नरई

न्यूजलपाईगुड़ी। १ सितंबर, २०१६।

जो टे्रन अलीपुरद्वार और दिल्ली के बीच चलती है, उसका नाम ‘महानंदा एक्सप्रेस’ है। उत्तर बंगाल की प्रमुख नदी है महानंदा।

हम दंपती इलाहाबाद जा रहे हैं। महानंदा एक्सप्रेस का आगमन दोपहर पौने दो बजे है। यह टे्रन अकसर देर करती जाती है। बड़ी टे्रनों को रास्ता देना महानंदा का स्वभाव बन गया है और रुकी हुई ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म पर इधर-उधर देखना मेरी फितरत।

महानंदा प्लेटफार्म पर आकर खड़ी हो गई है। कहाँ है ए.सी. टू कोच? ढूँढ़ते रह जाओगे। टी.टी.ई. ए.सी. टू के यात्रियों को ए.सी. थ्री में बर्थ दे रहे हैं। वरिष्ठ नागरिक होने के कारण हमें नीचे की बर्थ मिल गई है। यह मेरे लिए राष्ट्रीय पुरस्कार है। काँच की खिड़की के पार मेरा गाँव-देश है और गाँव-देश के बिंब-प्रतिबिंब। मैं ठहरा बिंब-प्रतिबिंबों का एक अदद द्रष्टा।

टे्रन न्यू जलपाइगुड़ी से निकल चुकी है और अब केले और अनन्नास की मनोरम दृश्यावली के बीच से गुजर रही है। स्वस्थ-प्रसन्न है अनन्नास की खेती। लेकिन मुझे प्लेटफॉर्म पर हॉकर ने दोने में जो अनन्नास के टुकडे़ दिए थे, वे लगभग कच्चे थे। छल कहाँ नहीं उपस्थित है?

किशनगंज आ रहा है। बिहार का सीमांत स्टेशन। बंगाल और बिहार की मिली-जुली भाषा और संस्कृति। अदृश्य सरस्वती के रूप में नेपाली भी विद्यमान है। कच्चे-पक्के घर, झोंपडे़-बाड़ी। बाँस की कोठियाँ। आम-कटहल-केले। कहीं-कहीं सुपारी और नारियल। धान और जूट के खेत। कुछ पोखरों में जूट के बोझ (पूरे बुंदेलखंड़ी में) बेहे गए हैं। माटी-पाथर से दाबकर बोझ को पानी में डुबोया गया है जूट को गलाने के लिए। गलने पर ही रेशे उतरते हैं। रेशे ही तो जूट हैं। सूखने के बाद रेशे के लच्छे और गोले जूट की मिलों में पहुँचते हैं और मिलों से टाट-पट्टियाँ, बोरे-बोरियाँ तथा न जाने कितने आकार-प्रकार में राष्ट्र की देहरी पर उपस्थित होते हैं। दुर्भिक्ष के वक्ष पर चढे़ अन्न के बोरे कितने गौरवशाली लगते हैं।

मेरे बचपन में गाँव की गड़ही के पानी में ऐसे ही सनई बेही जाती थी। अब न सनई रही न गड़ही रही। गाँव के दुर्दांत ने गड़ही दबोच ली। सन-सुतली की रस्सियाँ स्मृतिशेष हो गईं।

जूट के गलने से उसका रंग पानी में उतर आया है। पूरा पोखर कलुआ गया है। ऐसे विषैले पानी में मछलियों को साँस लेने में दिक्कत होती है। वे इच्छा-मृत्यु माँगती हैं। साफ-सुथरे पानीवाले पोखरों के किनारे पानी में बंसी डालकर बैठे हैं ध्यानावस्थित लोग। कब मछली कँटिए की डंडी झकझोरे, कब बंसी की डोर मछली को खींचे।

ये वही लोग हैं, जिन्होंने पिछले तीन महीनों में जी-तोड़ मेहनत की है। जोताई, बोआई, रोपाई, निराई। तब कहीं जाकर धान की हरीतिमा लहराती है। अब उन्हें फुरसत मिली है। बंसी लेकर पोखर के किनारे बैठना उनका शौक है। उनका मछली से गहरा नाता है। इस शौक में तन-मन एकाग्र हो जाता है। महानंदाएँ आती-जाती रहें। न कुछ और दिखाई देता है, न कुछ और सुनाई देता है। दीन-दुनिया से बेखबर।

और उधर कालियाचक में क्या हो रहा है? दूर नहीं है मालदा। प्रसिद्ध है आम के लिए बंगाल का जिला मालदा। उसी जिले का एक उपनगर है—कालियाचक। कालचक्र का तद्भव रूप है—कालियाचक्र। कितना विद्रूप हो गया है तद्भव।

यह उपनगर बांग्लादेश की सीमारेखा पर अवस्थित है। सीमारेखा पर बाड़ खड़ी है। बाड़ के दोनों ओर खेत हैं। पुलिस और बी.एस.एफ. है। खेत में मजदूर-किसान काम कर रहे हैं। अकस्मात् उस पार से प्रक्षेपित जाली नोटों के पैकेट खेत में आ गिरते हैं। रात के अँधेरे में इस पार से एक-एक करके पशुओं को बाड़ से भी ऊपर उठा लिया जाता है और सरकस की शैली में उस पार उतार दिया जाता है। उस पार की युवतियाँ बाड़ के ऊपर से उड़कर इस पार अवतीर्ण हो रही हैं। भारतीय महानगरों को प्रेषित करने के लिए आकर्षक पार्सल तैयार हो रहे हैं।

कालियाचक लूट और हिंसा का प्रधान केंद्र हो गया है। तृण की ओट में बैठी बंगाल बाघिन को यह सब नहीं दिख रहा है। वह किसी और पर कभी-कभी गरजती दिखती है। पुरस्कार लौटानेवाले महान् लेखकों को अभिव्यक्ति की आजादी चाहिए। हिंदी की युवा तर्क लेखिकाएँ और कवयित्रियाँ स्त्री अस्मिता के लिए लड़ रही हैं।

किशनगंज के बाद परिदृश्य बदल जाता है। उत्तर बिहार का वह विस्तृत भूभाग आरंभ होता है, जहाँ प्रतिवर्ष बाढ़ का पानी विनाशलीला करता है। जहाँ तक देख पा रहा हूँ—पानी-ही-पानी। पेड़-रूख पानी में। घर-द्वार पानी में। कहाँ गए लोग? कहाँ गए पशु-पक्षी? बाढ़ तो एक महीने पहले आई थी, लेकिन अभी भी पानी उतरा नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से उत्तर बिहार का यह अंचल धँसा हुआ है। प्रतिवर्ष हवाई सर्वेक्षण।

ऊँची जमीन की विशद पट्टी पर रेलवे लाइन बिछी हुई है। महानंदा पानी के आक्षितिज विस्तार के बीच चली जा रही है। कुछ स्टेशनों के करीब राहत शिविर लगे हुए हैं। जनसंख्या-विस्फोटक, बच्चे खेल-कूद रहे हैं। सर्वहारा-परिवार की एक स्त्री शिविर के द्वार पर बैठी दर्पण के सामने केश-विन्यास कर रही है।

बिहार का शोक—ओ कोसी! अगर श्मशान-भूमि में भी शिविर लगा दिया जाए, तो भी वह विस्थापित परिवार की कुलवधू मसान की पीठ पर बैठकर वेणी-संहार करेगी।

इधर बाढ़ में डूबा बिहार पानी से मुक्ति चाहता है, उधर महाराष्ट्र का मराठवाड़ा और उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड परम वृष्टि पाकर निहाल हो रहे हैं। कटिहार के बाद भू-दृश्य बदलता है। बाढ़ के दृश्य अब नहीं दिख रहे हैं। शाम का धुँधलका उतर रहा है।

बिहार रात की बाँहों में और मैं निद्रा के अनंत में।

सवेरा हो गया है। दक्षिण बिहार की धान-मेखला रात में आई और चली गई। मुगलसराय पीछे छूट गया है। महानंदा चुनार-मिरजापुर क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है।

कहाँ हैं देवकीनंदन खत्री के उपन्यास—चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति में वर्णित वे रहस्यमय जंगल और खोह-कंदराएँ? रेलवे लाइन के आस-पास कुछ जंगली पेड़, कटी-पिटी जमीन और नदी-नाले के पार्श्व में रहनेवाले सरपत अवश्य दिख रहे हैं। यही प्रतीक हैं जंगल के, नदी-नाले के। अब हम प्रकृति को प्रतीकों में देखा करेंगे।

पानी में प्रसन्नचित्त खडे़ हैं धान। नीचे रेलवे लाइन के किनारे वर्षा ऋतु ने जगह-जगह जलाशय बना दिए हैं। कुईं से समन्वित हैं ये जलाशय। अचानक एक जलाशय दृष्टिपथ में आता है और अपनी संपूर्ण दिव्यता के साथ मेरे मानस-फलक पर अंकित हो जाता है। नहीं मिटेगी जन्म-जन्मांतर तक वह छवि।

जलाशय का पानी उज्ज्वल नीलमणि सा दमक रहा है। अपने-अपने मृणाल पर प्रार्थनामय मुद्रा में, पानी में खड़ी है कुमुदिनियाँ। खिली-अधखिली-अनखिली। पानी पर छहरे हैं कुमुदिनी-पत्र। पानी के अरण्य में विहार कर रही हैं नन्हीं-नन्हीं मछलियाँ।

जलाशय के किनारे छिछले पाने में खड़ी है एक घास—नरई। इसमें न कोई गाँठ, न कोई पत्ता। भीतर से पूरी तरह खाली-खोखली। एक नरम शलाका सूर्योन्मुखी।

कोई देखे, न देखे। कोई चीन्हे, न चीन्हे। कोई जाने, न जाने। सृष्टिकर्ता तो देखता है। सिरजनहार तो चीन्हता है। प्रतिपालक तो जानता है। शायद गंगा पार काशी के मध्यकालीन संत ने नरई के किसी पूर्वज को कहीं देखा था और एक कालजयी साखी रच दी—

सतगंठी कोपीन है, साधु न मानै संक।

राम अमलि माता रहै, गिनै इंद्र कौ रंक॥

भस्मस्नात देह पर सात गाँठों से गठा कौपीन धारण कर साधु जब भागीरथी के तट पर सूर्योदय सा खड़ा होता है, तो वह जीवन और जगत् का महानायक हो जाता है, जिसका तेज-प्रताप देखकर पंच महाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश—रोमांचित हो उठते हैं।

महीतल पर अकुतोभय होकर वह सर्वभूत मंगलाय विचरण करता है। वह अपने स्वामी के भक्तिरसायन का पान कर अहोरात्र उन्मत्त रहता है। मेदिनी का वह गगन-गिरि अपने आगे इंद्र को रंक गिनता है।

लखनऊ के नवाब की तरह अपनी बिरादरी में अप्सराओं के साथ अनुरंजन करनेवाला तथा रात के अंधकार में अहल्याओं का अभिमर्शन करनेवाला देवेंद्र किस गिनती का?

२०/३ शिंदे नगर, बावधन

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दूरभाष  : ०२०-२२९५२२३८

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