थोड़ा इंतजार कीजिए

थोड़ा इंतजार कीजिए

इंतजार (प्रतीक्षा) सभी को कभी-न-कभी करना ही पड़ता है, चाहे राजा हो या रंक। अब राजा तो नहीं रहे, हाँ, बडे़-बडे़ नेता और उद्योगपति तो हैं ही, उन्हें भी किसी-न-किसी की प्रतीक्षा रहती है। नेताओं को सत्ता-राजसत्ता पाने का इंतजार रहता है। बिना सत्ता के वे बेचैन रहते हैं। नेता को इंतजार रहता है, कब हम चुनाव जीतेंगे और चुनाव जीत गए तो इंतजार रहता है, एम.एल.ए. या एम.पी. के बाद मंत्री बनने का। उद्योगपति भी इंतजार में रहते हैं, कब हमारे मन-मुताबिक सरकार आएगी और हमें व्यापार में मुनाफा होगा।

किसान को इंतजार रहता है कि कब इंद्र देवता कृपा करेंगे तो वर्षा होगी और फसल अच्छी होगी। कालाबाजारी करनेवाले व्यापारियों को इंतजार रहता है कि सूखा पडे़गा तो पैदावार कम होगी और वे अनाज का स्टॉक कर उसे ऊँचे दामों पर बेचेंगे। जनता मरे या जिए। गरीब इनसान को इंतजार रहता है कि कब उसे कुछ काम मिलेगा। माता-पिता को प्रतीक्षा रहती है, अपने बेटे के लिए अच्छी पत्नी और बेटी के लिए अच्छे पति की। विद्यार्थियों को इंतजार रहता है परीक्षाफल का और वह भी कितने अंक मिलेंगे। आजकल अच्छे कॉलेज में प्रवेश के लिए कटऑफ ९० प्रतिशत से ९९ प्रतिशत तक हो गई है। विद्यार्थी पढ़-लिख गया तो अच्छी नौकरी का इंतजार रहता है। दादा-दादी, नाना-नानी को इंतजार रहता है पौत्र-पौत्री और नाती-नातिन का। कोई मेहमान घर आनेवाला है, उसका इंतजार करना। जब अधिक गरमी होती है तो इंतजार करते हैं, कब वर्षा होगी और राहत मिलेगी। जब शरद ऋतु में अधिक ठंड पड़ती है तो गरमियों की प्रतीक्षा रहती है।

दुकानदार को ग्राहक का इंतजार रहता है। साहित्यकार, खिलाड़ी, संगीतकार, अभिनेता को सम्मान और पुरस्कार का इंतजार रहता है। साहित्यकार-लेखक को अपनी रचना का किसी अच्छी मासिक पत्रिका या समाचार-पत्र के रविवार के अंक में छपने का इंतजार रहता है। यह इंतजार की सूची बहुत लंबी है। रेल में सफर करने के लिए कभी-कभी आरक्षण नहीं मिलता और मिलता है तो वेटिंग लिस्ट में आता है। स्टेशन पर रेल का इंतजार करना पड़ता है। हमें त्योहारों का भी इंतजार करना पड़ता है। कब आएगी होली, कब आएगी दीवाली या ईद। कभी हम मोबाइल पर किसी से बात करना चाहते हैं तो सूचना मिलती है इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं। इंतजार कीजिए। इंतजार कीजिए अच्छे दिन आएँगे, नेताओं का जनता को आश्वासन।

साहित्यिक कार्यक्रमों में लोग कम ही जाते हैं। निमंत्रण-पत्र में कार्यक्रम का समय सुबह १० बज का दिया गया है तो लोग वहाँ अधिकतर देर से पहुँचते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि मुख्य अतिथि व अध्यक्ष कभी समय पर नहीं पहुँचते। श्रोताओं-आयोजकों का उनका इंतजार करना पड़ता है। साहित्यिक कार्यक्रम कभी समय पर शुरू नहीं हो पाते। यह सोचकर मैं भी आधा घंटा तो कम-से-कम देर से ही पहुँचता हूँ। फिर भी सभागृह खाली-खाली नजर आता है।

एक सुप्रसिद्ध साहित्यकार की जन्म-जयंती का आयोजन था। उसमें नगर के मेयर को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। कार्यक्रम शुरू नहीं हो पा रहा था मेयर महोदय के इंतजार में, उन्हें कार्यक्रम का उद्घाटन करना था। आयोजक श्रोताओं और अतिथियों को बार-बार कह रहे थे कि प्रतीक्षा करें, बस मेयर महोदय कुछ देर में पहुँचनेवाले हैं, उनका फोन आ गया है। ४५ मिनट इंतजार के बाद मेयर महोदय आए और फिर कार्यक्रम शुरू हुआ। मेयर महोदय ने जनता से क्षमा माँगी देरी के लिए और कहा, ‘‘मुझे एक ब्यूटी पार्लर के उद्घाटन के कार्यक्रम में देर हो गई।’’

मैं अपनी पुस्तक के प्रकाशन के लिए एक बहुत बडे़ प्रकाशक के पास गया हुआ था। मैंने उन्हें एक पुस्तक छपने के लिए दो वर्ष पहले दी थी, वे बार-बार यही कहते रहे, ‘‘इंतजार कीजिए, काम हो रहा है।’’ जब मैं वहाँ उनके कक्ष में बैठा था तो प्रकाशक महोदय से मिलने एक महिला उड़ीसा से आई थीं। प्रकाशक महोदय ने उन महिला को आधा घंटा इंतजार कराया, तब अपने कक्ष में बुलाया। महिला को अपनी एक पुस्तक छपवानी थी व प्रकाशक महोदय के सम्मान में एक बुके भी लाई थीं। प्रकाशकों के पास भी समय नहीं है लेखकों से मिलने का, उन्हें इंतजार करना पड़ता है।

मैं अपने बॉस आदर्श श्रीवास्तव के कमरे में कुछ कार्यवश गया हुआ था, तभी उनके चपरासी ने उन्हें एक विजिटिंग कार्ड दिया और कहा, ‘‘आपसे पी.डब्ल्यू.डी. के अधिशाशी अभियंता मिलना चाहते हैं।’’ मेरे बॉस ने कहा, ‘‘उन्हें अतिथि-कक्ष में बैठाओ और कहो कि साहब मीटिंग में व्यस्त हैं, थोड़ी प्रतीक्षा करें।’’ मैंने अपने बॉस से कहा, ‘‘सर, मेरा काम हो गया, आप उन्हें बुला सकते हैं, मैं जाता हूँ।’’ बॉस ने कहा, ‘‘नहीं, आप उन्हें प्रतीक्षा करने दीजिए।’’ ऐसे ही कुछ लोगों को दूसरों से प्रतीक्षा कराना अच्छा लगता है, शायद उन्हें इसमें अपना बड़प्पन लगता है।

एक बार मुझे पुलिस डी.आई.जी. से कुछ व्यक्तिगत कार्य था। वे मेरे किराएदार थे और जब घर छोड़कर गए तो टूटा-फूटा सामान व पुरानी साइकिल भी छोड़ गए थे। मैंने उनसे फोन पर मिलने का समय लिया। मुझे अपने कार्यालय में दोपहर तीन बजे बुलाया। मैं वहाँ तीन बजे पहुँच गया। उनके अर्दली सिपाही ने कहा, ‘‘आप इंतजार कीजिए, साहब मीटिंग में हैं।’’ मैं एक घंटा उनका इंतजार करता रहा और शाम को ४ बजे देखा, वे हाथ में टेनिस का रेकिट लेकर कहीं से आ रहे थे। ऐसे व्यस्त होते हैं कुछ अधिकारी। खैर, पुलिस के अधिकारी थे, क्या कहता? मैं उनसे मिलकर घर आया। न जाने लोगों को अपने काम के लिए अधिकारियों से मिलने के लिए कितना इंतजार करना पड़ता है।

कभी-कभी तो पत्नियाँ भी अपने पति के ऑफिस से लौटने के इंतजार में थक जाती हैं। जब बहुत देर हो जाती है तो झगड़ा भी हो जाता है। कहीं शादी में या पार्टी में जाना हो और पति ऑफिस से लौटने में देर करते हैं तो महाभारत छिड़ जाता है। कभी-कभी पत्नी अपने पति से विशेष कार्य की बात करना चाहती है फोन पर, जब देखो फोन व्यस्त मिलता है, कब तक बिचारी पत्नी इंतजार करे!

आजकल पत्र लिखने की रुचि लोगों में कम देखी जाती है, क्योंकि मोबाइल फोन और इ-मेल ने इसकी जगह ले ली है। पहले पत्र लिखे जाते थे और उनके पहुँचने का इंतजार होता था, फिर उत्तर पाने का। यह सब इंतजार मोबाइल फोन और वॉट्सअप ने समाप्त कर दिया। बात पुरानी है, मैं कॉलेज का विद्यार्थी था, छात्रावास में रहता था। मेरे मित्र विमल प्रकाश को पत्रों का बड़ा इंजतार रहता था। जब भी डाकिया छात्रावास में डाक देने आता, वे पूछते—मेरा कोई पत्र तो नहीं आया। मैंने उनके उतावलपन को दूर करने के लिए उनकी अलमारी से पुराने पत्र निकाल लिये और लेटर बॉक्स में डाल दिए। ३-४ दिन बाद वही पत्र पोस्टमैन मेरे मित्र को देने आया। मित्र बहुत प्रसन्न हुए कि आज बहुत पत्र आ गए। परंतु जब पत्र पढे़ तो निराश हो गए।

प्रत्येक लेखक, चाहे वह कवि हो, कहानीकार हो या निबंधकार, चाहता है कि मेरी रचना किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में छपे। बाबू गुलाबरायजी ने अपनी पुस्तक ‘मेरी असफलताएँ’ में लिखा है, ‘‘मेरे भेजे हुए एक-दो संवाद और शायद दो-एक लेख ‘लीडर’ में छप चुके थे। फूल वे, जो महेश पर चढे़। बात वही, जो अखबार में छपे।’’ मैंने एक लेख एक प्रतिष्ठित पत्रिका में भेजा था छपने के लिए, एक-दो महीने इंतजार किया, नहीं छपा, भूल गया। अचानक लगभग १८ महीने बाद पत्रिका आई। देखा, उसमें मेरा लेख छपा है। पत्रिका गोरखपुर से निकलती है। एक त्रैमासिक पत्रिका में एक लेख भेजा था, इंतजार था, कब छपेगा। भूल गया उसके बारे में। मेरे मित्र ने फोन किया, ‘आपका लेख मैंने एक त्रैमासिक पत्रिका में पढ़ा, जो भोपाल से निकलती है।’ ऐसा अनेक बार हुआ। इसलिए यदि आप किसी पत्रिका में लेख, कविता, कहानी छपने भेजते हैं तो इंतजार न करिए, बिचारे संपादकों के पास बहुत रचनाएँ छपने के इंतजार में पड़ी रहती हैं। रचनाएँ भी सोचती होंगी, कभी मेरी भी बारी आएगी। थोड़ा इंतजार कीजिए।

नेता वायदे तो जनता से बहुत करते हैं अपने चुनावी भाषणों में, परंतु सत्ता में आने पर सभी पूरे नहीं हो पाते। जनता अच्छे दिनों का इंतजार करती रहती है। किसी पार्टी को लोकसभा में तो पूर्ण बहुमत मिल गया और जनता की भलाई के लिए जो वायदे किए थे, बिल पास करा लिये परंतु राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण विपक्ष ने बिल पास नहीं होने दिए। सरकार इंतजार में रहती है कि कब विपक्ष को सद्बुद्धि आए, बिल पास हो और कानून बने। जनता के दिन इंतजार में गुजर जाते हैं कि अब अच्छे दिन आएँगे! महँगाई कम होगी, भ्रष्टाचार बंद होगा, काला धन देश में वापस आएगा, विदेशों में जो जमा है। इंतजार में भी कुछ आशा की किरण रहती है। फिर सुबह होगी, रात को यह सोचकर हम थककर सो जाते हैं।

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