बेमेल

पिछले कुछ दिनों से उसे अपनी चालीस वर्ष की पत्नी कुरूप दिखने लगी थी। ऑफिस में हाल ही में आई एक सुंदर तितली सी सहयोगी का भी इसमें कुछ योगदान था। वह सोचता, ‘शादी के समय का पत्नी का गोरा रंग अब कुछ साँवला हो चला है। पहले कितनी स्मार्ट लगती थी और अब दो बच्चों के बाद शरीर भी कुछ बेडौल हो चला है।

हद तो तब हो जाती थी, जब वह ऑफिस से घर लौटता, तब वह घर को व्यवस्थित करने में व्यस्त होती, बच्चों को पढ़ा रही होती या किचन में शाम के खाने की तैयारी कर रही होती। वह सोचता, ‘उसके पास पति के लिए समय ही नहीं है।’ इसकी प्रतिक्रिया अकसर पत्नी को उसके रंग-रूप पर ताने मारने से होती, जैसे, यह क्या पहन रखा है, सारा पढ़ा-लिखा गँवा दिया आदि-आदि।

एक दिन आउटिंग पर कहीं जाना था। वह तैयार हो चुका था, पत्नी ड्रेसिंग टेबल के सामने तैयार हो रही थी। तब उसका मन किया कि पत्नी के रंग-रूप पर कुछ व्यंग्य करे। वह पत्नी के पास तक आया, तभी उसकी निगाह मिरर की ओर गई। मिरर में दोनों एक साथ दिख रहे थे। वह चौंक गया—‘‘अरे! यह सलोनी सी दिख रही पत्नी के साथ खड़ा भद्दा बेमेल सा अधेड़ कौन है?’’

उसकी जबान तालू से चिपक गई थी, पत्नी के प्रति व्यंग्य के सभी भाव जाने कहाँ तिरोहित हो गए थे!

गुरुग्राम, हरियाणा

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