भाषा और हँसी

भाषा और हँसी

यह एक बढि़या मुकदमा है और अपरूप मुकदमा भी। इधर के सालों में राष्ट्रीय महिला आयोग और मानवाधिकार आयोग के सामने जिन-जिन मुकदमों को दाखिला किया गया, उनमें यह भी एक है।

दोनों आयोगों के सामने मुकदमे को इसलिए दाखिला करना पड़ा कि इधरवाले कहते थे कि यह मुकदमा हमारी व्याप्ति में नहीं आता तो उधरवाले कहते थे कि यह मुकदमा उनकी व्याप्ति में ही आता है। लगातार कोशिशों के बाद आखिर दोनों आयोगों के उपाध्यक्षों की साझीदारी सभा के बाद नया न्याय मंडल बनाया गया। उसके बाद उस मंडल को ही नए मुकदमे को अपने हाथ में लेना पड़ा।

इसलिए यह मुकदमा अपरूप का था, ऐसी बात नहीं है। मुकदमा गौरीशंकर के नाम दर्ज किया गया। आप जानते हैं न गौरीशंकरजी को, राजाओं के राजा कृष्णदेवराय के जमाने के श्रोत्री वंशज थे। थोड़ा सा भी मैल न हो, गंदगी न हो, ऐसा अपना ध्यान रखते थे। वैसे देखा जाए तो गौरीशंकर खुद श्रोत्रिय नहीं थे। वे एक बड़े भाषा अन्वेषक थे। उन्होंने द्रविड़ संस्कृति के शोध को एक नई दिशा दिखाई थी, इसी से वे प्रसिद्ध थे। गौरीशंकर की पत्नी अनुपमा मैडम थीं, जो प्रसिद्ध प्राणिशास्त्रज्ञ भी थीं और केंद्रीय विश्वविद्यालय में काम कर रही थीं। इनका भरा-पूरा परिवार था। तीन बेटियाँ और दो बेटे थे। सब मिल-जुलकर पुराने जमाने के अविभक्त परिवार के जैसे रहते थे और आधुनिकता को भी जीवन में लागू करते थे। अहाते के अंदर ही टेनिस कोर्ट, मांटेज ग्रुप के ब्यूटी पार्लर की मोबाइल वैन, जो महीने में दो दिन इनके अहाते में ही डेरा डालता था। मंत्र, होम-हवन, व्रत, पूजा भी सुचारु रूप से हो रहे थे। ऐसी एक व्यवस्था को देखने के लिए, और भेंट देने के लिए भारत तथा दुनिया के कई जगहों से पत्रकार, छाया चित्रकार आते थे।

और इतने से ही मुकदमा अपरूप का हो नहीं सकता। मुकदमा निंगाम्मा ने दर्ज किया था। निंगाम्मा भी नहीं है हुजूर, निंगाम्मा की ओर से समता मंचवालों ने किया था।

निंगाम्मा अपने यौवन से पहले ही गौरीशंकरजी के अहाते के बाहर के काम करने के लिए नियुक्त कर ली गई थी। मगर धीरे-धीरे वह घर का हिस्सा ही बन गई और वहीं रह गई। गौरीशंकर के घरवाले उसे भली-भाँति देखते थे। अच्छी तनख्वाह भी देते थे। वाहन का इंतजाम भी था। इसके रहने के लिए ही अहाते के कोने में छोटा सा घर भी बनाया गया था। निंगाम्मा के पति रामप्पा को भी इसी परिवारवालों ने नौकरी दिलाई थी, यह भी एक बड़ी बात थी। और भी पीछे जाएँ तो निंगाम्मा की शादी में भी इन्होंने ही मदद की थी न। निंगाम्मा का नेपथ्य जो भी हो, जैसे-जैसे दिन बीतते गए, वह पीछे तो नहीं रही। सुसंस्कृत परिवार के वातावण में उसने पढ़ाई-लिखाई, बुद्धिमत्ता, नाजुकपन, कोमलता सबकुछ सीखा।

निंगाम्मा के दो बेटों को भी गौरीशंकरजी ने जिम्मेदारी से एक अच्छे स्कूल में भरती कराया। इनके घर जो-जो आते-जाते थे, देखा कि खुद घर का मालिक निंगाम्मा के बच्चों के साथ बैठकर क्रास-वर्ड भरते थे। स्पेलिंग जोर से जबानी याद कराते थे। संक्षेप में सबकुछ ठीक था, सुख ही सुख था, आनंद ही आनंद था।

ऐसे गौरीशंकरजी ने यकायक निंगाम्मा को नौकरी से बरखास्त कर दिया, उसे अहाता छोड़कर चले जाने की बात कही। और कहा कि एक अच्छी जगह दूसरा घर बनाकर देंगे, अहाते के घर में काम के न रहने पर भी हर महीने जितनी तनख्वाह दी जाती थी, उसकी आधी तनख्वाह मुफ्त में देंगे, दो बच्चों को पी.यू.सी. तक पढ़ाएँगे। उन्होंने वचन भी दिया और एफिडेविट भी करवाया कि अगर वे जल्दी मर गए तो किसी तरह भी तकलीफों का सामना न करना पड़े, लिमिटेड विल कराई, बेटे और बहुओं से दस्तखत कराए और नोटरी के यहाँ जाकर हस्ताक्षर भी करवाए।

गौरीशंकर के वंशजों की विद्वत्ता, इतिहास, सरलता और सज्जनता सभी जानते थे। मगर उन्होंने ऐसा क्यों किया? यह बात पूछनेवाले वंशज भी बहुत खुश हुए। मगर सविता मंडलियों का तर्क था कि आज के जमाने में इतना ही काफी नहीं होता।

गौरीशंकरजी ने महिला मंडली के आगे जवाब के रूप में जो बातें पेश कीं, वे इस प्रकार थीं—

इधर निंगाम्मा का बातचीत करने का ढंग, हँसने का तर्ज, सबकुछ हमारे घर की औरतों के जैसा ही हो गया है। जब निंगाम्मा हँसती रहती है, बातें करती रहती है, तो कुछ दूरी पर खड़े होकर या पड़ोस के कमरे से ध्यान से सुनेंगे तो पता ही नहीं चलता कि हँसी बातचीत हमारे घर की औरतों की है या निंगाम्मा की। वह कई सालों से हमारी नौकरानी थी, अहाते में ही रहती थी और इस अति परिचय के कारण जब भी सब्जियाँ काटती थी और घर की चीजों को ठीक से रखती थी तथा सुख-दुःख की बातों में शरीक होती थी, तब घर की औरतों के समान हाथ-पैर पसारकर बैठ जाती है।

इतने तर्क-ब्योरों के बिना जब निंगाम्मा को नौकरी से बरखास्त किया गया, बात यह हुई कि उस दिन गौरीशंकरजी हनुमान गली से सुबह का सैर-सपाटा करके लौट रहे थे तो देखा कि निंगाम्मा ओडियन सैलून के आगे कुरसी पर पाँव पर पाँव पसारकर बैठी अखबार पढ़ रही है। अफकोर्स, इनको देखते ही भय-भक्ति से खड़ी होकर हाथ जोड़कर नमस्कार किया था, मगर गौरीशंकरजी की जीभ ही सूख गई और वे पूछ बैठे, ‘‘तुम यहाँ?’’

‘‘जय और विजय दोनों बेटे बाल कटवाने के लिए आए हैं। अंदर बैठे हैं।’’ निंगाम्मा ने कहा। निंगाम्मा जवाब दे रही थी, मगर उसका सारा ध्यान अखबार पढ़ने में ही लगा हुआ था। उसके मन में पाठकों के पत्र ही भरे हुए थे, जिन्हें उसने आधा ही पढ़ा था।

ओडियन सैलून के मुनिस्वमी के वंशज गौरीशंकरजी के वंशजों को कई सालों से नाई की सेवा करते आए थे। ऐसे वक्त में...कसक, पीड़ा और उबकाई की हालत में ही गौरीशंकरजी घर लौट आए। बड़ी देर तक धस-धस करके जलते रहे। एक-दो घंटे के बाद निंगाम्मा घर आई। गौरीशंकरजी ने देखा कि निंगाम्मा ब्यूटी पार्लर से आई थी, बालों को अच्छी तरह से ट्रिम कराकर रंगीन करा लिया था। माँग में सिंदूर भी था, जिसे देखकर गौरीशंकरजी को अपनी बड़ी बहू का हेयर स्टाइल आँखों के सामने उभर आया।

उस दिन गौरीशंकरजी अन्वेषण-केंद्र नहीं गए। घर के लोगों को जो कचहरी गए हुए थे, सबको फोन करके बुलाया। उसी दिन, उसी वक्त निंगाम्मा को बरखास्त किया। पीछे ही एफिडेविट, विल करना आदि काम भी हो गए। दूसरे ही दिन से समता मंडली का काम-काज शुरू हो गया। मुकदमा फाइल करना सबकुछ।

मुकदमे का अभी फैसला नहीं हुआ है।

 

नवनीत, IInd क्रॉस, अन्नाजी राव लेआउट

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