प्रभु के सहचर-रसाद्वैत संत श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार

‘भाईजी’ श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी को हम प्रायः गीता प्रेस से जुड़ा हुआ या ‘कल्याण’ के यशस्वी संपादक के रूप में जानते हैं। ‘गीता प्रेस’ की स्थापना तो पूजनीय सेठजी श्री जयदयाल गोयनकाजी ने की थी, परंतु उसका पोषण एवं संवर्द्धन भाईजी ने लगभग ४५ वर्षों तक किया था। उनके ही मार्गदर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरित मानस एवं श्रीमद्भागवत महापुराण के साथ-साथ हिंदू वाङ्मय के अनेक ग्रंथों का प्रामाणिक प्रकाशन गीता प्रेस के द्वारा हुआ। यह इन दो संतों के दिव्य संसर्ग, आध्यात्मिक आलोक, प्रभु की अद्भुत योजना एवं मारवाड़ी वणिक की सूझबूझ का परिणाम है कि गीता प्रेस प्रतिवर्ष दो करोड़ पुस्तकें बेचती है। बिना चंदे के, बिना विज्ञापन के, यह प्रेस इतनी सस्ती पुस्तकें कैसे बेच सकती है? यह सभी के लिए आश्चर्य का विषय है। गीता प्रेस वास्तव में विश्व की सबसे बड़ी प्रेस कहलाने की अधिकारी है।

परंतु भाईजी संपादक एवं लेखक के अतिरिक्त एक उच्चतम कोटि के भक्त, ज्ञानरूढ़ साधक एवं वीतरागी कर्मयोगी भी थे, यह सत्य कम लोग ही जानते हैं। भाईजी की दिव्य जीवन-यात्रा बाल्यकाल से ही आरंभ हो गई थी। बालक मन्नू अपनी दादी के साथ मंदिर जाता तो पेड़ के नीचे बैठकर सहज ध्यानमग्न हो जाता था। मुफ्त बेरों के लालच में मन्नू ने पूरी गीता कंठस्थ कर ली थी। दादी रामकौरजी ने अपने प्रिय पोते को अटूट नाम जाप का अभ्यास करवा दिया था।

अन्य मारवाड़ी व्यापारियों की तरह युवक हनुमान ने धंधे के लिए कलकत्ते की ओर प्रस्थान किया। परंतु युवक हनुमान का मन एवं ध्यान आध्यात्मिक सत्संग एवं क्रांतिकारी गतिविधियों में अधिक लगता था, धंधे में न्यूनतम। इसीलिए भाईजी कभी सफल व्यापारी नहीं बन सके। भाईजी जब रोड़ा कांड के तहत अलीपुर जेल में बंदी थे तो रात्रि में अवसाद मिटाने के लिए उन्होंने नाम जाप का सहारा लिया। अपने शिमलापाल की एकांत नजरबंदी की सजा के दो वर्षों में भाईजी ने ‘श्री नारायण’ के चित्र पर दिन-रात ध्यान का अभ्यास इतना प्रगाढ़ एवं स्थायी बना लिया था कि बंद नेत्रों से, खुले नेत्रों से, चर या अचर जीवों में भाईजी को ‘नारायण’ की छवि के दर्शन होते थे। भाईजी शिमलापाल को अपनी साधना स्थली कहते थे। ऐसा दिव्य एकांत उन्हें पुनः नसीब नहीं हुआ।

भाईजी प्रायः कहा करते थे, ‘‘यह अति सामान्य एवं साधारण जीवन ईश्वर की कृपा का प्रसाद है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मुझे प्रतिपल यही लगता है कि मेरे जीवन को प्रभु ही चला रहे हैं।’’

बंगाल से निर्वासन के बाद भाईजी अपनी दादी, माता, दो बहनों एवं पत्नी का उत्तरदायित्व निभाते हुए कोई सुरक्षित व्यवसाय की खोज कर रहे थे। इसी सिलसिले में मारवाड़ी समाज के सिरमौर एवं गांधीजी के परम अनुयायी श्री जमनालाल बजाज ने भाईजी को धंधे के लिए बंबई बुलवा लिया। यहाँ भी भाईजी की अनेक सफल-असफल एवं आधे-अधूरे धंधों में भागीदारी रही। जहाँ भाईजी के समवयस्क मित्र राम कृष्ण डालमिया एवं घनश्याम दास बिड़ला व्यवसाय की ऊँचाइयों को छू रहे थे, वहीं हनुमान प्रसाद पोद्दार का परिवार दो समय की रोटी ही जुटा पा रहा था।

लंबे समय तक कांग्रेस में सक्रिय रहने के पश्चात् भी भाईजी कांग्रेसी नेताओं के विचारों से मन नहीं मिला पाए। बंबई प्रवास में  भाईजी को अनेक दिव्य अनुभव हुए, जिन्हें हम प्रभु की अनुभूति या आंशिक साक्षात्कार कह सकते हैं। भाईजी ने अपने गुरुवत् मौसेरे भाई श्री जयदयाल गोयनकाजी द्वारा प्रेरित होकर प्रभु के निर्गुण-निराकार स्वरूप की दृढ साधना की। इस साधना में अपनेपन का भेद सर्वथा मिट जाता है, जो व्यष्टि में होता है, वही समष्टि में सिमट जाता है एवं मन उसी चेतनावस्था में स्थिर हो जाता है। भाईजी इस साधना में काफी आगे बढ़ गए थे, तभी एक चमत्कारिक अनुभव हुआ, उन्हीं के शब्दों में, ‘‘एक दिन निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करते-करते सहसा नारायण का सगुण स्वरूप प्रकट होने लगा। मैं बरबस प्रभु की सगुण छवि को हटाकर निर्गुण स्वरूप पर ध्यान जमाने का बरबस प्रयास करता, परंतु नारायण की छवि सामने से हटी ही नहीं। तभी एक तीव्र अनुभूति हुई कि दोनों तत्त्व एक ही हैं। सत्य एक ही है। निर्गुण रूप भी मेरा है एवं सगुण स्वरूप भी मेरा है।’’

भाईजी की यह अनुभूति निर्गुण एवं सगुण पर वाद-विवाद करनेवालों का मुहँ बंद करनेवालों के लिए पर्याप्त है।

६ दिसंबर, १९२७ को बिहार के जसडीह नगर में कभी न सुनी, न देखी एवं न कही प्रभु की असीम कृपा बरसी थी। भाईजी ने जाग्रत् अवस्था में खुले नेत्रों से मित्र समाज के बीच साक्षात् नारायण की छवि के दर्शन किए थे, उसी साक्षात्कार में अनेक ऋषि-मुनियों ने सदेह दर्शन दिए थे, जिनमें नारद मुनि एवं अंगिरा ऋषि प्रमुख थे। कलियुग में साक्षात् अवतरण का यह दृष्टांत अद्भुत था।

भाईजी अपने सत्य स्वरूप को यथासंभव सबके सामने छिपाकर रखते थे। परंतु भाईजी के अन्यतम सहयोगी श्री गंभीर चंद दुजारीजी उनके एक-एक शब्द एवं एक-एक लेख को बहुमूल्य खजाने की तरह सहेजकर रखते जाते थे, यह दुजारीजी के परिश्रम का ही फल था कि भाईजी द्वारा रचित सत्रह हजार पृष्ठों का अमूल्य साहित्य हमारे सामने है। दूसरी ओर भाईजी की चिन्मय देहगति एवं उनके भीतर अबाध चल रही नित्य लीला का प्राकट्य पूज्य राधा बाबा ने किया था। राधा बाबा ने रतनगढ़ प्रवास के दौरान एक रात्रि में दुजारीजी एवं चिम्मन लालजी गोस्वामी के सामने यह रहस्योद्घाटन किया था। बाबा के शब्दों में—‘‘आप विश्वास करें कि पोद्दार प्रभु का यह पाँच भौतिक ढाँचा पूरी तरह राधा रानी के अधिकार में है। ऊपर से वे संसार के कार्य कर रहे हैं, परंतु उनके भीतर नित्य लगातार प्रभु की लीला चल रही होती है। उनका सूक्ष्म शरीर युगल सरकार (श्री कृष्ण एवं श्री राधा रानी) को पूर्णतया समर्पित है। अतः प्रभु जब चाहें, तुम्हारे भाईजी की बाह्यवृत्तियों को लुप्त करके उन्हें अपने साथ लीला में प्रवेश कर लेते हैं। हाथ में कलम थामे या हाथ धोते हुए भाईजी स्पंदनहीन हो जाते हैं, उनकी देह निश्चल हो जाती है एवं आँखें पथरा जाती हैं। यह आपने बहुधा देखा है, भाईजी इस अवस्था को ‘माथा खराब’ होना कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि भाईजी का बाह्य जगत् से संबंध टूट गया है एवं अपने प्रभु से संयोग हो गया है।’’

श्री चैतन्य प्रभु के समकक्ष ही भाईजी की आतंरिक अवस्था है, ऐसे उदहारण संसार में बिरले हैं।

बंबई से धंधा समेटने के पश्चात् भाईजी का मन तो संन्यास लेकर गंगाजी के तट पर अनवरत प्रभु-भजन एवं भक्ति करने का था। परंतु प्रभु का मन तो भाईजी को समाज-संसार के बीच रखकर उनके माध्यम से लोक कल्याण के अनेकों कार्य सिद्ध करवाने का था। इस प्रकार भाईजी की ट्रेन बंबई से चलकर सीधे गोरखपुर पहुँची। फलस्वरूप भाईजी ने ४५ वर्षों तक ‘कल्याण’ का संपादन किया। गीता प्रेस एवं कल्याण के माध्यम से भाईजी ने हिंदू समाज को बीसवीं सदी की अप्रतिम भेंट दी है।

नाम-जाप का वृहत्तर कार्यक्रम भाईजी द्वारा आरंभ हुआ, जहाँ भक्तों ने करोड़ों की संख्या में नाम-जाप का संकल्प लिया एवं मारवाडि़यों की बही में रोकड़े के हिसाब की जगह नाम-जाप का हिसाब लिखा जाने लगा। कर्म क्षेत्र में भाईजी ने नोआखली जैसी अनेक सामाजिक आपदाओं में भाईजी ने सेवा कार्य किए, गौ-रक्षा आंदोलन, कृष्णजन्मभूमि की मुक्ति एवं भगवद् भवन के निर्माण में भाईजी सबसे आगे थे। भाईजी ने विश्व हिंदू परिषद् की स्थापना में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हरे राम-हरे कृष्णा के संस्थापक श्री प्रभुपादजी भी अमेरिका जाने से पहले भाईजी का सहयोग लेकर गए थे।

इसके बावजूद भाईजी ने कभी शिष्य नहीं बनाए या कोई आश्रम स्थापित नहीं किया। भाईजी ने अंग्रेजों के राज में ‘रायबहदुर’ की उपाधि एवं भारत सरकार द्वारा ‘भारत रत्न’ की उपाधि को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। भाईजी ने कभी धन अर्जित नहीं किया। परंतु उनके द्वारा लाखों की धनराशि लोक सेवा के लिए व्यय हुई।

१७ सितंबर, १८९२ में जनमे शेखावाटी के रतनगढ़ नगर के निवासी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी की इस वर्ष १२५वीं जयंती वर्ष है। इस पुण्य अवसर पर हम भाईजी के जीवन से दो प्रमुख सीख एवं आदर्श ग्रहण कर सकते हैं।

प्रथम, भाईजी की आध्यात्मिक यात्रा एवं चरमोत्कर्ष अवस्था कोई दैविक चमत्कार नहीं है, वरन् पुरुषार्थ का परिणाम है। जिसे कोई भी साधक अपनी मेहनत से प्राप्त कर सकता है।

द्वितीय, भाईजी जीवन भर परिवार एवं समाज के बीच घिरे रहे, समाज की विसंगतियों से जूझते रहे। परंतु भाईजी कमल की भाँति संसार के पंक से अछूते रहे। जीवन के उत्तरदायत्वों को निभाते हुए अपने प्रभु से एकनिष्ठ जुड़े रहे।

प्रभु से यही प्रार्थना है कि इस अखंड दिव्य ज्योति की एक किरण हमें भी मिल सके।

6070 Eaglet Dr.

West Chester, OH45069

USA

हमारे संकलन