वनों पर आश्रित प्राणी-जीवन

वनों पर आश्रित प्राणी-जीवन

मानव सभ्यता का विकास वनों की गोद में हुआ। उनके सौम्य, स्वच्छ एवं शांत वातावरण में हमारी सभ्यता एवं परंपरा विकसित हुई। शुद्ध वायु एवं जल-संचय के स्रोत वन तथा वृक्ष हैं। हमारे स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन, आर्थिक उन्नति एवं मानसिक तथा आत्मिक शांति के लिए आस-पास हरियाली आवश्यक है। यह कहावत सत्य है कि वन हैं तो हम हैं। हमारा जीवन वनों पर निर्भर है।

वन विश्व के लिए वातानुकूलन तथा पृथ्वी के लिए आवरण का काम करते हैं। वे हमें जल, ऊर्जा, प्राणवायु, भोजन, चारा, लकड़ी तथा नाना प्रकार की वनोपज उपलब्ध कराते हैं। वे जल का संचय करते हैं, भूमि-क्षरण को रोकते हैं। सूखा, अकाल तथा बाढ़ की विभीषिका से मुक्ति दिलाते हैं। वन-विनाश से भूमि का कटाव, पानी की कमी, सूखा, बाढ़, मरुस्थलों का विस्तार, मौसम की विषमताएँ, पर्यावरण प्रदूषण, उत्पादकता में कमी तथा जैविक विविधता में कमी हो जाती है। वनों के विनाश से जलाऊ लकड़ी तथा चारे का संकट, पानी की कमी तथा बाढ़ एवं सूखे की समस्या, जलवायु परिवर्तन का समाधान नहीं मिलता एवं गरीबी, भुखमरी, बेकारी की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है।

वन व वृक्ष सहित समस्त प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन द्वारा ही हम पर्यावरण अवनयन, प्रदूषण, जलवायु-परिवर्तन तथा तापक्रम में वृद्धि, जैविक विविधिता के क्षरण, गरीबी, भुखमरी आदि से छुटकारा पा सकते हैं। वन-संरक्षण, वन-संवर्धन, सतत वन-प्रबंधन एवं वन-महोत्सव को जन-आंदोलन बनाकर ही हम लोगों को हरियाली हेतु प्रेरित तथा प्रोत्साहित कर सकते हैं। आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय फायदा मिलने पर ही लोगों की वनों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी तथा देश के ३३ प्रतिशत क्षेत्र में हरियाली का फैलाव होगा।

वनस्पति और जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर मानव का अस्तित्व निर्भर है। वैदिक मुनियों ने हमारे राष्ट्र की सांस्कृतिक, सौंदर्यमूलक एवं आर्थिक जीवनधारा में पेड़-पौधों एवं वनों की भूमिका की भूरि-भूरि सराहना की है। प्रकृति के प्रति स्नेह और आदर की भारतीय परंपरा अत्यंत प्राचीन है। बौद्ध तथा जैन धर्मों में वनों की रक्षा एवं विकास पर जोर दिया गया है। कुरान-शरीफ, बाइबिल, गुरुग्रंथ तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में वनों एवं वृक्षों के महत्त्व को स्वीकार किया गया है।

वनों में बाढ़, सूखा, भूकंप, कीटों का प्रकोप, तूफान आदि आते हैं। इन प्राकृतिक विपदाओं से निपटने का कोई जादुई तरीका नहीं है। उनके लिए सुविचारित दीर्घकालीन उपाय तलाशने होंगे। अलग-अलग नहीं, वरन् समग्रता में, क्योंकि वे सब उपाय एक-दूसरे से संबद्ध हैं। उनका लक्ष्य एक है। वे समग्र इलाज के तरीके हैं, इसलिए असरकारी तरीका अपनाना होगा। असली चुनौती तो जीवन को सुखपूर्वक चलाने और वन-विनाश को रोकने की है। इसके लिए वनों के विकास (उत्पादन और दोहन) के मौजूदा मॉडल को संतुलित तथा परिष्कृत करना होगा। नजरिए में आमूल-चूल बदलाव लाना होगा। संयुक्त वन प्रबंध, सामाजिक वानिकी, वन-उद्योग जैसे कार्यक्रमों को पूरी तरह जनोन्मुखी बनाना होगा। वन-संपदा को राजस्व प्राप्ति का साधन मानने के स्थान पर कार्बन शोधक, जैव-विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के योगदान का स्रोत भी मानना होगा। लोगों को उत्पादित रोजगार एवं उनकी आमदनी बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

विश्व के समग्र काव्य का रस-रूप वृक्षों की कमनीयता एवं कुसुमों के सौंदर्य से मुखरित हुआ है। जीवन में त्याग, परोपकार, पावनता, निरीहता आदि सद्गुणों की स्थापना वृक्षों के साहचर्य से ही संभव है। कहा गया है—

वन जीवन को संदेश प्रकृति का देते हैं,

वे मार्ग प्रगति का मानव को दिखलाते हैं।

वे आकर्षक तो हैं ही धरती माता के

मानव हित में वे कई वस्तु उपजाते हैं।

वनों की दशा

ग्लोबल फॉरेस्ट असेसमेंट के अनुसार पूरे विश्व में पृथ्वी का ३१ प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है, परंतु भारतवर्ष में अभी यह २५ प्रतिशत से कम है। राष्ट्रीय वन-नीति के अनुसार देश के एक तिहाई (३३ प्रतिशत) भाग में वन उगाने हेतु सामाजिक-वानिकी एवं कृषि-वानिकी को महाभियान के रूप में अपनाना होगा। वनों का संरक्षण, संवर्धन एवं लोगों की आय में वृद्धि करने हेतु निम्न प्रयास आवश्यक हैं—

नदियों (गंगा, यमुना, नर्मदा आदि) को स्वच्छ, निर्मल तथा सदानीरा बनाने हेतु इनके दोनों तरफ अधिक-से-अधिक पौधे जन सहयोग से उगाना। इन पौधों से प्राप्त आय का फायदा लोगों को मिलना चाहिए।

देश में लकड़ी के आयात को कम करने हेतु कृषि-वानिकी को समुचित बढ़ावा देना, ताकि किसान की आमदनी दुगनी हो सके तथा देश की जी.डी.पी. ग्रोथ बढ़ सके।

स्मार्टसिटी में वायु-प्रदूषण कम करने हेतु नगरीय-वानिकी को प्रश्रय देना, ताकि लोगों का स्वास्थ्य ठीक रहे तथा उन्हें अकाल मृत्यु से छुटकारा मिल सके।

सुखद बात है कि इस समय हम पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म शताब्दी समारोह मना रहे हैं। उनका ‘लक्ष्य अंत्योदय, प्रण अंत्योदय तथा पंथ अंत्योदय’ का था। वे चाहते थे कि वनों पर आश्रित देश की लगभग ३७ प्रतिशत आबादी को गरीबी, भुखमरी, बीमारी, अशिक्षा, बेकारी, असमानता तथा शोषण आदि से मुक्ति मिलनी चाहिए। प्रधानमंत्रीजी भी चाहते हैं कि २०२२ तक सबका विकास होना चाहिए। इसे प्राप्त करने हेतु निम्न बातों पर ध्यान देना होगा—

वन-क्षेत्रों में मकान, सड़क, अस्पताल, बिजली, पानी, स्कूल, बाजार आदि की समुचित व्यवस्था।

आग, बाढ़, सूखा, कीटों का प्रकोप जैसी आपदाओं से बचने की व्यवस्था।

संयुक्त वन-प्रबंधन में सभी को सहभागी बनाना, ताकि लोगों का सामाजिक-आर्थिक विकास हो सके तथा वनों की दशा सुधर सके।

कुटीर, लघु एवं मध्यम वन-उद्योगों की स्थापना तथा उन्हें चलाने हेतु लोगों को प्रशिक्षित करना एवं बने माल की बिक्री पर ध्यान देना।

वन-संरक्षण के उपाय

किसी राष्ट्र के आर्थिक विकास एवं पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए वन-संपदा की रक्षा एवं संरक्षण न केवल वांछनीय है, वरन् आवश्यक भी है। सामान्य तौर पर वनों के संरक्षण के उपायों में निम्न पक्षों को सम्मिलित किया जाता है—(१) बचे हुए वन-क्षेत्रों का पूर्ण रक्षण; (२) वनों की कटाई में वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण विधियों का प्रयोग तथा (३) वन क्षेत्रों में वृद्धि, ताकि प्रत्येक देश के सकल भौगोलिक क्षेत्रफल के लगभग ३३ प्रतिशत भाग पर वनों का स्वस्थ आवरण हो सके। इस कार्य के लिए वृक्षारोपण, सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी एवं नगरीय-वानिकी कार्यक्रम युद्ध स्तर पर चलाना होगा।

वनों की सामूहिक कटाई के स्थान पर चयनात्मक कटाई होनी चाहिए। अर्थात् उन्हीं पेड़ों की कटाई होनी चाहिए, जिनकी वास्तव में माँग हो। अतः वनों के संरक्षण के लिए यह परमावश्यक है कि वनों की धुआँधार तथा सामूहिक कटाई पर तुरंत रोक लगाकर बचे हुए वन-क्षेत्रों की रक्षा की जाए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए निम्न कदम उठाए जाने चाहिए—(१) सरकार द्वारा वनों के संरक्षण के लिए प्रभावी एवं कारगर कानून का निर्माण करना तथा (२) जनसाधरण में वनों के महत्त्व के प्रति दिलचस्पी एवं जागरूकता पैदा करना। अधिकांश देशों की पहले से ही अपनी-अपनी राष्ट्रीय वन-नीतियाँ हैं तथा वनों के विनाश के खिलाफ सरकारी कानून भी हैं, परंतु इसके होते हुए भी वनों का विनाश तेजी से हो रहा है।

वनों के समुचित प्रबंधन तथा संरक्षण के लिए भारत की भी राष्ट्रीय वन-नीति है, जिसके निम्न आधारभूत नियम हैं—

१. कार्यात्मक आधार पर वनों का वर्गीकरण, यथा संरक्षित वन, आरक्षित वन, ग्राम्य वन आदि।

२. आम जनता के कल्याण हेतु स्थान विशेष का भौतिक एवं जलवायु संबंधित दशाओं में परिमार्जन एवं सुधार के लिए वनरोपण द्वारा वन-क्षेत्रों में विस्तार करना।

३. पशुओं के लिए चारे, कृषि के उपकरणों के लिए लकड़ी तथा वनों के पास रहनेवाले लोगों के लिए जलावन लकड़ी की समुचित आपूर्ति की व्यवस्था करना।

४. वनों को साफ करके कृषि-क्षेत्रों में व्यापक विस्तार का विरोध करना। सतत वन-प्रबंध को बढ़ावा देना।

५. खाली क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर वन-रोपण करना, ताकि देश के समस्त भौगोलिक क्षेत्रफल के ३३ प्रतिशत भाग पर वनावरण हो सके।

वन्य जीव

वन्य जीवों को संरक्षण देने की परंपरा देश में प्राचीन काल से चली आ रही है। ऋषि-मुनियों के आश्रम वर्तमान अभयारण्यों के ही रूप थे। इन आश्रमों में चक्रवर्ती सम्राट् भी शिकार खेलने का दुस्साहस नहीं कर सकते थे। चाणक्य ने ईसापूर्व की तीसरी सदी में लिखे अपने ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में अभयारण्य स्थापित करने की जो नीति निर्धारित की, वह वन्य जंतु-संरक्षण के क्षेत्र में विश्व का प्राचीनतम संदर्भ माना जाता है।

भारतीय संस्कृति को वन्य जीवों के संरक्षण के परिप्रेक्ष्य में देखने से स्पष्ट आभास मिलता है कि यहाँ प्रकृति द्वारा उत्पन्न समस्त जीव-जंतुओं को स्वतंत्र रूप से विकसित होने का अवसर देने की अविरल परंपरा रही है। विभिन्न कलाओं एवं गुणों के प्रतिनिधि माने गए देवी-देवताओं के साथ वाहन के रूप में संबद्ध किए गए पशु-पक्षी भी जनमानस की पूजा के अधिकारी माने जाते रहे हैं।

विश्व वन्य-जीव संरक्षण सप्ताह के अवसर पर २०१५ में ‘विश्व वन्य जीव कोश’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि विगत ४० वर्षों में वन्य जीवों की संख्या आधी हो गई है। १९७० से २०१० के बीच कराए गए सर्वे से पता चला है कि इस समयावधि में धरती से समुद्र तक जीवों की आबादी में ३९ फीसदी की कमी आई है, जबकि स्तनधारियों, पक्षियों, सरीसृपों, उभयचरों तथा मछलियों की आबादी आधी रह गई है। इसी समयावधि में मनुष्यों की संख्या लगभग दूनी हुई है। कितना विरोधाभास है! जैव विविधता की महत्ता को देखते हुए जहाँ उनकी संख्या बढ़नी चाहिए थी, वहाँ उनकी संख्या में इतनी कमी चिंता का विषय है।

वन्य-जीवों को सरंक्षण प्रदान करना मानवजाति के भविष्य से जुड़ा है। धरती पर उत्क्रमित हुई समस्त जीव प्रजातियाँ एक-दूसरे से इस प्रकार संबंधित हैं कि किसी एक प्रजाति को पहुँचनेवाली क्षति अन्य सभी को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित करती है। यदि किसी वन्य जीव की प्रजाति विलुप्त होती है तो इसका सीधा अर्थ होता है कि हमारा पर्यावरण कुछ अंशों तक जीवन के अनुपयुक्त हो गया है। मनुष्य भी उसी पर्यावरण पर निर्भर करता है, इसलिए अंशों-अंशों में क्षतिग्रस्त होता पर्यावरण मानवजाति को भी क्रमशः क्षति पहुँचाता रहता है। धरती पर विभिन्न प्रजातियों का उत्क्रमण भी इसी सिद्धांत पर आधारित है कि कोई दो प्रजातियाँ पर्यावरण का उपभोग समान ढंग से नहीं करतीं। अर्थात् प्रजाति की अपनी विशिष्टताएँ हैं और उसके विलुप्त होने से वे विशिष्ट गुण समाप्त हो जाते हैं। इन गुणों को समझते हुए मानवजाति विभिन्न जीव प्रजातियों की विशिष्टता का उपयोग अपना जीवन-स्तर सुधारने के लिए करती रही है। वैज्ञानिक प्रगति के साथ क्रमशः उपयोगी जीव-जंतुओं की सूची बढ़ती जाती है। अनेक दुर्लभ बीमारियों की औषधि विभिन्न वन्य जीवों के विशिष्ट गुणों का अध्ययन करके खोजी गई है। जैसे-जैसे हमारा ज्ञान बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे धरती पर उपलब्ध अन्य जीव प्रजातियों के विशिष्ट गुणों को समझने एवं उनके संभावित उपयोग खोजने की हमारी क्षमता भी बढ़ती जाती है। इसीलिए सभी राष्ट्र अपनी सीमाओं में पाए जानेवाले वन्य जीवों को संरक्षण देने को प्राथमिकता दे रहे हैं। क्योंकि प्रकृति के रहस्यों को समझ पाने में मानवजाति को अभी तक आंशिक सफलता ही मिली है। भविष्य में खोजे जानेवाले रहस्यों से भावी पीढ़ी पूर्णरूपेण लाभान्वित हो सके, इस दृष्टि से यह अनिवार्य है कि वन्य जीवों के प्राकृतवासों (हैबीटेट) के चुने हुए क्षेत्र संरक्षित रखे जाएँ, जिससे विशिष्ट गुणोंवाले जीव-जंतु पूर्णरूपेण समझे जाने से पहले ही विलुप्त न होने पाएँ। इसलिए अभयारण्यों एवं राष्ट्रीय उद्यानों को एक नया नाम दिया गया है, ‘जीन पूल्स’, अर्थात् विशिष्ट जैविक गुणों की खान।

वन एवं वन्य-पशु प्रकृति की अनुपम कृतियाँ हैं। प्राकृतिक दृश्यों तथा उपादानों को साहित्य में उतारकर कवियों तथा लेखकों ने आनंद के अक्षय कोष का निर्माण किया है। महाकवि शेक्सपियर ने प्रकृति की पावन गरिमा का वर्णन निम्नानुसार किया है—

प्रकृति का हलका सा स्पर्श,

बना देता दुनिया को एक।

वनवासी अथवा जनजातियों को गरीबी से छुटकारा

पारंपरिक रूप से जनजातियाँ वन पारिस्थितिकी का एक अभिन्न अंग हैं। वन जनजातियों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं चिकित्सा से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अतः जनजातीय क्षेत्रों में स्थित वनावरण का अनुवीक्षण एवं विश्लेषण करना अति महत्त्वपूर्ण है। वे विश्व के सभी क्षेत्रों में पाए जाते हैं तथा मोटे तौर पर उनकी जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का ६ प्रतिशत है।

वन और वनवासी एक-दूसरे के पूरक हैं। हजारों वर्षों से ये दोनों एक-दूसरे के अविच्छिन्न अंग रहे हैं। भविष्य में कब तक यह अटूट संबंध बना रहेगा, कहा नहीं जा सकता? एक प्रकार से वनवासियों का वनों से भावनात्मक एवं आत्मिक संबंध रहा है और इसलिए वन उनके लिए प्रकृति प्रदत्त संसाधन हैं। उनके लोक-जीवन और लोकगीतों में सर्वत्र वन-जीवन का प्रतिबिंब झलकता है, वनों के विभिन्न संदर्भ लोकगीतों के माध्यम से सामान्य वनवासी के जीवन को प्रेरणा और प्रफुल्लता मिलती है। इनके विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा पद्धतियों में वन की विभिन्न वस्तुओं की अनिवार्यता है। वनों के कुछ वृक्ष वनवासियों के देवी-देवताओं के पवित्र निवास-स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुके हैं।

प्रथम बार राष्ट्रीय वन-नीति १९८८ में वनवासियों एवं वनों के बीच सहजीवी संबंध स्वीकार किया गया। वन-नीति में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया—

१. वन-कार्यों में आदिवासियों को लाभदायक रोजगार उपलब्ध कराना।

२. वन गाँवों को स्मार्ट विलेज बनाना।

३. आदिवासी हितग्राहियों की आर्थिक दशा में सुधार लाने हेतु परिवार अभिमुख योजनाओं को चालू करना।

४. लघु वन उपज के उत्पादन, संग्रहण, विपणन आदि पर ध्यान देना, ताकि आदिवासियों का आर्थिक विकास हो सके।

५. वनों की सुरक्षा, पुनरुद्धार, विकास में वनवासियों की सहभागिता।

६. झूम कृषि के स्थान पर उन्हें अन्य उत्पादन के तौर-तरीकों से परिचित कराना।

वन-नीति तथा वन कानून मानते हैं कि वन पदार्थ तथा वन से प्राप्त सेवाएँ पूरी तरह से जनजातियों को प्राप्त होनी चाहिए। गरीबी एक अभिशाप है तथा इसका उन्मूलन शीघ्र होना चाहिए। गरीबी तथा भुखमरी से निजात पाने के लिए निम्न प्रकार के ठोस प्रयास की आवश्यकता है—

वन-प्रबंधन में सहभागिता, जिससे वे अपनी जरूरत के अनुसार वन-पदार्थों का उपयोग कर सकें तथा वनों से प्राप्त आमदनी में हिस्सा प्राप्त कर सकें।

लघु वन-उपज के उत्पादन, संग्रहण, प्रसंस्करण, विपणन में उनकी कॉपरेटिव सोसाइटी को पूरा अधिकार होना चाहिए। एम.एफ.पी. फेडरेशन को सभी वनोपज के विक्रय में उन्हें सहायता देनी चाहिए।

कृषि-वानिकी, उद्यानिकी के विकास हेतु राज्यवार एक मिशन चालू करना, ताकि वनवासियों का समुचित आर्थिक विकास हो सके।

वानिकी कुटीर, लघु तथा मध्यम श्रेणी के उद्योगों की स्थापना हेतु उन्हें समुचित प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता तथा उनके द्वारा उत्पादित माल के विक्रय की व्यवस्था करना।

प्रोजेक्ट चालू करना, ताकि पर्यावरणीय विकास के साथ उनका आर्थिक विकास हो सके।

वन-कार्यों के द्वारा वर्षभर उन्हे लाभकारी रोजगार उपलब्ध कराना।

उनके ग्रामों को पक्की सड़क से जोड़ना तथा स्वास्थ्य, स्वच्छ पीने का पानी, बिजली एवं जन-वितरण प्रणाली को अच्छी तरह लागू कराना। इको टूरिज्म को बढ़ावा देना।

कवि रहीम ने लिखा है—

दीनन सबको लखत हैं, दीनहि लखे न कोय।

जो रहीम दीनहि लखे, दीनबंधु सम होय॥

वन हमारी भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। विश्व के समग्र काव्य का रस-रूप वृक्षों की कमनीयता एवं कुसुमों के सौंदर्य से मुखरित हुआ है। साहित्य की स्पंदनशीलता तथा संवेदनमयता को पादप-पुष्पों ने ही सजीव बनाया है। हमारी धार्मिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय मान्यताओं तथा परंपराओं की पृष्ठभूमि में वृक्षों एवं पुष्पों का विशिष्ट स्थान है। निश्चय ही इनका अस्तित्व हमारी भौतिक व पारमार्थिक साधना को बलवती बनाता है।

जीवन में त्याग, परोपकार, पावनता, निरीहता आदि सद्गुणों की स्थापना वृक्षों के साहचर्य से ही हुई है, जिसका वर्णन निम्न छंद में किया गया है—

अब से कल्पतरु पाथर सो मारियत,

देत हैं सुफल उर औगुन न आने हैं।

उदर धरा को फार नीर को निकासत हैं,

जग को जियावत हैं ममता न माने हैं।

केतो दुःख सहत कपास निज काम बिन,

ढकत कहाय लाज राखत जहाने हैं।

कनक पराये काज ताड़न दहन सहे,

ऐसे उपकारी दुख ही को सुख माने हैं॥

वन महिमा गान करने की हमारी समृद्ध परंपरा रही है। आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में भी हम वनों के प्रति अनुराग बनाए रखेंगे, ताकि हरियाली से खुशहाली तथा समूचे विश्व पर मँड़रा रहे पर्यावरणीय संकट को टाला जा सके। वृक्षों के महत्त्व को समझते हुए उन्हें कर्मयोगी कहा गया है—

वृक्ष जन्म से मृत्युपर्यंत,

सदैव मानव सेवा में रत।

मूल से शीर्ष तक उपयोगी,

सच्चे शब्दों में निष्काम कर्मयोगी।

पद्म पुराण में कहा गया है—

जो लगाता वृक्ष, किनारे सड़क के, तट पर जलाशयों के,

फलता-फूलता उतने ही वर्ष,

जितने वर्ष, फूलता है वृक्ष, इस संसार में।

इस प्रकार भारतीय काव्य प्रकृति का चिर सहचर बनकर अपने आपको मृदुलता, सुषमा और प्रभावोत्पादकता के तत्त्वों से अभिभूत करता रहा है। वनों एवं वृक्षों की उपादेयता में साहित्य का सार व समाज का कल्याण निहित है। हरियाली से सुख, शांति एवं सतत विकास संभव है, जो जीवन का आधार है।

उत्थान सेंटर फॉर सस्टेनेबल

डवलेपमेंट ऐंड पावर्टी एलेविएशन

१८-ए, ऑकलैंड रोड

इलाहाबाद (उ.प्र.)

दूरभाष : ०७२७५६६६६६६

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