वे अध्यापक, जिनके ममता भरे स्पर्श ने मुझे गढ़ा

वे अध्यापक, जिनके ममता भरे स्पर्श ने मुझे गढ़ा

बीर ने गुरु को ‘गोविंद’ से बड़ा बताया, इसलिए कि गुरु ने गोविंद से मिलवाया। वे बड़ी हिम्मत से कहते हैं—और जहाँ तक मेरा खयाल है, हमारे पूरे वाङ्मय में पहली बार यह कहा जा रहा था, इतने सीधे, खरे और दो टूक शब्दों में कि गुरु और गोविंद दोनों खड़े हों तो मैं पहले गुरु के चरण छुऊँगा, क्योंकि गुरु न मिले होते तो भला मैं गोविंद से कैसे मिलता? गुरु ने ही अच्छे-बुरे का बोध कराकर जीवन जीने का, साधना का सही मार्ग बताया और यों उन्होंने गोविंद से मिलवाया तो उनका दर्जा पहले है। यानी अच्छे गुरु का मिल जाना ही जीवन का सबसे बड़ा प्राप्य है। अच्छे गुरु के मिलते ही जीवन धन्य और सार्थक हो जाता है।

यह बात कहते हुए मुझे अपने अध्यापक याद आ रहे हैं। सोचता हूँ, मेरे अध्यापकों ने मुझे न गढ़ा होता तो भला आज मैं कहाँ होता?

मैं कोई कबीर नहीं, एक मामूली आदमी और एक मामूली लेखक हूँ। पर जैसा इनसान मैं हूँ, जैसा लेखक मैं हूँ, एक नहीं, बहुतों का कृतज्ञ हूँ। इसलिए कि बहुतों का बनाया हुआ हूँ। कुछ ने पीठ ठोंकी, कुछ ने कंधा थपथपाया। कुछ ने उस समय हिम्मत बँधाई, जब मैं पूरी तरह हिम्मत छोड़ चुका था। इनमें मित्र भी हैं, परिवारीजन भी, मुझसे बड़े और बहुत आदरणीय भी, और बहुत से ऐसे भी, जिन्हें मैं ठीक से जानता तक नहीं, पर रास्ता चलते मुझ पर अनुकंपा की। किसी ने मुझ खुद में खोए हुए कतई गैर-दुनियादार शख्स को ऐन सामने या बगल से आनेवाली बस या ट्रेन के बारे में बताकर सावधान किया, बल्कि एक-दो ने तो तेजी से हाथ पकड़कर खींच लिया!...किसी ने यों ही बातों-बातों में, अयाचित कोई ऐसी सीख दे दी कि मैं भटकते-भटकते आखिर सही राह पर आ गया। बहुत से हैं, जिनका नाम भी याद नहीं है। पर शक्ल याद आती है, चेहरा याद आता है तो मैं हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम कर लेता हूँ।

पर सच में जिन्होंने यह जीवन बनाया, मुझे अपने हाथों से गढ़ा, एक बेहतर इनसान और लेखक बनाया, मेरे अंतःकरण को निमज्जित किया और मुझे सही मानी में आदमी बनाया, उनमें सबसे पहला नंबर तो मेरे अध्यापकों का ही आता है। उनमें कच्ची और शुरुआती कक्षाओं के अध्यापक हैं, तो बड़ी कक्षाओं के अध्यापक भी, जिन्होंने मुझे प्यार से ठोंक-पीटकर इनसान बनाया और जाने-अनजाने लेखक भी, जिससे अक्षरों की एक निराली दुनिया मेरे आगे खुलती चली गई।

 

अपने अध्यापकों को याद करता हूँ तो सबसे पहले चश्मेवाले मास्टरजी याद आते हैं। मेरे नर्सरी के अध्यापक। हालाँकि तब नर्सरी कौन जानता था? पहले दर्जे के नए-नए आए बच्चों को अलग बैठा लिया जाता था, ताकि वे थोड़ा-बहुत पट्टी पर लिखना सीख लें। क ख ग और थोड़ी गिनती वगैरह। उसे शायद कच्ची क्लास कहा जाता था। तो उसी कच्ची क्लास का यह किस्सा है।

हमारे स्कूल का नाम था—पालीवाल विद्यालय, पर हम उसे बोलते थे, छोटा पालीवाल स्कूल। बाद में छठी से पढ़ाई पालीवाल इंटर कॉलेज में हुई, जिसे हम लोग बड़ा पालीवाल स्कूल कहते थे। चश्मेवाले मास्टरजी का मजेदार किस्सा छोटे पालीवाल स्कूल का है। और स्कूल में वह मेरा पहला ही दिन था। स्कूल में कच्ची क्लास में मेरा दाखिला हुआ, पर शायद दाखिले से पहले ही मैं स्कूल जाने लगा था। मुझे याद पड़ता है, मेरी दीदी कमलेश दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। रोज-रोज उसे तख्ती और बस्ता लेकर स्कूल जाते देखता तो मुझे अच्छा लगता था। वह स्कूल के किस्से सुनाती थी और अच्छा लगता था। लिहाजा मैंने भी उसके साथ ही स्कूल जाने की इच्छा प्रकट की।

कमलेश दीदी ने बड़े भाईसाहब से बात की कि कुक्कू भी स्कूल जाना चाहता है। इस पर कुछ-कुछ मुझे खयाल है कि भाईसाहब ने कहा था, ‘‘अच्छा, तो अभी कुछ दिन ऐसे ही चला जाए। बाद में मैं नाम लिखवा दूँगा।’’ स्कूल के हैडमास्टर साहब और बाकी अध्यापक भी हमारे घर के लोगों को अच्छी तरह जानते थे, इसलिए कोई मुश्किल न थी।

वहाँ लंबूतरे चेहरेवाले एक अध्यापक थे। लंबे, दुबले और प्यारे। आँख पर भारी-सा चश्मा। मैं नया-नया क्लास में पहुँचा, तो उन्हें स्वाभाविक उत्सुकता हुई। वैसे भी मेरा खयाल है, मैं जरूरत से कहीं ज्यादा सीधा और अबोध बच्चा था। एकदम बुद्धू सा। उन्होंने शायद यह देख लिया हो। तो उन्होंने इशारा करके मुझे पास बुलाया और पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

तब घर में मुझे सब कुक्कू बुलाते थे। वही पता था। लिहाजा मैंने धीरे से जवाब दिया, ‘‘कुक्कू।’’

‘‘क्या कहा?’’ मास्टरजी ने एकाएक होंठ फैलाकर कहा, ‘‘घुग्घू...?’’ चश्मे के पीछे से उनकी शरारती आँखें चमक रही थीं। होंठों पर आनंद-भाववाली अजब सी हँसी।

इस पर उनकी गलतफहमी को दूर करने के लिए मैंने और भी जोर से चिल्लाकर कहा, ‘‘कुक्कू, कुक्कू...!’’

सुनकर दोबारा वे अपने होंठों को गोल-गोल फैलाकर बोले, ‘‘क्या कहा, घुग्घू...? अरे भई, यह कैसा नाम है?’’

मैंने उनकी गलतफहमी दूर करने के लिए कुछ और जोर से चिल्लाकर कहा, ‘‘नहीं, घुग्घू नहीं, कुक्कू...कुक्कू!’’

मगर वे फिर उसी लहजे में बोले, ‘‘क्या कहा, घुग्घू...?’’ चश्मे के पीछे से उनकी शरारती आँखें झप-झप कर रही थीं।

अब तो मेरा धैर्य जवाब दे गया। मैं बोला, ‘‘जरा रुकिए।’’ मैं दौड़ा-दौड़ा गया और हाथ पकड़कर अपनी कमलेश दीदी को बुला लाया, जो मुझसे दो बरस बड़ी थी और कक्षा दो में पढ़ती थी। कहा कि ‘‘मेरा नाम पूछते हैं, जरा तुम बता दो।’’

जब कमलेश दीदी मेरे साथ पहुँची तो मास्टरजी ने पूछा, ‘‘तुम इसकी बहन हो?’’ दीदी ने कहा कि ‘‘हाँ।’’ मास्टरजी ने पूछा, ‘‘इसका नाम क्या है? यह तो पता नहीं, क्या बता रहा है।’’

कमलेश दीदी बड़ी थी। उसे पता था, घर पर चाहे कुक्कू कहते हों, पर मेरा बाहर का, यानी स्कूलवाला नाम तो चंद्रप्रकाश है। सो उसने कहा, ‘‘मास्टरजी, इसका नाम चंद्रप्रकाश है।’’

पर आश्चर्य! इस पर फड़कती मूँछोंवाले वे चश्माधारी अध्यापक पहले की ही तरह अपने होंठों को खूब फैलाकर बोले, ‘‘क्या कहा? संटपरकास...! अरे भई, यह कैसा नाम है?’’

उनकी इस विचित्र नाटकीय अदा से हम दोनों भाई-बहन हतप्रभ थे और हँस भी रहे थे। साथ-ही-साथ क्लास के और बच्चे भी हँस रहे थे। उस वक्त तो समझ में नहीं आया था, पर आज कह सकता हूँ कि यह उन अध्यापकजी की बड़ी प्यारी-सी कोशिश थी, मुझे संकोच मुक्त करने की! और सच में कुछ दिनों बाद ही मैंने पाया कि यही मास्टरजी मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।

उन्होंने मोंटेसरी शिक्षा के बारे में पता नहीं, कुछ पढ़ा था या नहीं, पर हाव-भाव और अंदाज वही कि क्लास में डर का क्या काम? खूब हँसो, खूब गप्पें लगाओ, खेलकूद और गपशप में ही खूब पढ़ भी लो।

अगर स्कूली अध्यापकों की बात करूँ, तो सबसे पहले कच्ची कक्षा, जिसे आजकल नर्सरी कहते हैं—के इन्हीं खुशदिल और हँसोड़ मास्टरजी की मुझे याद आती है, जिनका नाम भी मुझे नहीं पता। बस इतना याद है कि वे मुझे बेहद प्यार करते थे। बच्चे अबोध होते हैं। उनके पास भाषा की सामर्थ्य बहुत नहीं होती। पर न जाने कैसा अज्ञात पैमाना उनके पास होता है, जिससे वे ठीक-ठीक जान लेते हैं कि कौन मुझे कितना प्यार करता है, या फिर नहीं करता? स्कूल में वह मेरा पहला ही दिन था, जब उन चश्मेवाले अध्यापक ने मेरे घर के नाम ‘कुक्कू’ को लेकर मेरा खासा मजाक उड़ाया। पर अब याद करता हूँ तो लगता है, यह उनकी बड़ी ही प्यारी-सी अदा थी।

उन ‘घुग्घूवाले अध्यापक’ की मुख-मुद्रा और चेहरे-मोहरे को इतने बरसों बाद भी मैं भूल नहीं पाया। शायद इसलिए कि जो प्रिय होते हैं, वे बरसों-बरस तक हमारे भीतर इस धरती के देवी-देवताओं की तरह आसन जमाए रहते हैं। और वे इस मानी में तो ‘अमर’ होते ही हैं कि बरसों-बरसों गुजरते जाते हैं, मगर वे कभी फेडेडआउट नहीं होते। मुझे अच्छी तरह याद है कि उनकी आँखों पर मोटे लैंस और भारी फ्रेम का चश्मा था और फड़कती हुई मूँछें। मूँछों में फुरफुराती हँसी। पता नहीं, क्यों वे मुझे बहुत प्यार करने लगे थे और खूब हँसाते थे। शायद मेरे बुद्धूपन पर वे रीझ गए हों। यों पढ़ाई में तो मैं होशियार था ही। वर्णमाला, गिनती सब मैंने जल्दी ही सीख लिये। पहली में उन्हें फिर से पढ़ना ही था। तो थोड़े दिनों बाद उन्हीं मास्टरजी की सिफारिश पर मुझे प्रमोट करके अगली क्लास, यानी पहली में भेज दिया गया। उन दिनों शायद यह तरीका था, कि अगर बच्चा अच्छा है तो एक साल में दो कक्षाएँ भी पास कर सकता है। कम-से-कम कच्ची से पहली में तो जा ही सकता है।

पर मेरे लिए शुरू-शुरू में यही चीज मुसीबत बन गई। वहाँ जो थोड़े सख्त चेहरे और रूखे स्वभाववाले रमेश अध्यापक थे, उनसे मुझे डर लगता था। इस कारण जो मुझे याद था, वह भी मैं भूल जाता था। रमेश अध्यापक गुस्सा करते और खीजते थे कि क्यों मुझ सरीखे बुद्धू छात्र को प्रमोट करके पहली में भेज दिया गया, जबकि मुझे तो कुछ आता-जाता ही नहीं। वे जिस कड़ाई से गिनती या पहाड़ा सुनाने को कहते, उससे मेरी रूह काँपती थी और मैं कुछ भी सुना नहीं पाता था। तब बीच-बीच में मेरे वही पुराने मास्टरजी संकटमोचक बनकर क्लास में आ जाते और हँसते हुए कहते, ‘‘ओहो कुक्कू, क्या बात है? तुम्हें तो सबकुछ आता है ना!’’ और रमेश मास्टरजी से कहते, ‘‘हमारा यह कुक्कू बड़ा होशियार है। इसका खयाल रखना आप।’’

मुझे लगता, उन मास्टरजी के सामने आते ही, जो कुछ भूला हो, वह भी मुझे खुद-ब-खुद याद आने लगता है। कुछ दिनों बाद मैं जो ज्यादा लाड़-प्यारवाले माहौल में पला था, धीरे-धीरे दूसरे माहौल में भी ढल गया। रमेश मास्टरजी का डर कुछ कम हुआ, तो मैं खुद-ब-खुद चल निकला और मुझे पाठ याद होने लगे। पर मैं मन-ही-मन अपने आप से यह तो जरूर कहता था कि ‘काश, सारे अध्यापक, उन बड़ी-बड़ी मूँछों और चश्मेवाले मास्टरजी सरीखे ही होते तो कितना अच्छा था!’ और उनके पहले दिन की अदा को याद करके मैंने उनका नाम रख लिया था, ‘घुग्घूवाले अध्यापक’।

कहना चाहिए कि मेरे कच्ची कक्षावाले मास्टरजी न सिर्फ मुझे बहुत ज्यादा प्यार करते थे, बल्कि उन्होंने मेरे भीतर यह चीज पैदा कर दी कि जो तुम्हें प्यार नहीं करता, वह अच्छा टीचर नहीं हो सकता। इसीलिए बहुत से अध्यापकों की याद है, जो शायद इतने बुरे न थे, पर मैं उन्हें अध्यापक मान ही नहीं पाया। जब आगे चलकर मैं खुद प्राध्यापक बना, तो भी औरों से तो शायद अलग ही था। साथी अध्यापकों से मेरे संबंध इतने सहज और दोस्ताना नहीं थे, जितने अपने विद्यार्थियों से।

अपने इन कच्ची क्लास के स्नेहिल मास्टरजी पर पिछले दिनों ही मैंने एक कहानी लिखी है, ‘चश्मेवाले मास्टरजी’। पर मुझे लगता है, वह इतनी अच्छी नहीं बनी, जितने अच्छे वे अध्यापक थे, जो अपने स्कूली जीवन की शुरुआत में मुझे किसी वरदान सरीखे मिले थे।

इसके अलावा छोटी कक्षाओं के जिन अध्यापकों की याद आती है, उनमें कुरता-धोतीधारी तिवारीजी भी हैं, जो पालीवाल विद्यालय के हैड मास्टर थे। उनकी दो बातें नहीं भूलतीं। एक तो उन्होंने पाँचवीं कक्षा के लगभग आखिरी दिन रामचरित मानस से लिया गया पाठ ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’ पढ़ाया था और इतना रस लेकर और इतने नाटकीय ढंग से पढ़ाया था कि मैं रस से सराबोर हो गया था। उस समय मैं भूल ही गया था कि क्लास-रूम में बैठा हूँ। लगता था कि रामलीला के मैदान में बैठा हूँ और अपने सामने होती रामलीला को देख रहा हूँ। बल्कि कहना चाहिए कि रामलीला में भी वह आनंद मुझे कभी न आया था, जो उस दिन तिवारीजी से राम-लक्ष्मण संवाद वाला पाठ पढ़कर आया था।

अहा, लक्ष्मण और परशुरामजी के वे तुर्की-ब-तुर्की संवाद भी क्या खूब थे! एकदम फड़कते हुए, और उनमें तुलसी का एक अलग ही रूप है। पर उनमें छिपे जादू की पहली झलक तिवारीजी के कारण मैं देख सका। ‘इहाँ कुम्हड़बतियाँ कोउ नाहीं, जे तरजनी देख मुरझाहीं...!’ जैसे संवादों के भीतर कैसा विट छिपा है, कैसा तीखा व्यंग्य-कटाक्ष, पहलेपहल तिवारीजी की बदौलत ही मैं जान पाया। तब बहुत छोटा था, पर पहली बार तभी मैं समझ पाया कि तुलसीदास कितने बड़े कवि हैं, और मन-ही-मन मैंने पहली बार उनकी काव्य-प्रतिभा को प्रणाम किया।

हालाँकि उस समय मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई थी, ऐसे बढि़या ढंग से तिवारीजी ने पहले क्यों नहीं पढ़ाया या कि वे हमेशा ऐसे ही क्यों नहीं पढ़ाते? मैं पूरी तरह से उनके जादू की गिरफ्त में था और पछता रहा था कि पहले उनकी इस कला से क्यों नहीं परच पाया? अगर ऐसा होता तो तिवारी मास्टरजी से जुड़े कुछ और भीगे हुए लम्हे मेरी स्मृतियों की पिटारी में सुरक्षित होते। हालाँकि तिवारीजी उस दिन कैसे लगे थे और उनका वह लक्ष्मण-परशुराम-संवाद पढ़ाना कितना अद्भुत था, इसकी एक छवि मैंने अपनी किसी कहानी या उपन्यास में ‘मास्टर इतवारीलाल’ के रूप में दर्ज की है।

तिवारी मास्टरजी से जुड़ी दूसरी बात यह है कि उसी दिन उन्होंने एक बड़ी मार्मिक बात कही थी, जिसे मैं आज तक नहीं भूला। उन्होंने कहा था कि अध्यापक के जीवन की एक बड़ी अजब-सी पहेली है। वह यह कि अध्यापक तो वहीं रह जाता है, जबकि उसके पढ़ाए विद्यार्थी कहाँ-से-कहाँ पहुँच जाते हैं। फिर हलके कटाक्ष के साथ हमारी ओर इशारा करते हुए बोले, ‘‘कहीं तुम लोग भी ऐसे ही तो नहीं हो? क्या तुम भी कुछ हो जाओगे तो हमें भूल जाओगे कि अब कौन मास्टरजी और कहाँ के मास्टरजी! रास्ते में मिलोगे तो दूसरी ओर मुँह करके निकल जाओगे कि कहीं नमस्ते न करनी पड़ जाए!’’

उनके मुँह से यह बात सुनकर मैं विगलित हो गया था और भीतर-ही-भीतर बड़ी कचोट-सी महसूस की थी। बस, आँसू ही नहीं उमड़े, लेकिन मैं पूरी तरह हिल गया। आज भी मैं यह सोचकर परेशान हो जाता हूँ कि एक अध्यापक की यह कैसी नियति, कैसी विडंबना है, जिसकी ओर उन्होंने बड़े ही चुभते हुए शब्दों में इशारा किया था। मुझे निश्चित रूप से लगता है कि वह समाज जो अपने अध्यापकों को सम्मान नहीं कर सकता, कभी बड़ा समाज नहीं बन सकता। और तो और, उसे जिंदा समाज भी क्या कहा जाना चाहिए?

कहना न होगा कि मैं छोटे पालीवाल स्कूल से बड़े पालीवाल स्कूल में पढ़ने गया तो तिवारीजी के यही शब्द मेरे साथ थे, बल्कि पीछा कर रहे थे।

अब मुझे बड़े स्कूल यानी पालीवाल इंटर कॉलेज के अध्यापकों का जिक्र करना चाहिए। इसकी शुरुआत कला अध्यापक कृश्नचंद्र मुंदा से करने का मन है, जिन्होंने हमें छठी, सातवीं और आठवीं क्लास में कला और पुस्तक-कला पढ़ाई थी। पर शुरुआत मुंदाजी से ही क्यों? इसका कारण संभवतः यह है कि कला में मैं कच्चड़ था, यानी ड्राइंग या चित्रकला मेरी कमजोर नस थी। पुस्तक-कला में तो मैं फिर भी कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन कला यानी ड्राइंग में एकदम कच्चड़ था। पुस्तक-कला में पोस्टकार्ड, लिफाफा, पुस्तक-चिह्न यानी बुक मार्क आदि बनाने होते थे, दफ्ती का गुलदस्ता या घर वगैरह भी। पर ये चीजें घर से बनवाकर ले जानी होती थीं, इसलिए मुझे ज्यादा मुश्किल नहीं आती थी। सत्ते, मेरा दोस्त जो पड़ोसवाले घर में रहता था, इस मामले में मेरी काफी मदद कर देता था। कुछ श्याम भाईसाहब की भी मदद मिल जाती थी।

मगर ड्राइंग तो वहीं क्लास-रूम में बनानी होती थी और मेरी फूहड़ता यहाँ पूरी तरह खुल जाती थी। मेरे आकार असहनीय रूप से भद्दे होते थे, रेखाएँ मोटी-मोटी और बुरी। अगर रबर का इस्तेमाल होता तो कागज की चमड़ी उधड़ जाती। और रंग भरने में तो मैं एकदम माशा अल्लाह था। रंग कुछ इस बेरहमी से बाहर निकले होते थे कि देखनेवाले का जी खराब हो जाए। और कोई आश्चर्य नहीं कि किसी कक्षा में—शायद सातवीं में यों तो मेरे नंबर काफी अच्छे थे, पर ड्राइंग में मैं एक नंबर से फेल था। यानी जैसा कि तब कहने का रिवाज था, मैं कृपांक यानी ‘ग्रेस मार्क्स’ से या तरक्की से पास हुआ था!

मैं रोता हुआ घर आया था। मेरी ममतामयी माँ ने यह सुना तो विगलित हुईं। उन्होंने तत्काल श्याम भाईसाहब को प्रिंसिपल रामगोपाल पालीवाल के पास भेजा और प्रिंसिपल साहब ने एक नंबर बढ़ाकर मुझे ‘क्लियर’ पास कर दिया। हालाँकि इसका अफसोस मुझे आज भी है कि कला में मुझे एक रियायती नंबर लेना पड़ा। और मुंदाजी की इस बात के लिए मैं आज कहीं ज्यादा तारीफ करूँगा कि कितना ही होशियार विद्यार्थी हो, अगर उसकी ड्राइंग अच्छी नहीं है, तो उसे फेल करते उन्हें जरा भी संकोच नहीं होता था। अलबत्ता आज मैं जिन चीजों के लिए खुद को शर्मिंदा महसूस करता हूँ, उनमें प्रिंसिपल रामगोपाल पालीवाल की ओर से ड्राइंग में मिला वह एक अदद रियायती नंबर भी है।

हालाँकि खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि बाद में मेरे ही दो सहपाठियों ने, जो एक ही गाँव के थे और शायद भाई-भाई थे, दया करके अच्छी ड्राइंग बनाने और खासकर बढि़या रंग भरने के गुर मुझे बताए और वे मेरे बहुत काम आए। उसके बाद तो यही मुंदाजी थे, जिन्होंने खुश होकर कई बार मुझे ‘गुड’ और ‘वेरी गुड’ दिए। और तब मुझे अपने जीवन में जो खुशी मिली—जो सच्ची, एकदम सच्ची खुशी थी, उसे आज भी बरसों बाद छू और टटोलकर बता सकता हूँ कि देखो, ये थी वो चीज!

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यों पालीवाल इंटर कॉलेज के अध्यापकों में जिनकी सबसे ज्यादा याद आती है और मैं सबसे ज्यादा जिनके प्रभाव की गिरफ्त में था, वे थे हमारे अंग्रेजी के अध्यापक राजनाथ सारस्वत! और वे सचमुच ‘महान्’ अध्यापक थे। एकदम विलक्षण और अद्वितीय। वैसा कोई दूसरा और हो ही नहीं सकता था। उनके बारे में कोई एक वाक्य कहना हो तो मैं कहना पसंद करूँगा कि पूरी दुनिया में राजनाथ सारस्वत तो सिर्फ एक राजनाथ सारस्वत ही हो सकते थे! उन जैसा कोई दूसरा शख्स बना पाना तो शायद खुद ईश्वर के लिए संभव न हो। पढ़ाते थे तो बिल्कुल डूब जाते थे। और ऐसे नाटकीय अंदाज में पढ़ाते थे कि पूरी क्लास पर उनका जादू तारी हो जाता था। कई बार उनकी नाटकीय मुद्राएँ देख-देखकर हम मानो अवाक् और हक्के-बक्के से रह जाते थे। इसलिए कि हमारे स्कूल की पारंपरिक पढ़ाई से उसका कोई मेल ही नहीं था। उनका पढ़ाया हुआ पाठ ‘अंकल पोजर हैंग्स अ पिक्चर’ अब भी याद है। और ‘अब भी’ क्यों कह रहा हूँ? इसलिए कि इसे तो जनम-जिंदगी तक भूल पाना मेरे बस की बात नहीं है।

उफ, उन्होंने किस कदर पूरी क्लास में नाच-नाचकर यह पाठ पढ़ाया कि किस तरह अंकर पोजर तसवीर टाँगने के लिए एक स्टूल पर चढ़ते हैं और फिर क्या-क्या तमाशे होते हैं। कभी स्टूल नीचे गिरता है तो कभी अंकल पोजर लड़खड़ाकर गिरते हैं, कभी कील दूर जा छिटकती है, कभी हथौड़ा या फिर हथौड़े की मार से टूटकर गिरा दीवार का पलस्तर। पूरे घर में हड़कंप मच जाता है कि देखो, अंकल पोजर तसवीर टाँग रहे हैं। यों वह स्कूली पाठ तो कम, नाटक में नाटक था। ऐसा गजब नाटक कि तौबा-तौबा!

याद पड़ता है, क्लास-रूम में बिल्कुल असली जैसा प्रभाव लाने के लिए हमारे अलबेले अध्यापक राजनाथ सारस्वतजी ने आवाज और चेहरे की ढेर-ढेर सी भंगिमाओं का सहारा लिया था। और फिर क्लास में कुछ ऐसा जादुई दृश्य निर्मित हो गया था कि उसकी याद से मैं आज भी चकित और विस्फारित रह जाता हूँ कि क्या यह सचमुच हुआ था! और वह भी पालीवाल इंटर कॉलेज के धीर-गंभीर वातावरण में...कि एक नाटकीय पाठ को उसके असल और पूरे नाटक के साथ यों पढ़ाया गया कि मानो आप क्लास रूम में नहीं, मंडी हाउस में बैठे हैं!

राजनाथ सारस्वतजी से जुड़ा एक प्रसंग और है, जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाया और शायद इस जिंदगी में तो कभी नहीं भूल पाऊँगा। हुआ यह कि सारस्वतजी ने क्लास में ग्रामर का पाठ पढ़ाया और उसी में से कोई काम सब बच्चों को दिया था घर से करके लाने के लिए। उनका काम हम बच्चे सबसे पहले करते थे, इसलिए कि उनके गुस्से और इससे भी अधिक उनके भाषणों से बड़ा डर लगता था। सच पूछो तो कभी-कभी हमें वे अंग्रेजी वाले ‘जाइंट’ लगते थे, दैत्य! लेकिन इस दफा हुआ यह कि उन्होंने होमवर्क दिया, फिर कुछ दिनों की छुट्टियाँ हो गईं। लिहाजा किसी को भी याद नहीं रहा।

छुट्टियों के बाद हम क्लास में आए तो सारस्वतजी ने काम के बारे में पूछा। पूरी क्लास में इक्का-दुक्का को छोड़कर किसी ने होमवर्क नहीं किया था, लिहाजा उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा और उन्होंने पूरी क्लास को ‘मुरगा’ बनने का आदेश दे दिया।

सभी सन्न! सभी जानते थे कि सारस्वतजी का कहा पत्थर की लकीर है। इसे माने बगैर कोई उपाय नहीं। यह भी हो सकता है कि अनखने पर वे गुस्से में सजा और बढ़ा दें। तो एक-एक कर सभी बच्चे सामने आते गए और मुरगा बनते गए। रह गया मैं, जो सारस्वतजी का बहुत सम्मान करता था, पर सोचता था कि ईश्वर ने जब अच्छा खासा बंदा बनाया है, तो मुझे मुरगा बनाने का हक तो किसी को नहीं है—राजनाथ सारस्वतजी को भी नहीं। अलबत्ता मैं मुरगा नहीं बना।

सारस्वतजी ने बहुत धमकाया। क्लास से निकल जाने और हफ्ते भर तक क्लास में न आने को कहा। मैं इस पर भी तैयार नहीं था और उनकी हरेक धमकी और भयानक दैत्यनुमा क्रोध का जवाब मेरे पास सिर्फ यही था कि ‘‘सर, आप मार लीजिए। आप कितना ही मारिए, मैं चूँ नहीं करूँगा, पर नहीं, मुरगा मैं न बनूँगा।’’

एक पीरियड पूरा निकल गया इसी चक्करबाजी में। सारस्वतजी कभी शांत होकर मुझे समझाते कि ‘‘मि. विग, मुरगा तो तुम्हें बनना पड़ेगा, इसके बगैर कोई चारा नहीं है।’’ कभी आगबबूला होकर डाँटने लगते। अंत में पीरियड खत्म होने की घंटी बजी, तो मुझे कुछ चैन पड़ा। सारस्वतजी क्लास से जाने लगे तो उन्होंने निर्णायक स्वर में कहा कि ‘‘देखो विग, तुम्हारी वजह से पूरा पीरियड खराब हो गया। पूरी क्लास का बहुत नुकसान तुमने कराया है। अब अगले पीरियड में या तो मेरे पीरियड में आना मत या फिर पीरियड शुरू होते ही यहाँ आकर मुरगा बन जाना। अच्छी तरह सोच लो कि तुम्हें क्या करना है, वरना मुझे सख्त कदम उठाना पड़ेगा।’’

उसके बाद एक-एक करके कई पीरियड आए-गए। मुझे कुछ होश नहीं था। मैं तो जैसे कीलित कर दिया गया होऊँ! मेरा सारा ध्यान तो उस कत्ल की घड़ी पर था, जो अंग्रेजी के अगले पीरियड यानी आठवें पीरियड में आनेवाली थी। तो आखिर, जैसे-तैसे राम-राम करके आठवाँ पीरियड शुरू हुआ। मेरी ऊपर की साँस ऊपर, नीचे की साँस नीचे। डर के मारे प्राण निकले जा रहे थे कि पता नहीं क्या हो! पर मुरगा मैं न बना। सारस्वतजी ने बहुत डर दिखाया, गुस्से के मारे उनकी भी हालत खराब थी। अपने तरकश के सारे तीर वे चला चुके थे। पर क्या करते! वे मुझे प्यार भी बहुत करते थे। लिहाजा एक बीच का रास्ता उन्होंने यह निकाला कि कहा, ‘‘अच्छा, इतना ही तुम कहते हो तो एक तरीका है कि अगर क्लास के बच्चे कहेंगे कि विग को छोड़ दीजिए, तो हम छोड़ देंगे।’’

ओह, ईश्वर का लाख-लाख धन्यवाद! उनकी बात अभी पूरी भी न थी कि पूरी क्लास एक साथ चीख पड़ी, ‘‘छोड़ दीजिए सर, छोड़ दीजिए...छोड़ दीजिए!’’ और यों मामला बमुश्किल खत्म हुआ। हालाँकि खत्म हुआ तो भी अंतरतम में बुरी तरह ‘थर-थर...थर-थर’ हो रही थी। आँखें जैसे आँसुओं से उमड़ उठना चाहती हों और आँसू निकल भी न रहे हों!

खैर, उस दिन पूरी छुट्टी होने पर स्कूल से निकला, तो मैं क्लास के सारे बच्चों का ‘हीरो’ था, क्योंकि एक बच्चे ने पहली बार किसी नचिकेता की तरह अपनी विनम्रता से एकदम एक गुस्सैल अध्यापक पर विजय पाई थी...और कहिए कि एक सही मुद्दे पर विजय पाई थी। यह विजय उस अध्यापक पर थी, जिसका गुस्सा हमें यमराज से कम भयानक नहीं लगता था!

राजनाथ सारस्वतजी भी पिछले दिनों मुझ पर छाए रहे और कुछ अरसा पहले ही उन पर एक कहानी ‘जोशी सर’ मैंने लिखी है, जिसे कुछ मित्रों ने बहुत पसंद किया। इसे पढ़कर बहुत से मित्रों ने कहा कि ‘‘आपके जोशी सर तो भूलते नहीं हैं।’’ तब हँसकर मैंने यही कहा कि ‘‘काश, आप असली जोशी सर, उर्फ हमारे राजनाथ सारस्वतजी से मिले होते। तब आपको पता चलता, यह दुनिया कितने अद्भुत लोगों से भरी पड़ी है।’’

पालीवाल इंटर कॉलेज में अंग्रेजी के एक और अध्यापक थे मि. खुराना, जिनकी बड़ी मधुर स्मृति मेरे मन में है। खुरानाजी ने इंटरमीडिएट में हमें अंग्रेजी पढ़ाई थी। उनका नाम मैं भूल गया, पर अंग्रेजी पढ़ाने का उनका अंदाज अब भी याद है। वे इस कदर मुसकराते हुए, बहुत अनौपचारिक अंदाज में खुशदिली से अंग्रेजी पढ़ाते थे कि बस मजा आ जाता था। और लगता था कि क्या ही मजा आए, अगर हम पूरी जिंदगी बस अंग्रेजी लिटरेचर पढ़ते गुजार दें! अंग्रेजी साहित्य पढ़ने में मुझे इतना मजा कभी नहीं आया, जितना तब आता था।

इंटरमीडिएट में पहले ही दिन जब वे अंग्रेजी पढ़ाने आए, उन्होंने सबसे पूछा, ‘‘हाईस्कूल में तुम्हारे अंग्रेजी में कितने नंबर थे?’’ जब मैंने बताया कि हाईस्कूल में अंग्रेजी में मेरी डिस्टिंक्शन थी तो उन्होंने कुछ हैरान होकर पूछा था, ‘‘तुम क्रिश्चियन हो क्या?’’ मेरे ‘न’ कहने पर वे चौंके।

उन दिनों हमारे यहाँ अंग्रेजी डिस्टिंक्शन का रोब कुछ ऐसा था। मुहावरेदार अंग्रेजी बोलने का सुख क्या होता है, यह मैंने उनसे ही जाना। वे ऐसे अध्यापक थे, जो अंग्रेजी अच्छी पढ़ाते ही नहीं थे, बल्कि अंग्रेजी में लिखने-पढ़ने को भी प्रेरित करते थे।

जब मैं इंटरमीडिएट में था, तभी लोहियाजी के ‘अंग्रेजी हटाओ’ आंदोलन से प्रभावित होकर मैंने अंग्रेजी के खिलाफ शिकोहाबाद शहर में आंदोलन किया था और रात-रात भर जागकर नारे लिखे थे। लेकिन अंग्रेजी साहित्य का आनंद लेना भी मैं न भूला। अपने देश में अंग्रेजी की तानाशाही से हमारा विरोध था, अंग्रेजी साहित्य से हर्गिज नहीं। यह फर्क हम बराबर करते रह सकें, इसका श्रेय उन्हीं खुराना सर को जाता है! और सच तो यह है कि मेरे मन में आदर्श अध्यापक की जो सुंदर छवि है, वह बहुत कुछ खुराना सर से मिलती-जुलती है। इसका सबसे सुंदर लक्षण यह है कि उनसे हमें डर बिल्कुल नहीं लगता था और मन उनके पढ़ाए हुए में खुद-ब-खुद रमता जाता था। हमेशा एक मंद-मंद मुसकराहट उनके चेहरे पर हमेशा रहती थी और वह मुझे बहुत लुभाती थी। लगता था, एक अच्छे अध्यापक को ऐसा ही होना चाहिए।

फिर गिरीशचंद्र गहराना, जिन्होंने इंटरमीडिएट में हमें गणित पढ़ाया था। वे सही मायनों में गणित के जादूगर थे। बल्कि कहना चाहिए, गणित उनकी उँगलियों के पोरों पर नाचता था। मुझे लगता है, उन्हें जरूर हवा में अपने चारों ओर गणित की संख्याएँ लिखी हुई नजर आती होंगी। इसीलिए ब्लैकबोर्ड के पास आते ही वे इतनी तेजी से बोलते थे, जैसे कहीं सामने लिखा हुआ पढ़ रहे हों। और फिर उतनी ही तत्परता से उनकी उँगलियाँ तेजी से ब्लैकबोर्ड पर दौड़ने लग जातीं। वे खेल-खेल में गणित के सवाल हल करते थे और हमारी बड़ी-से-बड़ी समस्याओं को बस एक मामूली इशारे से ही, चुटकी बजाते हवा में उड़ा देते थे।

यों गिरीशजी अपने ढंग के निराले अध्यापक थे। बेहद मेहनती इनसान। उनसे ज्यादा मेहनती अध्यापक भी कोई हो सकता है, कम-से-कम मैं इसकी कल्पना करने में खुद को असमर्थ पाता हूँ। उनकी एक खासियत यह थी कि वे क्लास में एक मिनट तो क्या, एक सेकेंड भी बरबाद नहीं करते थे। क्लास के बाहर से ही जैसे बोलते हुए आते थे और भीतर घुसते ही विषय की थोड़ी प्रस्तावना के बाद सीधा ब्लैकबोर्ड पर लिखना शुरू कर देते थे। मैंने देखा कि बड़े-से-बड़े बदमाश और महा ऊधमी लड़के भी उनकी क्लास में चुप और आतंकित होकर बैठे रहते थे। कहीं एक हलकी चूँ भी नहीं। यों तो ऐसे लोग अंग्रेजी पढ़ानेवाले सारस्वतजी से भी डरते थे। पर नहीं, वहाँ तो फिर भी कभी-कभार हँसी-मजाक की भी गुंजाइश थी, पर यहाँ तो निपट गंभीरता थी, जैसे सारा गणित रटा पड़ा हो और मौका आते ही वह उँगलियों की पोरों से फूट पड़ता हो! मुझे सचमुच इस बात का गर्व है कि मुझे गिरीशजी ने पढ़ाया है। वे सही मायने में पालीवाल इंटर कॉलेज के गौरव थे और शिकोहाबाद के भी।

गिरीशजी के साथ ही याद आते हैं, भौतिक विज्ञान वाले शर्माजी! यानी अध्यापक समाज में हमारे धीरोदात्त किस्म के नायक श्री लक्ष्मणस्वरूप शर्मा! जैसे गिरीशजी कड़ी मेहनत के पर्याय थे, ऐसे ही शर्माजी सख्त अनुशासन के। वे सच में अपने कई विलक्षण गुणों के कारण ‘किंवदंती-पुरुष’ बन चुके थे।

यों हमारे कॉलेज में गिरीशजी और शर्माजी की जोड़ी थी। बड़ी ही विलक्षण जोड़ी। कॉलेज के ये दो सिरमौर अध्यापक थे, जिनकी दूर-दूर तक कीर्ति थी। पता नहीं, कहाँ-कहाँ तक लोग उनकी अद्भुत शिक्षण कला का बखान किया करते थे, जिसके कारण पढ़ाई और हर वर्ष निकलनेवाले परीक्षा-परिणाम को लेकर हमारे कॉलेज का बड़ी दूर-दूर तक नाम था। उनके शिष्य भी ऊँचे-ऊँचे पदों पर थे। पर आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमारे अध्यापकों की यह अमर जोड़ी, विभिन्नताओं का एक विचित्र संगम भी थी। इसलिए कि गिरीशजी के विपरीत, भौतिक विज्ञान के हमारे ये धीर-गंभीर अध्यापक शर्माजी बिल्कुल ट्यूशन नहीं करते थे और इस चीज को कतई पसंद भी नहीं करते थे।

बाहर से जो अध्यापक विज्ञान की प्रैक्टिकल परीक्षा लेने आते थे, उनके लालच की अनंत कथाएँ वे हमें सुनाया करते थे। कभी गुस्से में, तो कभी मजाक में भी। उस क्षण उनके पूरे मुखमंडल पर एक आदर्श और स्वाभिमानी अध्यापक की सी उजली कांति देखकर मैं विभोर और कुछ-कुछ गर्वित सा होता था कि सचमुच हम कितने भाग्यशाली हैं, हमारे अध्यापक इतने अच्छे, इतने आदर्श अध्यापक हैं! उनका स्वाभिमान कुछ-कुछ हम शिष्यों का भी अभिमान बन जाता था।

दोनों अध्यापकों में एक फर्क और था। गिरीशजी बोलते ज्यादा थे और बहुत तेज-तेज बोलते थे। अपनी क्लास में काम करके न लाने या फिर त्रिकोणमिति के फॉर्मूले याद न करनेवाले छात्रों को दूर से बस एक कटाक्ष से ही ऐसा काटते कि उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लग जातीं। आवाज उनकी तीखी-धारदार थी। खड्ग जैसी। उस हिसाब से शर्माजी बहुत कम बोलते थे। बड़े शांत थे और बहुत धीरे बोलते थे। ज्यादातर थोड़ा-बहुत समझाने के बाद बोर्ड पर सवाल लिख देते थे और फिर चुपचाप अलग खड़े हो जाते थे, ताकि हम अच्छी तरह नोट कर लें। बस बीच-बीच में जब जरूरी होता था, तभी बोलते थे। कभी-कभी समझाने और व्याख्या करने पर आते थे तो बड़े सरल शब्दों में और बीच-बीच में थोड़ा रुककर, बहुत अच्छी व्याख्या करते थे।

पर मेरे प्रिय और विलक्षण अध्यापकों की बात अभी खत्म नहीं हुई। मैंने इंटरमीडिएट में गणित पढ़ानेवाले गिरीशजी का जिक्र किया। पर हाईस्कूल में गणित पढ़ानेवाले लालाराम शाक्यजी को कैसे भूल सकता हूँ? ठीक है, उन्होंने हमें कुछ ही दिनों तक पढ़ाया और फिर चले गए। पर उनके जाने को कितनी उदासी और तकलीफ के साथ हमने झेला, यह भी बताना मुश्किल है। लालाराम शाक्य बड़े ही कलाकार तबीयत के और खुशदिल अध्यापक। थोड़ा श्यामल वर्ण, माथे पर हर वक्त थिरकनेवाले गहरे काले बालों के गुच्छे और हर पल होंठों पर नाचती मुसकान। ब्लैक बोर्ड पर कुछ लिखते-लिखते अचानक वे पलटकर मुसकराते हुए हमारी ओर देखते तो लगता, जैसे पूरी क्लास को उन्होंने प्यार की डोर से बाँध लिया हो। याद पड़ता है कि बस, कुछ ही दिन उन्होंने पढ़ाया था। फिर वे चले गए। कहाँ, क्यों...? मैं नहीं जानता। पर उनका जाना हमें बेहद अखरा। इसलिए कि गणित को भी वे कविता वाले लास्य के साथ पढ़ाते थे। एकदम सरल, सुबोध बनाकर। इससे अच्छा पढ़ाने का ढंग भला और क्या हो सकता है?

शाक्यजी की कई बातें याद आती हैं। इनमें सबसे बढ़कर है, उनकी मोहिनी मुसकान। तुलना करनी हो तो कहूँगा, एकदम कृष्ण कन्हैया की सी मोहक मुसकान थी वह। उन्हें देखकर लगता था, जैसे साहित्य या कला का कोई अध्यापक भूल से गणित पढ़ाने चला आया हो। वे थे भी कुछ कलाकार ही! हाथ में चॉक लेकर ब्लैकबोर्ड पर ऐसी गजब की फुरती के साथ गोला खींचते थे कि बस देखते ही बनता था। और वह गोला इतनी पूर्णता लिये हुए होता था, इतना मुकम्मल, इतना सही कि उस पर दोबारा हाथ लगाने की उन्हें जरूरत नहीं थी। जैसे वृत्त खींचनेवाला बहुत बड़ा परकार लेकर किसी ने खींचा हो।

याद है कि एक झटके में ऐसा बढि़या गोला खींचने के बाद वह पहले एक नजर ब्लैकबोर्ड को देखते थे, एक सुरीली मुसकान के साथ, और फिर कुछ आत्ममुग्धता भरी बाँकी अदा से हमारी ओर देखते थे, दाद चाहनेवाले अंदाज में! जैसे कवि-सम्मेलन का कोई कवि बढि़या गीत सुनाने के बाद थोड़ा रुककर बाँकी अदा से श्रोताओं की ओर देखता है, कि अरे भई, अब थोड़ी तारीफ तो करो!

पूरी क्लास मंत्रमुग्ध। हम सभी कुछ ऐसे चकित से कि जैसे कोई जादू दिखाया जा रहा है! अपने इस जादू पर वे खुद भी मंद-मंद हँसते थे और उनके साथ-साथ हम सब भी हँस पड़ते थे। पूरी क्लास में आनंद और प्रसन्नता की एक लहर दौड़ जाती थी। क्या यह गणित का जादू था? नहीं, शायद गणित और कला का मिला-जुला जादू!

साहित्य में तो यह हो सकता है और सच्ची पूछो तो अकसर होता ही है, पर गणित में भी हो सकता है, यह हमने शाक्यजी से ही सीखा। ऐसे बढि़या अध्यापक क्यों कॉलेज छोड़ गए, कहाँ गए, कुछ पता नहीं। बाद में उनकी जगह जो अध्यापक आए, वे उतने ही ‘नीरस’ थे, जितना कोई गणित का अति साधारण अध्यापक हो सकता है! और यों शाक्यजी के साथ-साथ गणित का आनंद भी चला गया। गणित में हाईस्कूल में मेरे सौ में पंचानबे नंबर थे। पर इसका श्रेय अगर किसी को देना हो तो मैं लालाराम शाक्यजी को देना चाहूँगा, जिन्होंने सिर्फ कुछ दिनों के अध्यापन से ही गणित को मेरे लिए कविता सरीखा आनंददायी बना दिया।

मैंने जीवन में पहली बार जाना कि ‘‘अरे, गणित तो आनंद की वस्तु है, उससे क्या डरना? उससे तो प्यार करना आना चाहिए!’’ और मेरे भीतर यह बड़ा परिवर्तन हुआ शाक्यजी के कारण, जिसने मुझे बहुत बल दिया और आत्मविश्वास से भर दिया।

इसके साथ ही पालीवाल इंटर कॉलेज के हिंदी के दो अध्यापकों का जिक्र तो होना ही चाहिए, जिनके बगैर यह वृत्त पूरा नहीं हो सकता। इनमें एक थे साहित्यप्रकाश दीक्षित और दूसरे जगदीशचंद्र पालीवाल। दोनों कविमना व्यक्ति और हम छात्रों में भी साहित्यकार होने की उत्कट कामना जगानेवाले। मुझे याद है कि इन दोनों ही अध्यापकों में कुछ अलग-सी कविताई ठसक थी, जो बाकी के अध्यापकों में न थी। यह चीज मुझे मोहती थी और मैं कुछ-कुछ चकित हुआ सा, चुपके-चुपके उनके व्यक्तित्व के ऐसे कोणों और रेखाओं का अध्ययन किया करता था।

पालीवाल इंटर कॉलेज में दो अध्यापक ऐसे थे, जिन्होंने हमें कभी पढ़ाया नहीं, पर उनकी इतनी गहरी छाप मन पर पड़ी कि मैंने उन्हें अन्य अध्यापकों से कहीं अधिक ऊँचे आसनों पर बैठाया और बड़े मन से उनका आदर किया। आज भी करता हूँ। इनमें एक हिंदी के आचार्य किस्म के शांतिस्वरूप दीक्षित थे और दूसरे अंग्रेजी के शांतमना ओंकारनाथ अग्रवाल।

शांतिस्वरूप दीक्षित हमारे दौर के काफी पढ़े-लिखे अध्यापकों में थे। हिंदी भाषा और साहित्य के बड़े भारी विद्वान्। मेरे साहित्य के बहुत से संस्कार उनकी पुस्तक ‘भाषा भास्कर’ पढ़कर बने। यह हिंदी की अनोखी सहायक पुस्तक थी, जिसे शिकोहाबाद के ही एक प्रकाशक कृष्णा बुक डिपो ने छापा था और भारत में दूर-दूर तक इस किताब की माँग थी। एक सहृदय साहित्यकार ही ऐसी पुस्तक लिख सकता था, जो यों तो एक सहायक पुस्तक ही थी, पर ऐसी रसमय और साहित्यिक कि किसी को भी लेखक बना दे।

सच तो यह है कि हिंदी के दिग्गज लेखकों को जानने की मेरी शुरुआत दीक्षितजी द्वारा लिखी पुस्तक ‘भाषा भास्कर’ से ही हुई। हिंदी के प्रसिद्ध कवियों की इतनी अच्छी पंक्तियाँ इस किताब में इतने सलीके से और उनके वास्तविक ‘मर्म’ को उद्घाटित करते हुए उद्धृत की गई थीं कि मैं अकसर सुबह उठकर तड़के ही याद किया करता था और उस समय कितना आनंद आता था, हृदय में रस की कैसी धारा बहती थी, क्या कहूँ! दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, जयशंकर प्रसाद, निराला, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ समेत कई कवियों की कविताएँ, जो तब ‘भाषा भास्कर’ में पढ़ी थीं, आज भी जस की तस मुझे याद हैं और उन्हीं से एक तरह से मेरा साहित्यिक संस्कार भी बना!

यों मैं निस्संकोच कहूँगा कि मुझे लेखक बनाने में शांतिस्वरूप दीक्षितजी का भी बड़ा हाथ है और उनकी किताब ‘भाषा भास्कर’ आज भी एक मॉडल की तरह से मेरे सामने है कि साहित्य की दुनिया में हम काम करें तो कैसे करें और कैसे पाठकों के एक बड़े वर्ग को रसात्मक ढंग से साहित्य से जोड़ें! हमारे कल के पाठक ही नहीं, लेखक भी यहीं से जन्म लेंगे।

इसी तरह ओंकारनाथ अग्रवाल की लिखी पुस्तक ‘डिलाइट्स ऑफ इंगलिश ग्रामर’ बड़ी अच्छी किताब थी, जिसे हमने दसवीं कक्षा में बड़े ही आनंद के साथ पढ़ा। यह पुस्तक भी हमारे शहर के ही उन्हीं प्रकाशक कृष्णा बुक डिपो ने बड़े सुंदर ढंग से छापी थी। इससे ओंकारजी की एक प्रिय छवि मन में अंकित हुई। पर फिर उनसे मिलना हुआ, तो उनके चुंबकीय व्यक्तित्व से मैं खिंचता ही चला गया। वे आदर्श अध्यापक तो थे ही। पर उन्होंने इससे भी आगे बढ़कर बड़े भाई और गाइड की तरह कदम-कदम पर मेरा बौद्धिक और भावनात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया।

उस समय एक मैं विद्रोही जैसा था, जिसके भीतर हर क्षण एक ज्वालामुखी सा धधकता रहता था। साथ ही एक साथ बहुत कुछ कर डालने का नशा था। हालाँकि दुनिया और दुनियादार लोगों की कोई व्यावहारिक समझ तो थी नहीं। इसलिए मेरी किशोरावस्था और तरुणाई में ऐसे बहुत मौके आए, जब मेरे कदम भटक सकते थे। उस समय ओंकारजी का शांत और संयमित चेहरा मेरे लिए बड़ा संबल बना।

ओंकारनाथ अग्रवाल के निकट रहकर मेरे जीवन में आस्था और विश्वास की नींव मजबूत हुई। तैश में कोई निर्णय लेने के बजाय, आगा-पीछा सोचकर काम करने का ढंग मैंने उनसे सीखा। साथ ही विपरीत स्थितियों में भी अपने निर्णय पर टिकने की दृढ़ता मैंने उनसे सीखी। ओंकारजी के प्रशांत व्यक्तित्व में एक शीतलता थी, जिसने मुझे भी शांत किया। यों उनके निकट आकर मैं भीतर-बाहर से बदला। मेरी अच्छी चीजों को वे बराबर प्रोत्साहित करते थे। इससे आगे कुछ करने की उम्मीद बँधी। नए सपने देखने मैंने शुरू किए। वे स्वयं अध्ययनशील थे, इसलिए शिक्षा से इतर बहुत से सामाजिक-सांस्कृतिक कामों में शामिल होते हुए भी, उनका पढ़ना-लिखना नहीं छूटा। मुझे यह बात अच्छी लगी। तब से जीवन में और बहुत सारे काम करते हुए भी बरसों से मेरा लिखना-पढ़ना अविकल रूप से जारी है। इसका बहुत कुछ श्रेय ओंकारजी को ही जाता है। उनमें एक अध्यापक का मैंने ऐसा रूप देखा था, जिसमें माँ की सी ममता, गुरु का सा गुरुत्व और किसी दिग्दर्शक जैसा गंभीर, प्रशांत और धीरजवान व्यक्तित्व था।

पता नहीं मैंने पहले कहीं इस बात का जिक्र किया है कि नहीं, किसी सभा में या मंचों पर मेरे बोलने की शुरुआत पालीवाल इंटर कॉलेज से हुई थी। अगर मैं भूल नहीं रहा तो ग्यारहवीं कक्षा से। वह पंद्रह अगस्त का कार्यक्रम था, जिसमें मैं खूब तैयारी के साथ बोला था और तभी से एक जोरदार वक्ता के रूप में मेरी धाक जम गई थी। इसके बाद न सिर्फ निरंतर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बोलने की शुरुआत हुई, बल्कि मेरे व्यक्तित्व में भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया। मेरा संकोच और भीरुता कम हुई और मैं धीरे-धीरे मानो बहिर्मुखी होने लगा। छात्रों के बीच जो मुझे लगातार प्रसिद्धि मिल रही थी, वह भी मानो एक तरह से मेरी शक्ति ही थी।

पंद्रह अगस्त के मेरे भाषण को सबसे अधिक सराहा ओंकारनाथ अग्रवाल ने। बोले, ‘‘बहुत प्रभावी था तुम्हारा भाषण। मैं तो बहुत हैरान होकर सुन रहा था। जानना चाहता था कि यह कौन सा विद्यार्थी है, जो देशप्रेम से जुड़ी इतनी बातें कह रहा है।’’ शायद उन्होंने ही सबसे पहले पहचाना कि मेरे अंदर छिपी कोई चीज है, जो औरों से अलग। वे हर जगह इसका जिक्र करते और मुझे आगे बढ़ाने की कोशिश करते।

ओंकारजी ने कभी पढ़ाया नहीं, पर जो मेरे लिए ‘गुरुओं से बढ़कर गुरु’ थे। वे उस आंदोलनकारी समय में जब मेरे भीतर बड़ी भयानक उथल-पुथल चल रही थी और मैं कुछ कर गुजरने के लिए बेचैन था, बमुश्किल मुझे सँभाला और यथासंभव पथ-प्रदर्शन किया। मेरे भीतर एक तरह के ‘आदर्श’ की छवि गढ़ने में उनकी सचमुच बड़ी भूमिका है।

ओंकारजी के जीवन के आखिरी दिनों में ने मेरी उनसे मुलाकात नहीं हो सकी। उनको पारकिंसन की बीमारी ने काफी परेशान किया हुआ था, जिससे उनके हाथ काँपते थे, जबान में भी कुछ लड़खड़ाहट आ गई थी। एक बार उन्होंने मिलने के लिए बुलाया था। पर तब दुर्भाग्य से मैं किसी काम में बुरी तरह फँसा हुआ था। नहीं जा सका। और फिर सुना कि वे गुजर गए। अंतिम समय में उनसे न मिल पाने का बहुत गहरा अपराध-बोध मेरे भीतर है।

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और हाँ, पालीवाल इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य रामगोपाल पालीवालजी का जिक्र तो छूट ही गया! उन्हें भला कैसे याद न करूँ? वे अपने आप में एक खास शख्सियत थे, जिनका कोई जोड़ नहीं था। कोई सानी नहीं। अपने आप में वे एक किंवदंती पुरुष थे और उन्होंने एक तरह से अपना पूरा जीवन ही इस कॉलेज के लिए होम कर दिया था। उनसे जुड़ी कई यादें आज भी मन की स्लेट पर एकदम ताजा हैं। इनमें एक तो यही कि उन दिनों कॉलेज की बिल्डिंग बन रही थी और पालीवालजी दिन में कई चक्कर वहाँ लगाते और राज मिस्त्री, मजदूर सभी को खूब प्रोत्साहित करते थे। कभी-कभी तो उत्साह में आकर वे खुद भी एक मजदूर की तरह ईंटें पकड़ाने के काम में लग जाते थे।

हम लोग कॉलेज की उस अधबनी इमारत में मिस्त्रियों को अकसर दीवारें बनाते या छत डालते देखा करते थे। चारों ओर ईंटें और दूसरा सामान भी बिखरा पड़ा रहता था। पर इस हालत में भी हमारी पढ़ाई में कभी कोई व्यवधान नहीं आया। जरूरत पड़ने पर बरामदे की दीवारें खड़ी करके वहाँ छप्पर तानकर हमारी क्लासों की व्यवस्था कर दी जाती।

कभी-कभी मदद के लिए बड़ी कक्षाओं के छात्रों को भी बुला लिया जाता और सभी उत्साह से इस निर्माण कार्य में शामिल हो जाते। ईंटें पकड़ाने के काम में तो छठी-सातवीं कक्षा के विद्यार्थियों की बालसेना भी बड़े उत्साह से शामिल हो जाती थी। कॉलेज में बड़े घरों के बच्चे भी थे। खूब धनवान और संपन्न परिवारों के बच्चे। पर इस श्रमदान में कभी किसी ने नाक-भौं नहीं सिकोड़ी। उलटे हम सभी को मजा आता था, जैसे यह भी किसी खेल का हिस्सा हो। बाद में केले, अमरूद या चने बँटते और हम लोग परम आनंद से खाते थे। आज सोचता हूँ, रामगोपाल पालीवालजी का समर्पित व्यक्तित्व हमारे सामने न होता तो भला यह सुख और प्रेरणा हमें कहाँ से मिलती? हम इतने आनंद से इस काम में कैसे जुटते?

आश्चर्य, इसके बावजूद हमारा कॉलेज दूर-दूर तक पढ़ाई में अव्वल माना जाता था। दूसरी एक शासियत उसकी यह थी कि अमीर और गरीब बच्चों में कोई फर्क, कोई भेदभाव नहीं था। अध्यापक भी उन्हीं बच्चों को दिल से चाहते और पूरी क्लास में उनकी तारीफ करते थे, जो पढ़ाई में होशियार और मेहनती थे। कई बार तो उनमें गाँव के ऐसे गरीब बच्चे भी होते थे, जिनके पास पहनने के लिए ढंग के कपड़े तक नहीं होते थे। पर अध्यापक अमीरों के बच्चों से ज्यादा उन गरीब बच्चों को पसंद करते थे और उनकी दिल खोलकर तारीफ करते थे। इससे जाने-अनजाने एक बात सब बच्चों के मन में जम जाती थी कि इस संसार में विद्या से बड़ा कोई गुण नहीं है, विद्या से बड़ा कोई खजाना नहीं है। यह ऐसी सीख थी, जिसे हम आज बरसों बाद भी नहीं भूले।

प्रधानाचार्य रामगोपाल पालीवालजी की चर्चा के साथ ये सारी बातें भी इसलिए याद आ गईं, क्योंकि हमारा कॉलेज रामगोपाल पालीवालजी के लिए ईंट और सीमेंट से बनी इमारत नहीं, बल्कि उनकी सर्वोत्तम कृति थी, जिसके चप्पे-चप्पे में उनकी छाप नजर आती थी। वे ऐसे बड़े और समर्पित ‘कृतिकार’ थे, जो अपनी रक्त और मज्जा से कृति की रचना करता है और अपना सर्वस्व उसे देकर निःशेष हो जाता है। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसे बनाने में रामगोपाल पालीवालजी और उनके द्वारा निर्मित कॉलेज का बड़ा और मूल्यवान् योगदान है, मैं इसे भला कैसे भूल सकता हूँ!

५४५ सेक्टर-२९,

फरीदाबाद-१२१००८ (हरियाणा),

दूरभाष : ०९८१०६०२३२७

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