प्रगतिशील और खुफिया बाबालोक

प्रगतिशील और खुफिया बाबालोक

वह स्वभाव से प्रगतिशील है। उसके घर के सामने सरकारी जमीन है। उसने प्रगति की अपने घर की बाउंड्री में उसे शामिल करके। हर तरक्कीपसंद स्वयं की तरक्की में दूसरों का भला सोचता है। इस हथियाई जमीन पर उसने ‘हैज’ लगाकर हरित क्रांति लाई है। उसे अपेक्षा है कि वातावरण के प्रदूषण को कम करने के लिए मोहल्ले के लोग उसका आभार मानें। यों पास-पड़ोस के व्यक्ति इस उल्लेखनीय पहल की नकल कर उसकी मौन प्रशंसा में मग्न हैं। उनका खयाल भी सही है। अगर सामूहिक रूप से सामने की जमीन हड़पी तो क्या पता विकास प्राधिकरण को खबर ही न हो? ऐसे भी सब जानते हैं। अगर भीड़ पीटती है तो किसी एक व्यक्ति को दोष देना कठिन है।

प्रगतिशील अपनी इस गैर-कानूनी उपलब्धि से खुश है। यदि दूसरे अनुकरण करें तो कौन प्रसन्न नहीं होगा? उसकी नाक पर मक्खी भी बैठे तो वह सरकार को जिम्मेदार मानता है—‘‘इतनी गंदगी है इस मोहल्ले में कि बदबू नहीं तो क्या परफ्यूम महकेगा! अभी तक यही क्या कम है कि हम महामारी से बचे हैं, वरना डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू सब होने की संभावना है। यह सरकारी स्वच्छ भारत अभियान का नतीजा है। हर मोड़ पर कूड़े के ढेर हैं। कचरे की टेकरी है, पत्तों-पत्तियों के छोटे-छोटे पर्वत हैं। नगर निगम भी सरकार सा नकारा है। कोई कितनी भी शिकायत करे, मजाल है कि उसके कानों पर जूँ भी रेंगे।’’

उसका यह सार्वजनिक प्रलाप श्रोता मजे लेकर सुनते हैं। किसी ने आज तक यह पूछने की हिमाकत नहीं की है कि क्या कोई अभियान बिना सक्रिय नागरिक सहयोग के सफल हो सकता है अथवा स्वच्छ भारत की मुहिम में उसका निजी योगदान कितना है? उसकी अपनी बनाई बाउंड्री के सामने जो कबाड़-कचरे का गँधाता पहाड़ है, उसमें किस की भूमिका है? कोई भी यह नाजुक प्रश्न कैसे उठाए? सफाई के प्रति सबका समान नजरिया घर के कूड़े का सड़क पर निष्कासन है। सड़क को साफ रखना सरकार या नगर निगम का दायित्व है, उसे अकर्मण्यता के लिए कोसना उनका अधिकार है। सार्वजनिक सफाई के लिए तैनात कर्मचारी क्या पूजाघर की दर्शनीय और पूजनीय मूर्तियाँ हैं? उनसे किसी काम की अपेक्षा के लिए क्या चढ़ावा जरूरी है? यों इसे सरकार का जादू ही कहेंगे कि उसके प्रभाव से दफ्तर-के-दफ्तर पूजाघर बन गए हैं। बाबू से लेकर अफसर तक सबका दर्जा छोटे-बड़े देवता का है। बेचारे जन-कल्याण और सार्वजनिक सेवा में इतने व्यस्त हैं कि किसी के भी पास बिना चढ़ावे सामान्य आदमी से मिलने की फुरसत ही नहीं है। काम-काज के लिए यज्ञ-हवन की अलग दर है, जिसके लिए पंडित-पुजारी नियुक्त हैं, जो बिचौलिए भी कहलाते हैं।

यों हमारे परिचित प्रगतिशील को स्वयं की सेक्युलर छवि पर गर्व है। वह घर में पूजा तक अपराध-बोध के भाव से करता है, इस निर्देश के साथ कि किसी को खबर न हो कि वह भगवान् के ध्यान में है। इस दौरान उसका मोबाइल स्विच ऑफ  रहता है। लैंड-लाइन वह लाइन मैन की माहवारी दस्तूरी की माँग से तंग आकर पहले ही कटवा चुका है। पत्नी और पप्पू को पूजा के सच को छिपाने की सख्त हिदायत है।

पप्पू को तो पता नहीं है, पर उसकी माँ जानती है। एक दशक ऐसा भी गुजरा है, जब नहाने-धोने जैसे नित्य कर्म से निबटने या किसी को टालने के लिए लोग ‘पूजा में होने’ जैसे बहाने का सहारा लेते थे। वक्त का फैशन बदलता रहता है। अब पूजा-पाठ या धार्मिक आस्था दकियानूसी ही नहीं, उससे एक कदम आगे ‘सांप्रदायिकता’ की श्रेणी में आ गए हैं। वैसे ही जैसे कभी आर्थिक अभाव से त्रस्त गरीब आदिवासी महिलाएँ कम कपड़ों में गुजारा करतीं, पर यह ध्यान रखतीं कि शरीर ढका रहे। इससे उलट, आज समृद्ध महिलाएँ फैशन के असर से अधिक-से-अधिक शारीरिक नग्नता की ओर अग्रसर हैं। समय की बदलती रुचि जो न करवाए कम है।

कहने को प्रगतिशील को हर धार्मिक ढोंग और बाबा-साधु से परहेज है। उसका विचार है कि ठगी में माहिर ही गेरुआ धारण करते हैं, भोले श्रद्धालुओं को लूटने को। कठिनाई है कि ऐसी खुली लूट के विशेषज्ञों के विरुद्ध कोई कानून भी नहीं है। उल्टे इन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। हर दल के नेता-मंत्री इनके दरबार में हाजिरी बजाते हैं। प्रगतिशील की इस विषय में अपनी निजी धारणा है। उसके अनुसार जैसे दुनिया में कई लोक हैं, भारत में भी एक गुप्त बाबा-लोक है। इसमें सिद्ध बाबा बसते हैं। ये भक्तों-चेलों को नैतिकता के धारावाहिक उपदेश देने में कुशल हैं। जंगल में लगी आग के समान इनके अपने झूठ के प्रचारक हैं। उनका दावा है कि बाबा दैवी शक्ति के धनी हैं। उनके स्पर्श मात्र से रोग छू-मंतर होते हैं। उनके दर्शन से मन में अभूतपूर्व शांति आती है। उनकी कृपा से आर्थिक अभाव दूर होते हैं। बेकारों को रोजगार और रोगी को रोग से मुक्ति मिलती है। उनके आशीर्वाद ने न जाने कितनों की जिंदगी सँवारी है। कोई भी डेरे या मठ से निराश नहीं लौटता है।

उनके भक्तों के लिए वह साक्षात् भगवान् नहीं, तो उनके समान तो हैं ही। उनकी सेवा में लड़कियों का एक झुंड चौबीसों घंटे लगा है। कुछ को वे गाहे-बगाहे अकेले में माफी देते हैं और कुछ को शरण। वे स्वयं में ऐसे हुनरमंद हैं कि क्रिकेट-कबड्डी से लेकर कबूतरबाजी तक में उनका दखल है। इतना ही नहीं, वह भगवान् के दूत तो हैं ही, शैतान के भी हैं। अपने दुश्मनों को जीवन की सजा से वे आजाद करते हैं। उनके भक्तों-सेवकों की पूरी टीम इस नेक काम को अंजाम देने में जुटी रहती है। बस उनके इशारे की देर है।

विवादित प्रश्न केवल इतना है कि इनके द्वारा बलि चढ़ाए इनसानी बकरों को जन्नत नसीब है कि जहन्नुम? देवपुरुष होने के कारण हत्या जैसा घृणित काम वे नहीं करते हैं, केवल इष्टदेव के सम्मुख बलि देने के पुण्यकर्म में इनका यकीन है। यों जन्नत-जहन्नुम के सवाल पर अभी बुद्धिजीवी बहस जारी है। इनसानी कानून इनकी ‘बलि’ को हत्या समझता है और मानता है। यह भी तय नहीं कि बाबा-लोक के बाबा इन नियम-कानूनों में बँधे हैं या उससे उन्हें छूट है?

बाबा के भक्त-श्रद्धालुओं के मतानुसार वह इंद्र के अवतार हैं। इंद्र के समान ही उनकी भी इंद्र-सभा है। इसकी अप्सराओं में कुछ को चुनकर वे हर रात उनमें प्राण फूँकते हैं। ऐसे देवपुरुष पर धरती के नियम-कानून लागू करना कहाँ का न्याय है? यही तो अंतर है। जिन्हें धरती पर अपराध के बारे में मुगालता है, वे इस तथ्य से अनभिज्ञ हैं कि यह इंद्र की जीवन-शैली है। वह तो बाबा सहनशील हैं। उनमें नाइनसाफी को बरदाश्त करने की कूवत है, वरना वे कहीं क्रोधित होकर श्राप दे देते तो यह धरती के कानूनदाँ कहीं के नहीं रहते। यदि धरती के पाप के भार इन्हें कभी उठने भी देते तो यह आकाश लोक के दरवाजे अपने लिए बंद पाते। बाबा जानते हैं कि उनके श्राप के फलस्वरूप ये सबके सब अदृश्य भूत बनकर किसी पीपल के पेड़ पर उल्लू की माफिक उलटे लटककर वृक्षों की शोभा बढ़ाने की ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह करते।

प्रचारकों के अनुसार बाबा दयालु हैं। उनका ध्यान केवल लोगों के हित पर केंद्रित है। इसीलिए अपने दयावान स्वभाव के कारण आज वे जेल की सलाखों में बंद हैं। पूरा मीडिया उनके विरुद्ध अनर्गल प्रचार में जुटा है। कहीं उनपर भोग-विलास का आरोप लग रहा है, कहीं बलात्कार का। यह कोई नहीं सोचता है कि अब तक मीडिया क्यों मुखर नहीं था? कुछ तो यहाँ तक दावा करते हैं कि उन्हें बाबा के सारे काले कारनामों की वर्षों से खबर थी, पर इस प्रकार के चरित्र-हनन के समाचारों को प्रसारित करने में उनका विश्वास नहीं है। वह सकारात्मक समाज-कल्याण के समाचारों को छापते तथा प्रचारित करने में यकीन रखते हैं। यों भी उनके अखबार और चैनल की साख है। वह उन्हीं खबरों का प्रचार-प्रसार करते हैं, जिससे उनका आर्थिक हित सधे। विज्ञापन की आय बढ़े। बाबा की खबर छापकर समाज के इस प्रभावी वर्ग से वे दुश्मनी क्यों लेते? गिरे को लात मारने से धाक जमती है। अब जब बाबा के बुरे दिन हैं तो उन्हें लात लगाकर ये अपना पत्रकारिता धर्म निभा रहे हैं।

बाबा-कथा को सुनाकर प्रगतिशील साँस लेने को सुस्ताए। फिर उन्होंने जिज्ञासुओं के समक्ष प्रश्न उछाला, ‘‘इस देश में अंधविश्वास और अंधभक्तों का युग कब समाप्त होगा? हमें तो उस दिन का इंतजार है, जब ढोंग और ढकोसले के प्रतीक ऐसे सारे बाबा अपने कुकर्मों की सजा पाएँ।’’

इस प्रवचन में एक ऐसा जिज्ञासु भी था, जो अतीत में इस बाबा का भक्त था। उसने बाबा-कथा ध्यान से सुनी और जानना चाहा, ‘‘पर ऐसे ढोंगी और धूर्त इतने प्रभावी क्यों हैं?’’

प्रगतिशील जुबानी पेंच लड़ाने का शौकीन है। उसे दूसरों की बोलती बंद करने में अलौकिक आनंद आता है। उसने प्रश्नकर्ता की ओर विद्रूप की मुसकान उछाली और फिर अपने मूल उसूल को प्रतिपादित करने में जुट गया, ‘‘ये बाबा कभी भी इतने शक्तिशाली न होते, यदि नागरिकों को चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार की सुविधाएँ उपलब्ध होतीं। अब बीमार या बोरोजगार कहाँ जाएँ? आशा लेकर बाबा की शरण में आते हैं। पिछले तीन वर्षों में यह सिलसिला और बढ़ गया है। अब तो संन्यासी भी सरकार में प्रवेश कर गए हैं।’’

प्रगतिशील बिना अवसर गँवाए वर्तमान सरकार पर निशाना साधने से नहीं चूकता है। एक जमाना था, जब वह कामरेड कहलाता, मौके-बेमौके रूस की सैर कर आता। सरकार में उसका सम्मान था। पिछले दो-तीन वर्षों से कोई उसे घास नहीं डालता है। दिल की भड़ास नहीं निकाले तो वह क्या करे? निर्णायक कमेटियों में सरकार उससे कन्नी काटती है। बेचारा उपेक्षा के संत्रास में डूबा है। उसका इकलौता मिशन सरकार की खामियाँ खोजना है—‘‘जब मंत्री और अफसर गुप्त लोक के अनैतिक बाबा को फर्शी लगाएँगे तो उसका प्रभावी होना अनिवार्य है। क्या कोई भी थाना प्रमुख उसके खिलाफ जाँच करने का दुस्साहस कर सकता है?’’

अतीत के बाबा भक्त ने सहमति में मुंडी हिलाई और कहने लगा, ‘‘हमें भी बाबा की हरकतों का आभास होने लगा था तो हमने डेरे की सच्चाई भाँपकर वहाँ जाना ही छोड़ दिया।’’ फिर उसे जैसे अचानक याद आया, ‘‘पर आप क्यों वहाँ जाते थे? आप तो पढ़े-लिखे समझदार व्यक्ति हैं। आप तो न अंधविश्वासी हैं, न धार्मिक आस्था से भ्रमित। मुझे याद है, मैंने कई बार वहाँ आपको देखा है।’’

उनकी इस अनपेक्षित सूचना से सन्नाटा छा गया। एक पल को तरक्कीपसंद के चेहरे का जैसे रंग उड़ गया। फिर उसने स्वयं को सँभाला और बोला, ‘‘हमें शिकायतें मिली थीं पीडि़त महिलाओं की। हमने सोचा कि जाकर स्वयं चेक कर लें।’’

उनके स्पष्टीकरण से पुराना भक्त आश्वस्त नहीं हुआ, ‘‘डेरा प्रमुख द्वारा महिलाओं के शारीरिक शोषण और इस अनपढ़ ढोंगेश्वर के कारनामों से हमारा विश्वास उठ गया, पर आपकी शिकायत तो किसी साध्वी ने ही की थी कि आप जबरन उसका हाथ पकड़कर दुर्व्यवहार कर रहे हैं। इस पर आपको सुरक्षाकर्मियों ने बाहर खदेड़ दिया था।’’

प्रगतिशील को वहाँ से पलायन में ही अपनी भलाई नजर आई। उसके जाने के बाद भी पान की दुकान पर देश के गुप्त बाबालोक के बाबाओं पर अंधश्रद्धा के विश्वासी दौर का विषय छाया रहा। सोने की लंका का लंकेश्वर तो विद्वान् था, आस्थावान् था, पर यह ढोंगेश्वर तो कतई अज्ञानी है, सिर्फ अभिनय में दक्ष है। उसे यकीन है कि वह भगवान् है, वरना अपनी पूजा क्यों करवाता? पर यह प्रगतिशील कौन कम फरेबी है? उसके विचार भी सुविधानुसार बदलते हैं, नहीं तो वह मठ में क्यों जाता? वह तो इसे मौका नहीं मिला है, वरना छल, कपट, ढोंग, फरेब में यह ढोंगेश्वर को मात देने में क्या सर्वथा समर्थ सिद्ध नहीं होता? लोग खुश थे, एक साथ दो ढोंगियों की कलई खुलने से। एक दुःखी था जेल जाकर, दूसरा घर पहुँचकर!

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