जियो और जीने दो सबको...

किसान

प्रातः वेला में आँखें खोल,

परिंदों का सुन मोहक बोल।

निरख प्राची स्वर्णिम आँचल,

चला कृषक खेतों की ओर।

कंधे पर हल साथ बैलों की जोड़ी,

चारों ओर फैली है खेतों की क्यारी।

मुनि सा किसान कठिन तप करने,

धरती को तृप्त कर जग उदर भरने।

वसुधा को सींच रहा निज श्रम-बूँदों से

मंदिर की घंटियाँ सी बजती वृषभ कंधों से।

कभी तन्मय से गीत मुखर होते हैं,

मनो भूमि रानी का गुणगान करते हैं।

हिंद के किसान की तपस्या कहाँ खत्म हुई

कभी हरित क्रांति कभी श्वेत है लगी हुई

क्रांति संकल्प को ज्येष्ठा से ओत-प्रोत।

श्रम-वीर बनके बढ़ाए आज अन्न स्रोत।

पर देख दशा दीनहीन अपने किसान की

व्याकुल तड़प उठती है भारत की भारती।

कृष्ण विरह

मानस-पटल तिरोहित था

प्रेयसी की विरह व्यथा से

चेतन मन झंकृत होता था

कालिंदी कूल हवा से।

गोकुल का प्रेमी पुरुष

विकल मन से बैठा था,

नहीं आई वृषभानुजा

पल क्षण सोचा करता था।

कहीं पुलिनों से झींगुर झनकते

चौंक उठता उसे पायल समझ के,

शीतल हवा के झोंके जो आते

भूल में रहता वृषभानुजा के।

बाँसों के झुरमुट में सीटी सी बजती

कोमल कला की वह माधुरी सी,

जीवंत होकर वंशी बजाती

वह श्याम होकर वह श्याम की सी।

तंद्रा से आकुल गोपाल का मन

चकित देखता अज्ञात शिशु सा,

गई कहाँ आज वृषभानु तनुजा

व्याकुल है तन-मन जल बिनु मीन सा।

आँखें उठीं देखा क्षितिज पर

मधुचंद्रमा की बाँकी छटा पर,

मनोनील अंबर का घूँघट उठाए

राधे चली जा रही श्यामा तट पर।

अभी कुछ और सोचते श्याम

दिखाई दी लताओं बीच,

रती की मंजुलता सी काम

राधिका इतर गोपियों बीच।

 

जीवन

काँटे पहले मिले सृष्टि से बाद फूल का जन्म हुआ,

प्रकृति प्रगति धारा प्रवाह से जीवन पथ हुआ।

जन्म-मरण संगम की दूरी, जीवन पथ की विस्तृति माप,

जिओ और जीने दो सबको, सत् पथ पर चलते चुपचाप।

कहीं-सुनाई दे इस पथ पर दुग्ध धवल झरनों की वीणा,

कल-कल बहती सरिता लहरें कहीं-कहीं करती हैं क्रीड़ा।

तुमुल घोष कर दुःख के बादल कहीं-कहीं मँड़राते हैं,

वीराने गम जदा मरुस्थल कहीं-कहीं बरसाते हैं।

सत्य धर्म की पहन पादुका कर्म-कवच से ढके शरीर,

कर्म-योगियों की गलियों से जीवन-पथ पर बढ़ते वीर।

गाँव : मामपुर, पो. : लंभुआ

जिला : सुल्तानपुर-२२२३०२ (उ.प्र.)

दूरभाष : ७५२३८९६४२३

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