लोकगीतों में स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति

लोकगीतों में स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति

समाज में लोकगीतों की उपस्थिति सदैव रही है। त्योहारों और उत्सवों में इन्हें गाया जाता रहा है। इतिहासकारों का ध्यान कभी इस ओर नहीं गया कि इतिहास लेखन में भी इन गीतों का महत्त्व हो सकता है। कुछ वर्षों से लोकगीतों ने इतिहास लेखकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। लोकगीतों की विषयवस्तु का अध्ययन करने के उपरांत इस नजीते पर पहुँचा गया कि लोकगीतों में अभिव्यक्त तमाम घटनाओं को भी इतिहास लेखन में स्थान दिया जाना चाहिए। अब लोकगीत इतिहास लेखन के महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गए हैं। यहाँ पर विषय स्वातंत्र्य चेतना का है, अतः हमारे लोकगीतों नें इस चेतना को अपने गीतों में स्थान दिया है या नहीं। यदि दिया है तो कितना और किस प्रकार अभिव्यक्त किया है, इस विषय पर चर्चा करनी है।

हमारे देश की पराधीनता की दास्तान बहुत लंबी रही। लेकिन अंग्रेजी राज की गुलामी के २०० वर्षों में इस देश को जितना व्यथित, अपमानित और उद्वेलित किया, उतना व्यथित यह देश पहले कभी नहीं रहा था। यही कारण है कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की विजय के साथ ही उसके विरोध का जन्म भी हो चुका था। यह विरोध लोकमानस को भी प्रभावित करता रहा और इस विरोध ने लोकगीतों में अभिव्यक्ति पाई। ये अभिव्यक्तियाँ आम आदमी की भावनाओं का प्रमाण हैं। प्रमाण हैं इस बात का कि जनमानस भी जागरूक हो रहा था, वह भी अंग्रेजों की दासता से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था। भले ही वह राष्ट्रीय स्तर पर न सोच पाता हो, पर वह बहुत कुछ सोच रहा था, विचार कर रहा था, अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा था। ‘कोई नृप होई हमें का हानी’ की मानसिकता के बावत लोककवि के गीतों में अब नृप के प्रति घृणा दिखाई देती है। उससे मुक्त होने की चाहत नजर आती है। वनवासियों से लेकर ग्रामीण अंचल तक फैले इस असंतोष की जड़ें बहुत गहरी थीं। उनके हृदय के उद्गार उनकी अपनी स्थानीय भाषा में गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त हुए। खेतों, खलिहानों, चौपालों में गाए जाते रहे ये लोकगीत आज भी उनके बीच सुरक्षित हैं।

लोकगीत हर युग में गाए गए। भारत की आजादी की लड़ाई टुकड़ों-टुकड़ों में रही। यह संघर्ष लंबा रहा। १८५७ की क्रांति के सभी नायक—नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई, कुँवर सिंह, राजा देवी बरजा, बेनी माधव आदि लोकगीतों के विषय बने। १८५७ का संग्राम जनमानस पर गहरी छाप छोड़ गया था। अंग्रेजी राज्य के दमन और कू्ररताओं ने लोकमन को इतना आहत किया था कि लोकगीतों में इस संग्राम की खूब चर्चा रही। कभी-कभी यही लोकगीत शिक्षित समाज के कवियों के प्रेरणास्रोत बने। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पर बुंदेलखंड के हरबोला गायकों ने तमाम लोकगीतों की रचना की। ‘खूब लड़ी मरदानी’ कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता का प्रारंभ ही इन हरबोलों को याद करते हुए किया था—

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसीवाली रानी थी।

केवल नायकों का ही वर्णन नहीं किया इन जनकवियों ने, देश की आर्थिक दशा की भी चर्चा की। वैभव से विपन्नता की ओर देश बढ़ गया। उन्हें इस बात की ही समझ थी कि देश की समृद्धि का नाश कैसे हो रहा है। तभी लोककवि के हृदय से निकला—

देसवा के सब धन धान विदेसवा में जाय रहे।

महँगी पड़त हर साल, कृसक अकुलाय रहे॥

लोककवि ने वर्तमान और अतीत की तुलना कुछ इस तरह की—

होइ गइबे कंगाल हो विदेसी तोरे रजवा में।

सोने की थाली में जहवाँ, जेवना जेंवल रह ली,

कठवा के डोकिया के होइ गइली मुहाल हों,

विदेसी तोरे रजवा में॥

विदेशी शोषण के प्रति कवि के हृदय में कितनी पीड़ा है, यह उपर्युक्त पंक्तियों में स्पष्ट दिखाई देता है। लोककवि को यह भी समझ में आता है कि अंग्रेज रूपी दुश्मन उनके देश को दबाने आया है। अतः युद्ध आवश्यक है; और यह भी कि जो युद्ध नहीं कर सकते, वे युवक साड़ी अच्छी पहनकर घर में बैठ जाएँ—

लागे सरम लाज घर में बैठ जाहु

मरद से बनि के लुगइया आए हरि।

पहिरि के साड़ी च्छी मुँहवा छिपाइ लेहु

राखि लेइ तोहरी पगरइया आए हरि॥

१९०५ में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर दिया। सरकार अनेक वर्षों से बंगाल के विभाजन पर विचार कर रही थी। बंग-भंग के विचार को ही बंगालवासी स्वीकार नहीं कर रहे थे, जब विभाजन हो गया, तब बंगाल में जैसे तूफान आ गया। समस्या यह थी कि शक्तिशाली ब्रिटिश राज्य का विरोध कैसे किया जाए, कैसे उसके आर्थिक वर्चस्व को निर्बल किया जाए। बंग-भग ने एक ओर सशस्त्र क्रांति के मार्ग को प्रशस्त किया, वहीं दूसरी ओर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रयोग का नारा दिया था। बिटिया के विवाह के अवसर पर समधीजी से लोककवि कहता है कि उसकी बेटी का विवाह तभी होगा, जब उनके द्वारा स्वदेशी वस्त्रों को धारण किया जाएगा। पिता को अपनी पुत्री का अनब्याहा रह जाना स्वीकार है। देखिए कितनी सुंदर अभिव्यक्ति है—

फिर जाहु फिर जाहु घर का समधिया हो,

मोर धिया रहि हे कुँआरि।

बसन उतारिं सब फेंकहु विदेशिया हो,

मोर पूत रहिहैं उधार।

बसन सुदेसिया मंगाइ पहिरबा हो,

तब होइहै धिया के विवाह।

निम्नलिखित एक और गीत खादी की लोकप्रियता को प्रदर्शित करता है एवं गांधी, जवाहर और तिरंगे के प्रति महिलाओं के उत्साह को दरशाता है। वे हुलसकर रँगरेज से याचना करती हैं कि बहुत दिनों से एक ऐसी चुनरी पहनने की इच्छा थी, जिसमें—

खादी की चुनरिया रंग दे छापेदार रे रँगरेजवा।

बहुत दिनन से लगलवा जा मन हमार रे रँगरेजवा॥

कहीं पे छापो गांधी महातमा, चरखा मस्त चलाते हों।

कहीं पे छापो वीर जवाहर जेल के भीतर जाते हों।

अंचरा पे झंडा तिरंगा बांका लहरदार रे रँगरेजवा॥

सादी की चुनरिया...।

१९१५ में भारतीय राजनीति में गांधीजी का पदार्पण हुआ। एक नए युग का और शक्तिशाली शत्रु से युद्ध करने की एक नई शैली का सूत्रपात और विकास हुआ (यद्यपि अहिंसा और असहयोग का प्रयोग पहले भी किया जा चुका था)। इतिहासकार कहते हैं कि राजनीति में गांधी का प्रवेश आँधी की तरह हुआ था। लोककवि, जिसने इतिहास का कभी अध्ययन नहीं किया था, वह भी ऐसा ही कुछ कहता है—

गांधी कीं तो आँधी आ गई,

मिलकर शोर मचाएँगे।

गांधी पहुँचे जेल में

हम जेल में जाएँगे॥

गांधी का जमाना था। सारा देश जेल जाने को लालायित था। भाभी का देवर भी हथकड़ी-बेड़ी पहने जेल में था। भाभी कह रही है—

गांधी के आइल जमाना देवर जेलखाना अब गइले।

जब से तपे सरकार बहादुर भारत मरे बिनु दाना।

हाथ हथकडि़या वा गोडवा में बेडि़या,

देसवा भर भइल दिवाना, देवर जेलखाना अब गइले॥

लोककवि की दृष्टि में आजादी की जंग का महत्त्व था। उसके लिए साध्य का महत्त्व था, साधन का नहीं। उसके लिए हिंसा अथवा अहिंसा के मार्ग का विवाद नहीं था। जन-मानस को जगाने के लिए एक ओर गांधी को याद किया तो दूसरी ओर भगतसिंह के बलिदान को सराहा गया, कुछ इस तरह—

जागा बलम गांधी टोपीवाले आइ गइलैं...

राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंह हो,

तहरै जगावे बदे फाँसी पर चढ़ाय गइलै।

लोककवि को ज्ञात था कि भगतसिंह ने अपनी इच्छा से स्वयं के लिए फाँसी का रास्ता चुना था। उन्होंने देशहित के लिए साथियों सहित हँसते-हँसते अपने जीवन का बलिदान कर दिया—

ए रामा भगतसिंह जवनवा,

आरे देस के करनवा ए रामा

हँसि हँसि,

फाँसी पर चढि़ गइले ए रामा॥

सभी इतिहासकार एक मत हैं कि ‘फूट डालो और राज्य करो’ अंग्रेजी सरकार का मूल मंत्र था। इन्हीं कूटनीतिक दाँव-पेंचों द्वारा मुट्ठी भर विदेशियों ने इतने बड़े देश को अपना गुलाम बना लिया था। एक राजस्थानी लोकगीत में आम जनता की वेदना की चर्चा है। कवि कहता है कि अंग्रेज अपने साथ बेगार प्रथा लाए, उन्होंने भाई-भाई को लड़ाया, देश की ऐसी दुर्गति की कि पशुओं से लेकर शिशु तक दाने-दाने को मोहताज हो गए—

देश में अंगरेज आयौ कांई कांई लायौ रे,

फूट न्हाखी भायां में बेगार लायौ रे।

घोड़ा रोवै घास नै, टाबरिया रोवै दाणै नें,

बुरजां में ठाकुराणिया रोवै जामण जाया नें।

हिंदू-मुसलिम समस्या हमारे देश की बहुत बड़ी समस्या रही, आज भी है और अंग्रेजी राज्य में भी थी। धार्मिक आधार पर परस्पर वैमनस्यता कुछ तो थी, बहुत कुछ अंग्रेजों के द्वारा बढ़ाई गई। अंग्रेजी सरकार के लाभ के अनुपात में हमारा नुकसान बढ़ता गया। इस वैमनस्यता ने बहुत खून बहाया और आजादी की लड़ाई को कमजोर भी किया। गांधीजी के अथक प्रयासों के बावजूद दोनों धर्मावलंबियों के बीच की दूरी कम नहीं की जा सकी और अंततः देश बँट गया। लोककवि ने अशिक्षित होते हुए भी एकता की आवश्यकता को समझा था और आमजन को समझाने का प्रयास किया था। उसने बड़े मार्मिक शब्दों में अपील की है कि दो भाइयों के झगड़े में क्या रखा है, गांधी की सीख को मान लो—

अरे चमकै मंदिरवा में चाँद,

मसजिदवा में बंसी बाजै।

मिलि रहू हिंदू मुसलमान,

छांडि देहु सगरे झगड़े।

अरे, मिलि रह दोनों भइया,

लड़ाई झगड़ा न साजै।

मानि जाव गांधी करि सीख,

इन झगडन में काह धरौ॥

कभी भारतीय नरेशों और सैनिकों का विद्रोह। कभी वनवासियों और किसानों का विरोध, फिर क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष, गांधीजी का अहिंसात्मक जन-आंदोलन और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का सैन्य प्रयास इन सबका परिणाम देश की आजादी के रूप में आया। चिर प्रतीक्षा पूर्ण हुई तो लोककवि भी गा उठा—

काहि जे चढि़ आएल भारतमाता,

काहिं जे चढ़ल सुराज,

चलहु सखि! देखन को॥

किथ जे चढि़ आएल वीर जवाहिर,

कथि पर गांधी महाराज।

चलहु सखि। देखन को॥

हाथी चढ़ल आवै भारतमाता,

डोली में बैठल सुराज।

चलहु सखि! देखन को॥

घोड़ा चढि़ आएल वीर जवाहिर,

पैदल गांधी महाराज।

चलहु सखि देखन को॥

एक सखी दूसरी सखी से कह रही है कि चलो, देखने चलें कि भारतमाता और स्वराज्य किस सवारी पर बैठकर आ रहे हैं, जवाहरलाल और गांधी भी। कवि की कल्पना उत्तर देती है कि भारतमाता हाथी पर, स्वराज्य डोली में और जवाहर घोड़ी पर बैठकर आ रहे हैं। गांधी पैदल ही सबका मार्गदर्शन कर रहे हैं। संभवतः उनकी अनेक पद-यात्राओं के कारण यह कल्पना की गई थी।

तो ऐसी थी इन अनाम, अनजान लोककवियों, लोकगायकों की रचनाएँ, जिन्होंने उस कालखंड की भारतीय राजनीति की प्रत्येक आवश्यकता, प्रत्येक आंदोलन और अधिकांश महत्त्वपूर्ण घटनाओं को अपने गीतों में स्थान दिया था, जिन्हें अनवरत सुनते रहने से वैसी ही भावनाओं का जन-मानस में जन्म हुआ होगा। यही कारण था कि प्रारंभिक विरोधों से लेकर अंत तक हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम को उन लोगों का भी साथ मिला, जिन्हें इन आंदोलनों की ही समझ नहीं थी। यह साथ ही बहुत था। इस साथ ने इसे जन-आंदोलन बनाया। स्वातंत्र्य चेतना को जन्म देने में, उसे प्रसारित करने में इन लोककवियों के अवदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती। आज भी ये गीत हृदय को छू लेते हैं और हमारे भीतर उत्साह का संचार करते हैं।

७४ कैंट, कानपुर-२०८००४

दूरभाष : ०९७९२७३३७७७

हमारे संकलन