सच्चे नागरिक को अपने कर्तव्य व जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए

४ नवंबर, १९४८

अपनी मातृभूमि की पूर्ण रक्षा से बढ़कर सरदार पटेल के लिए कुछ नहीं है। जब पाकिस्तान का पूर्वी बंगाल के अल्पसंख्यकों तथा कश्मीर की सुंदर घाटी के प्रति लड़ाकू रवैया चरम पर पहुँच गया था (कश्मीर के मामले में पहले युद्ध में उलझ गया था), तब सरदार पटेल ने ४ नवंबर, १९४८ को नागपुर में ऐतिहासिक भाषण दिया था। इसमें सरदारजी ने गरजते हुए लोगों का आह्वान किया कि वे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए उत्पन्न खतरों के संबंध में अपना फर्ज समझें। हम भारत के रक्षक हैं और जब तक जीवित रहेंगे, हम अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति इन खतरों को बरदाश्त नहीं करेंगे। अपने समय के शीर्षस्थ नेताओं में सरदार पटेल पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने पाकिस्तान को खुलेआम धमकी दी कि यदि पाकिस्तान पूर्वी बंगाल में हिंदुओं को उनके घरों से खदेड़ने से बाज नहीं आया तो उसे इन लाखों लोगों को बसाने के लिए अपनी भूमि देनी होगी।

ये ऐसे दिन थे, जब नारों और शोर-शराबे का हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं था। हमें इस बात पर ध्यान केंद्रित करना था कि स्वयं को कैसे मजबूत बनाया जाए। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम अपनी आजादी की मिठास का आनंद कदापि नहीं ले पाएँगे। हम नहीं जानेंगे कि हम आजाद हैं या गुलाम। अंधे व्यक्ति के समान हम हाथ में रखे आभूषण का मूल्य नहीं आँक पाएँगे। बंदर के समान इस आभूषण को तोड़ देंगे। इसी प्रकार से हम या तो इस आजादी के उपहार को नहीं आँक पाएँगे या उस आजादी को ही तबाह कर देंगे, जो हमें इतने बलिदानों और उत्सर्ग के बाद प्राप्त हुई। यदि हम आजादी का सच्चा मूल्य महसूस नहीं करते तो हम तबाह हो जाएँगे।

अब सारा विश्व अस्त-व्यस्त है। विश्वयुद्ध का प्रत्येक देश के मनोबल तथा माहौल पर प्रभाव पड़ा। हमने बहुत कुछ झेला है। स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान हमने बलिदान, सत्य, एकता, प्रेम और न्याय का रास्ता चुना। जब हमने आजादी प्राप्त की, तब हम उस मार्ग से हट गए। यदि आप मेरी सलाह पर ध्यान देते हैं, सुनते हैं तो यह देश मजबूत होगा, प्रगति की ओर बढ़ेगा। आज हम बुरी तरह से अपने किए पर पछता रहे हैं। हम मात्र गोरे साहब की जगह काले साहब को रखकर संतुष्ट नहीं हो सकते। हमें वास्तविक स्वराज का आनंद मिलना चाहिए।

कांग्रेस के प्रत्येक सिपाही को यह सपाट और सरल तथ्य समझना चाहिए। पहले इन लोगों में बलिदान एवं आत्म-त्याग तथा दुःख-तकलीफें झेलने की होड़ लगी रहती थी। अब ये सत्ता और अधिकार के लिए छीना-झपटी कर रहे हैं। ये लोग प्रांतीयतावाद में डूबते जा रहे हैं। हम यह महसूस नहीं करते कि हम सभी भारतीय हैं, जैसा कि पहले महसूस करते थे जब हमें विदेशी दासता से मुक्ति पानी थी। देश को एकता के सूत्र में पिरोने की बजाय हम इसे टुकड़ों में बाँट रहे हैं। यदि हम इसी मार्ग पर चलते रहे तो भगवान् की हर नेमत को खो देंगे।

गांधीजी के आने से पहले हमें दासता की बेडि़याँ भी अच्छी लगती थीं। गांधीजी ने दासता के बंधनों से मुक्त होने का रास्ता दिखाया। लेकिन हम अभी दास मनोवृत्ति से पूर्णतः उबर नहीं पाए। हम पिंजरे से प्यार करते हैं। हमें आजादी मिल चुकी है, लेकिन हम अभी भी अतीत की दासता की ओर लालायित हैं। हम आजादी को पचा नहीं पा रहे। हमने यह मानना शुरू कर दिया है कि समर्थ या शक्तिशाली इस दुनिया में कुछ भी कर सकता है। इसलिए हमारे पास ताकत होनी चाहिए। निरंकुश सरकार होने पर ऐसी सोच सही है, लेकिन लोकतांत्रिक सरकार होने पर लोगों को सजग रहना पड़ेगा। इसी कारणवश प्रत्येक भारतीय का फर्ज है कि देश के प्रति अपनी देयता तथा वास्तविक स्वराज की योजना में अपनी जिम्मेदारी और स्थान को समझे।

भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी है। यहाँ खनिज संसाधनों के भंडार हैं तथा प्रच्छन्न संपदा है। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पास इतना अन्न नहीं है कि हमारा पेट भर सके। हमें अनाज का आयात करना पड़ता है तथा इसके अत्यधिक दाम चुकाने पड़ते हैं। अन्य देश हमसे केवल लागत ही नहीं लेते, बल्कि उचित मुनाफा भी कमाते हैं। यदि हम अपना पेट नहीं भर सकते तो ऐसे स्वराज का क्या लाभ है? इसके पीछे मिलनेवाली शिक्षा स्पष्ट है। हमें या तो अधिक खाद्यान्न उगाना होगा या आयात की व्यवस्था करनी होगी।

इसलिए प्रत्येक भारतीय को यथासंभव मात्रा में अनाज उगाना है, ताकि हम कम-से-कम दिल्ली बाजार पर निर्भर हों। जितना अधिक उत्पादन होगा, आप उतनी अधिक देश की सेवा करेंगे। आपको, इस देश के औसत नागरिक को ‘अधिक अन्न उपजाओ’ अभियान में योगदान देना है।

आपका समृद्ध प्रांत है, लेकिन आप अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। यदि आपका पड़ोसी भूखा है तो आपका फर्ज है कि उसे भोजन दो, उसके साथ अपनी रोटी बाँटो। आखिरकार, आपके हमवतन विदेशी नहीं हैं। आप उनके साथ रोटी बाँटने से मना नहीं कर सकते। भुखमरी से पीडि़त लोग हमारे अपने हैं।

वेतन बढ़ाने तथा और अधिक मुनाफे की दुर्दम माँग अब टूट चुकी है, जिसके परिणामस्वरूप निर्मित उत्पाद की लागत बढ़ जाती है और इसके बदले जीवन-यापन की लागत में भी वृद्धि हो जाएगी, जो वेतन में वृद्धि की माँग पर आधारित है। मजदूर अधिक मजदूरी की माँग कर रहे हैं। इसके बाद सरकारी कर्मचारी, रेलवे कामगार, टेलीग्राफ कर्मियों तथा डाकिए का स्थान है। हम उतना पैसा कहाँ से जुटाएँगे? जितने अन्न तथा कपड़े का हम उत्पादन करते हैं, वह पर्याप्त नहीं है। उनके मूल्य भी बढ़ते जा रहे हैं। हमारी संपदा सीमित है। यदि हर व्यक्ति अधिकाधिक छीनना चाहता है तो हम दिवालियापन की ओर बढ़ रहे हैं। तब बाँटने के लिए कुछ नहीं रहता, हम निरर्थक छीना-झपटी कर रहे हैं।

चीन में क्या हो रहा है? वहाँ पर एक जोड़ी जूतों के लिए हजारों चीनी मुद्रा का भुगतान करना पड़ता है। लोगों को नंगे पैर चलना पड़ता है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अनाज का एक दाना भी बेकार न जाए। यही बात कपड़ों पर लागू होती है। हमें अपने पास उपलब्ध हर चीज का पूरा इस्तेमाल करना चाहिए। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि एक गज कपड़ा भी बेकार न जाए तथा अधिक उत्पादन किया जाए। हम मजदूर को यह बताने के लिए तैयार हैं कि हम आपको अधिक-से-अधिक देने की कोशिश करेंगे, लेकिन अधिक-से-अधिक उत्पादन हो। लेकिन उन्हें सलाह दी जाती है कि अधिक माँग करो, उत्पादन कम करो।

सच्चे नागरिक को अपने कर्तव्य तथा जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए, अन्यथा स्वराज नाममात्र का रह जाएगा। हमें स्थिरता लानी है। आज भारत की स्थिति ऐसी है कि यदि यह मार्ग में आनेवाले अवसरों का लाभ उठाने का तरीका जान जाता है तो राष्ट्र समुदाय में इसे उचित स्थान मिलेगा।

यह प्रांतीयतावाद का समय नहीं है, बल्कि भाईचारे, मेल-मिलाप और एकता को बढ़ावा देना है। गांधीजी ने हमें यही सिखाया है।

हैदराबाद की समस्या खत्म हो चुकी है। लेकिन विश्व में अभी भी इसकी चर्चा चल रही है। किसी समय शासकों और महाराजाओं को समस्या की जड़ समझा जाता था। अब वे लोग राष्ट्रीय संरचना में अपनी समुचित भूमिका समझने लगे हैं।

क्या आप सोचते हैं कि इतना सबकुछ पा लेने पर हम कड़ी मेहनत से प्राप्त की गई स्वतंत्रता को गँवा बैठेंगे? हम देश के हितों से जुड़ा कोई भी खतरा या क्षति बरदाश्त नहीं करेंगे। हमने इस तरह से अपनी उपलब्धियों को नष्ट करने के लिए जानें न्योछावर नहीं की थीं। यद्यपि हमने आजादी के पहले बहुत कुछ किया है, लेकिन अभी हमें बहुत कुछ करना है।

हमारे लिए चिंताजनक समस्या यह है कि लाखों लोग पूर्वी बंगाल से पश्चिम बंगाल में आ रहे हैं। इस बारे में हम क्या करें? जब पंजाब का विभाजन हुआ, तब हिंदू और सिक्ख यहाँ आए और हम अभी भी वह बोझ उठा रहे हैं, जो हमारे कंधों पर लाद दिया गया। उस ओर सिंध से सिंधी लोग और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत से हिंदू-सिख निकाल दिए गए। सीमा प्रांत में स्थिति ऐसी है कि जिन लोगों ने देश की स्वतंत्रता की खातिर इतनी कुरबानी दी, वे जेल की सलाखों के पीछे हैं। खान बंधु जैसे देशभक्त कैद में हैं। पूर्वी बंगाल में १२५ लाख हिंदू हैं। पंजाब में हम हिंदुओं और सिक्खों को देश छोड़ चुके मुसलमानों की जगह बसा सकते हैं, लेकिन पूर्वी बंगाल से आए हिंदुओं की समस्या से कैसे निपटा जाए। इस प्रश्न से उत्पन्न व्यापक समस्या पर विचार किया जाए। क्या हम सोचते हैं कि हमारे पास संकीर्ण प्रांतीयतावाद में शामिल होने का समय है, जबकि इस समस्या के आयाम बढ़ते जा रहे हैं? हम इस समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं? हमें पाकिस्तान को साफ-साफ बता देना चाहिए कि यह समस्या शांतिपूर्ण अथवा मैत्रीपूर्ण ढंग से निपटाई जा सकती है, अन्यथा यह दो देशों के बीच हमेशा कठिनाइयों, मुसीबतों की जड़ बनी रहेगी। हम सभी प्रकार की आकस्मिकताओं के लिए तैयार हैं। यदि आपने हिंदुओं को निकालने का संकल्प ले लिया है, ठान लिया है तो उन्हें बसाने के लिए हमें पर्याप्त भूमि दें। हम इनको ऐसे ही स्वीकार नहीं कर सकते।

एक वर्ष से कश्मीर में संघर्ष चल रहा है। हमारे जवान शहीद हो रहे हैं। मद्रास से आए सैनिकों ने कभी हिमालय नहीं देखा। अब वे लोग बर्फ में लड़ रहे हैं, उस समय प्रांतीय राजनीति और प्रांतीयतावाद का बेकार तमाशा खड़ा कर रहे हैं।

हम बूढे़ हो चुके हैं, लेकिन भारत के रक्षक हैं तथा जब तक जिंदा हैं, हम अपनी राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति ये सब खतरे बरदाश्त नहीं करेंगे।

अब कश्मीर की समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ के सामने है। यदि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र द्वारा सुझाया गया समाधान स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं है तो वह ऐसा कर सकता है। हम बुरा नहीं मानते, लेकिन इसके बाद हमें इस समस्या को ऐसे सुलझाना होगा, जैसे हैदराबाद की समस्या सुलझाई है। यदि हमें इस प्रकार से समस्या सुलझानी होगी तो हमें अपने दुर्भाग्य पर भी विचार करना होगा, लेकिन हम डरते नहीं हैं।

यदि पूर्वी बंगाल या कश्मीर में स्थिति और अधिक बिगड़ती है तो हमारे राष्ट्र को पुनः खतरा पैदा होगा। हमें इस समस्या को सुलझाना है तथा इसके लिए तैयार होना है।

आपको अपनी सरकार को अधिकतम समर्थन तथा सहयोग देना चाहिए। अपने देश को मजबूत बनाएँ। समूचे भारत से हमें विकास संबंधी अनेक योजनाएँ मिली हैं। इनसे हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। लेकिन इसमें समय लगेगा। आशा है कि हाइड्रो-विद्युत् नहर, कुओं आदि की सुविधाएँ प्रत्येक ग्रामीण की पहुँच के भीतर होंगी। इससे पता चलता है कि अतीत में दासता की बेडि़यों में जकड़े रहने के बावजूद अभी भी हमारे पास पर्याप्त संपदा है। यदि हम सच्ची भावना से कार्य करते हैं तो हम उचित समय के भीतर अपने संसाधनों का भरपूर लाभ उठाएँगे। हम उन लोगों को सत्ता पर पदासीन करने के लिए तैयार हैं, जो हम पर विफलताओं का आरोप लगाते हैं। उन्हें ऐसा करने दें और यह पता चल जाए कि हम अपने कार्य-निष्पादन में कैसे सुधार ला सकते हैं। यदि वे लोग अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं हैं तो उनका यह परम कर्तव्य बनता है कि वे ठोस प्रयास करते हुए हमें सहयोग दें, न कि नकारात्मक चतुराई बरतें। ऐसी गलत काररवाई के कारण हम सबकुछ खो देंगे, जो आज हमारे पास है।

मेरी आप से अपील है कि मैंने जो कुछ आपको बताया है, उसपर शांति से विचार करें। मेरी सलाह मानें, अभी भी समय है। मैं आप सबके लिए प्रार्थना करता हूँ। शुभकामनाओं सहित।

वल्लभभाई पटेल

सरदार पटेल द्वारा सिंध के शरणार्थियों को पूरी सहायता देने की सलाह देते हुए किशोरीलालभाई को लिखा पत्र

देहरादून

१९ मई, १९४९

प्रिय बंधु किशोरीलाल

आपका ८ तारीख का पत्र मुझे मिला। इससे पहले भी दो-तीन पत्र मिल चुके हैं। आपने समस्या के एक पक्ष में शरणार्थियों के बारे में लिखा। सिंधी शरणार्थियों के प्रति लोगों की सहानुभूति नहीं रही। प्रांतों की सरकारें किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। उनके नेता उन्हें गुमराह कर रहे हैं। जैसा कि बापू ने नोट किया है, उन्हें सही शिक्षा या सलाह देनेवाला कोई नहीं है। भारत ने अपने दम पर स्वतंत्रता पाई है, अब इस स्थिति को बहाल करना सरकार की ड्यूटी है। सरकार को यह जानकारी दी जाती है कि ये शरणार्थी कुछ भी कर सकते हैं। उन्हें बताया जा रहा है कि हिंसा या अहिंसा, शांति या अशांति, नैतिकता या अनैतिकता के बारे में न सोचा जाए। कोई भी हथकंडा अपनाएँ। सबको डराएँ और अपना काम निकालें। ऐसे भी लोग हैं, जो शरणार्थियों की तकलीफों तथा मानसिक स्थिति से लाभ उठाकर नेता बन रहे हैं। सिखों के मास्टर तारा सिंह ने इस मामले में सभी हदें पार कर दी हैं, इसलिए हमें इस व्यक्ति को सलाखों के पीछे डाल देना चाहिए। डॉ. चौथराम ने अनेक बार ऐसा कहा है, जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए। उन्होंने शरणार्थियों को भड़काया है। उन शरणार्थियों में अनेक लोग ऐसा कार्य करते हैं, जो उन्हें नहीं करने चाहिए। और ये लोग सोचते हैं कि वे कुछ भी गलत नहीं कर रहे। ऐसे मामले समस्या का एक पक्ष हैं। आपने एकतरफा जानकारी दी है।

भवदीय वल्लभभाई

सरदार पटेल द्वारा बारदोलोई को सलाह कि ५० : ५० के आधार पर असम में शरणार्थियों को बसाने पर उदार दृष्टिकोण अपनाएँ

देहरादून

३ जुलाई, १९५०

प्रिय बारदोलोई

कृपया चाय के बागान की जमीन पर शरणार्थियों को बसाने के बारे में २२ जून, १९५० का पत्र देखें। मुझे डर है कि इस पत्र में शरणार्थी समस्या सुलझाने की अत्यावश्यकता को नहीं समझा गया। मैं जानता हूँ कि मेरे इस विचार का समर्थन रहा है कि बाहर के लोगों को बसाने के लिए असम में अतिरिक्त जमीन नहीं है। प्रशासन की दृष्टि से उनका समूचा दृष्टिकोण पक्षपातपूर्ण विचार से प्रभावित या इसके द्वारा सुनिश्चित प्रतीत होता है। हमारे सूचना-स्रोत प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं। यह तथ्य है कि असम में पर्याप्त अतिरिक्त भूमि है। यदि हम इसे खाद्यान्न की फसल के रूप में यथाशीघ्र परिवर्तित नहीं करते तो इस प्रकार से जमीन बेकार चली जाएगी। हर तरफ, जहाँ कहीं हमारा शरणार्थी समस्या से पाला पड़ा, हमें शरणार्थियों को प्राथमिकता देनी पड़ी। यहाँ तक कि स्थानीय लोगों की भावना के प्रतिकूल भी ऐसा करना पड़ा। आप सोचते हैं कि स्थानीय लोग शरणार्थियों को बसाने का विरोध करेंगे, यहाँ तक कि कानून का उल्लंघन हो सकता है अथवा आगामी चुनाव में वोट डालने से मना कर सकते हैं, तो मैं बताना चाहूँगा कि आपके पास अपने लोगों के प्रति निकृष्ट विचार हैं। ऐसे असामान्य हालात में हमें स्थानीय पूर्वग्रहों से ऊपर उठना चाहिए तथा चीजों को विशद नजरिए से देखना चाहिए, शिक्षाप्रद भूमिका अपनाई जाए, स्थानीय लोगों को उनके हित-अहित के बारे में समझाना चाहिए। इन बेघर, जमीन-रहित लोगों को आश्रय देने के लिए केंद्र सरकार की कठिनाइयों का मूल्यांकन करना चाहिए। मुझे इसमें कतई संदेह नहीं है कि यदि आपकी सरकार सफल होने की इच्छा से कुछ करती है तो उसे सफलता मिलेगी।

तथापि अजीत प्रसाद जैन से पता चला है कि उन्होंने गवर्नर को यह सुझाव दिया है कि ५०:५० के आधार पर इस समस्या को सुलझाया जा सकता है। अन्य शब्दों में चाय के बागानवालों को दी गई आधी जमीन शरणार्थियों के लिए अलग से रखी जाए तथा शेष जमीन स्थानीय लोगों को दी जाए। यह कार्य इस शर्त पर किया जाएगा कि यदि स्थानीय लोग पर्याप्त संख्या में आगे नहीं आते तो शेष भूमि शरणार्थियों को दे दी जाएगी। आशा है कि आप इस समझौते को स्वीकार कर पाएँगे तथा अपने राजस्व मंत्री तथा प्रशासन को कहेंगे कि यह समझौता दृढतापूर्वक लागू किया जाए।

भवदीय

वल्लभभाई पटेल

(श्री पी.एन. चोपड़ा एवं प्रभा चोपड़ा द्वारा संपादित एवं प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘सरदार पटेल : मुसलमान और शरणार्थी’ से साभार)

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