओ तो उससे मिलवाऊँगा। उससे मिलकर तुम्हें अच्छा लगेगा। ऐसा कौन सा काम है, जो वह न कर पाता हो। सचमुच, हैरत होती है। परसों उसने बब्बन चच्चा को साइकिल रेस में हरा दिया।’’

मैं सुनता रहा और उसके बारे में तरह-तरह की कल्पनाएँ करता रहा।

कुछ दिन बाद की बात है। मैं थोड़ा-थोड़ा ठीक होने लगा था। आँगन में थोड़ा-बहुत टहल-घूम लेता था।

अचानक एक सुबह बाहर तेज शोरगुल सुनाई दिया। उस चीख-पुकार में रोने की आवाजें भी शामिल थीं।

मर्दानखाने के सारे लोग बाहर की ओर लपके। शद्दू भी नाश्ता छोड़कर तीर की तरह बाहर की ओर दौड़ा। मैं भी हिम्मत करके बाहर निकला। चबूतरे पर खड़े होकर देखा तो सामने बने कुएँ की जगत पर भीड़ लगी थी। लोग कुएँ के अंदर झुके जा रहे थे। ‘रस्सी लाओ!’ ‘बाल्टी लाओ!’ का शोर मच रहा था। एक तरफ माथे तक घूँघट काढ़े औरतों का झुंड खड़ा था। वे चीख-पुकार मचा रही थीं। कुछ रो भी रही थीं।

अज्जू जुलाहा बदहवासी से इधर-उधर दौड़ रहा था। उसका दो साल का बच्चा खेलते-खेलते कुएँ में गिर गया था। अज्जू चीख-चीखकर जान दिए दे रहा था। एक बार तो उसने खुद भी कुएँ में कूदने की कोशिश की, पर लोगों ने थाम लिया।

तभी रस्सी और बाल्टी आ गई। फिर भी कामयाबी मिलने की उम्मीद कम थी, क्योंकि बच्चा छोटा था और डर के मारे निढाल हो चुका था।

तभी भीड़ को चीरता हुआ एक दुबला-पतला लड़का आया और इससे पहले कि कोई कुछ समझता, वह कुएँ में कूद पड़ा। मैं उसे ठीक से देख न पाया। बस, उसकी मटमैली और बदरंग कमीज ही निगाह में आई। मैं सोचता रह गया कि यह जाँबाज भला कौन है!

तभी शोर उठा, ‘‘रऊफ कुएँ में कूद गया!’’

मेरा हृदय उत्तेजना से धड़क उठा। मैंने आँखें गड़ा दीं। आज हर हाल में मैं उस लड़के को देख लेना चाहता था और मन की सारी जिज्ञासाओं को मिटा डालना चाहता था।

थोड़ी ही देर में रस्सी के सहारे एक लड़का कुएँ से ऊपर आता दिखा। लोग चिल्लाए, ‘‘बच्चा बच गया! रऊफ ने बचा लिया!’’

बाहर आते ही लोगों ने रऊफ को कंधे पर उठा लिया। उसे देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। यकीन न हुआ कि जो देख रहा हूँ, वह सच है या झूठ। जिसे मैं लंबा-चौड़ा और ताकतवर समझ रहा था, वह उससे बिल्कुल उल्टा था। छोटे कद का दुबला-पतला साँवला सा लड़का। और सबसे बड़ी बात, जिस पर मुझे ही नहीं, किसी को भी हैरत होती, वह यह कि उसका एक हाथ बाजू के पास से कटा हुआ था। सचमुच, इससे बड़ा आश्चर्य मुझे जिंदगी में कभी नहीं हुआ।

मेरा मन उसके सम्मान में झुक गया। मुझे लगा कि हम लोग सही-सलामत और दो-दो हाथवाले होकर भी बेकार हैं; और उसका एक हाथ भी हजार हाथों से बढ़कर है।

जी.एफ. कॉलेज, शाहजहाँपुर-२४२००१ (उ.प्र.)

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