गांधी-जयंती पर महापुरुषों का स्मरण

अक्तूबर महीने में देश भर में अनेक सपूतों, महापुरुषों की जयंतियाँ प्रतिवर्ष आयोजित होती हैं। कुछ आयोजनों की व्यवस्था सरकार करती है, कुछ राजनैतिक दल और कुछ वे फाउंडेशन या मेमोरियल, जो उनके मरणोपरांत स्थापित हुए हैं। कुछ आयोजनों में आस्था दिखती है और कुछ केवल दिखावे के लिए, रस्मी तौर पर ही आयोजित होते हैं। इन महाविभूतियों में सबसे प्रमुख हैं महात्मा गांधी, जिनकी छाप मानव-चिंतन पर अजर-अमर है। भारत में हम उनके आदर्शों से विमुख हो गए हैं। यह प्रश्न अनेक विदेशी विचारकों ने कॉन्फ्रेंस और गोष्ठियों में अकसर उठाया है कि भारत में गांधी कहाँ हैं? फिर भी हम कहना चाहेंगे कि गांधी भारत के जनमानस में ऐसे घुल-मिल गए हैं कि कोई उनको अलग नहीं कर सकता। किसी ने कहा है कि भारत के गाँव में रहनेवाला व्यक्ति भी एक दार्शनिक होता है, वह परमात्मा, भाग्य, जीवन-मूल्यों, सत्य, जीवन-लक्ष्य संबंधी बातें उतनी ही सुगमता से करता है, जितनी कि वह अपनी दैनिक समस्याओं और कष्टों के विषय में। गांधी के जन्मदिवस २ अक्तूबर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी महत्ता दी है, उसके महत्त्व को ‘अहिंसा दिवस’ के रूप में रेखांकित किया। हम इस दिन को प्रतिवर्ष सौहार्द और आपसी भाई-चारे के रूप में मनाते हैं। हम प्रयत्नशील हैं कि समावेशी नागरिक राष्ट्रीयता की भावना को अपने दैनिक व्यवहार में उतार सकें। गांधीजी किसी भी प्रकार के सम्मान-पुरस्कार से कहीं बडे़ हैं। गांधी की विचारधारा के विश्वव्यापी प्रभाव को विश्व के अनेक राजनेताओं और चिंतकों ने स्वीकारा है। गांधीजी का संपूर्ण साहित्य (भाषण, लेखन आदि) सौ ग्रंथों में प्रकाशित हो चुका है और ऑनलाइन भी उपलब्ध है। कहीं-न-कहीं गांधी के व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन-दर्शन पर शोध चलता ही रहता है। गांधी की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करनेवाले उनकी कृतियों के बहुत से संचयन भी हैं, जो अत्यंत उपयोगी हैं। संचयनकर्ताओं ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार इनमें सामग्री सम्मिलित की। सबसे पहले यह प्रयास सी.एफ. एंड्रूज ने किया। अनेकों और भी संकलन हैं, पर हम केवल एक संचयन की चर्चा करना चाहेंगे, जिसका संकलन प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. एन.के. बोस ने किया, जो गांधी के साथ नोआखाली में रहे। उन्होंने गांधीजी के साथ अपने अनुभवों को ‘माई डेज विद गांधी’ में भी रेखांकित किया है। ऐसा नहीं कि गांधी कटु आलोचना के शिकार नहीं रहे। गांधीजी से गलतियाँ भी हुईं। हम उनको भगवान् नहीं मानते, वैसे परमात्मा भी आलोचनाओं से परे नहीं है। जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने तो बहुत पहले घोषणा कर दी थी कि गॉड इज डेड। गांधी की महत्ता उनके जीवन को सही परिपे्रक्ष्य और समग्रता में देखने में है, विशेषतया उनके जीवन के अंतिम वर्षों की दिनचर्या में, जब उनके राजनीतिक शिष्य जैसे नेहरू और पटेल भी गांधीजी केपरामर्श के प्रति उदासीन हो गए थे और गांधी एक प्रकार से अपने को कांग्रेस की राजनीति में असहज व अनाथ महसूस करने लगे थे। वह मर्मस्पर्शी अध्याय प्यारेलाल की लिखित गांधी की विशद जीवनी के अंतिम भाग ‘द लास्ट फेज’ में देखा जा सकता है। तेंदुलकर के आठ वॉल्यूम की जीवनी का अंतिम भाग भी इस प्रकरण पर प्रकाश डालता है। नेल्सन मंडेला ने कहा था कि ‘एक साधारण व्यक्ति की तरह गांधी अफ्रीका गए थे और अफ्रीका ने उन्हें महात्मा बनाकर भारत भेजा।’ कई मायनों में यह सही है, पर हम समझते हैं कि वास्तव में गांधी का महात्मत्व उनके जीवन के अंतिम दो वर्षों में अपने चरम पर था, जब वे अपने को असहाय मान रहे थे। उन्होंने कहा भी कि उनकी बात अब कोई नहीं सुनता, किंतु वही उनके जीवन का ऐसा प्रकरण था, जिसने उन्हें कालजयी बना दिया और उनके कथन तथा आदर्शों को कालातीत।

एक आश्चर्यजनक बात यह है कि पिछले वर्षों से गांधीजी के विषय में भारतीय मूल के लेखकों और विदेशी लेखकों की बहुत अच्छी-अच्छी पुस्तकें आ रही हैं। वैसे गांधीजी ने जीवन का कोई भी पक्ष या समस्या नहीं है, जिस पर अपने विचार कभी अपने संपादकीय में, पत्राचार और भाषणों में व्यक्त न किए हों। गांधीजी के अनुसार व्यक्ति के जीवन और समाज का कोई पक्ष एक-दूसरे से अलग नहीं है। एक-दो पुस्तकों की हम यहाँ चर्चा करना चाहेंगे। कुछ समय पहले ‘गांधी और स्टोइक्स’ शीर्षक से रिचर्ड सोरावजी की एक पुस्तक आई थी। स्टोइक्स ग्रीक दार्शनिकों का एक वर्ग था, जिसकी विचारधारा का प्रारंभ जेनो नामक दार्शनिक से हुआ और रोमन शहंशाह मारकस आरेलियस, जिनके वचन जग-प्रसिद्ध हैं, उस विचारधारा के अनुयायी हो गए थे। पुस्तक का उपशीर्षक है ‘Modern Experiments On
Ancient Values’, जो प्राचीन दर्शन और आज के प्रयोगों को जोड़ता, एक निरंतरता का आभास देता है। लेखक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के योगदान से ऊपर उठकर एक बृहत् ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में गांधीजी की विचारसरणी धारा का विश्लेषण करता है, जो सोचने के लिए नए मानसिक वातायन खोलता है तथा गांधीजी को एक दार्शनिक रूप में प्रतिष्ठापित करता है। गांधीजी को समझने के लिए लेखक एक नई प्रणाली प्रस्तुत करता है। दूसरी पुस्तक है एंथोनी जे. पटेल द्वारा रचित ‘पैक्स गांधियाना: द पॉलिटिकल फिलॉसफी ऑफ महात्मा गांधी’। एंथोनी पैरल गांधी दर्शन या विचारधारा के एक प्रतिष्ठित विद्वान् हैं। गांधीजी पर उनका अध्ययन बहुत गहरा है। उन्होंने गांधीजी पर बहुत कुछ लिखा है। ‘हिंद स्वराज’ पर उनकी लिखी व्याख्या बहुत सराही गई है। पुस्तक में लेखक ने कहा है कि गांधीजी केवल पॉलिटिकल स्टे्रजिस्ट अथवा राजनैतिक दाँवपेंच वाले नहीं हैं, प्रत्युत एक राजनीतिक दार्शनिक हैं। गांधीजी स्वयं कहते थे कि वह कोई सिस्टम बनानेवाले नहीं हैं, परिस्थितियों के अनुसार उनके विचार बनते हैं। लेखक का अपने विद्वत्तापूर्ण विवेचन में यह प्रस्थापित करने का प्रयास हुआ है कि गांधीजी की सोच और कार्यप्रणाली के पीछे एक अवधारणा है, एक कॉन्सेप्ट है, जो उनके पूरे राजनीतिक दर्शन को निर्धारित करता है। तर्कों के साथ विद्वान् लेखक उसे उजागर करता है। दोनों पुस्तकें अपने में अद्भुत हैं और गांधी को नए प्रकाश में प्रस्तुत करती हैं। देश में प्रतिवर्ष गांधीजी पर डॉक्टरेट के काफी थीसिस छपते हैं, पर उनमें कोई नयापन नहीं दिखाई देता है। सब एक लकीर के फकीर हैं। ये दोनों पुस्तकें गांधीजी का अध्ययन करने और समझने के नए चिंतनशील मार्ग प्रस्तुत करती हैं, अतएव पठनीय हैं।

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री

दो अक्तूबर को ही देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जन्मतिथि है। दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सीमित रहा, किंतु उन्होंने जनमानस पर एक अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने ‘जय किसान, जय जवान’ का नारा दिया, कहने की आवश्यकता नहीं, उसकी देश को आज भी उतनी ही आवश्यकता है। उसके मर्म को समझना चाहिए। १९६५ में पाकिस्तान के आक्रमण केसमय जिस साहस का परिचय दिया, जो मार्गदर्शन प्रदान किया, उसने १९६२ के चीन के आक्रमण के उपरांत देश में जो हताशा का एक वातावरण बन गया था, उसको दूर किया। देश की जनता में एक नई स्फूर्ति और आत्मविश्वास प्रस्फुटित हुआ। उनकी धर्मपत्नी ललिताजी ने जो संस्मरण लिखे हैं, उनसे पता चलता है कि किन जीवन-मूल्यों से उनका व्यक्तित्व निर्मित हुआ था। वे सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। उनके साथ काम करनेवाले उच्च अधिकारियों, जैसे एल.पी. सिंह और राजेश्वर प्रसाद ने भी अपने संस्मरण लिखे हैं, जिनसे उनकी अनूठी राजनैतिक पहुँच, प्रशासनिक पैठ, क्षमता तथा जनता के हितों के प्रति समर्पण भावना का आभास होता है। अन्य लोगों ने भी अपनी-अपनी भावनाएँ और अनुभव लिखे हैं। भारत जैसे विशाल और अनगिनत समस्याओं से ग्रसित देश का शासन कैसे किया जाए, ताकि देश की एकता सुरक्षित रहे, और हम आगे बढ़ते रहें, इस संदर्भ में उनकी संपूर्ण जीवनी (अंग्रेजी और हिंदी) में सी.पी. श्रीवास्तव ने लिखी, वह आज के राजनेताओं को पढ़नी चाहिए। सही मायने में उसका उपशीर्षक है—A Life in Truth ‘सत्य की जिंदगी’। किन कठिनाइयों से शास्त्रीजी को गुजरना पड़ा। शास्त्रीजी ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया, रेल मंत्री की हैसियत से रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए। उनकी मृत्यु के बाद जब देश को उनके बैंक-खाते की जानकारी हुई, तो सब स्तब्ध रह गए। देश को ईमानदारी का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला। जनजीवन में नैतिकता की रक्षा करते हुए कैसे राजनीतिक दायित्वों का निर्वाह किया जा सकता है, उसकी शिक्षा आज के नेताओं को शास्त्रीजी के जीवन से लेनी चाहिए। इसीलिए वे सबके आदर के पात्र हैं। ऐसी ही विभूतियों के लिए संत कबीरदास ने कहा है—‘दास कबीरा जतन से ओढ़ी, ज्यों-की-त्यों धर दीनी चदरिया।’

आचार्य नरेंद्र देव

आज की पीढ़ी में आचार्य नरेंद्रदेव के कार्य और नाम को कितने लोग जानते हैं। एक-आध शायद यह कह दें कि वे एक समाजवादी नेता थे, इससे अधिक नहीं। आचार्य नरेंद्र देव का जन्म ३१ अक्तूबर, १८८९ और निधन १९ फरवरी, १९५६ में हुआ। प्रारंभ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बाद में बनारस से उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। उनका व्यक्तित्व और विचारधारा भारतीय संस्कृति व दार्शनिक धरोहर से प्रभावित थी। बचपन से ही वे पिता के प्रभाव में कांग्रेस से जुड़ गए। उस समय जब कांग्रेस में दो दल हो गए थे—एक उदारवादी कहलाता और दूसरा उग्रवादी। उनकी सहानुभूति उग्रवादी दल के साथ हो गई, जिसके नेता थे लोकमान्य तिलक और अरविंद घोष। उनकी रचनाओं ने युवा नरेंद्र को बहुत प्रभावित किया और उनके लेखों तथा भाषणों को वे बडे़ चाव से पढ़ते थे। गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के बाद उन्होंने अपनी वकालत छोड़ दी और सक्रिय राजनीति में भाग लेने लगे। आंदोलन में सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार हो रहा था, बनारस में काशी विद्यापीठ की स्थापना हुई और वे वहाँ पढ़ाने लगे। बाद में वहाँ के कुलपति बने। काशी विद्यापीठ से ही लाल बहादुरजी ने ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की, जो उनके नाम का अभिन्न अंग बन गई। आचार्य नरेंद्रदेव पर कार्ल मार्क्स के विचारों का बहुत प्रभाव पड़ा, किंतु वे स्टालिनवाद के कटु आलोचक रहे। भारतीय दर्शन के साथ उन्होंने बुद्धधर्म का गहन अध्ययन किया। गांधीजी के विचारों और कार्य प्रणाली का भी उनपर प्रभाव रहा। १९३४ में जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई, आचार्य नरेंद्रदेव उसके अध्यक्ष बनाए गए। १९२९ में ही उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को आर्थिक पुनर्रचना का कार्यक्रम बनाने के लिए लिखा था। उच्च जीवन-आदर्श, सादा जीवन तथा मजदूर, किसान व वंचितों के उन्नयन के प्रयासों से वे निरंतर जुड़े रहे। कांगे्रस में वे कार्यकारिणी समिति के सदस्य भी रहे। समाजशास्त्र, इतिहास और दर्शन के वे अप्रतिम विद्वान् थे। उनकी विद्वत्ता से नेहरू बहुत प्रभावित थे। वे अवसरवादिता से कोसों दूर रहते थे। गांधीजी ने एक बार मौ. आजाद के इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया, पर नेहरू सहमत नहीं हुए। जब कांगे्रस ने निर्णय लिया कि उसके अंतर्गत और पार्टियाँ नहीं रह सकतीं, तो वे कांग्रेस से सोशलिस्ट पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ अलग हो गए। सोशलिस्ट पार्टी की उठापठक से वे बहुत चिंतित थे और निरंतर एकता बनाए रखने की कोशिश की, पर सफल नहीं हुए। उनका बौद्ध धर्म दर्शन पर लिखा ग्रंथ उनके पांडित्य का प्रतीक है। उनसे मिलने का केवल एक बार सुअवसर हमें जयपुर में प्राप्त हुआ, जहाँ सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकारणी की बैठक थी। शुरू से ही उनका स्वास्थ्य कमजोर था। दमे की बीमारी थी। वहाँ कुछ अधिक अस्वस्थ हो गए। मुख्यमंत्री सुखाडि़या ने हमें आदेश दिया कि आचार्यजी से मिलकर उनकी ओर से नरेंद्रदेवजी के स्वास्थ्य के बारे में पूछताछ करूँ तथा यह भी पूछूँ कि किसी प्रकार की और कोई आवश्यकता तो नहीं है। जब हम आचार्यजी से मिले, प्रणाम किया तो उन्होंने बडे़ स्नेहपूर्वक आश्वस्त किया कि उनकी चिकित्सा ठीक चल रही है, कोई कमी नहीं है और मुख्यमंत्री को धन्यवाद देने को कहा। हमसे भी हमारे बारे में कुछ व्यक्तिगत प्रश्न किए और मुझे आशीर्वाद तथा धन्यवाद दिया।

जमीन पर एक सादे कालीन पर एक गावतकिया के सहारे लेटे हुए। कुछ अन्य सोशलिस्ट नेता उनके पास बैठे थे। वे सही मायनों में अजातशत्रु थे। नरेंद्रदेवजी केव्यक्तिगत संबंध राजनीति के परे थे। वे नैतिकता और मूल्यों के बडे़ हामी थे। चूँकि वे उत्तर प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के टिकट पर चुने गए थे, कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। यह कानूनी दृष्टि से उस समय आवश्यक नहीं था, पर नैतिक दृष्टि से उन्होंने यह आवश्यक माना। आचार्यजी दो विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे—लखनऊ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के। कुलपति के दायित्व केबावजूद वे कुछ क्लास भी लेते थे। छात्रों में उनकी लोकप्रियता इससे पता चलती है कि जब उनसे लखनऊ से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जाने का अनुरोध किया गया, तो लखनऊ विश्वविद्यालय में हड़ताल हुई कि वे वहाँ से इस्तीफा न दें और बनारस में हड़ताल कि उन्हें आने में देरी क्यों हो रही है? बड़ी मुशकिल से समझौता हुआ और आचार्यजी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का दायित्व सँभाला। राजनीति और विश्वविद्यलयों के अपने दायित्वों के बीच उन्होंने स्वस्थ सामंजस्य स्थापित किया था। एक गंभीर व्यक्तित्व और बहुमुखी विद्वत्ता के धनी आचार्यजी काफी मजाकिया भी थे। पं. गोविंदवल्लभ पंत एक दिन अपने मित्र आचार्यजी से मिलने गए, जो दारुलशफा में रह रहे थे। कुछ समय के बाद कुछ गधों की डेंचू-डेंचू की आवाज आई। पंतजी ने कहा कि क्या यहाँ गधे भी रहते हैं। आचार्यजी ने कहा कि हाँ, कभी-कभी आ जाते हैं। पास बैठे लोगों में हँसी के फव्वारे छूटने लगे थे। ऐसे थे आचार्य नरेंद्रदेव, जिनको हम श्रद्धा और आदर से स्मरण करते हैं। यह संतोष का विषय है कि उनकाअंग्रेजी और हिंदी केआलेखों और भाषणों का संकलन कई भागों में प्रकाशित किया है नेहरू मेमोरियल और लाइब्रेरी ने, जिसके द्वारा हम उनके व्यक्तित्व और विचारों से परिचित हो सकते हैं।

सरदार वल्लभभाई पटेल

जब कभी देश की एकता बनाए रखने का प्रश्न उठता है तो सरदार वल्लभभाई पटेल की चर्चा अवश्य होती है। सरदार पटेल का जन्म ३० अक्तूबर, १८७५ को हुआ। वे बडे़ जीवट और आत्मानुशासन के व्यक्ति थे। अदालतों में प्रैक्टिस करने के लिए उन्होंने प्लीडर का इम्तिहान पास किया। उनकी फौजदारी वकालत की प्रैक्टिस चलने लगी। आवश्यक धन-उपार्जन के पश्चात् वे बैरिस्टरी की उपाधि के लिए इंग्लैंड जाना चाहते थे। उनके बड़े भाई विट्ठलभाई भी प्लीडर थे, बैरस्टरी के लिए भरती के कागजात आदि आए, वह विट्ठलभाई को मिले। विट्ठलभाई भी बैरिस्टर बनने केलिए विलायत जाना चाहते थे। अतएव उन्होंने कहा कि वे बड़े हैं, पहले वे बैरिस्टरी की डिग्री हासिल करने जाएँगे। वल्लभभाई सहर्ष राजी हो गए। अंग्रेजी में दोनों के नाम वी.जे. पटेल ही थे, इसलिए कोई कठिनाई नहीं हुई। वल्लभभाई बाद मेें विलायत गए। बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल सेंट्रल एसेंबली के पहले चुने हुए भारतीय अध्यक्ष थे और वे वायसराय तथा नौकरशाहों से टक्कर लेने में कभी नहीं हिचकिचाते थे। वे स्वराज पार्टी के सदस्य थे। वल्लभभाई केआत्मानुशासन का एक विरला उदाहरण है कि वे एक फौजदारी मुकदमे में बहस कर रहे थे, उसी समय उनको एक टेलीग्राम मिला। देखकर जेब में रख लिया। उसमें उनकी पत्नी के निधन का दुखद समाचार था। यह सबको बाद को पता लगा। सरदार ने बहस जारी रखी। सरदार के लिए उनका कर्तव्य सर्वोपरि था। वल्लभभाई पटेल की प्रशासनिक क्षमता और नेतृत्व के गुण तब उजागर हुए, जब वे अहमदाबाद म्यूनिसिपैलिटी के अध्यक्ष बने और कार्यक्षमता दिखाई और जिस प्रकार उन्होंने बारदोली किसानों का आंदोलन चलाया, उससे प्रभावित होकर देश ने उनको ‘सरदार’ का सम्मान प्रदान किया, जो उनके नाम के साथ जुड़ गया, जैसे लोकमान्य, लोकनायक आदि। कांग्रेस के संगठन को उन्होंने मजबूत बनाया। चुनावों में उनकी अहम भूमिका रहती थी। भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी अहम भूमिका रही। उसको रेखांकित करना आवश्यक है।

वे गांधीजी की कही बात को कभी नकारते नहीं थे, यद्यपि उनसे हमेशा स्पष्टता से बात करते। हालाँकि १९२९ में उनको प्रांतीय कांग्रेस इकाइयों से नेहरू से कहीं अधिक समर्थन मिला था, पर गांधीजी के कहने पर पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया, क्योंकि मोतीलाल चाहते थे कि उनका पुत्र उनके बाद कांग्रेस का राष्ट्रपति बने। १९४६ में भी यही हुआ। गांधीजी के कहने से सरदार पटेल ने अपना नाम वापस ले लिया। नेहरू का भारत के प्रधानमंत्री बनने का मार्ग साफ हो गया। अंतरिम सरकार में और उसके बाद सरदार का ध्यान इसी पर केंद्रित था कि भारत के हित सुरक्षित रहें। देश के विभाजन के उपरांत नेहरू के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री (उपप्रधानमंत्री) के रूप में उनकी सेवाएँ अविस्मरणीय हैं। देसी रजवाड़ों का एकीकरण, हैदराबाद, राजकोट का भारत संघ में विलय उन्हीं की देन है। नेहरू के अनिर्णय की स्थिति में भी पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण का सामना करने के लिए रातोरात फौज, वायुसेना को भेजना बड़ी दूरदर्शिता का काम था। पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कबीले श्रीनगर हवाई अड्डे तक पहुँचनेवाले थे। उन्होंने नेहरू को चीन के संभावित खतरों से आगाह करते हुए पत्र लिखे। काश, हम उस समय चेत गए होते तो १९६२ की शर्मिंदगी से बच सकते थे! सरदार पटेल ने परिवार से अपने को अलग रखा। कोई उन पर उँगली नहीं उठा सका। सादगी और गीता के स्थितप्रज्ञता की प्रतिमूर्ति थे। उनको प्रतिक्रियावादी भी कहा गया, परंतु सरदार पटेल जमीनी सत्य को टटोलते और तब अपने निर्णय लेते थे। वे न किसी आइडियोलॉजी से बँधे हुए थे और न ही प्रेरित थे। सरदार पटेल के जीवनी लेखक टी.बी. तहमानकर ने सरदार की कार्यप्रणाली का एक नए दृष्टिकोण से आकलन किया है। उन्होंने लिखा है, ‘‘यह दिलचस्प बात समझने की है कि पटेल ने गांधी को अपना गुरु स्वीकार किया, किंतु उन्होंने अनुसरण लोकमान्य तिलक के व्यावहारिक दर्शन का किया, उसी प्रकार जैसे गांधी ने स्वयं उग्रवादी तिलक का अनुकरण किया, यद्यपि वे नम्र और उदारवादी गोखले को अपना गुरु मानते थे। यह गुण था उनकी कृषक उत्पत्ति (ओरिजिन) का कि हल पर अगर एक बार हाथ रखा तो पीछे नहीं देखा। सरदार पटेल ने अगर कोई निश्चय किया तो उसको पूरा करकेही दम लिया।

सरदार मुसलिम विरोधी नहीं थे, जैसा कि उनके कुछ विरोधियों द्वारा प्रचारित किया गया। वे चाहते थे कि भारत विभाजन के बाद सबकी वफादारी भारत के प्रति होनी चाहिए। उस समय मुसलिम लीग के कई शीर्ष नेता भारत के प्रति शपथ लेकर चुपचाप पाकिस्तान भाग गए थे। आज का भारत सरदार पटेल की देन है। देश में अराजकता के दौर में किस प्रकार शासन व्यवस्था स्थापित की जा सके, उस ओर उनका ध्यान था। किस प्रकार सक्षम अधिकारियों से अधिकाधिक काम लिया जा सकता है, यह सरदार पटेल ने उदाहरण प्रस्तुत कर दिखा दिया। यह समय विस्तार से इन मुद्दों में जाने का नहीं है। यहाँ संकेत मात्र ही संभव है सरदार पटेल द्वारा देश के हित में की गई सेवाओं का। ‘मैनचेस्टर गार्डियन’ विलायत केएक प्रसिद्ध समाचार-पत्र ने सरदार पटेल केनिधन के बाद लिखा था, ‘‘पटेल केबिना गांधीजी के विचार का कम व्यावहारिक प्रभाव होता और नहरू की आदर्शवादिता को कम ही स्थान (स्कोप) प्राप्त होता। पटेल न केवल स्वातंत्र्य युद्ध की व्यवस्था करनेवाले थे, प्रत्युत युद्ध समाप्त होने पर एक नए राज्य केशिल्पकार। एक व्यक्ति बहुत कम सफल होता है, एक विद्रोही (केवल) और राजनेता (स्टेट्समैन) की तरह सरदार पटेल इसेएक अपवाद थे।’’ विडंबना यह कि १९५२ में प्रारंभ किया गया ‘भारत रत्न’ का सम्मान सरदार पटेल को राजीव गांधी के साथ मिला, जबकि उनके समकालीन बहुत पहले ही भारत रत्न से नवाजे जा चुके थे। वह भी तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दबाव के कारण ही संभव हो सका। सरदार पटेल की एक अच्छी, शोधपूर्ण जीवनी कोणार्क प्रकाशन, दिल्ली द्वारा संशोधित रूप में पुनः प्रकाशित हुई। उसके रचयिता हैं स्व. पी.एन. चोपड़ा, जिन्होंने सरदार पटेल के भाषणों, लेखों आदि का १५ भागों में संकलन किया था। यह पुस्तक अत्यंत पठनीय है और सरदार पटेल के व्यक्तित्व व कृतित्व का समुचित और समुचित प्रस्तुतीकरण है।

सिस्टर निवेदिता व उनका अवदान

अब हम एक ऐसी महिला की कुछ चर्चा करना चाहेंगे, जो जन्मना भारतीय नहीं थीं, किंतु जो  शनैः-शनैः भारतीयों से अधिक भारतीय बन गईं और अपना पूरा जीवन भारत को समर्पित कर दिया। यह प्रक्रिया स्वामी विवेकानंद के संपर्क से हुई। महिला का नाम है सिस्टर (भगिनी) निवेदिता। उनका जन्म २८ अक्तूबर, १८६७ को आयरलैंड में हुआ। घर का वातावरण न केवल परोपकारी था, वरन् आयरलैंड की स्वतंत्रता का पक्षधर भी था। इसका प्रभाव मारग्रेट नोबल पर पड़ा। हैलीफैक्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने शिक्षक का दायित्व अपने लिए चुना। फ्रोबेल, पेस्टोलॉजी आदि शिक्षाशास्त्र के उस समय के प्रख्यात शिक्षाविदों की पढ़ाने की नवीन शैली उन्हें पसंद आई। कई स्थानों और कई स्कूलों में पढ़ाने के बाद उन्होंने १८९४ में विंबलडन में अपना किंडरगारटेन स्कूल खोला। वे १८९५-९६ में स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित हुईं। वेदांत भाव आंदोलन का प्रारंभ इ.टी. स्टर्जी के साथ मिलकर किया और उसके विषय में ‘ब्रह्मवादिन’ पत्रिका, जो मद्रास से निकलती थी, संपादन किया। अकाल पीडि़तों की सहायता के लिए जो कार्य रामकृष्ण मिशन कर रहा था, उसके लिए धन एकत्र करना शुरू किया। स्वामी विवेकानंद से भारत में कार्य करने की अपनी इच्छा प्रकट की, किंतु स्वामीजी ने उनको हतोत्साहित करने की कोशिश की, भारत जैसे पिछड़े और गरीब देश में कार्य करने की कठिनाइयों से अवगत कराया। अंत में स्वामीजी ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया, क्योंकि स्वामीजी महिला शिक्षा को अत्यंत महत्त्व देते थे और उनका विश्वास था कि भारत का भविष्य महिला शिक्षा और युवाओं को मार्गदर्शन देने से ही उज्ज्वल होगा। उसमें मारग्रेट नोबेल की भूमिका रहेगी। सिस्टर निवेदिता ने स्वयं लिखा है कि स्वामीजी ने एक बार गंगा पर इशारा करते हुए कहा कि वहाँ वह महिलाओं का एक कन्वेंट, अर्थात् मठ और आश्रम चाहते हैं। एक चिडि़या की तरह जिसको दो पर उड़ने केलिए चाहिए, वैसे ही भारत को शिक्षित पुरुषों और शिक्षित महिलाओं की आवश्यकता है। यहाँ से मारग्रेट नोबेल का भारतीय अध्याय प्रारंभ होता है। स्वामीजी मारग्रेट को ‘मारगोट’ जैसा आइरिश भाषा में है, कहकर संबोधित करते थे। २८ जनवरी, १८९८ में मारग्रेट कलकत्ता पहुँचीं और स्वामीजी ने बंदरगाह पर उनका स्वागत किया। कहानी लंबी है। आगे की चर्चा हम सिलसिलेवार नहीं करेंगे। उनकी भारत की बहुमुखी सेवाओं, उनकी भारत के लिए क्या अपेक्षाएँ और आशाएँ थीं तथा उन्होंने भारत के हित में क्या-क्या प्रयास किए, उनका संक्षेप में जिक्र करेंगे।

खेद की बात यह है कि जिनको स्वामी विवेकानंद ने निवेदिता नाम दिया और जो अंत तक अपने को ‘निवेदिता ऑफ रामकृष्ण-विवेकानंद’ कहती रहीं, उनकी कोई भी जीवनी निवेदिता कीमृत्यु के बाद प्रकाशित नहीं हुई। इसका श्रेय एक फ्रेंच साधिका लिजेल रेमंड को जाता है, जिन्होंने निवेदिता की मृत्यु के ४० वर्ष बाद उनकी पहली जीवनी लिखी और जो अंग्रेजी में भी अनुवादित हुई। उन्होंने भगिनी निवेदिता के पत्र एकत्र किए और उनका उपयोग अपने लेखन में किया। पत्राचार में व्यक्ति अपने हृदय की बात खोलकर रखता है। शंकरी प्रसाद बसु  के प्रयास  से अब वे पत्र दो भागों में प्रकाशित हुए हैं, उनसे भगिनी निवेदिता के विचारों और संबंधों पर प्रकाश पड़ता है। तीसरा भाग और छपना था, पर वह न हो सका, और वह कहाँ है, यह भी पता नहीं है। अपने यहाँ पहले प्राव्रजिका आत्मार्पण ने उनकी अंग्रेजी जीवनी लिखी और निवेदिता के पत्रों का भी उपयोग वे कर सके। रेवा सोम की लिखी सिस्टर निवेदिता की नई जीवनी मारघोट पेंगुइन द्वारा प्रकाशित हुई है। ‘प्रबुद्ध भारत’ का जनवरी २०१७ का अंक सिस्टर निवेदिता पर केंद्रित है, जो पठनीय है। हम आशा करते हैं कि उसका हिंदी संस्करण पुस्तकाकार हिंदी भाषा-भाषियों को उपलब्ध होगा। इस वर्ष भगिनी निवेदिता का १५०वाँ जन्मवर्ष है। इस उपलक्ष्य में रामकृष्ण मठ और मिशन तथा रामकृष्ण-शारदा मठ एवं मिशन अपने ढंग से १५०वीं जयंती मना रहे हैं। अच्छा होता कि सरकार भी कुछ आयोजन करती। इससे महिला जगत् को एक नया संदेश जाता। स्वामीजी के आदेशानुसार महिलाएँ शिक्षा और अपने व्यक्तित्व को विकसित करें, भगिनी निवेदिता जहाँ जातीं, महिलाओं से यही कहा करती थीं। केंद्र सरकार के कार्यक्रमों में निवेदिता के भाषण, आलेख और पुस्तकें  बहुत उपयोगी  हैं, विशेषतया राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत् करने, प्रबुद्ध नागरिकता के आदर्शों को अपनाने, आत्मविश्वास और स्वावलंबी बनने, पश्चिम की नकल के स्थान पर अपना मार्ग स्वयं खोजने के सिलसिले में उसका साहित्य अत्यंत सामयिक है। अंग्रेजी में चार भागों में उनका साहित्य अब उपलब्ध है। कम-से-कम एक संचयन तो हिंदी में भी उपलब्ध होना ही चाहिए। सरकार के सहयोग से उनका पूरा साहित्य हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में प्राप्त हो सके, यह प्रयास होना चाहिए। नेहरू मेमोरियल और लाइब्रेरी भगिनी निवेदिता के बहुपक्षीय अवदान पर एक तीन दिवसीय गोष्ठी का आयोजन कर सकती है और उसमें पढ़ने योग्य आलेखों को पुस्तकाकार छाप सकती है। श्रीअरविंद के कलकत्ता से चंद्रनगर और उसके बाद पांडिचेरी जाने के पहले उन्होंने अपने अंग्रेजी पत्र ‘कर्मयोगी’ का दायित्व सिस्टर निवेदिता को दिया, जो निवेदिता ने पूरी तरह निभाया। उसके एक अंक में उन्होंने भारत के प्रति अपने दृष्टिकोण को इस प्रकार व्यक्त किया, जो आज भी प्रासंगिक है—

‘‘मेरा मानना है कि भारत एक अभेद्य, अविभाज्य देश है। राष्ट्रीय एकता समान नाम, समान उद्देश्य और समान प्रेम के आधार पर बनती है। वह शक्ति जो वेदों और उपनिषदों में, धर्मों और साम्राज्यों के गठन में, विद्वानों के ज्ञान में और संतों के ध्यान में दृढ रही है, वह एक बार फिर हमारे बीच जन्म ले चुकी है और उसका नाम आज राष्ट्रवाद है। मेरा विश्वास है भारत के वर्तमान की जडें़ इसके अतीत में समाहित हैं और इसके आगे एक उज्ज्वल भविष्य है। हे राष्ट्रवाद, तुम सुख या दुःख की तरह, चाहे मान या अपमान की तरह मेरे जीवन में आना। मुझे पूर्णतयाः अपना बना लो!’’

निवेदिता के जीवन का पहला अध्याय इंग्लैंड का था और दूसरा अध्याय स्वामी विवेकानंद का प्रशिक्षण था कि किस प्रकार भगनी निवेदिता को देश की दशा से परिचित कराया जाए, किस प्रकार उनको रामकृष्ण मठ और परंपरा तथा नियमों के अनुसार ढाला जाए, किस प्रकार उनको महिला शिक्षा के कार्य में लगाया जाए, किस भाँति कलकत्ता के विशिष्ट लोगों से परिचित कराया जाए और निश्चित हो कि भारत के बृहत् भविष्य में उनकी क्या भूमिका होनी चाहिए। उसके लिए उनकी तैयारी कैसे कराई जाए। पहले आशंका थी कि पता नहीं विदेशी महिला को माँ शारदा देवी और मठ के अन्य सहयोगी स्वीकार करते हैं या नहीं। माँ शारदा ने उनको बेटी के रूप में स्वीकारा और उनके स्नेहपूर्ण संबंध रहे। स्वामीजी ने सिस्टर निवेदिता को ब्रह्मचारिणी की शपथ दिलाई। उन्होंने दीक्षा भी ली, वे अपने प्रति व्यक्तिगत सम्मोहन के विरुद्ध उनको आगाह करते रहे। यही नहीं, एक जापानी कलाकार और सार्वजनिक कार्यकर्ता ओकाकुरा काकूजो, जो एशिया के सब देशों की एकता का प्रचारक बनकर भारत आए और स्वामीजी तथा निवेदिता के संपर्क में भी आए, और निवेदिता उसके विचारों और व्यक्तित्व से कुछ अधिक ही प्रभावित होती जान पड़ीं। स्वामीजी को भान हुआ कि एक व्यक्तिगत आकर्षण भी पनप रहा है तो उन्होंने तुरंत निवेदिता को सावधान किया। ये ऐसे नाटकीय प्रकरण तथा मनोवैज्ञानिक गुत्थियाँ हैं, जिनके मध्य से निवेदिता निकली। स्वामीजी देश का संपर्ण पूर्णनिर्माण चाहते थे, उसमें देश की स्वतंत्रता एक पक्ष था, पर वे नहीं चाहते थे कि इसमें एक विदेशी हस्तक्षेप करे। इस अंक में भगिनी निवेदिता पर एक संक्षिप्त लेख सम्मिलित है तथा उनके बारे में जो अन्य महत्त्वपूर्ण बातें हैं, भविष्य में सामग्री प्रस्तुत करने की चेष्टा करेंगे। प्लेग और अकाल का प्रकोप जब बंगाल में हुआ, तो स्वामीजी की प्रेरणा से युवकों के साथ मिलकर अथक सहायता कार्य निवेदिता ने किया एवं सर्वसाधारण भी उन्हें जानने लगे। स्वामीजी उनसे समय-समय पर अनेक विषयों पर भाषण भी दिलवाते थे। पहला भाषण मठ में था। काली की अवधारणा पर उनका भाषण बहुत चर्चित हुआ, बाद में निवेदिता ने उसपर पुस्तक भी लिखी।

विश्वविख्यात समाजशास्त्री पैट्रिक गेड्स से उन्होंने सीखा कि भारतीय समाज का, गाँवों के रीति-रिवाजों तथा वहाँ की जीवन-शैली का कैसे अध्ययन किया जाए। उन्होंने इस पर लेख और पुस्तकें लिखीं। कुछ समय भारत में रहने के बाद उन्हें यह एहसास हो गया कि ब्रिटिश शासन एक अभिशाप है और उसके रहते भारत का विकास संभव नहीं है। वे एक गोपनीय क्रांतिकारी समिति ‘अनुशीलन समिति’ की सदस्या बनीं। वे युवकों को प्रोतसाहित करतीं, आवश्यक साहित्य उपलब्ध करातीं और सहायता भी करतीं। स्वामीजी के विषय में उनकी दो पुस्तकें, खासकर ‘द मास्टर ऐज आई सा हिम’ अर्थात् ‘स्वामी को जैसा मैंने देखा’ अत्यंत रोचक है। हिंदी में उसका अनुवाद आवश्यक है। भारत में स्वामीजी के साथ उन्होंने काफी भ्रमण किया और एक बार कुछ समय अमेरिका में भी साथ रहीं। भारत के संबंध में जो मिशनरी दुष्प्रचार कर रहे थे, उसके बारे में भाषण दिए। सिस्टर निवेदिता की गतिविधियों के कारण उनकी निगरानी भी ब्रिटिश सरकार ने शुरू दी। मठ भी उसकी चपेट में आया। रामकृष्ण मठ और आश्रम का वह शैशवकाल था, अतएव उसके कारण अध्यक्ष ब्रह्मानंदजी सरकारी कोप से चिंतित थे। सिस्टर निवेदिता ने औपचारिक रूप से अलग होने की घोषणा कर दी, किंतु स्वामी विवेकानंद के मिशन के प्रति दृढप्रतिज्ञ रहीं। मठ के प्रति उनका आदर व आस्था यथावत् था तथा माँ शारदा से उनके संबंध निरंतर प्रगाढ़ बने रहे। उन्होंने जिस स्कूल को हिंदू विधवाओं और लड़कियों के लिए स्वामीजी की प्रेरणा से प्रारंभ किया था तथा जिसका उद्घाटन माँ शारदा ने किया था, को हर प्रकार की कठिनाइयों के होते हुए उसे चलाती रहीं, यह एक प्रेरक प्रसंग है। वाइसराय लॉर्ड मिंटो की पत्नी छद्म नाम से उनके स्कूल में सिस्टर निवेदिता से मिलीं। उनके स्कूल की सराहना की और जाते हुए लेडी मिंटो ने रहस्य खोला कि वे कौन हैं। स्कूल के लिए सहायता लेना उन्हें उनसे भी स्वीकार नहीं था। कुछ विदेशी महिलाओं ने समय-समय पर उनकी सहायता कीं, क्योंकि वे स्वामी के संपर्क में आई थीं और निवेदिता से भी मित्रता हो गई। उनसे उनका पत्र-व्यवहार भी होता था।

स्वामीजी के निधन के उपरांत सिस्टर निवेदिता की राजनैतिक गतिविधियाँ और तेज हो गईं। देश में जगह-जगह उन्होंने महिलाओं तथा युवकों को जाग्रत् करने की चेष्टा की—स्वामीजी के विचारों और मिशन के आलोक में। क्रोपोटकिन से उनका परिचय था और उनकी पुस्तकें वे युवकों को पढ़ने को देती थीं। रवींद्रनाथ टैगोर और पूरे टैगोर परिवार से उनके संबंधों की चर्चा आवश्यक है। टैगोर परिवार ब्रह्म समाज का अनुयायी, न वह रामकृष्ण को अवतारी पुरुष मानता, न उसका मूर्तिपूजा में विश्वास था। सिस्टर निवेदिता उनको जोड़ने की एक कड़ी थीं। जिस पर आगे प्रकाश डाला जाएगा। टैगोर ने ही उनको ‘लोकमाता’ कहकर संबोधित किया, क्योंकि उन्होंने देखा था कि किस प्रकार वे उनकी जमींदारी के किसानों से आत्मीयता से मिलती थीं और जानकारी प्राप्त करती थीं। लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल के विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनके स्पष्टवादी और अक्खड़ स्वभाव तथा स्वतंत्र विचारों के होते हुए भी उस समय की सभी उल्लेखनीय विभूतियों से निकट के संबंध रहे, जैसे गोपालकृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक, श्रीअरविंद, विपिन चंद्र पाल, सी.आर. दास, रमेश चंद्र दत्त, जगदीशचंद्र बोस, रामानंद चटर्जी, डान सोसाइटी के संस्थापक मुकर्जी, जदुनाथ सरकार, सरला देवी आदि। विरोधी विचार के लोग भी उनकी भारत के प्रति प्रतिबद्धता के कायल थे। १९०५ के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में उपस्थित रहीं। वैज्ञानिक डॉ. जगदीशचंद्र बोस को वे सदा उनके कार्य के लिए प्रोत्साहित करती रहीं, यद्यपि सरकार उनके काम में रोडे़ अटकाती थी। उनकी पुस्तकों को लिखवाने में उन्होंने मदद की, उनके पद और सुविधाओं के लिए अंग्रेजी सरकार से लड़ने में नहीं हिचकीं। भगिनी निवेदिता के भाषण, आलेख, पुस्तकें आदि आज भी सामयिक हैं, जो आज की समस्याओं पर प्रकाश डालती हैं। देश की कलाओं, हस्त-उद्योग आदि के पुनर्जीवन के लिए प्रयास किया। होनहार कलाकारों को प्रेरणा दी कि वे पश्चिमी कलाकारों की नकल न करके जो पुरानी भारतीय विरासत है, उससे प्रेरणा लें। बंगाल कला स्कूल का इसी प्रकार प्रादुर्भाव हुआ। अवनींद्र नाथ टैगोर, असित कुमार हलदर आदि इसी की उपज थे। स्वामीजी के मिशन को सामने रखकर उनका प्रयास सदैव रहा कि भारतीय संस्कृति, विरासत, आत्मसम्मान, स्वावलंबन, गौरव का संरक्षण और विस्तार हो। यहाँ हम कहना चाहेंगे कि स्वामी विवेकानंद की जीवनी, जिसमें लिखने में उनको पश्चिम और पूर्व प्रशंसकों तथा अनुयायियों का सहयोग रहा है, उसमें सिस्टर निवेदिता का प्रमुख भाग था, जब पहला संस्करण निकला था। उसी प्रकार संपूर्ण विवेकानंद साहित्य के संकलन में उन्होंने ही प्रारंभ में सामग्री एकत्र करने और संपादित करने की पहल की। उनका निधन दार्जिलिंग में जहाँ वह डॉ. जे.सी. बोस के साथ स्वास्थ्य लाभ के लिए गई थीं, ३ अक्तूबर, १९११ को हो गया। दार्जिलिंग के नागरिकों ने उनके अंतिम संस्कार के स्थान पर एक मेमोरियल स्मारक का निर्माण किया, जिसपर अंग्रेजी में अंकित है—‘यहाँ विश्राम कर रही है सिस्टर निवेदिता, जिन्होंने अपना सर्वस्व भारत को अर्पित कर दिया।’

लिखते समय ही यह खेदजनक समाचार मिला कि दार्जिलिंग, जिसके घर में सिस्टर निवेदिता निवास करती थीं, और जहाँ उनके नाम पर ही रामकृष्ण मठ तथा आश्रम का केंद्र था, कुछ लोगों वहाँ तोड़-फोड़ की और वहाँ जो चिह्न थे, वे जमीन पर फेंक दिए, दान-पात्र को ध्वस्त कर दिया। पूजागृह में भी तोड़फोड़ की। गोरखालैंड आंदोलन के नेताओं ने कहा है कि वे निवेदिता का आदर करते हैं, यह काम कुछ अन्य उपद्रवियों का है। आशा करते हैं, इस केंद्र का पुनर्निर्माण शीघ्र होगा। भगवान् सबको सद्बुद्धि प्रदान करे।

एक और विदुषी महिला और एकरिविस्ट, जिन्होंने भारत की स्वराज्य की लड़ाई में भाग लिया, शिक्षा-क्षेत्र में कार्य किया और इंडियन नेशनल कांग्रेस की पहली महिला राष्ट्रपति निर्वाचित हुई थीं, वह श्रीमती एनी वेसेंट थीं। उनका जन्म भी १ अक्तूबर, १८४७ को लंदन में हुआ था। वे भी शिकागो की धर्मसभा में शामिल थीं थिसोसोफिस्टों की एक प्रतिनिधि के रूप में, जहाँ उनका स्वामी विवेकानंदजी से मिलना हुआ था। उसके बाद वे १८९३ में भारत में आईं और फिर यहाँ की ही हो गईं। भविष्य में उनके अवदान की झलकियाँ प्रस्तुत करने का प्रयास होगा।

‘नया ज्ञानोदय’ का सितंबर अंक हिंदी साहित्य के दो महारथियों आचार्य शिवपूजन सहाय और महापंडित राहुल संस्कृत्यायन पर केंद्रित है। दोनों की १२५वीं जयंती है। जिसके लिए अत्यंत उपयोगी सामग्री संकलित की गई है, जो इन दोनों महारथियों के अनुपम अवदान की जानकारी आज की पीढ़ी को कराएगी। मंगलमूर्ति जो स्वयं एक विद्वान् लेखक हैं, का आलेख शिवपूजन सहाय और राहुल सांस्कृतायन का पारस्परिक जीवन बहुत ज्ञानवर्धक और मर्मस्पर्शी है। विद्वान् संपादक को बहुत-बहुत साधुवाद, न केवल ऐसे सार्थक प्रकाशन के लिए, बल्कि भवदीय में अपनी सशक्त टिप्पणियों के लिए।

देश की कुछ ज्वलंत समस्याओं की चर्चा नहीं की जा सकी। सच्चा सौदा डेरे के तथाकथित गुरु गुरमीत सिंह पर बहुत कुछ मीडिया में आया है। देखना यह है कि ऐसे डेरे क्यों पनप रहे हैं? राजनेताओं से इनके कैसे संबंध हैं? क्यों इतनी संख्या में अंधभक्त हो रहे हैं? इन पहलुओं पर सर्जनात्मक रूप में विचार करने की आवश्यकता है। इसी प्रकार विवेचन होना चाहिए कि स्कूलों में बालक-बालिकाओं की सुरक्षा-व्यवस्था की। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, फर्रुखाबाद में बच्चों की अस्पतालों में बड़ी संख्या में मृत्यु हृदयविदारक है। वर्षों से यही हो रहा है। कई अन्य राज्यों में भी यही हाल है। चिकित्सा-व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई है। कैसे इस में सुधार हो, यह विचारणीय है। जेल सुधार की समस्या से भी कैसे निपटा जाए। अन्य-अन्य समस्याएँ भी हैं, जिनका व्यवस्थित रूप में विश्लेषण होना चाहिए, जिसकी चेष्टा आगे की जाएगी। इस स्तंभ में आशंका प्रकट की गई थी कि जी.एस.टी. की आड़ में मुद्रास्फीति की संभावना है। कीमतें बढ़ रही हैं। छोटे-छोटे व्यापारियों की जी.एस.टी. संबंधी दिक्कतों को देखना जरूरी है। प्रणाली का सरलीकरण होना चाहिए। उनको इंसपेक्टर राज के डर से मुक्त होना चाहिए। खेतिहर मजदूरों और कृषि की हालत डाँवाँडोल है। किसान परेशान दृष्टिगोचर होते हैं। जिस ढंग से कर्जमाफी के आश्वासन अलग-अलग राज्यों में दिए गए थे, उनसे किसान असंतुष्ट हैं। इस बढ़ते असंतोष पर व्यवस्थित रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। यह इसलिए भी जरूरी हो गया है, क्योंकि अपेक्षा से कम वर्षा हुई और कहीं-कहीं असमय हुई। २५० जिलों से अधिक पर अकाल की छाया है। अत्यंत आवश्यक है कि देश के विकास के लिए कि जमीनी हकीकतों को गंभीरता से लिया जाए, क्योंकि आर्थिक विकास की दर धीमी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जनता का पूरा विश्वास आज भी है। पर जनता को यह भी महसूस होना चाहिए कि उन्हें वास्तव में सुविधाएँ मिल रही हैं, जो आश्वासन उन्हें मिले थे, वे फलीभूत हो रहे हैं। भाँति-भाँति की विकट कठिनाइयों की संभावना आनेवाले दिनों में दिखाई दे रही है, उनके निराकरण के लिए और जनसाधारण में व्याप्त नैराश्य को दूर करने का प्रयास केंद्र और राज्य सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए, तभी नए भारत, युवा भारत  तथा सशक्त भारत की पररिकल्पना साकार हो सकती है।

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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