खुशहालियों के बीच...

खुशहालियों के बीच...

हलो वेणु! हाँ-हाँ, पापा ही बोल रहा हूँ बेटा, वहाँ अमेरिका में तो इन दिनों कड़कड़ाती, बर्फीली ठंड पड़ रही होगी न! बचकर रहना। हम सबका मन लगा रहता है।...हाँ, यहाँ घर के फर्श का काम पूरा हो गया। एकदम पूरा कमरा चमचमा उठा है। वसु और वृंदा के कहने पर किनारे की दीवारों तक चार इंच की टाइलें लगवा दीं। उससे शो भी बढ़ गया, सहूलियत भी। अभी पॉलिशिंग चल रही है।

जैसा तुमसे कहा था, बाथरूम की फिटिंग्स आ गईं। टाइलें आनी बाकी हैं। जितना सोचा था, उससे ज्यादा टाइम और कहीं ज्यादा पैसे भी लग गए, लेकिन हमारी बैठक अब सचमुच वो क्या कहते हैं, ड्राइंगरूम बन गई है।

कल राठौर की मिसेस आई थीं तुम्हारी माँ के साथ। पूछ रही थीं, कुल कितना लगा एक कमरे का फर्श बदलवाने में! पिछली लेनवाले रस्तोगी साहब और मदनमोहनजी भी पूछ रहे थे।

और तो और, मेरे ऑफिस तक भी खबर पहुँच गई। बड़े बाबू और संजय सिंह तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहे थे। तुम्हारे यहाँ आने पर आए तो थे दोनों साथ-साथ। विशाखा के जाने के अगले दिन।

वसु कह रही थी काश! दादा को इस चमकीले फर्श पर सजे सोफे की फोटो भेज पाते, पर हमारे पास कैमरा नहीं है।

तुम कैसे हो, अपना पूरा खयाल रखना। इस बार मैंने ज्यादा समय ले लिया न फोन पर—क्या करूँ मन नहीं माना...!

हलो वेणु!...

हाँ, हाँ, तुम्हारे भेजे डॉलर न! आ गए मेरे बैंक अकाउंट में, पाँच सौ डॉलर। इतने क्यों भेज दिए बेटे, तुम्हारी माँ मेरे ऊपर नाराज हो रही हैं कि जरूर मैंने दबाव डाला होगा, लेकिन मुझे तो नहीं याद पड़ता ऐसा। मैंने तो बढ़ी हुई मजदूरी और बाथरूम में लगे काम की बात की थी, जिसके लिए तुम्हीं ने सबसे ज्यादा जोर दिया था, बल्कि तुम तो चाहते थे, तुम्हारे रहते ही काम शुरू हो जाए।

लेकिन खैर, झूठ क्यों बोलूँ, तुम्हारे पैसे बहुत ठीक समय से आए, मैं काम खत्म करवाने ही वाला था कि कल अचानक क्वार्टर नंबर नौ वाले कासलीवालजी आ गए। चाय पीकर जाते हुए बोले, अंदर तो शुक्लाजी बहुत बढि़या काम करवाया आपने, इसी के साथ बाहरी मुँड़ेरों के उखड़े पलास्टर भी दुरुस्त करवा लेना था। पचीसों हजार तो लगे ही होंगे। पाँच हजार और में घर की शोभा बढ़ जाती। तुम्हारी माँ और वसु-वृंदा को भी उनकी बात ठीक लगी। सबसे बढ़कर सीमेंट की छोटी बोरी भी बची थी। सोचा था, दुकानवाले से वापस लेने के बारे में पूछूँगा, पर अब तो खैर उलटे दो बोरी और लग जाएँगी, मजदूर पहलेवाले हैं ही, काम समझ गए हैं...और बताओ, तुम कैसे हो?

हलो वेणु बेटाऽ!...

तुम विश्वास करोगे? वृंदा की, अपनी वृंदा की शादी...लगभग तय समझो...अरे आज सुबह ही देखकर गए हैं वे लोग, योंही बात चल रही थी...मैंने तो सोचा भी नहीं था कि इतनी हैसियतवाली पार्टी मान जाएगी। वृंदा को देखते ही पहली बार में हाँ कर दी। नहीं बेटा, सुभाष मामा की अंजु वृंदा से कम सुंदर थोड़ी है। हैसियत भी मुझसे ज्यादा ही है मामा की। लेकिन पिछले चार साल से परेशान हैं। हर हफ्ते, दस दिनों पर कोई-न-कोई पार्टी काजू, रसगुल्ले, कोल्ड ड्रिंक और कॉफी पीकर ‘हम खुद आपको फोन करेंगे’ का आश्वासन देकर चली जाती है। पहले इंतजार करो, फिर बेशर्म बनकर फोन करो तो वही टका सा जवाब। कहीं कुंडली में दोष, कहीं कोई और अड़चन बताकर टरका देंगे।

लेकिन ये लोग पूरा भरोसा दे गए हैं कि उनकी तरफ से बात पक्की।

विश्वास अभी भी नहीं हो रहा बेटे, लड़का निखिल, मुंसिफ, पिता मजिस्ट्रेट। खानदानी, इज्जतदार लोग। हमारी हैसियत उनके सामने कुछ भी नहीं। इन्हीं कासलीवालजी के कहने पर एक बार चला गया था उनके घर, बेहद मॉडर्न रुतबेदार लोग। साफ-सुथरा घर, नौकर-चाकर, बढि़याँ काँच के गिलास-प्लेटें, मैं तो यह सोचकर लौटा था कि इस घर में अब लौटकर अपनी फजीहत नहीं करानी, कहाँ ये लोग, कहाँ हम! लेकिन किसमत देखो कि वे ही लोग आ गए और वृंदा को पसंद भी कर गए।

पिछले पूरे हफ्ते उनके आने की खबर के बाद से वसु-वृंदा और तुम्हारी माँ पूरे घर की बजरी, मिट्टी, धूल साफ करते-करते थक के चूर हो गईं। तीन दिन में जल्दी-जल्दी बाहरी मुँड़ेरों पर हल्की हरी पुताई भी करवा दी। खैर, जब तक वे लोग आए, पूरा घर न सही, बाहरी मुँड़ेरें और ड्राइंगरूम एकदम लकदक था। वसु तो सबसे ज्यादा खुश इसलिए थी कि मजिस्ट्रेट साहब की मिसेस बाथरूम में भी गई थीं। खैर, अच्छा यह लगा कि इतने मॉडर्न, हैसियतदार होते हुए भी बातचीत में दिखावे या घमंड का नामनिशान नहीं, फिर भी देखो—कब कौन उनके कान भर दे, कितने लड़कीवाले उनके आगे-पीछे डोल रहे हैं, कहने की बात नहीं। और लड़केवालों का मूलाधार चक्र तो बस एक ही होता है, लड़की के पिता की हैसियत!

हलो वेणु!

कल वृंदा की गोदी की रसम कर गए बाजपेयी लोग। हम सभी लोग तुम्हें बहुत याद कर रहे थे। मैं उन्हें साइड टेबल पर रखी तुम्हारी फोटो दिखा रहा था तो वसु तुम्हारी पूरी अलबम ही उठा लाई।

उनके जाने के बाद बड़ी शान से कह रही थी वृंदा से, हुँह, हैसियत चाहे जितनी हो वृंदा तेरे ससुरालवालों की, लेकिन उनके यहाँ से कोई अमेरिका वगैरह नहीं गया है। सारे इंतजाम में वसु थकी भी बहुत। हम लोग डर रहे थे कि कहीं पूरा घर ही न देखने लगें वे लोग। औरतों का क्या ठिकाना, क्योंकि नए पॉलिशवाले चमाचम फर्श के बाद बाकी कमरों के फर्श और ज्यादा भदरंग दिखने लगे हैं, लेकिन ईश्वर को धन्यवाद, कोई गया नहीं।

हलो वेणु!

हाँ-हाँ, सब ठीक है यहाँ। हाँ, बाजपेयीजी से भी बात होती रहती है। एक बात बता दूँ, बाजपेयीजी तुम्हारे नाम और काम से बहुत ज्यादा इंप्रेस्ड हैं। मेरा भी तो दिल नहीं मानता। मुँह से तुम्हारी बात निकल ही जाती है कि उतनी दूर से भी मेरा अकेला बेटा बहुत प्यार करता है अपनी बहनों और माँ-बाप को भी...तो समझ लो तुम्हारे नाम और काम की बहुत बड़ी मदद रहती है तुम्हारी गैर-हाजिरी में भी।

हलो वेणुऽऽऽ...

हाँ बेटा, मैं चाहता था खुलकर लेने-देने की बात हो जाती तो मुझे थोड़ा अंदाज हो जाता, शादी के खर्च वगैरह का। लेकिन वे तो इन बातों का जिक्र ही नहीं करते। लेकिन ऐसा लगता है कि बरात में बहुत लोग हो जाएँगे। खानदानी रईस लोग हैं। रिश्तेदार भी सब नामी-गिरामी। लगता है, मुझ पर और खासकर तुम पर ज्यादा ही विश्वास हो गया है उन्हें। हर बात इस बराबरी के लहजे में जैसे इतना तो हमारे बाएँ हाथ का खेल हो, अब अपने बजट की सीमा बताना उनका विश्वास तोड़ने जैसा लगता है—कैसे, क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता। कोई तेवरों में बात कर रहा हो, सीधे लेन-देन की तो हिसाब-किताब के लहजे में बात की जा सकती है। लेकिन अगर हर बात में जरूरत से ज्यादा शाइस्तगी जताते हुए इज्जत से बात करे तो अपनी तंगी की बात उठाते भी नहीं बनता। मैं कभी कुछ कहने की कोशिश भी करता हूँ तो उल्टे मुझे आश्वस्त करने लगते हैं कि ‘अरे, आप बिल्कुल मत परेशान होइए। वेणुजी सब मैनेज कर लेंगे। आपने, जैसा अपनी फैमिली के बारे में बताया और बताया क्या, मैंने खुद अपने आँखों से देखा, उससे आपकी फैमिली-वैल्यूज और टेस्ट का पता चल जाता है। आप भी जानते हैं, मैं भी कि ज्यादा हमें चाहिए नहीं और कम आप देंगे नहीं, यानी कुछ उठा नहीं रखेंगे आप।’

हाँ, शादी ये लोग जल्दी ही करना चाहते थे। मैंने कहा, इतनी जल्दी तो वेणु को अमेरिका में छुट्टी नहीं मिल पाएगी तो झट मान गए, ‘कि नहीं, वेणुजी के बिना कैसे होगा। हम इंतजार कर लेंगे, वेणुजी का दिसंबर तक।’

हलो वेणु!...

आज रात बिल्कुल नहीं सो पाया बेटे! पता नहीं क्यों बड़ी घबराहट हो रही है। बाजपेयीजी सीधे-सीधे तो अब भी कुछ माँग नहीं रहे हैं, लेकिन उनकी बातों से लगता है, मंसूबे बहुत ज्यादा हैं उनके। मुश्किल यही कि साफ-साफ कुछ कहते, बताते ही नहीं।

बरात में ही उनके हजार ऊपर लोग हो रहे हैं। दूसरे शहर से आ रही है फिर भी। और भी, न जाने किस-किस शहर के लोग अलग से शादी में शामिल होने आएँगे। सबको रिसीव करने के लिए कार, ड्राइवर की व्यवस्था। ठहराना भी होटल में ही पड़ेगा। इस एरिया में कोई ठीक-ठाक होटल होता तो भी सहूलियत होती। मुझे बहुत घबराहट हो रही है।

कुछ भी पूछने पर उसी इत्मीनान से कहेंगे, बस वेणुजी को जल्दी बुला लीजिए। वे सब सँभाल लेंगे। आप क्यों परेशान होते हैं। मेरे बहुत जिद करने पर कि वेणु के आने तक काम बहुत बढ़ जाएगा। तब तक मैं, वाइफ, बेटियाँ, थोड़ा-थोड़ा करते चलें। बोले, ‘ठीक है तो वृंदा से कहिए निखिल के सूट का शेड पसंद कर ले।’

दुकान पर पूछा तो अकेले निखिल का सूट ही ‘ब्लू-बेरी’ वाला सात हजार का। हम सबके होश उड़ गए। किसी तरह बहाना करके दुकान से बाहर निकल आए। मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा, बेटे। बहुत मन को समझा-बुझाकर परसों गया था। किसी तरह अनुनय कर बात चलाई कि आपकी जो भी मंशा हो, सोचा हो, कैश, आइटम, लिखवा दें, जिससे बाद में आपको जरा भी शिकायत का मौका न मिले, तो फौरन उखड़ गए। तपाक से बोले, ‘कैसी बातें करते हैं शुक्लाजी! हम-आप अब रिश्तेदार होने जा रहे हैं। एक-दूसरे के हितैषी। बीच में लेन-देन कहाँ से आ गया! हमें कोई खरीद-फरोख्त थोड़ी करनी। अरे, आप एजुकेटेड, समझदार लोग। खुद कोई कसर नहीं उठा रखेंगे। मुझे मालूम है, आप हमें कोई ऐसा मौका देंगे ही नहीं।’

और सबसे बढ़कर आपने तो एक बेटी की शादी भी की है। मुझसे कहीं ज्यादा अनुभवी...तो बताना तो आपका पड़ेगा मुझे, शादी के इंतजामात वगैरह के बारे में।

तुम कब तक आ रहे हो बेटे! मुझे तो कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा। तू आ जाए तो बाजपेयीजी से बात करने की जिम्मेदारी तेरी, बाकी की देखभाल मैं कर लूँगा।

नहीं, पैसे के लिए तो मैंने अपने फंड से भी आधे के लिए अप्लाई कर दिया है। डेढ़-पौने दो लाख हो जाएँगे, लेकिन ये लोग पहले से तय कर लेते तो अच्छा था।

अब मैं तुम्हें मना भी कैसे करूँ, हजार-हजार डॉलर दो बार तो तुम भेज चुके। नहीं, और भेजने की बिल्कुल जरूरत नहीं। बस तुम आ जाओ, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा!

हलो वेणु!

हाँ पापा, नहीं, मैं मम्मी बोल रही हूँ बेटा। घर के नहीं, गली के नुक्कड़वाले फोन बूथ से।...इन दिनों तेरे पापा जिस तरह दिन-रात बदहवास हैं, मुझे तो बहुत डर लग रहा है कि कहीं शादी तक बीमार न पड़ जाएँ। मैं इनसे बार-बार कहती हूँ कि वे सुनें या न सुनें, अपनी सारी स्थिति उनके सामने सही-सही बता दो, लेकिन इनका कहना है, वे कुछ सुनते ही नहीं। अपनी ही बोले जाते हैं। पिछले डेढ़ महीने में जब से वृंदा की शादी तय हुई है, शरीर आधा रह गया है, न जाने कौन सी चिंता इन्हें खाए जा रही है। मुझे तो बड़ा डर लग रहा है बेटे। बार-बार सोचती हूँ, शादी-ब्याह अपनी हैसियतवालों के बीच ही होना ठीक रहता है। विशाखा की शादी में तो देवेंद्र के रिश्तेदारों ने जान-बूझकर दुश्मनी निकाली थी, लेकिन इन पैसेवालों की माया कुछ समझ में नहीं आ रही!

तेरे पापा बेहद परेशान हैं, बाजपेयीजी की शातिर चालों से। मुँह से कहेंगे कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए, वेणु खुद ही समझदार हैं। वे नॉन-एसी गाड़ी खरीदेंगे ही नहीं। उन्हें खुद पता होगा कि मार्केट में कौन सा टी.वी. बेस्ट है, देखिए बात रुपए और पैसे की नहीं, आपके घर से जो भी चीजें यहाँ आएँगी, उससे मेरा नहीं, आपका स्टेटस बढ़ेगा।

हमेशा बातें तेरे पापा से करेंगे, लेकिन लक्ष्यवेध तू ही होता है, जैसे सीधे-सीधे तुझसे ही बातें कर रहे हों कि भई, शादी में दान-दहेज जैसे मोलभाव के तो मैं सख्त खिलाफ हूँ। मैंने तो निखिल से कहा, उसका भाई इतना खुद्दार है कि शादी के बाद की वृंदा की पहली ‘राखी’, नहीं तो भाई दूज तक ‘एयर कंडीशंड गाडी’ तुम्हारे दरवाजे पर खड़ी मिलेगी।

नहीं, तुझे अब कुछ भी भेजने की जरूरत नहीं है बेटे। वृंदा भी किसी तरह तैयार नहीं। तू अमेरिका नहीं गया होता तो क्या वृंदा की शादी नहीं होती? बस किसी तरह एक बार आने की कोशिश कर।

(शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ‘...कौन देस को वासी’ (वेणु की डायरी) का एक अंश।

 

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