तू दानवीर, सच्चा दाता

तू दानवीर, सच्चा दाता

तू दानवीर, सच्चा दाता

तू आया मेरे द्वार स्वयं

सच्चे दाता का यही नियम

तुझको देने का नहीं गर्व

तू देकर ही है अपनाता,

तू दानवीर, सच्चा दाता।

जितनी तू पूरी कर देता

इच्छाएँ उतनी भर देता,

ऐसा कर और दृढा देता।

यह याचक-दाता का नाता,

तू दानवीर, सच्चा दाता।

ले-लेकर मेरे थके हाथ

हर कठिनाई में दिया साथ,

मैं पीछे करता हूँ प्रयास।

तू पूर्ति प्रथम ही कर जाता,

तू दानवीर, सच्चा दाता।

प्रार्थना

मानव ही तो हूँ, तुम मेरी त्रुटियाँ क्षमा करो,

प्रभु, मेरी दूषित काया के अवगुण दोष हरो।

काम क्रोध मद लोभ निवारो ईर्ष्या द्वेष हरो,

ममता मोह मिटाओ मेरे भ्रम भय दूर करो।

अहंकार को काटो मेरे हिरदे प्रेम भरो,

मन माया मँझधार घिरा है इसको पार धरो।

रंग रूप रस की दुनिया ने मेरा मन भरमाया,

ऐसी सुध बिसराई मैंने, अपना तत्त्व भुलाया।

भोग और सुख की तलाश में असुखी जग के अंदर,

बहुत ठोकरें खाकर मालिक आया हूँ तेरे दर।

कृपानिधान दयानिधि भगवन् यह उपकार करो,

ज्ञान-ज्योति से मेरे अंतर का अंधकार हरो।

हे करुणाकर, शरणागत का तुम उद्धार करो,

मानव ही तो हूँ, तुम मेरी त्रुटियाँ क्षमा करो,

प्रभु, मेरी दूषित काया के अवगुण दोष हरो।

मैंने तारों से प्रश्न किया

मैंने तारों से प्रश्न किया—

‘मैं प्रति निशि यह देखा करता

तुम सदा मूक, निश्चल, गंभीर;

क्या नहीं तुम्हारी दुनिया में

इस जग की चिंता, जलन, पीर?

तुम मौन हुए हो क्या पाकर?

मैं तो रोता दिन-रात यहाँ;

क्या विरह, विवशता, कंगाली

का नहीं शेष अस्तित्व वहाँ?’

यों दिया सितारों ने उत्तर—

‘दुःख अपना ही लगता महान्,

मन कौन किसी का सका जान?

ज्वाला सबके अंदर जलती,

पीड़ा सबको अपनी खलती;

हम दुःखी, दीन, अति पीडि़त, पर

तुममें औ’ हममें यह अंतर—

तुम रो-रोकर झेलते जिसे

हम सह लेते चुपचाप उसे।’

 

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